घर पहुँचने की खुशी बयां नहीं की जा सकती है

    हम जीवन मे संघर्ष करते हैं, अपने लिये और अपने परिवार के लिये । सब खुश रहें, सब जीवन के आनंद साथ लें । जब हम संघर्ष करते हैं तब और जब हम संघर्ष कर किसी मुकाम पर पहुँच जाते हैं तब भी घर जाने का अहसास ही तन और मन में स्फूर्ती भर देता है। घर जाने का मतलब कि हम हमारी कामकाजी थकान से रिलेक्स हो जाते हैं और अपने लिये नई ऊर्जा का
संचार करते हैं। घर पर अपने परिवार से मिलने की खुशी हमेशा ही रहती है।
 
    मैंने जब से नौकरी करनी शुरू की तब से ही हमेशा मेरे काम में घूमना शामिल रहा, कभी ज्यादा दिनों को लिये तो कभी कम दिनों के लिये तो कभी सुबह जल्दी जाकर देर रात तक वापिस घर आना। नौकरी के शुरूआती दिनों में जब मेरी शादी नहीं हुई थी तब भी मैं घर जाने पर बहुत खुश होता था। घर जाने का सुकून कुछ और ही होता था, माँ पिताजी को देखकर ही
सारी थकान मिट जाती थी, उनके साथ मिलकर उनकी हँसी, उनकी डाँट, उनका प्यार सबमें अपना अलग ही अपनापन लगता था। घर पहुँचने का इंतजार इसलिये भी रहता था कि बाहर कोई बड़ी उपलब्धि प्राप्त हुई तो सबसे पहले घर पर परिवार के साथ बाँटने में ही मजा आता था। मेरे बगीचे के पौधे और उनके फल फूलों के बीच मैं अपने आप को सातवें आसमान पर पाता था।
    जब शादी हुई तो भी नौकरी में यात्राएँ चलती ही रहीं और अब घर आने के लिये घरवाली जो कि हमारे जीवन में सबसे अच्छी दोस्त भी होती है, उसके साथ ज्यादा समय बिताने के लिये भी और बहुत सी बातें साझा करने के लिये भी मन उतावला रहता था। ऐसा लगता था कि बस अभी पंख लग जायें और अभी मैं घर पहुँच जाऊँ, कई बार मैं बहुत से उपहार लेकर घर जाता था, तो भी ऐसा लगता था कि बस उपहार खरीदते ही घर पहुँच जाऊँ और झट से उपहार घर पर सबको दे दूँ।
    जैसे जैसे जिम्मेदारियाँ बढ़ती गईं अपने कैरियर में भी आगे बड़ते गये, देश के साथ ही विदेश की भी यात्राएँ होने लगीं, अब कुछ हजार किमी की जगह कई हजार किमी दूर हवाईजहाज में बैठकर आना जाना होता था और परिवार के साथ केवल वीडियो चैटिंग पर ही बात किया करते थे, देख सकते थे पर वह अहसास नहीं होता था जो घर पर होता था, जब भी मैं वापिस भारत अपने घर के लिये निकलता था, तो बस ऐसा लगता था कि अब मेरी सारी थकान मेरे बेटे की हँसी से ही मिट जायेगी, मेरा बेटा मेरी गोद में आकर मुझे बहुत सारा प्यार करेगा, और फिर डैडी डैडी आवाज लगाकर बस मेरे आगे पीछे घूमता रहेगा। फिर मेरे साथ अपने गेम्स खेलने की जिद भी करेगा और मैं बेटे के साथ इन सारी बातों को यादकर ही खुश हो लेता था, घर जाने की खबर ही मन में स्फूर्ति भर देती है। आज भी शाम के घर पहुँचने का इंतजार इसलिये ही होता है कि घरवाली और बेटा, मैं दोनों के खिलखिलाते चेहरे देखकर ही सारे दिन की थकान छूमंतर हो जाती है।
यह पोस्ट हमने हाउसिंग.कॉम के लिये लिखी है।

2 thoughts on “घर पहुँचने की खुशी बयां नहीं की जा सकती है

  1. रंगों के महापर्व होली की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ…

    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (07-03-2015) को "भेद-भाव को मेटता होली का त्यौहार" { चर्चा अंक-1910 } पर भी होगी।

    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।

    सादर…!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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