सोशल नेटवर्किंग के युग में टूटती आपसी वर्जनाएँ

आज का युग तकनीक की दृष्टि से बेहद अहम है, हम बहुत सी तरह की सामाजिक तानेबाने वाली वेबसाईट से जुड़े होते हैं और अपने सामाजिक क्षैत्र को, उसके आवरण को मजबूत करने की कोशिश में लगे होते हैं। हम सोशल नेटवर्किंग को बिल्कुल भी निजता से जोड़कर नहीं देखते हैं, अगर हम किसी से केवल एक बार ही मिले होते हैं तो हम देख सकते हैं कि थोड़े ही समय बाद उनकी फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट हमारे पास आयी होती है या फिर हम खुद से ही भेज देते हैं। जबकि हम अपनी निजी जिंदगी में किसी को भी इतनी जल्दी दाखिल नहीं होने देते हैं, किसी का अपनी निजी जिंदगी या विचार में हस्तक्षेप करना हम बहुत बुरा मानते हैं और शायद यही एक कारण है कि जब तक हम किसी को जाँच परख नहीं लेते हैं तब तक हम उससे मित्रता नहीं करते हैं।

सोशल नेटवर्किंग के दौर में हम ज्यादा से ज्यादा मित्र बनाने की जुगाड़ में लगे रहते हैं, जुगाड़ इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि हम अपने दोस्तों को बताना चाहते हैं कि हमारे इतने सारे दोस्त हैं, हमारा सामाजिक दायरा कितना बड़ा है, और हम इसी चक्कर में सभी को अपना मित्र बनाते जाते हैं, जबकि मित्र बनाने के पहले किसी के बारे में जानना बहुत जरूरी है, क्योंकि वह आपके सामाजिक दायरे से जुड़ रहा है और इसका असर आपकी सोशल नेटवर्किंग की साइट्स की सामाजिक प्रतिष्ठा पर प्रभाव डाल सकता है।

सोशल नेटवर्किंग में टूटती वर्जनाएँ

सोशल नेटवर्किंग में टूटती वर्जनाएँ

अधिकतर हम देख सकते हैं कि हम कभी भी किसी से विचारों का आदान प्रदान इतनी आसानी से नहीं कर सकते हैं, जो विचार मतभेद को जन्म दे सकता है, कोई तो चीज है बीच में जिससे हम डरते हैं। वहीं दूसरा पक्ष देखा जाये सोशल नेटवर्किंग साइट का तो वहाँ हम अपने विचारों को लिख सकते हैं और आपकी पूरी दुनिया उस पर अपनी राय रख सकती है। कई बार कुछ लोग जो बेहद गहरे दोस्त होते हैं वे अपने रिश्ते की परवाह किये बगैर ही अपनी बातों को अपने विचारों को थोपने की कोशिश करते हैं, जिससे कई बार हास्यास्पद स्थिती उत्पन्न हो जाती है, और कई बार तो रिश्तों के टूटने तक की नौबत आ जाती है। केवल लिखित संवादों से ही आपसी रिश्तों में खटास पैदा हो जाती है। असल में आप अगर जानते हैं कि यह उन्माद कुछ समय का ही है तो ठीक है, परंतु उन्माद अगर ज्यादा समय ले लेता है तो बेहतर है कि रिश्तों की बारीकियों को जाँचकर उचित समय पर उचित निर्णय ले लिया जाना चाहिये।

असल में हम उतने विचारवान नहीं होते हैं जितना हम दुनिया को दिखाना चाहते हैं, और सोशल नेटवर्किंग पर केवल एक लाईन या एक पैराग्राफ कुछ भी उल्टा सीधा लिखकर उन्माद का तूफान खड़ा कर सकते हैं और उन लाईनों पर आपके सोशल नेटवर्किंग के मित्र अपनी सारी वर्जनाएँ तोड़कर आपको अपने विचारों में शामिल करने के लिये किसी भी हद तक जा सकते हैं, आजकल सोशल नेटवर्किंग साईटों पर स्वस्थ्य वार्तालाप नहीं होता है आजकल केवल आक्षेप लगते हैं और बेइज्जती की जाती है, और सोचा जाता है कि हम जितने ज्यादा आक्रामक होंगे हमें उतनी ही वाहवाही मिलेगी, परंतु कहीं न कहीं हम भूल रहे हैं कि हम आपसी वर्जनाओं को तोड़कर केवल और केवल अपना ही नुकसान कर रहे हैं, अपने ही कुछ बेहतरीन दोस्तों को खो रहे हैं, वे मित्र अपनी प्रतिष्ठा हमारे परिजनों की नजरों में भी खो रहे हैं, क्योंकि सोशल नेटवर्किंग साईटों पर हमारे मित्रों के अलावा हमारे परिजन भी जुड़े होते हैं।

One thought on “सोशल नेटवर्किंग के युग में टूटती आपसी वर्जनाएँ

  1. बिलकुल सही …. कुछ समय दे कर कुछ ऐसे जुड़े लोगों को अलग किया जाना चाहिए …….. सोशल साईट पर अनचाहे ही हमारे सामने ऐसे वार्तालाप आते हैं ,जिन्हें हम पढ़ भी लेते हैं ,लेकिन विचार हमसे मेल नही खाते ….. और वे हमारा समय खा चुके होते हैं ..

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