सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १४, महाराज धृतराष्ट्र से मुलाकात और युद्धशाला में शिक्षण का प्रयोजन

       एक-एक प्रासाद को पीछे छोड़्ते हुए हम चलने लगे । हम महाराज के प्रासाद में आये। विशाल वक्ष:स्थलवाले महाराज घनी लम्बी श्वेत दाढ़ी के काराण बड़े प्रभावशाली लग रहे थे, लेकिन उनकी आँखों के चारों ओर काले घेरे थे। उनकी आँखें बंद प्रतीत होती थीं।     अत्यन्त आदर से झुककर पिताजी ने महाराज को […]
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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १३

        झंझावत की तरह वह जैसे आया था, वैसे ही मुड़ा और बिजली की तेजी से राजप्रासाद की सीढ़ियों पर चढ़ने लगा। केवल एक सीढ़ी शेष रही थी। लेकिन वहीं रुककर वह पुन: पीछे मुड़ा और वर्षा की धारा की तरह क्षण-भर में उन समस्त सीढ़ियों को उतरकर वह फ़िर हमारे पास आया। मेरे पास […]
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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १२

      हमारा रथ राजाप्रसाद के महाद्वार से भीतर प्रविष्ट हुआ। द्वारपालों ने आदर से झुककर पिताजी को अभिवादन किया। रथ अश्वशाला के पास रुका। सामने ही राजाप्रसाद में जाने के लिये ऊपर चढ़ती हुई असंख्य सीढ़ियाँ थीं| यों ही मेरे मन में आया और मैं उनको गिनने लगा । एक सौ पाँच थीं वे ! […]
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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ११

    शोण हाथ उठाकर “भैया रुक जा ! भैया रुक जा ऽऽऽ – “ कहता हुआ रथ के पीछे दौड़ने लगा। माँ ने आगे बड़कर तत्क्षण उसको पकड़ लिया । मैंने सन्तोष की साँस ली। रथ आगे दौड़ने लगा । लेकिन शोण फ़िर माँ के हाथों से छूट गया था। दूर अन्तर पर उसकी छोटी-सी […]
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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १०

     दूसरे दिन पिताजी ने मुझको हस्तिनापुर चलने के लिए तैयार रहने को कहा। मैं उनकी आज्ञानुसार आवश्यक एक-एक वस्तु एकत्रित करने लगा। मन में अनेक विचारों का जमघट लगा हुआ था। अब चम्पानगर छोड़ना पड़ेगा। यहाँ के आकाश से स्पर्धा करनेवाले किंशुक, सप्तपर्ण, डण्डणी, मधूक, पाटल और खादिर के वृक्ष अब मुझसे अलग होनेवाले […]
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