विद्यालयीन प्रतियोगिता का सर्वश्रेष्ठ चित्र (ओर्कुट फ़ीवर)

6 thoughts on “विद्यालयीन प्रतियोगिता का सर्वश्रेष्ठ चित्र (ओर्कुट फ़ीवर)

  1. मेरे विचार से ये किसी बच्चे की नही किसी युवा ने बनाया हॆ क्योकि हॆन्डराईटिग तो यही चुगली करती हॆ…पर जिसने भी बनाया हॆ अच्छा बनाया हॆ..

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कृपया अपने जोखिम पर पढ़े… अगर बाद में आप अपने सिर के बाल नोंचें तो हमारी को जिम्मेदारी नहीं होगी..शोले फ़िल्म में किस का डबल रोल था..

एक वैज्ञानिक अपनी डोरबैल हटा देता है….

आप बता सकते हैं क्यों ??

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सोचो….

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नहीं जानते ..

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वो नो-बैल प्राईज जीतना चाहता था।

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एक जहाज था… जिसमें बहुत सारे लोग थे.. उसमें एक चोर भी था.. जहाज बर्फ़ की चट्टान से टकरा गया और सब डूब गये… सिर्फ़ चोर बच गया …. बताओ कैसे…?

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क्योंकि चोर की दाढ़ी में तिनका था…

डूबते हुए को तिनके का सहारा मिल गया

और चोर बच गया।

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एक काना लड़का किसी लड़की को कौन सा गाना गाकर प्यार का इजहार करेगा ???

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एक नजर से भी प्यार होता है मैंने सुना है…..

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प्रश्न: – एक अंग्रेज अगर अपने भारतीय नौकर को दरवाजा खोलने के लिये कैसे बोलेगा जो कि केवल हिन्दी समझता है !!

जबाब – “There Was A Cold Day” (say it fast)

(दरवाजा खोल दे)

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शोले फ़िल्म में किस का डबल रोल था..

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?

किंग जार्ज..

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कैसे ??

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सिक्के के दोनों साईड रहता है…

17 thoughts on “कृपया अपने जोखिम पर पढ़े… अगर बाद में आप अपने सिर के बाल नोंचें तो हमारी को जिम्मेदारी नहीं होगी..शोले फ़िल्म में किस का डबल रोल था..

  1. आपने साबित कर दिया की सुबह सुबह हमारा दिमाग कम चलता है।
    वैसे भी आज अखबार अभी तक नहीं आया । हा हा हा !

  2. ईमेल से प्राप्त –

    प्रिय बन्धु विवेक रस्तोगी जी,
    मेरे ख्याल से – जब अंग्रेज बोलता है तो कुछ इस प्रकार का उच्चारण करता है :

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    प्रश्न: – एक अंग्रेज अगर अपने भारतीय नौकर को दरवाजा खोलने के लिये कैसे बोलेगा जो कि केवल हिन्दी समझता है !!
    जबाब – “There Was A Cold Day” (say it fast)
    (दरवाज़े कोल्ड़े)
    ———————————————————-
    प्रश्न: – एक अंग्रेज अगर अपने भारतीय नौकर को दरवाजा बंद करने के लिये कैसे बोलेगा जो कि केवल हिन्दी समझता है !!
    जबाब – “There Was A Brown Crow” (say it fast)
    (दरवाज़े ब्रान्क्रो)
    ———————————————————-

    सवेरे सवेरे आपकी इमेल पढ़ कर आनंदित हुआ l धन्यवाद l
    आपका
    आनंद गोपाल शर्मा

  3. “There Was A Cold Day” (say it fast)……..
    “There Was A Cold Day” (say it fast)……..
    “There Was A Cold Day” (say it fast)……..
    “There Was A Cold Day” (say it fast)……..
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    “There Was A Cold Day” (say it fast)……..
    “There Was A Cold Day” (say it fast)……..

    हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा …….

    नोट: लखनऊ से बाहर होने की वजह से …. काफी दिनों तक नहीं आ पाया ….माफ़ी चाहता हूँ….

  4. जबरदस्त……………….जबर भी और ……………….
    मजा आ गया, बचपन के बाबा द्वारा सुनाये गए और हम लोगों से पूछे गए ऐसे ही रोचक किस्से, पल याद आ गए.
    एक नमूना दे दें???
    पैंट पहने हाथी देखा है?

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ये महेश भूपति क्रिकेटर कब से बन गये… मुझे तो नहीं पता … पर क्या आपको पता है… कि नवभारत टाईम्स ने …

आज के नवभारत टाईम्स में पेज नं १० पर एक समाचार है कि “लारा-भूपति लंदन में”। और इसमें लिखा है कि लारा दत्ता का नाम क्रिकेटर महेश भूपति के साथ जोड़ा जाने लगा। अब इस समाचार पत्र में किसे बताया जाये कि महेश भूपति क्रिकेट नहीं खेलते हैं वो टेनिस के खिलाड़ी हैं।

अब इन समाचार पत्र के हिन्दी शुरवीरों की क्या कोई सामान्य ज्ञान की परीक्षा लेने का साहस रखता है, नहीं !!!

बहुत दिनों से गलत खबरें पढ़ते रहे हैं पर आज फ़िर रुकते नहीं बना कि गलत खबर पढ़ते भी नहीं बन रही है, क्या ये टाईम्स ग्रुप का सिन्ड्रैला अखबार केवल हिन्दी के दिखावे के लिये प्रकाशित होता है, या वाकई हिन्दी के लिये गंभीर है, अगर कोई भी हिन्दी भाषी इस समाचार पत्र को पढ़ेगा तो वह इतनी गलतियां इसकी प्रकाशित सामग्री में निकाल सकता है कि इनको शर्म से डूब मरना चाहिये।

7 thoughts on “ये महेश भूपति क्रिकेटर कब से बन गये… मुझे तो नहीं पता … पर क्या आपको पता है… कि नवभारत टाईम्स ने …

  1. विवेक भाई,

    अभी तक पुलिस ही बदनाम थी कि हाथी को चूहा बना दे या चूहे को हाथी…अब अखबार भी…

    आपकी ब्लॉगर्स मीट की तैयारी कैसी चल रही है…हमारी यहीं से शुभकामनाएं कबूल कीजिए…

    जय हिंद…

  2. अब ऐसा अखबार कहता हैं तो भूपति ज़रूर (छुप-छुप कर) क्रिकेट खेलता होगा. चलो अच्छा है आपके माध्यम से 'ब्रेकिंग न्यूज़' मिली.

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १६

     अन्धे राजा को इतना वैभव दिया पर देखने की शक्ति छीन ली – यह क्रूर व्यवस्था करनेवाला दैव अन्धा नहीं था क्या ? सौ पुत्र और इस अमित राज्य-वैभव के स्वामी इस राजा को भाग्यवान कहा जाये या .…. क्योंकि यह सब देखने के लिये आँखें नहीं हैं – इसलिये उसे अभागा कहा जाये ? अपने सौ पुत्रों को यह अन्धा पिता कैसे पहचानता होगा ? और सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह थी कि आँखें ने होने पर भी इतने विशाल साम्राज्य पर ये शासन कैसे करते होंगे ? छि:, कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं कि उनका उत्तर ही नहीं दिया जा सकता ।

     बहुत देर चलने के बाद हम एक विशाल लौह-महाद्वार के पास आये। उसके दोनों ओर काले रंग के पाषाणों के प्राचीर दूर तक संकुचित होते चले गये थे। महाद्वार की भव्य कमान पर त्रिकोणी भगवा ध्वज फ़ड़फ़ड़ा रहा था। द्वारपालों ने हमको देखते ही अभिवादन किया। हम झुककर भीतर गये। वह कुरुओं की युद्धशाला थी।

     भीतर चारों ओर बड़े-बड़े कक्ष थे और बीचोंबीच एक योजन घेरे का एक विशाल अखाड़ा था। उसके अनेक खण्ड कर दिये गये थे। एक ओर मल्ली के लिए अखाड़ा था। यहाँ लाल रंग की बारीक मिट्टी गोलाकार फ़ैली हुई थी। उसमें अनेक मल्ल-युवकों की जोड़ियाँ एक-दूसरे पर दाँव-प्रति-दाँव चलाती हुई लड़ रही थीं। उस अखाड़े के मध्य भाग में हष्ट-पुष्ट गौरवर्णी युवक ताल ठोंकता हुआ गोलाकार नाचता दिखाई दिया उसके पास जाने का साहस किसी में नहीं था। हाथ उठाकर वह सारे अखाड़े में थय-थय नाच रहा था।

      “कर्ण उस युवराज भीम को देख ! वह अखाड़े में सबको चुनौती देता हुआ घूम रहा है ।“ उसकी ओर उँगली से संकेत करते हुए पिताजी बोले।

      दूसरी ओर अश्वारोहण के लिए स्थान रिक्त छोड़ दिया गया था। घोड़े पंक्ति में दौड़ सकें, इसलिए उस स्थान में रेखाएँ खींची हुई थीं। दौड़ते समय बार-बार रुकावट डालने के लिये स्थान-स्थान पर खन्दकें खुदी हुई थीं। कुछ खन्दकें पानी से भरी हुई थीं। स्थान-स्थान पर ऊँची दीवारें खड़ी की गयीं थीं। अनेक युवक उन सब रुकावटों को खेल-खेल में पार करके अश्वों को अभ्यास कराते हुए दिखाई दिये।

     पूर्व की ओर खड्गों का अभ्यास करने के लिए एक क्रीड़ा-क्षेत्र बनाया गया था। उसके किनारे पर छड़ें लगी थीं। उस छड़ों पर विविध आकार के कवच और छोटी-बड़ी ढालें टँगी हुई थीं। अनेक योद्धा खड्गों से अभ्यास कर रहे थे। क्रोध से तमतमाते हुए एक-दूसरे पर टूट रहे थे। खड्गों की झनझनाहट गूँज रही थी।

     पश्चिम की ओर चैसे ही आकार का एक गोलाकर क्रीड़ांगण था। उसमॆं कुछ युवक गदाएँ घुमाकर उनका अभ्यास कर रहे थे। गर्जना करते हुए चक्कर काट रहे थे। उस विशाल स्थान पर शूल, तोमर, शतघ्री आदि के लिए छोटे बड़े बहुत से क्रीड़ा-क्षेत्र बनाये गये थे। चारों ओर पाषाण-निर्मित कक्ष अनेक प्रकार के शस्त्रास्तों से ठसाठस भरे हुए थे।

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३५

प्राचीमूले तनुमिव कलामात्रशेषां हिमांशो: – इस पर महिमसिंह गणी का कथन है कि – “कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां रात्रौ शेषकलामात्रस्य चन्द्रस्य दिड़्मुखे संभव:।” अर्थात कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को चन्द्रमा पूर्व क्षितिज में एक ही कला के रुप में रह जाता है। यहाँ यक्ष-पत्नी की सेज की पूर्व दिशा के क्षितिज

से और यक्ष-पत्नी की कलामात्र शेष चन्द्रमा की मूर्ति से तुलना की गयी है।


विरहमहतीम़् – युवक और युवतियों को अपने प्रथम मिलन के दिनों में दिन और रात क्षण-क्षण के समान छोटे दिखायी पड़ते हैं, किन्तु विरह की अवस्था में उन्हें दिन-रात पहाड़ की तरह विशाल प्रतीत होने लगते हैं। यक्षिणी की भी यही स्थिति है।

पूर्वप्रीत्या – काव्यों में, संयोगवस्था में जो चन्द्रमा प्रियजनों को सुख प्रदान करता है और विरहावस्था में वही चन्द्रमा कष्टप्रद होता है, ऐसा वर्णन अनेक स्थलों पर मिलता है। यक्ष का विचार है कि उसकी प्रिया जब अपने प्रियतम के साथ लेटती थी, उसी अनुभव के आधार पर बड़े उत्साह से उसकी प्रिया चन्द्रमा की किरणों पर दृष्टि डालेगी, किन्तु विरह के कारण वह किरणें दु:ख प्रदान करने वाली होंगी; इसलिए वह उन पर से दृष्टि हटा लेगी।

शुद्धस्नानात़् – यहाँ शुद्ध स्नान से अभिप्राय तैल आदि सुगन्धित द्रव्यों से रहित, उबटन आदि से रहित स्नान से है; क्योंकि वह प्रोषितभर्तृका है, इसलिए पूज आदि करने से पूर्व साधारण स्नान ही कर सकती थी; क्योंकि उसे प्रसाधन का निषेध था।

मत्संभोग – यक्षिणी का प्रियतम उससे दूर है; अत: उससे साक्षात़् संभोग तो सम्भव नहीं है इसलिये यह सोचकर कि उससे स्वप्न में ही संभोग सम्भव हो जाये, इसी विचार से नींद लेने का प्रयास कर रही है, किन्तु आँखों में आँसू आ जाने के कारण निद्रा का अवसर नहीं मिलता।

मयोद्वेष्टनीयाम़् – प्राचीन समय में यह प्रथा थी कि वियोग के अवसर पर पति अपनी पत्नी के बालों को एक वेणी में गूँथता था और वियोग के बाद वही उसे खोलता था।

स्पर्शक्लिष्टाम़् – प्रोषितभर्तृकाएँ जिस वेणी को विरह के दिन गूँथती थीं, उसमें तेलादि न लगाने के कारण वह शुष्क हो जाती थीं जो स्पर्श करने में कष्ट देती थी।

कठिनविषमाम़् – बहुत समय से प्रसाधन न करने के कारण वेणी कठोर और उलझ जाती थी। विषम का अर्थ ऊँचा नीचा होता है, किन्तु यहाँ इसका अर्थ उलझा हुआ अधिक उपयुक्त है।

अयमुतनखेन – प्रोषितभर्तृकाएँ क्योंकि विरहावस्था में प्रसाधन नहीं करती थीं; इसलिए नाखून भी नहीं काटे थे, जिससे यक्षिणी के नाखून लम्बे-लम्बे हो गये थे।

3 thoughts on “कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३५

  1. अजी मुझे पता नही इस बारे फ़िर भी हम आप के कहने से जरुर वोट करेगे, लेकिन,"रस्तोगी समाज का होने के नाते मैं “यथार्थ” को वोटिंग करने के लिये सबसे जोरदार अपील करता हूँ।" यह शव्द ना लिखते तो ज्यादा अच्छा था, एक तरफ़ तो हम गुट वाजी, ओर जात पात का विरोध करते है, ओर दुसरी ओर….
    धन्यवाद

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ५

यक्ष का प्रिया विरह – यक्ष कितना दुर्बल हो गया है अपनी प्रिये से दूर होकर कि उसके हाथ में जो स्वर्ण कंकण पहन रखा था वह ढ़ीला हो जाने के कारण गिर पड़ा था, जिससे उसकी कलाई सूनी हो गई थी।
कालिदास के अनुसार – आषाढ़ के प्रथम दिन से ही वर्षा का प्रारम्भ होता है।
वप्रक्रीड़ा उस क्रीड़ा को कहते हैं जब प्राय: मस्त सांड, हाथी, भैंसे
आदि पशु टीले की मिट्टी को सींग से उखाड़ते हैं, इसे उत्खातकेलि भी कहते हैं।
सुखी किसे माना जाता है – प्रिया से युक्त वयक्ति को, धन से युक्त को नहीं।
अर्घ्य किसी विशेष व्यक्ति, अतिथि या देवता आदि को दिया जाता है।
गुह्यक और यक्ष ये दो अलग अलग देवयोनियाँ मानी जाती हैं, परंतु कालिदास ने इन दोनों को एक-दूसरे का पर्यायवाची माना है।
अत्यधिक काम-पीड़ित व्यक्ति अपना विवेक खो बैठते हैं और उन्हें जड़-चेतन में भी भेद प्रतीत नहीं होता। प्राय: काम-पीड़ित व्यक्ति विरह के क्षणों में अपनी प्रिया के फ़ोटो, वस्त्रादि से बातें करते हैं।
पुराणों के अनुसार प्रलयकाल में संहार करने वाले मेघों को पुष्करावर्तक कहते हैं। इसी कारण पुष्कर और आवर्तक को मेघ जाति में श्रेष्ठ माना जाता है।
अलका – यह धन के देवता कुबेर की राजधानी मानी जाती है। इसमें बड़े-बड़े धनी यक्षों का निवास बताया गया है। यह कैलाश पर्वत पर स्थित मानी जाती है। इसके वसुधारा, वसुस्थली तथा प्रभा ये अन्य नाम भी कहे जाते हैं।
पुराणों के अनुसार कुबेर की राजधानी अलका के बाहर एक उद्यान था जिसे गन्धर्वों के एक राजा चित्ररथ ने बनाया था। उस अलका के महल, बाह्य उद्यान में रहने वाले शिव के सिर पर स्थित चन्द्रमा की चाँदनी से प्रकाशित होते रहते थे।
पवनपदवीम़् – क्योंकि वायु सदा आकाश में ही चलती है, इस कारण आकाश को वायु मार्ग भी कहते हैं।

5 thoughts on “कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ५

  1. सुखी किसे माना जाता है – प्रिया से युक्त वयक्ति को, धन से युक्त को नहीं।

    बहुत सुंदर बाते हमे बता रहे है, इन ग्रांथो से आप का धन्यवाद

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और मेरी रगों में खून तेजी से दौड़ने लगा..

         आज अलसुबह हम ऑटो से अपने ऑफ़िस जा रहे थे पहला चौराह पार करते ही क्या देखते हैं कि ऑटो वाले अपने पैसेन्जर के साथ जूतमपैजार कर रहे थे। तो यह सब देखते ही मेरी रगों में खून तेजी से दौड़ने लगा और दिमाग गर्म होने लगा और ऐसा लगा कि इन स्सालों को अभी उतार कर दौड़ा दौड़ा कर मारुँ, जैसा कि कभी अपने कालेज के जमाने में किया करते थे फ़िर अचानक अपनी छठी इंद्रीय ने संकेत दिया कि अब तुम कॉलेज में नहीं पढ़्ते हो, ओर हम चुपचाप दूसरी तरफ़ मुँह करके बैठ गये पर दिमाग गर्म ही था, क्योंकि बहुत दिनों बाद मार पिटाई देखी थी। वापस से अपना ध्यान कालिदास प्रणीतम “मेघदूतम” में लगाया जिसमें यक्ष मेघ को अलकापुरी जाने के रास्ते में उज्जियिनी से जाने को कहता है कि तुम्हारा मार्ग वक्र हो जायेगा परंतु उज्जियिनी की सुंदरता देखकर तुम सब भूल जाओगे।

 

        किसी तरह शाम को जाकर दिमाग की गर्मी खत्म हुई और रगों में खून वापस अपनी पुरानी रफ़्तार पर आ गया।

5 thoughts on “और मेरी रगों में खून तेजी से दौड़ने लगा..

  1. अच्छा है
    "तुम्हारा मार्ग वक्र हो जायेगा परंतु उज्जियिनी की सुंदरता देखकर तुम सब भूल जाओगे।"
    वक्र मार्ग के बाद उज्जयिनी —
    वाह

  2. संस्कार कदम पीछे खींच लेते हैं . ऐसी गुंडागर्दी जहाँ भी ऑटो है बढती जा रही है

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