ज़ूही की कली कविता सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’ रचित “कविश्री” से

विजन-वन-वल्लरी पर
सोती थी सुहागभरी-
स्नेह-स्वप्न-मग्न-अमल-कोमल-तनु तरुणी
जूही की कली,
दृग बन्द किये, शिथिल, पत्रांक में।
वासन्ती निशा थी;
विरह-विधुर प्रिया-संग छोड़
किसी दूर-देश में था पवन
जिसे कहते हैं मलयानिल।
आई याद बिछुड़न से मिलन की वह मधुर बात,
आई याद चाँदनी की धुली हुई आधी रात,
आई याद कान्ता की कम्पित कमनीय गात,
फ़िर क्या ? पवन
उपवन-सरद-रितु गहन-गिरि-कानन
कुंज-लता-पुंजों को पार कर
पहुँचा जहाँ उसने की केलि
                                कली-खिली-साथ !
सोती थी,
जाने कहो कैसे प्रिय आगमन वह ?
नायक ने चूमे कपोल,
डोल उठी वल्लरी की लड़ी जैसे हिंडोल।
इस पर भी जागी नहीं,
चूक क्षमा माँगी नहीं,
निंद्रालस वंकिम विशाल नेत्र मूँदे रही –
किम्बा मतवाली थी यौवन की मदिरा पुए,
                                                     कौन कहे ?
निर्दय उस नायक ने
निपट निठुराई की,
कि झोंकों की झाड़ियों से
सुन्दर सुकुमार देह सारी झकझोर डाली,
मसल दिये गोरे कपोल गाल;
चौक पड़ी युवती,
चकित चितवन निज चारों ओर फ़ेर,
हेर प्यारे को सेज पास
नम्रमुखी हँसी, खिली
खेल रंग प्यारे संग ।
इस कविता में छायावाद की romaniticism का प्रभाव है।
कुछ शब्दों के अर्थ –
विजन – एकान्त
वल्लरी – वेल
गात – प्रेम विभोर होकर कांपते हुए उसके सुन्दर
निद्रालस – निद्रा में अलसाये हुए कटाक्ष

4 thoughts on “ज़ूही की कली कविता सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’ रचित “कविश्री” से

  1. इस कविता का ऐतिहासिक महत्त्व है – हिन्दी का पहला मुक्त छ्न्द जिसके लिए निराला को तमाम लांछनाएँ तक सहनी पड़ीं। पहली बार आदर्श मासिक कलकत्ता के नव-दिसम्बर 1922 के अंक में छपी थी। इसे 'केंचुआ छ्न्द' तक कहा गया। उन 'विद्वानों' को यह तक नहीं मालूम पड़ा कि इस कविता की लय हिन्दी के शास्त्रीय छ्न्द घनाक्षरी से मिलती थी।
    संशोधन:
    उपवन-सरद-रितु – उपवन-सर-सरित
    किम्बा – किम्वा
    पुए – पिए
    कपोल गाल – कपोल गोल (कपोल का अर्थ ही गाल होता है। निराला ऐसी ग़लती नहीं कर सकते। मैंने मूल पाठ देख लिया है।)
    निंद्रालस – निद्रालस
    चौक – चौंक
    चारों – चारो
    नम्रमुखी – नम्रमुख
    गात का अर्थ शरीर होता है। निद्रालस का अर्थ निद्रा का आलस ही है। उसमें कटाक्ष की संगति नहीं है।
    हाँ, निराला के नाम 'कविश्री' जैसा कोई संकलन नहीं है।

    इस महान रचना से ब्लॉग जगत का परिचय कराने के लिए धन्यवाद।

    • जी यही तो मैंने शीर्षक में लिखा है, यह मेरी रचना कतई नहीं है, यह तो निराला की है

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तनख्वाह बड़ी है ? अच्छे तरीके से कैसे उपयोग करें … ? कहाँ निवेश करें ?

    पिछला वर्ष २००८ नौकरीपेशा वर्ग के लिये बहुत मंदी वाला था, जहाँ एक तरफ़ तो अपने खर्चे कम करने पड़े और अपनी बचत में से भी पैसा निकालना पड़ा, और साथ ही कंपनियों द्वारा बाहर निकाले जाने का डर भी।

    कंपनियाँ बड़ी हुई तनख्वाह और बोनस बड़ाने में सक्षम नही थीं और सबने बहुत ही बुरा समय देखा है। खैर, अब ये मंदी का दौर खत्म हो गया है, और समय बदल रहा है और कंपनियाँ भी मंदी के दौर से निकल चुकी हैं।

अंदाजन बढ़ने वाली तनख्वाह के सर्वेक्षण नतीजे –
    सर्वेक्षणों से पता चलता है कि इस वर्ष सबसे ज्यादा वेतन बढ़ौत्तरी होने वाली है। भारत में वर्ष २०१० में वेतन वृद्धि लगभग १०.६ प्रतिशत होने का अनुमान है, जो कि एशिया महाद्वीप में सबसे ज्यादा है और वर्ष २००९ की ६.६ प्रतिशत की वृद्धि से ६० प्रतिशत ज्यादा है। भारतीय कंपनियों के मुकाबले बहुराष्ट्रीय कंपनियों की वेतन वृद्धि लग्भग ११.४ प्रतिशत होगी।

    ऊर्जा, दूरसंचार, दवाई उद्योग, यांत्रिकी, सेवा और निर्माण, तकनीक और ऑटोमोबाइल कुछ ऐसे क्षैत्र है, जहाँ पर वेतन वृद्धि ११.६ प्रतिशत से १२.८ प्रतिशत तक होने का अनुमान है।

    तकनीक और् आऊटसोर्सिंग क्षैत्र में २००९ के बाद जबरदस्त तरीके से व्यापार में उछाल देखा गया है, लेकिन ये बेहद डरी हुई हैं और इकाई के अंक में ही वेतन वृद्धि देने का अनुमान है जो कि ८.५ प्रतिशत से ८.९ प्रतिशत हो सकता है।

ज्यादा आमदनी: क्या करें ?
    मंदी ने भारतियों को धन की महत्ता सिखाई। तो धन का कैसे अच्छे तरीके से प्रबंधन करें / वेतनवृद्धि को कैसे बेहतर तरीके से उपयोग करें जिससे भविष्य में हमें ज्यादा मुनाफ़ा हो ? यह समय धन को उड़ाने का है या फ़िर उसे बचाने का ? या फ़िर जो मितव्ययिता के उपाय हमने इस मंदी के दौरान सीखे उन्हीं को जारी रखने में समझदारी है ?

    क्या यह बिल्कुल उपयुक्त समय है घर का सामान खरीदने के लिये ? आज लेपटॉप या टीवी जिसकी कीमत ४०,००० है वह शायद छ: महीने बाद ३५,००० हो जायेगी, और कुछ अच्छे ऑफ़र्स भी मिल सकते हैं। मोबाईल फोन या आईपोड के दाम एक तिमाही में ३० प्रतिशत तक कम हो जाते हैं। तो वास्तव में उपभोक्ता वस्तुओं पर बड़ी राशि खर्च करने का उपयुक्त समय नहीं है, लेकिन अगर बिल्कुल ही जरुरत हो तो आपको लेना ही चहिये, बस अच्छी तरह से मोलभाव कर लीजिये जिससे आपको अच्छे ऑफ़र मिल पायें ।

मौजूदा ऋणों की ई.एम.आई. बड़ा दें –
    अगर आपके ऊपर किसी भी तरह का लोन (गृह, शिक्षा, ऑटो, क्रेडिट कार्ड) है तो वेतनवृद्धि के धन से आंशिक पूर्व भुगतान या आप अपने लोन की ई.एम.आई. को बड़ाकर निर्धारित अवधि के पहले चुका सकते हैं, जिससे आपको राहत मिलेगी। (“अधिकतर व्यक्तिगत ऋणों में आंशिक पूर्व भुगतान की सुविधा नही होती है।" )

    हर बार जब भी आप अपनी किस्त का भुगतान करते हैं तो उसका एक हिस्सा लोन के ब्याज में चला जाता है और बाकी का बचा हुआ ऋण की रकम में। ऋण लेने के बाद आमतौर पर पहली किस्त जो भरी जाती है वह आप ब्याज भर रहे होते हैं जो कि आपको पता भी नहीं होता है, और ऋण की किस्त के आखिरी हिस्से को जब भर रहे होते हैं वह ऋण की रकम का हिस्सा होती है। उदाहरण के लिये – अगर आपने ६०,००० रुपये का ऋण लिया है और उसकी मासिक किस्त ई.एम.आई. १५०० रुपये जा रही है तो आप उसे बड़ाकर २००० रुपये करवा लीजिये जिससे बड़े हुए ५०० रुपये आपकी ऋण की रकम कम करने में सहायक होंगे और आपको ब्याज कम भरना पड़ेगा।

    तो जल्दी से ऋण चुकाने में अपनी रकम बड़ाईये और ब्याज में अपना पैसा जाने से बचायें।

निवेश और बचत बढ़ायें –

    अगर आपने ॠण नहीं ले रखा है तो आप अपने धन को म्यूचयल फ़ंड, यूलिप, बांड, शेयर इत्यादि में निवेश कर सकते हैं। म्यूचयल फ़ंड नये निवेशकों के लिये सबसे अच्छा वित्तीय उत्पाद है, जबकि आज के बाजार में निवेश के बहुत सारे विकल्प उपलब्ध हैं।

    मैं आपको एस.आई.पी. लेने की सलाह दूँगा, जहाँ आप पूर्व निर्धारित मासिक राशि अपने पसंद के म्यूचयल फ़ंड में निवेश कर सकते हैं। एस.आई.पी. आवर्ती जमा जैसा ही वित्तीय उत्पाद है बस एस.आई.पी. (SIP) बाजार के रिटर्न देने की क्षमता रखता है और आवर्ती जमा (Recurring Deposit) एक निश्चित ब्याज राशि।

    एस.आई.पी. की प्रत्येक मासिक राशि को एक ईंट के तौर पर देखें तो भविष्य में इससे आपको बिल्डिंग बनती नजर आयेगी। नियमित बचत के लिये यह बिल्कुल सही समाधान है।

    ५००० रुपये का एस.आई.पी. अगर १५ वर्षों तक जमा करते हैं, तो १५% के हिसाब से लगभग ३३ लाख रुपये हो जाता है। १५% बहुत कम लगाया है जबकि कई फ़ंडों में यह ६०% तक गया है।

    बहुत सारे फ़ंड हाऊस के फ़ंड अच्छॆ हैं तो आज ही चुनें और निवेश शुरु करें।

    इस वर्ष अच्छे वेतन वृद्धि की उम्मीद है और आप अपने बड़े हुए वेतन को अपने भविष्य के लिये निवेशित करें, क्योंकि पिछले दो वर्षों में आप लोग सीख ही गये होंगे कि खर्चों में कटौती कैसे करना है।

    कुछ तरीके वेतन वृद्धि के लिये मैंने बताये हैं, बाजार में और भी वित्तीय उत्पाद उपलब्ध हैं, जिनमें आप निवेश कर सकते हैं, और अपनी गाढ़ी मेहनत की कमाई को अपने परिवार के भविष्य के लिये सुरक्षित रख सकते हैं। आप पैसा कमाने के लिये कार्य करते हैं और ये वित्तीय उत्पाद आपके पैसे को भविष्य में अच्छे रिटर्न देने के लिये कार्य करते हैं।

23 thoughts on “तनख्वाह बड़ी है ? अच्छे तरीके से कैसे उपयोग करें … ? कहाँ निवेश करें ?

  1. बहुत सुंदर जानकारी दी आप ने , मैने तो जिन्दगी मै कभी भी ऋण नही लिया, अगर हमारे यहां पेसे बढे( बढने की कोई उम्मीद नही) तो मै फ़िर किसी ऎसे देश मै १०, १५ दिनो के लिये जाऊगां जहा अभी तक नही गया

  2. बड़ी को बढ़ी कर लीजिये विवेक सर.. पोस्ट खुलने में परेशानी और बढ़ गई है, बार-बार वायरस डिटेक्ट हो रहा है..

  3. बहुत ही काम की जानकारी है । अभी सारे नोटों को ठिकाने लगाता हूं 🙂 🙂 🙂

    अमा सीरियसली मत ले लेना भाई

  4. अपना बेटा भी यही सोच रखता है तो कह सकते है कि आज के युवा ऐसा ही सोचते होगे कि जल्दी से पैसा इक्ट्ठा कर लो और फिर अपनी मर्ज़ी का काम करो…बहुत बढिया जानकारी….

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जन्मदिन पर दिनचर्या उज्जैन में [सुबह की “जबेली”] भाग १

    उज्जैन आकर बहुत ही सुकून महसूस होता है, जो राहत यहाँ मिलती है वह कहीं और नहीं मिलती। बुजुर्गों ने सही ही कहा है कि “अपना घर अपना घर ही होता है, और परदेस परदेस !!”

    उज्जैन आते आते हमारी एक ऊँगली की चट पकने लगी थी, और उज्जैन आकर तो अपने पूरे शबाब पर थी, हम अपने फ़ैमिली डॉक्टर के पास गये कि चीरा लगाकर पट्टी कर दें पर उन्होंने एक देसी नुस्खा बता दिया। बर्फ़ को पीसकर कप में भरलें और फ़िर उसमें दिन में ४-५ बार अपनी ऊँगली को १० मिनिट तक रखें, अब तक हम यह नुस्खा ३ बार दोहरा चुके हैं, तो दर्द कम नहीं हुआ परंतु सूजन जरुर थोड़ी कम हो गई है, जब दस मिनिट बाद ऊँगली बाहर निकालते हैं तो ऐसा लगता है कि ऊँगली कें अंदर कोई तेजी से दौड़ रहा है, जो कि शायद पीप रहता है। ऐसा लगता है कि मेरी उँगली कहीं दौड़ जायेगी।

    कल हमारा जन्मदिन था, पता नहीं क्यों पर रुटीन में ही दिन निकल गया, उज्जैन की हवा को महसूस करने और घर पर अपने माता पिता के साथ समय कैसे हवा हो गया पता ही नहीं चला।

    ३ अप्रैल की रात १२.०१ मिनिट पर पाबला जी का फ़ोन आ गया, और सबसे पहले उन्होंने हमें जन्मदिन की शुभकामनाएँ दी, हालांकि हमारी नींद में खलल पड़ चुका था परंतु हम पाबला जी का स्नेह और आशीर्वाद पाकर खुद को अभिभूत महसूस कर रहे थे। एकदम ब्लॉग जगत ने हमारी दुनिया ही बदल दी है या कहें कि हमारी एक आभासी दुनिया भी है जहाँ के लोग संवेदनशील हैं और एक दूसरे के सुखदुख में शामिल होने को तत्पर रहते हैं।

    फ़िर १२.२५ पर हमारी प्रिय बहना का फ़ोन आया जो कि मिस काल हो चुका था, तो हम वापिस से नींद के आगोश में जाने के पहले अपने प्रिय और दुष्ट मोबाईल फ़ोन को भी नींद के आगोश में सुला चुके थे, कि अब कोई भी प्रिय हमारी नींद में खलल न डाल पाये, और हम अपनी नींद पूरी कर सकें। आखिर पूरी लंबी नींद शरीर की बहुत ही सख्त जरुरत है।

    सुबह छ: बजे अपनी सुप्रभात हुई और फ़िर वहीं रुटीन, फ़्रेश हुए फ़िर फ़टाफ़ट सुबह की सैर के लिये निकल पड़े और अपनी ही कॉलोनी के चक्कर काटने लगे, बहुत दिनों बाद कोई ऐसी जगह देख रहे थे जहाँ कि मल्टीस्टोरी नहीं थीं, केवल खुला आसमान दिख रहा था। जो सुख महसूस हो रहा था, वह शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।

    फ़िर वापिस आकर घर पर हमसे पूछा गया कि क्या खायेंगे ब्रेकफ़ास्ट में, हम तो हमेशा तत्पर रहते हैं अपने मनपसंदीदा पोहा जलेबी के नाश्ते के लिये। वैसे हमारी फ़रमाईश हमेशा पूरी होती है भले ही अनमने मन से, पर होती है। जलेबी लेने के लिये हम अपने बेटेलाल के साथ चल दिये बाजार अपनी बाइक पर, पुरानी उज्जैन में पर थोड़ी आगे सर्राफ़े पर जाकर पता चला कि आज सैयदना साहब का ९९ वाँ जन्मदिन है तो उसकी खुशी में बोहरा समाज का जुलूस निकल रहा है, फ़िर हमने सोचा कि चलो तेलीवाड़ा की तरफ़ से चला जाये परंतु वहाँ पर भी जुलूस से रास्ता बंद था, तो हमारे बेटेलाल को चिंता हो गई कि अब हमारी “जबेली” का क्या होगा !!! हमने कहा बेटा आज भोलागुरु की जलेबी नहीं खाने को मिलेगी आज हमें फ़्रीगंज जाकर श्रीगंगा की जलेबी खाना पड़ेगी। हमने अपनी बाइक मोड़ी और चल दिये फ़्रीगंज ….

    और अपने दोस्त की दुकान से अपने बेटेलाल की “जबेली” लेकर घर चल दिये। अब अगर यही मुंबई होता तो वहाँ इतना घूमना नहीं पड़ता था, केवल आपके पास दुकान का फ़ोन नंबर होना चाहिये और फ़ोन कर दो, कोई भी चीज चाहिये घर पर १५ मिनिट में हाजिर। पर उज्जैन में कल्पना करना भी मुश्किल है, कि फ़ोन पर जलेबी घर आयेगी 🙁

कुछ एडवान्टेज अगर मुंबई के हैं तो कुछ उज्जैन के भी हैं।

12 thoughts on “जन्मदिन पर दिनचर्या उज्जैन में [सुबह की “जबेली”] भाग १

  1. इतना ढूंढकर ज़लेबी खाने का स्वाद ही कुछ और है।
    वैसे उंगली में पस है तो एंटीबायोटिक भी खा लीजियेगा।

  2. उज्जैन का नाम पोस्ट में देख कर खुद को रोक नहीं पाई विवेक जी ! आपने तो मुझे मेरे मायके की सैर करवा दी ! फ्रीगंज की जलेबी ! वाह क्या बात है ! मेरा घर फ्रीगंज में ही था ! आपका आलेख पढ़ कर बहुत खुशी हुई ! जन्म दिन की शुभकामनाएं स्वीकार करें ! कुछ घण्टे देर से ही सही !
    http://sudhinama.blogspot.com
    http://sadhanavaid.blogspot.com

  3. मिठाइयों जलेबी का अलग ही स्‍वाद है, हमे तो जबलपुर की बड़खुल की जलेबी एक साल बाद भी याद है।

  4. उज्जैन तो हमें भी बहुत पसंद है। बस इस बार वहाँ गए साल भर से अधिक हो गया है। उंगली पकने लगे तो होमियोपैथ को याद करो, रात को दवा खाओ सुबह दुरुस्त पाओ। कभी जरूरत पड़े तो हमें याद कर लेना।

  5. “अपना घर अपना घर ही होता है, और परदेस परदेस !!”
    धीरे धीरे बोल कोई सुन न ले, भई, कोई सुन न ले।
    पाबला जी के स्नेह ने हम मे से कइयों को आत्मविभोर किया है ।मेरे जन्म दिन पर भी सबसे पहले फ़ोन करने वाले वही थे। भगवान उनको लंबी उमर दे और उनकी एनर्जी ऐसे ही बनाये रखे

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रपट आ चुकी है कुछ चीजें ठीक नहीं है पर अधिकतर चीजें ठीक हैं, मानवीय संवेदनाएँ मर चुकी हैं…. क्या ??

    आप सभी लोगों ने मुझे इतना संबल दिया मैं तो अभिभूत हो गया इतना प्रेम मिला और आप सभी की दुआओं और आशीर्वाद की बदौलत मैं आज बिल्कुल ठीक महसूस कर रहा हूँ। पाबला जी ने तो फ़ोन पर ही मुझे इतना हँसाया कि मैं तो सोचता ही रह गया कि जिनसे आज तक मिला नहीं, उनसे इतना अच्छा रिश्ता, जरुर यह “राज पिछले जनम का” में ही पता चलेगा, कि सभी ब्लॉगर्स से इतना अपनापन क्यों है।
    कुछ चीजें ठीक नहीं हैं पर अधिकतर चीजें ठीक हैं, मतलब कि अब जो थोड़ी सी समस्या बची है वो भी नियमित दिनचर्या के बीच ठीक हो जायेगी। तो अब सुबह नियमित सुबह घूमने जाना और व्यायाम हम अपनी दिनचर्या में शुरु कर रहे हैं, पोस्टों की संख्या अब कम होने लगेगी, कोशिश करेंगे कि नियमित लिखें और टिपियायें भी। समय प्रबंधन कुछ ओर बेहतर तरीके से करना पड़ेगा। जिससे सभी गतिविधियों के लिये समय निकाल पायें और पर्याप्त समय दे पायें।
मानवीय संवेदनाएँ मर चुकी हैं…. क्या ??
    आज थोड़ी देर के लिये कहीं बाहर गया था बहुत ही व्यस्त मार्ग था, और सभी लोग अपने अपने ऑफ़िस जाने की आपाधापी में भागे जा रहे थे। तभी किसी चारपहिया वाहन ने एक पैदल यात्री को टक्कर जोर की मार दी, पर भगवान की दया से तब भी वह पैदल यात्री बच गया परंतु उसके बाद जो हुआ वह बहुत बुरा हुआ।
    चारपहिया वाहन का चालक ने किसी चीज से उस पैदल व्यक्ति के ऊपर आघात कर दिया और उसके सिर से खून बहने लगा। बस फ़िर क्या था जाम हो गया और वाहनों की दोनों ओर से लाईन लग गयी, कुछ पैदल यात्री उसका साथ देकर चालक को जुतियाने लगे। जब तक हम पहुँचे तब तक केवल जाम था, सब घटित हो चुका था और हमें किसी चलते हुए पैदल यात्री ने सड़क पार करते हुए यह कथा सुनाई। क्या हमारी मानवीय संवेदनाएँ वाकई मर चुकी हैं… क्या ??? हो गया है हमें.. कि दूसरे के खून को देखकर हमें कुछ होता ही नहीं है।

10 thoughts on “रपट आ चुकी है कुछ चीजें ठीक नहीं है पर अधिकतर चीजें ठीक हैं, मानवीय संवेदनाएँ मर चुकी हैं…. क्या ??

  1. विवेक भाई , यह जीवन बहुत खूबसूरत है । इसे सिर्फ एक बार ही हमे जीना है । न कोई पिछला जन्म था न अगला जन्म होगा । इसलिये समय का और स्वास्थ्य का ख्याल भी रखना है । पूरी तरह आशावाद के साथ इसे देखें । मनुष्य से प्यार करें । जहाँ ज़रूरी है वहाँ विरोध दर्ज करें । अपने आप को अभिव्यक्त करते रहें । भय किसी भी तरह का हो मन से निकाल दें । और क्या कहूँ आप खुद समझदार है ।

  2. Bas itana hi kahana chahungi ki man ke jite jit hai isliye apane man ko kabhi harane na de…!!
    Aapke Uttam swastya ke liye dhero shubkaamnae!!

  3. शुक्र है अधिकतर चीजें ठीक हैं, जो नहीं हैं वे भी जल ठीक कर लें.
    इस पोस्ट के बहाने मैंने पिछली पोस्ट अभी पढ़ी. अपनी अस्वस्थता पर बड़े ही रोचक ढंग से पोस्ट लिखी आपने. :डी
    आपके स्वास्थ्य और लेखन दोनों के लिए शुभकामनाएं !!!!

  4. उचित स्वास्थय के लिए बहुत शुभकामनाएँ..बाकी तो संवेदनहीनता के अनेकों उदाहरण नित आस पास दिख रहे हैं..

  5. विवेक जी , स्वास्थ्य सम्बन्धी सब तरह की सलाहें तो आपको मिल ही गयी।
    लेकिन उपाय तो आपने खुद ही ढूंढ लिया है। जी हाँ , ब्लोगिंग को कम करके , कुछ समय सेहत को भी देना चाहिए ।
    बाकि सब ठीक हो जायेगा।

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राजनीति से प्रेरित कुछ चुटकुले.. अगर सारे पाकिस्तानी चाँद पर चले जायें तो क्या कहोगे ?

पेंटागन पर हमले के तुरंत बाद सांत्वना के लिये चीन के प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति बुश को फ़ोन किया :

“हमें हमले के बारे में जानकर बहुत दुख हुआ, और हम इस कृत्य की घोर निंदा करते हैं, लेकिन अगर पेंटागन से कोई जरुरी दस्तावेज गुम हो गये हों, तो बता दें हमारे पास सभी की प्रति उपलब्ध है।”

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मुशर्रफ़ ने बुश को ११ सितंबर को फ़ोन किया –

मुशर्रफ़ – “राष्ट्रपति महोदय, मैं अपनी गहन संवेदनाएँ व्यक्त करना चाहता हूँ, यह घोर निंदनीय कृत्य है…यह भयानक त्रासदी है.. इतनी प्रसिद्ध इमारत…इतने सारे लोग.. लेकिन मैं आपको भरोसा दिलाता हूँ कि हमारा इस सबसे कोई संबंध नहीं है…”

बुश – कौन सी इमारत ? कौन से लोग ?

मुशर्रफ़ – ओह, अभी अमेरिका में समय क्या हुआ है ?

बुश – अभी सुबह के आठ बज रहे हैं।

मुशर्रफ़ – ओहो, मैं आपको एक घंटे बाद फ़ोन करता हूँ !

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बाजपेयी और बुश एक बार में बैठे हुए थे, एक आदमी वहाँ आया और बारमैन से बोला “ये बुश और बाजपेयी हैं क्या ?”

बारमैन बोला “ हाँ वही हैं..” तो वो उनके पास गया

और बोला “नमस्कार, आप लोग यहाँ क्या कर रहे हैं ?”

बुश बोले “हम लोग तीसरे विश्वयुद्ध की योजना बना रहे हैं”

तो वह आदमी बोला, “सच्ची, तो क्या क्या होने वाला है ?”

तो बाजपेयी बोले, “हम १४लाख पाकिस्तानियों और एक साईकिल सुधारने वाले को मारने वाले हैं ।”

उस आदमी ने चिल्लाते हुए कहा, “एक साईकिल सुधारने वाला ?!!”

बाजपेयी बुश की ओर मुड़े और कहा, “देखा, मैंने कहा था न कि कोई भी १४ लाख पाकिस्तानियों की चिंता नहीं करेगा !”

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पाकिस्तानी चाँद पर –

प्रश्न – अगर एक पाकिस्तानी चाँद पर चला गया तो क्या कहोगे ?

उत्तर – समस्या…

प्रश्न – अगर दस पाकिस्तानी चाँद पर चले जायें तो क्या कहोगे ?

उत्तर – समस्या…

प्रश्न – अगर सौ पाकिस्तानी चाँद पर चले जायें तो क्या कहोगे ?

उत्तर – समस्या…

प्रश्न – अगर सारे पाकिस्तानी चाँद पर चले जायें तो क्या कहोगे ?

उत्तर – ….समस्या खत्म !!!

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एक आदमी न्यूयॉर्क के सेंट्रल पार्क में शाम के समय टहल रहा था, तभी उसने देखा कि एक बड़े से कुत्ते ने एक छोटी सी बच्ची पर हमला कर दिया।

वह दौड़ा और उस कुत्ते से उसे बचाने लगा और आखिरकार कुत्ते को मारने में उसे सफ़लता मिल ही गई और वह उस छोटी सी बच्ची को बचा पाया।

एक पुलिसवाला जो यह सब देख रहा था वह उस आदमी के पास आया और बोला – “तुम बहुत बहादुर हो”

कल तुम सारे अखबारों में यह खबर देखोगे – “बहादुर न्यूयॉर्कवासी ने छोटी सी बच्ची की जान बचाई”

वह आदमी बोला, “लेकिन मैं न्यूयॉर्क का रहने वाला नहीं हूँ !”

ठीक है, तो सुबह की खबर सारे अखबारों में इस प्रकार होगी –

“बहादुर अमेरिकी ने एक छोटी बच्ची की जान बचाई” वह पुलिसवाला बोला।

वह आदमी बोला-“मैं पाकिस्तानी हूँ !”

अगले दिन के अखबारों में खबर छपी, “उग्रवादी ने निर्दोष अमेरिकी कुत्ते को मारा”

14 thoughts on “राजनीति से प्रेरित कुछ चुटकुले.. अगर सारे पाकिस्तानी चाँद पर चले जायें तो क्या कहोगे ?

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १७

      उस अखाड़े में एक ऊँचा और लम्बा-चौड़ा लक्ष्यभेद करने का चबूतरा था। वह चबूतरा ऐसा था कि उसको कहीं से भी देखो, वह अखाड़े के ठीक बीच में दिखाई देता था। उस चबूतरे पर पुष्पों से सज्जित भिन्न-भिन्न आकारों के धनुष रखे हुए थे। एक ओर बाणों के असंख्य तूणीर रखे हुए थे। सामने की ओर अनेक लक्ष्य रखे हुए थे। उस चबूतरे पर साँवले रंग का एक युवक वीरासन लगाकर दायें पैर के पंजे पर शरीर का जोर दिय हुए बैठा था। हाथ में लगे धनुष की प्रत्यंचा उसने कान तक खींच ली थी। एक आँख बन्द कर दूसरी आँख की पुतली उसने बाण की नोंक की सीध में स्थिर कर रखी थी। उसके पास ही ढीले-ढाले वस्त्र पहने हुए, शुभ्र दाढ़ीवाले, सिर के बालों एकत्र बाँधे हुए एक लम्बे वृद्ध खड़े थे। उनकी मुद्रा नदी की तह की तरह शान्त थी। उस साँवले युवक के प्रत्यंचा पर रखे हाथ को उन्होंने सीधा किया। वे उसको कुछ समझाने लगे। युवक ध्यानपूर्वक उनकी बातें सुन रहा था।

    पिताजी ने उस युवक की ओर उँगली से संकेत कर कहा, “वत्स, यही है वह पाण्डुपुत्र धनुर्धर अर्जुन ! और उसको जो सूचनाएँ दे रहे हैं, वे ही हैं पूजनीय गुरुदेव द्रोण !”

    धनुर्धर अर्जुन ! भले ही जो हो – लेकिन क्या वह इससे अधिक प्रभावशाली वीरासन नहीं कर सकता है ? – यह विचार मेरे मेन में कौंध गया ।

    गुरुदेव द्रो़ण वास्तव में अशोक वृक्ष की तरह भव्य लग रहे थे। उनकी देह पर शुभ्र वस्त्र उनके लम्बे शरीर के अनुरुप ही शोभीत हो रहे थे।

    हम अखाड़े के रास्ते चबूतरे की ओर चलने लगे। मुझको ऐसा अनुभव होने लगा जैसे आस-पास की क्रीड़ाक्षेत्रों को देखकर मेरे शरीर की उष्णता यों ही अपने-आप बढ़ने लगी हो। मेरी इच्छाअ हुई कि मैं भी भीतर उतरुँ और चक्कर काटता हुआ तेजी से गदा और खड़्ग के प्रहार प्रतिपक्षी पर करुँ। इन उच्छ्श्रंखल घोड़ों को झुकाकर इअतना पिदाऊँ कि ये मुँह से झाग निकाल पड़ें। हाथी की सूँड पकड़कर उसे नचाऊँ और फ़िर उसको थकाकर अन्त में उसकी पीठ पर चढ़ जाऊँ। चबूतरे पर बैठे उस युवक को उसकी भुजा पकड़कर उठाऊँ और प्रभावशाली वीरासन कैसे लगाया जाता है, यह एक बार अच्छी तरह उसको बता दूँ। कुश्ती के अखाड़े में जंगली भैंसे की तरह यों ही चक्कर काटनेवाले उस उद्द्ण्ड भीम से कुश्ती लड़कर उसका मद भी दूर कर दूँ।

    हम धनुर्विद्या के उस ऊँचे चबूतरे के पास आये। ऊपर बैठे हुए युवराज अर्जुन ने एक बाण छोड़ा। सामने दूरस्थित लकड़ी के लक्ष्य में वह सर्र से घुस गया। गुरुवर्य द्रोण ने उसकी पीठ पर एकदम थाप मारी और वे आनन्द से गरज उठे, “साधुवाद अर्जुन ! लेकिन पास जाकर यह देखो कि तुम्हारा वह सूचीपर्ण बाण लक्ष्य में कितना घुसा है ?” युवराज अर्जुन आज्ञाकारी की भाँति उठा और दृढ़ता से पैर रखता हुआ लक्ष्य की दिशा में चला गया। इतने में पिताजी आगे बढ़े । चबूतरे के नीचे ही खड़े रहकर उन्होंने अभिवादन किया। बड़े आदर से झुककर मैंने उनको अभिवादन किया। पिताजी की इच्छा थी कि उन गुरुवर्य की देखरेख में ही मेरा युद्ध-शास्त्र का अध्ययन हो।

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३६

संन्यस्ताभरणम़् – विरहिणी स्त्रियों के लिए आभूषण पहनना निषिद्ध था; अत: यक्षिणी ने भी आभूषणों का त्याग कर दिया था।


पेशलम़् – इसमें पेलवं तथा कोमल यह पाठान्तर भी मिलते हैं। तीनों का ही अर्थ कोमल है। यक्ष मेघ से कहता है कि उसकी पत्नी अत्यधिक कोमल है, विरह की ज्वाला उसे जला
रही होगी, जिस कारण वह शय्या पर भी कठिनता से लेटती होगी।


नवजलमयम़् – यक्ष मेघ से कहता है कि विरहिणी यक्षिणी की दशा देखकर वह (मेघ) स्वयं भी रो पड़ेगा। किन्तु किसी को दु:खी देखकर रोना चेतन प्राणी का धर्म है, मेघ तो अचेतन है वह कैसे रोयेगा ? इसका उत्तर आर्द्रान्तरात्मा पद से कवि ने दिया है, जो चेतन के लिये कोमल ह्र्दय वाला तथा अचेतन के लिए द्रव रुप अन्त: शरीर वाला अर्थ देता है; अत: मेघ जल की बूँदों के रुप मे आँसू बहायेगा।


रुद्धापाड़्गप्रसरम़् – विरहिणी यक्षिणी ने विरह के प्रथम दिन ही बालों को गूँथा था, तबसे न गूँथने के कारण वे ढीले पड़ गये हैं, जिससे वे बाल उसके नेत्रों पर लटक गये हैं, जिससे वह पूरी तरह से नहीं देख पाती।


विस्मृत भ्रूविलासम़् – भौंहो के मटकाने को भ्रूविलास कहते हैं। पति वियोग में यक्षिणी ने मद्य-पान छोड़ दिया था, इसलिए उसकी चञ्चलता तथा  मस्ती समाप्त हो गयी थी तथा चञ्चलता के अभाव में बह भौंहो को मटकाना भी भूल गयी थी।


उपरिस्पन्दिनयनम़् –  नयन से यहाँ बायाँ नेत्र अभीष्ट है; क्योंकि स्त्री की बायीं आँख फ़ड़कना अच्छा शकुन माना जाता है, जबकि पुरुष की दायीं आँख। और आँख का ऊपर के हिस्से में फ़ड़कना इष्ट प्राप्ति का लक्षण कहा गया है।


वामश्चास्या: उरु: – निमित्त निदान के अनुसार स्त्रियों की बायीं जंघा का फ़ड़कना रति सुख की प्राप्ति तथा दोनों जंघाओं का फ़ड़कना वस्त्र प्राप्ति का सूचक है। यक्षिणी की वाम जंघा का फ़ड़कना यह सूचित करता है कि शीघ्र ही उसे रति सुख की प्राप्ति होगी।


करुहपदै: – नायक संभोग काल में नायिका के ऊरु में नखक्षत करता है।


सम्भोगान्ते – कामशास्त्र के अनुसार रतिक्रीड़ा के अन्त में नायक का नायिका की रतिजन्य थकान को दूर करने के लिये चरण दबाना, पंखा झलने आदि का विधान है।

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ६

विरहणी स्त्रियों का चित्रण – जिन स्त्रियों के पति परदेश चले गये हैं, ऐसी स्त्रियां शारीरिक श्रृंगार नहीं करती हैं। ऐसी स्थिती में उनके केश  बिखरे होने के कारण मुख और आंखों पर आये हुए हैं। वे स्त्रियाँ मेघ को देखने के कारण उन केशों के अग्रभाग को ऊपर से पकड़े होंगी।
प्राचीन काल में आधुनिक युग के समान आवागमन के साधन नहीं थे, इसलिये व्यक्ति वर्षा ऋतु अपने घर व्यतीत करते थे। शेष आठ माह घर
से बाहत अपना व्यापार, नौकरी आदि करते थे। इसी कारण हिन्दुओं के प्राय: सभी त्योहार (होली को छोड़्कर) इसी वर्षा ऋतु में होते हैं। दीपावली मनाने के बाद व्यक्ति बाहर चले जाते थे और वर्षा आरम्भ होने के साथ ही अपने घर लौट आते थे। इस कारण आकाश में मेघ को देखकर उनकी पत़्नियों को यह विश्वास होने लगता था कि अब उनके पति लौटने वाले हैं।
पुत्र को जन्म देने कारण पत़्नी को ’जाया’ कहा जाता है।
कुसुमसदृशं – पुष्प के समान (कोमल) प्राण वाले। उत्तररामचरितमानस में भी स्त्रियों के चित्त को पुष्प के समान कोमल बताया गया है।
शिलीन्ध्र को कुकुरमत्ता भी कहते हैं। ग्रामों में प्राय: छोटे छोटे बच्चे साँप की छत्री भी कहते हैं। यह वर्षा ऋतु में पृथ्वी को फ़ोड़ कर निकलते हैं। कुकुरमुत्तों के उगने से पृथ्वी का उपजाऊ होना माना जाता है।
मानस सरोवर हिमालय के ऊपर, कैलाश पर्वत पर स्थित है। कैलाश पर्वत हिमालय के उत्तर में स्थित है। कहते हैं कि इसको ब्रह्मा ने अपने मन से बनाया था। इसलिए इसे मानस या ब्रह्मसर भी कहा जाता है। वर्षाकाल से भिन्न समय में मानसरोवर हिम से दूषित हो जाता है और हिम से हंसों को रोग लग जाता है। इसलिये वर्षाकाल में ही राजहंस मानसरोवर जाते हैं तथा शरदऋतु के आगमन के साथ ही मैदानों में आ जाते हैं।
काव्यों में हंसों का कमल-नाल खाना प्रसिद्ध है। वे इसका दूध पीते हैं।
राजहंस – एक श्वेत पक्षी जिसकी चोंच और पैर लाल होते हैं, जो नीर-क्षीर-विवेक के लिये प्रसिद्ध है।

5 thoughts on “कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ६

  1. भाई कहां कहा से ढुढ कर लाते है इतने शब्द ओर उन के अर्थ, दिल सेआप का धन्यवाद, बहुत अच्छा लगता है

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पति – पत्नि का संबंध

       पति – पत्नि जीवन रथ के दो पहिये हैं। गृहस्थी की गाड़ी सुचारु रुप से चलाने हेतु दोनों पहियों का ठीक – ठाक रहना बहुत जरुरी है। वे एक दूसरे के पूरक हैं। पति – पत्नि को आपस में सम्बन्धों को सहज एवं सुलभ बनाने के लिये एक दूसरे की भावनाओं को समुचित आदर देना जरुरी है। यदि पति – पत्नि अग्नि को साक्षी मानकर विवाह के समय की गई अपनी प्रतिज्ञाओं को याद रखें एवं उनका पालन करें तो जीवन में आनन्द ही आनन्द होगा।

            पति – पत्नि में आपस में समझबूझ तब और ज्यादा विकसित पाई जाती है जब दोनों जीवन के कठिन मार्ग से साथ में गुजरे हों, फ़िर भले ही वह कुछ भी कठिनता हो चाहे वह पारिवारिक हो या धन की। कठिन समय में एक दूसरे का हौसला बढ़ाकर वे एक दूसरे को बहुत करीब से जानने लगते हैं। कई दंपत्तियों में इस समझबूझ की कमी पाई जाती है क्योंकि उनके पास शुरु से ही सारे सुख होते हैं, जिससे वे एक दूसरे को समझ ही नहीं पाते और हमेशा एक दूसरे से दूरी बनी रहती है।

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14 thoughts on “पति – पत्नि का संबंध

  1. @श्यामलजी – चित्र तो पति-पत्नि के बीच की understanding को दिखा रहा है, फ़िर से ध्यान से देखिये।

    मेरा मानना है कि जो पति-पत्नि बुरा समय साथ में गुजारते हैं वो हर अपने दांपत्य जीवन का हर क्षण खुशी से जीते हैं उसी में से एक यह चित्र दर्शाता है। 🙂

  2. salah achchhi hai par ……picture kuchh our wyan kara rahi hai ……aapasi samajh ke liye situation jarur maayane rakhati hai par situation badalane par aadami badal jaaye our aapake samajhadari ko bhool kar rukhapan uasake andar bana rahe to kya kahoge usake liye …….mujhe aisa lagata hai pyar badhanae ke liye samwedansheel hona jaruri hai our pariwar ko ijajt dene ki soch prabal hona chahiye sukh dukh ko baatane ki kshamata honee chahiye …….our bhi bahut kuchh honi chahiye dono ke andar

  3. चित्र कथ्य से सुसंगत है या नहीं ये सवाल दो टिप्पणियों को पढ़कर उठता है. मेरी राय में चित्र में जो कुछ हो रहा है बाकायदा लय और ताल में हो रहा है जिसकी दाम्पत्य में सख्त ज़रुरत है.
    वैसे चित्र ज़ोरदार है.

  4. यदि दो पहियों से ही पती पत्नी को डिफाईन करा जाय तो बताईये तब क्या हाल होगा जब एक पहिया ट्रैक्टर का हो और दूसरा स्कूटर का 🙂

    अच्छी पोस्ट।

  5. Bat to sundar likhi apne.

    पाखी की दुनिया में देखें-मेरी बोटिंग-ट्रिप !!

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कम्प्यूटर पर पासवर्ड कैसे छुपाएँ, कीबोर्ड से लिखते समय । कोई देख नहीं पाये कि आप अपने मोनिटर पर क्या कर रहें और क्या सर्फ़िंग कर रहे हैं और ताऊ….

कम्प्यूटर पर पासवर्ड कैसे छुपाएँ, कीबोर्ड से लिखते समय ।

कोई देख नहीं पाये कि आप अपने मोनिटर पर क्या कर रहें और क्या सर्फ़िंग कर रहे हैं।

और ये सबसे उम्दा….

और ये सब ताऊ से देखते न बना और आँखें बंद कर लीं –

10 thoughts on “कम्प्यूटर पर पासवर्ड कैसे छुपाएँ, कीबोर्ड से लिखते समय । कोई देख नहीं पाये कि आप अपने मोनिटर पर क्या कर रहें और क्या सर्फ़िंग कर रहे हैं और ताऊ….

  1. भाई यह ताऊ तो इस लिये माथे पर हाथ मार रहा है कि इस का कहना है ओर भी बहुत से तरीके है, लेकिन मुझे तो बहुत अच्छा लगा यह तरीका, अभी से शुरु भी कर दिया

  2. अरे ताऊ तू आंखे क्न्यो बंद कर रहा है कुछ सीख इस लडकी से

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खरीदें शार्दुल सिक्योरिटी

शार्दुल सिक्योरिटी अभी ४८५ रुपये के आसपास है जल्दी ही यह स्टाक बहुत तेजी में आने वाला है।
BSE Code : 512393

2 thoughts on “खरीदें शार्दुल सिक्योरिटी

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मुंबई का माल इन आर्बिट

परसों हम घूमने के लिये मलाङ के इन आर्बिट माल गये तो जो मित्र हमारे साथ थे उन्होंने हमें बताया कि ये एशिया का दूसरा सबसे बड़ा माल है | ३ मंजिला माल बहुत ही बड़ी जगह में फैला हुआ है, और इतनी बड़ी कार पार्किंग हमने पहली बार देखी | और फिर माल में मा….ल आह! आह!…अहा! कहने को शब्द नहीं है | बाकी शापिंग माल में तो सभी ब्रांडेड आइटम थे जो कि जितना महँगे से महँगा बेच सकते हैं बेच रहे हैं , खरीदने वाले खरीद रहे हैं और हम केवल देख कर आ रहे हैं…. | वहाँ चटोरों के लिये तीसरा माला स्पेशल बनाया गया है पर यहाँ पर वही चटोरा बन सकता है जिसकी जेब बहुत भारी हो, और खाली होने को तरस रही हो | तो भाईलोग अपन ने ५४९ का पिज्जा छोड़कर बाहर ठेले पे चटकारे ले लेकर पानी पूरी, मुंबईया भेल और रगड़ा पेटिस चटकाया | फिर लोकल पकड़कर छू हो गये |

One thought on “मुंबई का माल इन आर्बिट

  1. अच्‍छा लगा आपका लिखा, पर अगर आप मॉल की तस्‍वीरें भी साथ देते तो अच्‍छा लगता, चलिये ये काम अगली बार मैं कर दूंगा, मॉल की कुछ अप्रत्‍याशित तस्‍वीरें खींचने का आईडिया मिला है आपके लिखे से ।

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