“मुझे स्नेह क्या मिल न सकेगा” कविता सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’ रचित “कविश्री” से

मुझे स्नेह क्या मिल न सकेगा ?

स्तब्ध दग्ध मेरे मरु का तरु

क्या करुणाकर, खिल न सकेगा ?

                 जग दूषित बीज नष्ट कर,

                 पुलक-स्पन्द भर खिला स्पष्टतर,

                 कृपा समीरण बहने पर क्या,

                 कठिन हृदय यह हिल न सकेगा ?

मेरे दुख का भार, झुक रहा,

इसलिए प्रति चरण रुक रहा,

स्पर्श तुम्हारा मिलने पर क्या,

महाभार यह झिल न सकेगा ?

“प्यार के अभाव में मेरी जिंदगी

एक वीराना बन कर रह गयी है

अगर तुम देख लो, यह सँवर जाये ।” अज्ञात

5 thoughts on ““मुझे स्नेह क्या मिल न सकेगा” कविता सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’ रचित “कविश्री” से

  1. निराला को जैसे जैसे पढ़ता गया, हिन्दी जानने का अभिमान ध्वस्त होता गया । साथ ही साथ और पढ़ने की ललक उठ खड़ी हुयी ।

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पाकिस्तान का नया गुटखा… जरुर देखियेगा… आखिर गुटखे का सवाल है.. :)

 

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22 thoughts on “पाकिस्तान का नया गुटखा… जरुर देखियेगा… आखिर गुटखे का सवाल है.. :)

  1. देवनागरी कुफ्र है। स्क्रिप्ट बदलवा दीजिए, गुटखा हिट हो जाएगा। वैसे पाकिस्तान में गुटखा होता है क्या?

  2. सानिया ने पाकिस्तान को चुनकर जो गलत निर्णय लिया उसकी तस्वीर पेश करती ये गुटका /इस प्रस्तुती के लिए आपका धन्यवाद /


  3. @ गिरिजेश राव
    हाँ, ऎब के मामले में पाकिस्तानी भला हिन्दुस्तानियों से पीछे क्यों रहें ?
    अफ़ीमी गुटखा तक उपलब्ध है |

    @ विवेक जी
    यदि आप चाहें तो हिन्दी मज़मून को इसे कापी पेस्ट कर बदल लें,


    جب سانِیا ہو سںگ۔۔ پھڑک جایے اَںگ اَںگ

    यह अधिक नेचुरल लगेगा ।

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बिजनेस वर्ल्ड के ५ अप्रैल के अंक के साथ माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस और टूल्स की मुफ़्त डीवीडी

कल हमने बिजनेस वर्ल्ड का ५ अप्रैल का अंक लिया तो साथ में मिली माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस और टूल्स की मुफ़्त डीवीडी।

निम्न सॉफ़्टवेयर उपलब्ध हैं इस डीवीडी में –
१.  माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस २०१०
२. शेयर पाईंट २०१०
३.  माइक्रोसॉफ़्ट प्रोजेक्ट २०१०
४.  माइक्रोसॉफ़्ट विसियो २०१०
५. विन्डोज एक्स पी एस.पी. ३
६.  माइक्रोसॉफ़्ट सिक्योरिटीज एसेन्शियलस
७. इंटरनेट एक्सप्लोरर ८
८. विन्डोज लाईव एसेन्शियलस

आज ही अपनी प्रति खरीद लें और अपना कम्प्य़ूटर अपडेट कर लें।

9 thoughts on “बिजनेस वर्ल्ड के ५ अप्रैल के अंक के साथ माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस और टूल्स की मुफ़्त डीवीडी

  1. एम्. एम्. ऑफिस २००७ का प्रोफेशनल पैक कंपनी अभी भी रु.१५,०००/- से ज्यादा का बेच रही है तो २०१० का नया पैक फ्री क्यों देगी? कोई लोचा लगता है. ये तो ट्रायल पैक होगा जो साठ दिन में ठप हो जायेगा. बाकी सोफ्टवेयर तो वैसे भी फ्री ही हैं.

  2. @ Jyotsna जी,

    इसमें कोई भी लोचा नहीं है, २०१० का बीटा वर्जन दिया जा रहा है, बीटा वर्जन कभी भी एक्सपायर नहीं होता है। बस उसमें कुछ बग होते हैं जो नार्मल एन्ड यूजर को पता भी नहीं चलते हैं। और आप बेधड़क इस वर्जन को उपयोग में ला सकते हैं।

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चैन्नई में कल का रात्रि भोजन और आसपास के वातावरण के कुछ चित्र से अपने जहन में बीती जिंदगी का कोलाज बन गया…

    कल का रात्रि भोजन जो कि फ़िर हमने सरवाना भवन में किया, माफ़ कीजियेगा बहुत से ब्लॉगर्स को हमने इसका नाम याद करवा दिया है, और केवल इसके लिये ही वो चैन्नई आने को तैयार हैं।

    जब हम पहुँचे तो पहले से ही इंतजार की लाईन लगी थी क्योंकि बैठने की जगह बिल्कुल नहीं थी, हमने लिखवा दिया कि भई हमारा भी नंबर लगा दो। पीछे वेटिंग में पाँच लोगों का बहुत बड़ा परिवार (बड़ा इसलिये कि आजकल तो हम दो हमारा एक का कान्सेप्ट है।) और उनके पीछे दो लड़के हमारी ही उम्र के होंगे और साथ में उनके साथ एक वृद्धा थीं। पहला हमारा ही नंबर था, जैसे ही एक टेबल खाली होने वाली थी वैसे ही वेटर ने हमें उस टेबल का अधिकार हमें इशारा करके दे दिया। जो उस टेबल पर बैठे थे वो भाईसाहब हाथ धोने गये थे तब तक वेटर उनका बिल लेकर आ गया और उनको खड़े खड़े ही पेमेन्ट भी देना पड़ा और वापस छुट्टे आने का इंतजार भी करना पड़ा।

    पर हम अपनी कुर्सी पर ऐसे धँस गये थे बिल्कुल बेशर्म बनकर कि हमें कोई मतलब ही नहीं है, हालांकि अगर ये हमारे साथ होता तो बहुत गुस्सा आता और शायद इस बात पर हंगामा खड़ा कर देते। जब हम इंतजार की लाईन में खड़े थे तभी मेन्यू कार्ड लेकर क्या खाना है वो देख लिया था जिससे बैठकर सोचने में समय खराब न हो क्योंकि बहुत जोर से भूख लगी थी।

    आर्डर दे दिया गया, जहाँ हम बैठे थे उसी हाल के पास में ही खड़े होकर खाने की व्यवस्था थी, सेल्फ़ सर्विस वाली। हमारी टेबल के पास ही एक टेबल पर एक लड़की पानी बताशे खा रही थी, तो बताशा उसने जैसे ही मुँह में रखा, तो मुँह खुला ही रह गया, क्योंकि बताशा एक बार के खाने के चक्कर में उसके मुँह में फ़ँस गया था, उसने कोशिश की पर कुछ नहीं हुआ फ़िर अंतत: अपने हाथ से बताशा मुँह के अंदर करना पड़ा ये सब देखकर हमें अपने पुराने दिन याद आ गये, जब हम अपने उज्जैन में चौराहे पर पानी बताशे वाले के यहाँ खड़े होकर बड़े बड़े बताशे निकालने को कहते थे कि मुँह में फ़ँस जाये। और हम सारे मित्र लोग बहुत हँसते थे।

    तभी हमारे सहकर्मी जो कि हमारे साथ थे कहा कि देखो उधर सिलेंडर देखो, तो उधर हमने देखा तो पाया कि एक सुंदर सी लड़की खड़ी थी, हमारा सहकर्मी बोलता है कि हमने सिलेंडर देखने को बोला है, लड़की नहीं। किसी जमाने में हम भी अपने दोस्तों के साथ यही किया करते थे, और बहुत मजा किया करते थे। अपने स्कूल कॉलेज के दिनों की बातें याद आ गईं।

    अगली टेबल पर एक छोटा परिवार (छोटा इसलिये कि वो हम दो हमारा एक कॉन्सेप्ट के थे) था जो कि खड़ा होकर खा रहा था। और अपने प्यारे दुलारे बेटे को गोल टेबल पर बैठा रखा था, और उसकी मम्मी पापा बड़े प्यार दुलार से अपने बेटे को अपने हाथों से खिला रहे थे। और साथ में प्यार भी करते जा रहे थे। हमें हमारे बेटे की याद आ गई, क्योंकि वो भी लगभग इतनी ही उम्र का है, और शैतानियों में तो नंबर वन है। कहीं भी चला जाये तो पता चल जाता है कि हर्षवर्धन आ गये हैं। होटल में तो बस पूछिये ही मत पूरा होटल सर पर रख लेंगे, होटल वाला अपने आप एक आदमी उसके पीछे छोड़ देता है, कि यह पता नहीं क्या शैतानी करने वाला है, और हम लोग अपना खाना मजे में खाकर बेटे को साथ में लेकर चल देते हैं, बेचारा होटल वाला भी मन में सोचता होगा कि ये हमारे यहाँ क्यों खाने आये हैं।

    आज हमें कुछ ज्यादा ही मोटे लोग नजर आये, तो समीर भाई “उड़नतश्तरी जी” की टिप्पणी याद आ गई, कि हमें तो खाने का फ़ोटू देखते ही वजन दो किलो बड़ गया, ध्यान रखें। मोटे लोगों को देखकर अनायास ही मुँह से निकल जाता है, ये देखिये अपना भविष्य। पर क्या करें बेशर्म बनकर उनको देखते रहते हैं।

    शाम को ही एक बिहारी की दुकान पर समोसा खा रहे थे, तो वहाँ पर एक बेहद मोटा व्यक्ति जलेबियाँ खा रहा था, कपड़े ब्रांडेड पहने हुआ था, और मजे में जलेबियाँ खाये जा रहा था, हम सोचने लगे कि ये तो हमसे लगभग तिगुना है फ़िर भी क्या जलेबियाँ सूत रहा है, तो बसे हम समोसे पर ही रुक गये और जलेबियों की ओर देखा भी नहीं, केवल उस मोटे व्यक्ति की ओर एक नजर देखकर चुपचाप सरक लिये।

    जब सरवाना भवन से खाकर निकले तो बिल्कुल पास में ही एक पान वाले भैया खोका लगाकर बैठते हैं, ५ दिन से हम इनके पर्मानेंट ग्राहक हैं, भैया जी इलाहाबाद के हैं और बहुत रसभरी प्यारी प्यारी बातें करते हैं पर तमिल पर भी उतना ही अधिकार है, जितना कि अपनी मातृभाषा पर, पर उनका टोन बिल्कुल नहीं बदला है, अभी भी ऐसा ही लगता है कि छोरा गंगा किनारे वाला ही बोल रहा है। उनसे हम अपना पान लगवाकर थोड़ी सी हिन्दी में मसखरी करके अपने रास्ते निकल लेते हैं। आज वे भी प्यार से बोले “बाबू आप भी हमारे मुल्क से लगते हो” हम भी बोल ही दिये “भई हम तो इलाहाबाद के दामाद हैं।” और चल दिये अपने ठिकाने की ओर…

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  1. @Mahesh ji,
    हमने समीर लाल जी को कतई मोटा शब्द से संबोधन नहीं किया है, हमने केवल टिप्पणी का जिक्र किया है | बाकी सब बाते केवल हमारे लिए हमने की हैं| 🙂

  2. कभी मौका मिले तो टी नगर स्थित सर्वणा भवन के भी दर्शन कर आईये.. चेन्नई आकार अगर कोई वाहन नहीं गया तो उसका आना व्यर्थ ही समझे.. 🙂

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ग्लोबल वार्मिंग पर केवल नेपाल चिंतित है क्या… कुछ हमारा कर्त्तव्य है या नहीं… क्या हम अकेले कुछ कर सकते है….?

ग्लोबल वार्मिंग पर नेपाल के केबिनेट ने १७२०० फ़ीट ऊँचाई पर माऊँट एवरेस्ट काला पत्थर पर बैठक कर दुनिया का ध्यान अपनी और खींचा, दुनिया की सर्वोच्च शिखर चोटी के आधार शिविर के पास स्यांगबोचे में एक संवाददाता सम्मेलन में घोषणा पढ़ी, जिसके मुताबिक आपिनामा-गौरीशंकर क्षेत्र को नया संरक्षण क्षेत्र घोषित किया गया है। वहाँ पर उन्होंने संकेत दिया कि जलवायु परिवर्तन का मुद्दा न केवल पर्वतीय देशों और समुद्र तटों पर स्थित देशों से जुड़ा है बल्कि आम वैश्विक समस्या है।
नेपाल के प्रधानमंत्री ने कहा कि “हम दुनिया को यह संदेश देने आये हैं कि जलवायु परिवर्तन हिमालयी पट्टी और निचले इलाकों के १.३ अरब लोगों को प्रभावित करने जा रहा है।
हिमालय के ग्लेशियर कुछ दशकों में गायब हो सकते हैं और इससे एशिया के बड़े हिस्से को सूखे का सामना करना पड़ सकता है, जहाँ लाखों लोग हिमालय से निकलने वाली नदियों के ऊपर निर्भर करते हैं।
पर हम क्या कर रहे हैं, क्या हमें ग्लोबल वार्मिंग की तनिक भी चिंता है, लोग दशकों से बोल रहे हैं कि मुंबई डूब जायेगी पर इसके लिये किसी ने क्या कभी कुछ किया नहीं… किसी की इच्छाशक्ति ही नहीं है। क्या हम अकेले कुछ कर सकते हैं जिससे ग्लोबल वार्मिंग को रोकने में कुछ मदद मिले…. ।

6 thoughts on “ग्लोबल वार्मिंग पर केवल नेपाल चिंतित है क्या… कुछ हमारा कर्त्तव्य है या नहीं… क्या हम अकेले कुछ कर सकते है….?

  1. ग्लोबल वॉर्मिंग का मुद्दा हमारे वजूद से जुड़ा मुद्दा है…लेकिन खेद है कि न तो इस पर हम ध्यान दे रहे हैं और न ही सरकार अपनी ज़िम्मेदारी समझ रही है…अगर धरती यूं ही गरम होती रही और समुद्र का जलस्तर बढ़ता रहा तो अगले सौ-डेढ़ साल में मुंबई भी समुद्र में समा सकती है…

    cजय हिंद…

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १८

“यह मेरा पुत्र कर्ण है ।“ पिता जी ने गुरुवर्य द्रोण से निवेदन किया।

मुझको पूरा विश्वास था कि अब वे मुझसे मेरे कानों के कुण्डलों के सम्बन्ध में कुछ अवश्य पूछेंगे, लेकिन निर्विकार भाव से उन्होंने केवल इतना ही कहा, “तुम्हारा पुत्र, अधिरथ ? फ़िर इसको आज युद्धशाला में कैसे लाये हो ?”

“आपके चरणों में डालने के लिए ।“

“मेरे चरणों में किसलिए ?”

“युवराजों के साथ यदि इसको भी थोड़ी-सी युद्धविद्या की शिक्षा मिल जाये तो …”

“युवराजों के साथ ? अधिरथ, युद्धविद्या केवल क्षत्रियों का कर्तव्य है। तुम चाहो तो अपने पुत्र को युद्धशाला में भरती कर दो, लेकिन वह युवराजों के साथ शिक्षा कैसे पा सकता है ?”

      पिताजी का चेहरा क्षण-भर को निस्तेज हो गया। क्या कहें, यह थोड़ी देर तक उनकी समझ में नहीं आया, अन्त में वे जैसे-तैसे बोले, “गुरुदेव की जैसी आज्ञा ।“

      गुरुदेव को पुन: अभिवादन कर हम लोग लौटने लगे। मार्ग में युवराज अर्जुन लक्ष्य में से बाण निकालकर लौटता हुआ हमें मिला। मैंने उसको ध्यान से देखा। उसका बर्ण आकाश की तरह नीला था। हनु भाले की नोक की तरह सिकुड़्ती हुई थी। उस्की तेजस्वी आँखें दोनों कनपटियों की ओर संकुचित होती गयी थीं। उसकी नाक ऋजु और तीक्ष्ण थी। मस्तक थाल की तरह भव्य था। भौंहें सुन्दर थीं । उसका पूरा चेहरा ही विलक्षण सुन्दर था। घण्टे की तरह मधुर ध्वनि में उसने पिताजी से पूछा, “क्यों काका, चम्पानगरी से आज ही आये हो क्या ?”

“हाँ । अपने इस पुत्र कर्ण को लेकर आया हूँ।“

      अर्जुन ने मेरी ओर देखा। मेरी आँखों की अपेक्षा वह शायद मेरे कानों के कुण्डल को ही अधिक आश्चर्य से देख रहा था । वह मुझसे कुछ पूछने ही जा रहा था कि इतने में ही आकाश से एक कुण्डली-सी हम दोनों के बीच में आकर सर्र से गिरी। आकाश से गिरने के कारण सुन्न होकर वह सर्प थोड़ी देर तक वैसा ही पड़ा रहा और फ़िर जिधर अवसर मिला उधर ही दौड़ने लगा। विद्युत गति से युवराज अर्जुन ने हाथ में लगा बाण धनुष पर चढ़ा लिया और वह द्रुतगति से दौड़ते हुए सर्प पर निशाना लगाने लगा। इतने में ही चबूतरे से कोई चिल्लाया, “अर्जुन ! हाथ नीचे कर !” उस आवाज में अद्भुत शक्ति थी। युवराज अर्जुन ने एकदम हाथ नीचे कर लिया, मानो अग्नि का चटका लग गया हो। तीर की गति से भागता हुआ वह सर्प क्षण-भर में ही अखाड़े के पाषाण-प्राचीर में कहीं अदृश्य हो गया। चबूतरे पर से पुन: आवाज गूँजी, “युवराज, उस तुच्छ सर्प को मारने से पहले अपने भीतर के सर्प को मार डालो। क्रोध का सर्प बड़ा भयानक होता है। दुर्बल पर हाथ मत उठाओ।“

     उस चबूतरे पर गुरुदेव द्रोण थे । एक युवक शीघ्रता से अर्जुन के पास आया और अर्जुन की पीठ पर हाथ रखकर उसने अत्यन्त मधुर स्वर में पूछा, “एकदम ही धनुष कैसे उठा लिया, पार्थ ?”

ये थे युवराज युधिष्ठिर ।

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३७

याममात्रम़् – एक याम (प्रहर) तीन घण्टे के बराबर होता है। यक्ष ने यहाँ मेघ को एक याम तक प्रतीक्षा करने को कहा है; क्योंकि लक्षणों से यक्षिणी “पद्मिनी” मानी गयी है और पद्मिनी के सोने का समय एक या
म भर होता है। जैसे कि कहा गया है –

पद्मिनी यामनिद्रा च द्विप्रहरा च चित्रिणी।
हस्तिनी यामत्रितया घोरनिद्रा च शड़्खिनी॥

परंतु अन्य विद्वान लिखते हैं कि संभोग की परमावधि एक याम मानी गयी है। यक्षिणी भी पूर्ण यौवना है। उसकी भी स्वप्न में रतिक्रीड़ा एक याम तक चलेगी तब तक प्रतीक्षा करना।


स्वजलकणिकाशितलेन – इससे स्पष्ट होता है कि यक्ष-पत्नी कोई सामान्य स्त्री नहीं थी, वह स्वामिनी थी; क्योंकि स्वामी या स्वामिनियों के पैर दबाकर, पंखा झलकर, गाकर जगाना चाहिये। इसलिये यक्ष मेघ से निवेदन करता है कि वह उसकी प्रिया को शीतल जल कणों से, शीतल वायु से जगाये।


विधुद़्गर्भ: – मेघ वहाँ अपनी बिजली रुपी पत्नी को साथ लेकर जाये; क्योंकि मेघ के लिये परस्त्री के साथ अकेले बात करना उचित नहीं है (परनारीसंभाषणमेकाकिनो नोचितम़्)।


अविधवे – कवि ने यह पद साभिप्राय प्रयुक्त किया है; क्योंकि मेघ यक्षिणी को अविधवे कहकर संबोधित करेगा, जिससे यक्षिणी समझ जायेगी कि उसका पति जीवित है और वह मेघ की बात उत्साहित होकर सुनेगी।


यो वृन्दानि त्वरयति पथि श्राम्यतां प्रोषितानां – संस्कृत काव्यों में वर्षा का उद्दीपक के रुप में वर्णन किया गया है; इसलिए प्राय: यह वर्णन किया जाता है कि मेघ परदेश गये पतियों को घर लौटने के लिये प्रेरित करता है। प्राचीन काल में क्योंकि आवागमन के साधन नहीं थे और पैदल ही आते जाते थे तो पुरुष दीपावली के बाद अपनी जीविका के लिये चले जाते थे और फ़िर वर्षा ऋतु से पहले लौट आते थे, पैदल चलते-चलते जब वे थक जाते थे तो विश्राम करने लगते थे, किन्तु मेघों की घटाएं देखकर वे शीघ्रातिशीघ्र घर पहुँचने के लिये उत्कण्ठित हो उठते थे।


अबलावेणिमोक्षोत्सुकानि – प्रोषितभर्तृका स्त्री प्रिये के प्रवास के समय केशों को एक चोटी में गूँथ लेती थी जिसे प्रवास से लौटकर पति ही अपने हाथ से खोलता था।

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ७

प्रेमाश्रु – ग्रीष्म ऋतु की भयंकर गर्मी पर्वत को तपा डालती है तथा जब प्रथम वर्षा की बूँदें उस पर गिरती हैं तो उसमें से वाष्प निकलती है। आषाढ़ में लम्बे समय के बाद पर्वत जब मेघ से मिलता है, तो उसकी बूँदों से पर्वत से गर्म-गर्म वाष्प निकलती है। कवि ने कल्पना की है कि वे विरह के आँसू निकल रहे हैं।
पत्थरों से टकराने के कारण नदियों का जल हल्का व
स्वास्थ्यकारी माना जाता है।
इन्द्रधनुष वल्मीक के भीतर स्थित महानाग की मणि के किरण समूह से उत्पन्न होता है। कुछ इसे शेषनाग के कुल के सर्पों के नि:श्वास से उत्पन्न बताते हैं। वराहमिहिर ने इन्द्रधनुष की उत्पत्ति के विषय में इस प्रकार लिखा है – ’सूर्यस्य विविधवर्णा: पवनेन विघट्टिता: करा: साभ्रं वियति धनु:संस्थाना ये दृश्यन्ते तदिन्द्रधनु:।’ अर्थात जो सूर्य की अनेक वर्णों की किरणें वायु से बिखरी हुई होकर मेघ-युक्त आकाश में धनुष के आकार की दिखलायी देती हैं, उसे इन्द्रधनुष कहते हैं।
ग्रामीण स्त्रियाँ नागरिक स्त्रियों की अपेक्षा भोली-भाली होती हैं तथा वे कटाक्षपात आदि श्रृंगारिक चेष्टाओं से अनभिज्ञ रहती हैं।
आम्रकूट पर्वत – आम्रकूट नाम वाला पर्वत, इसका यह नाम सार्थक है, क्योंकि इसके आस-पास के जंगलों में आम के वृक्ष अधिकता में पाये जाते हैं। यह विन्ध्याचल पर्वत का पूर्वी भाग है। यहाँ से नर्मदा नदी निकलती है। आधुनिक अमरकण्टक को आम्रकूट माना जाता है।
विमखो न भवति – कोई भी व्यक्ति पहले किये गये उपकारों को नहीं भूलता है और फ़िर यदि कोई मित्र, जिसने उसके ऊपर उपकार किये हैं, उसके पास आता है तो वह उन पूर्व उपकारों को सोचकर उसका स्वागत करता है तथा यथासम्भव सहायता भी करता है।

4 thoughts on “कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ७

  1. अमूल्य शव्दो का अर्थ बता कर आप हमारी जानकारी बढा रहे है, हमारा ग्याण बढा रहे है. इस के लिये आप का धन्यवाद

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आज पापाजी की बहुत याद आ रही है।

आज सुबह से पता नहीं क्यों अतीत में अपने जीवन को झांक रहा था और उस सबमें पापाजी ने क्या किया अपने परिवार और मेरे लिये पता नहीं क्यों यह सब विश्लेषण करने की कोशिश कर रहा था। पर मैं कोई बहुत बड़ा तत्वज्ञानी नहीं कि मैं उस विशाल ह्रदय पिता के कार्यों का विश्लेषण कर सकता, पर हाँ यह बात तो मैं बहुत ही अभिमान के साथ कह सकता हूँ कि आज जो कुछ भी मैं हूँ केवल अपने माता पिता के दिये गये संस्कारों के कारण हूँ। अगर संस्कार नहीं होते तो मैं शायद कहीं ओर होता जो मेरे करीबी ओर मेरे अपने बहुत अच्छे से जानते हैं, जब मैं अपनी राह भटक गया था। परंतु संस्कारों ने मुझे सही राह दिखाई और मुझे गर्त में जाने से बचा लिया।

बचपन की यादों में झांक रहा था तो देखा कि पापाजी सुबह जल्दी उठकर अपनी साईकिल लेकर बैंक के काम से दौरा करने चल दिये हैं उन दिनों में परिवहन की उतनी अच्छी व्यवस्था तो थी नहीं, तो उन्हें एक दिन में तकरीबन ३०-४० किलोमीटर साइकिल चलानी पड़ती थी, अगर कहीं दूर गाँव जाना होता था तो पहले बस के ऊपर साईकिल रखते और फ़िर जहां जिस गाँव में जाना होता वहां साईकिल लेकर चल देते थे। फ़िर देर रात थकेहारे कब में आते थे हमें तो पता ही नहीं चलता था क्योंकि उस समय कोई टी.वी. तो था नहीं, मैं तकरीबन शाम ७-८ बजे के आसपास सो जाता था। कभी कभी दौरा २-३ दिन का भी हो जाता था। बस बचपन का इतना ही मुझे याद है।

पापाजी अपने छह: भाई बहनों में सबसे बड़े हैं, और मैंने उनकी एक बात को और ध्यान से देखा कि जब भी चाचाजी, फ़ूफ़ाजी या कोई ओर घर पर आता वो उनके साथ थोड़ी ही देर समय बिताते और बाकी समय बाहर जाकर पेड़ पौधे के साथ या पानी की टंकी भरने में या कुछ ओर करने में अपने को व्यस्त रखते। वैसे तो सब समझदार हैं पर यह बात मेरे समझ में न आई, पर वक्त ने मुझे बता दिया कि पापाजी क्यों ऐसा करते हैं। बड़ों की इज्जत अपने हाथों में होती है, यही बात मैं उनकी इस बात से सीख पाया। ओर भी बहुत कुछ सीखने को बाकी है जो शायद ऐसे ही जिंदगी की पाठशाला में सीखने को मिलेगा।

यादें तो बहुत हैं पर कहने के लिये शब्द नहीं मिल रहे हैं जब भी शब्द मिलेंगे यादों को पिरोने के लिये वो यादें जरुर कलमबद्ध करुँगा। मुझे गर्व है मेरे पापाजी के ऊपर कि वो मेरे पापा हैं।

10 thoughts on “आज पापाजी की बहुत याद आ रही है।

  1. पापा जी के ऊपर सोचने के बाद श्रद्धा होती है और माता जी के ऊपर श्र्द्धा का तो माहौल हर समय मौजूद रहता है .
    जाकर पिताजी के दर्शन कर आइये ! ऐसी क्या बात है !

  2. हमारी भावुकता हमें आपसी रिश्तों से जोडती है, उनमें कुछ खास ढूंढ़ती है…

    अपने पापा को याद करना, एक नई जिम्मेदारी का अहसास करने जैसा है…अच्छा लगा…

  3. ओह । बेहद भावुक पोस्‍ट ।
    पिता से मैंने रेडियोवाणी पर अपने मन की बहुत सारी बातें कहीं थीं कुछ दिनों पहले ।

  4. @विवेकजी – आपने बिल्कुल बात का मर्म लिख दिया।
    @रवि कुमारजी – केवल भावनाओं के द्वारा ही हम आपस में जुड़े हुए हैं।

    अगले सप्ताहांत हम पापाजी से मिलने जा रहे हैं।

  5. बहुत सुंदर, हमारे पिता जी भी कुछ ऎसे ही थे, पढ कर ऎसा लगा जेसे आप हमारे पिता जी की बात कर रहे है.
    धन्यवाद

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कालजयी साहित्यकार जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध रचना “हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयम प्रभा समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती॥“

जब हम कालेज में पढ़्ते थे तब जयशंकर प्रसाद की यह प्रसिद्ध रचना बहुत ही अच्छा लगती थी और यह गीत हमारी मित्र मंडली में सबको बहुत पसंद था। चूँकि हम सब मतलब हमारा समूह स्टेज आर्टिस्ट थे, कला से जुड़े थे तो हमारे नाटकों में हम कोशिश करते थे कि हम इसी प्रकार का कोई गीत सम्मिलित करें।

फ़िर जब “चाणक्य” धारावाहिक छोटे पर्दे पर शुरु हुआ तो हमें नई लय के साथ यह गीत मिल गया जो कि आज भी मेरा मनपसंद है और मेरे बेटे का भी।

स्वतंत्रता को प्राप्त करने के लिये उठाने वाले इस गीत को सुनते ही आज भी रगों में खून तेज गति से दौड़ने लगता है। प्रस्तुत है रचना –

हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयम प्रभा समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती॥ कोरस
अमर्त्य वीर पुत्र हो दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो, प्रशस्त पुण्य पंथ है बढ़े चलो बढ़े चलो॥ कोरस
असंख्य कीर्ति रश्मियाँ विकिर्ण दिव्य दाह सी, सपूत मातृभूमि के रुको न शूर साहसी॥ कोरस
अराति सैन्य सिंधु में सुबाड्वाग्नि से जलो, प्रवीर हो जयी बनो बढ़े चलो बढ़े चलो॥ कोरस

यूट्यूब पर वीडियो के लिये चटका लगायें

9 thoughts on “कालजयी साहित्यकार जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध रचना “हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयम प्रभा समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती॥“

  1. @संजयजी – यह कविता इतनी ही है पर इतनी ही होने पर भी उसके भाव कम नहीं होते। यही तो प्रसाद जी के शब्दों का कमाल है।

  2. सुन्दर… अति सुन्दर!
    और चाणक्य के तो क्या कहने.
    आभार यहाँ प्रस्तुत करने के लिए.

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रिलायंस इंडस्ट्रीज २५०० पार ।

रिलायंस इंडस्ट्रीज २५०० पार, और शेयर बाजार के सारे रिकार्ड तोड कर रिलायंस की सारी स्क्रिप नये आयाम पर हैं ।

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