मेरी चाहतें ….. रोज उठना ना पड़ता, रोज नहाना न पड़ता…, रोज खाना ना पड़ता…, काश कि बुशर्ट भी पेंट जैसी ही होती…, जिससे प्रेस जल्दी होती.. ।

    रोज रात को सोने के बाद …. सुबह उठना क्यों पड़ता है … कितना अच्छा होता कि …. रोज उठना ना पड़ता, रोज नहाना न पड़ता…, रोज खाना ना पड़ता…, रोज पानी ना भरना पड़ता, रोज बस मीठी नींद के आगोश में रहते…, रोज सुबह की सैर पर नहीं जाना पड़ता…, रोज ऑफ़िस न जाना पड़ता…, सप्ताहांत सप्ताह में एक की जगह दो होते…

    ऐसी मेरी चाहें तो अनगिनत हैं पर कभी पूरी नहीं होती हैं, सब सपना सा है, दो दिन सप्ताहांत पर आराम करने के बाद सोमवार को ऑफ़िस जाना जान पर बन आता है, कि हाय ये सोमवार इतनी जल्दी क्यों आ गया, हमने ऐसा कौन सा पाप किया था, कि ये ऑफ़िस में हर सोमवार को आना पड़ता है।

    शुक्रवार को तो मन सुबह से प्रसन्न होता रहता है कि बेटा बस आज और काम करना है फ़िर तो दो दिन आराम, अहा !!! कितना मजा आयेगा।

    पर चाहतें भला कब किसकी पूरी हुई हैं, ये पंखा देखो न कितनी आवाज करता है…, सोचने में विघ्न डालता है…, बंद कर दो तो पसीना सर्र से बहने लगता है…, काश कि मैं अभी कहीं ठंडे प्रदेश में छुट्टियाँ काट रहा होता…, वहाँ की वादियों को देखकर मन में सुकून काट रहा होता…, रोज ये चिल्लपों सुनकर तंग आ गया हूँ…, क्यों पेंट पर जल्दी प्रेस (इस्त्री) हो जाती है …., और बुशर्ट पर समय क्यों लगता है…, काश कि बुशर्ट भी पेंट जैसी ही होती…, जिससे प्रेस जल्दी होती.. । इस्त्री की जगह कोई ऐसी मशीन होती कि उसमें कपड़े डालो तो धुल भी जाये और इस्त्री होने के बाद बिल्कुल तह बन कर अपने आप बाहर आ जाये …, और अपने आप अलमीरा में जम जायें।

    चाहतों का कोई अंत नहीं है…, अभी दरवाजे पर दस्तक हुई है … शायद अखबार आया है…, तीन तीन अखबार और मैं इत्ती सी जान…, काश कि इन अखबारों को पढ़ना न पड़ता…, कोई अखबार का काढ़ा आता … हम उसे पी जाते और उसका ज्ञान अपने आप दिमाग में चला जाता…, पर ऐसा नहीं है… इसलिये हम चले अखबार बांचने और आप जाओ टिप्पणी बक्से में टीपने, और पसंद का चटका लगाने…।

12 thoughts on “मेरी चाहतें ….. रोज उठना ना पड़ता, रोज नहाना न पड़ता…, रोज खाना ना पड़ता…, काश कि बुशर्ट भी पेंट जैसी ही होती…, जिससे प्रेस जल्दी होती.. ।

  1. अखबारो को पढने का एक नायाब तरीक मै इस्तेमाल करता हू.. आप भी ट्राई करे:

    सर के नीचे रखकर सो जाये… जब सोकर उठेगे सब कुछ आपके दिमाग के भीतर होगा..

    * यह आईडिया टाम एन्ड जेरी कार्टून के एक एपीसोड से इन्सपार्यड है.. 🙂

  2. विवेक जी जीवन इतना सरल होता तो क्या बात होती..पर इच्छाये अन्नत होती हे कल को अगर आपको ये सुविधा मिल ही गई तो भी कल कोई नई इच्छा होगी..पर आवश्यकता ही आविष्कार की जननी हॆ…प्रवीण पाण्डेय जी की बात को भी नकारा नही जा सकता…

  3. भाईया हमे ठेका दे दो…. आप की जगह हम नहायेगे, हम उठेगे,हम खायेगे वगेरा वगेरा…. आप ने सिर्फ़ बिल अदा करना है… ओर मजे से बिस्तर मै आराम फ़रमाये:)

  4. अरे यार काहे को ऐसे सपने दिखाते हो जो पूरे नहीं होने वाले..या फिर जिसके पूरे होने के आसार नहीं नजर आ रहे हों…

  5. यार आपकी समस्या तो बहुत अजीब है… एक किस्सा याद आया… जब मैं बरेली में था तो मेरे स्कूल में एक सक्सेना जी थे, साल मे केवल दो ही दिन नहाते थे…
    एकदम सेप्टिक टैंक जैसे बदबू मारते थे….

    अभी जान लो भैया किस दिशा में आगे बढना है….
    बन्धु नहाओ… नहीं तो फ़िर सक्सेना जी का फ़ोटो तो मैनें खींच ही दिया है…

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ऑनसाईट जाने की खुशी, परिवार की

6 thoughts on “ऑनसाईट जाने की खुशी, परिवार की

  1. हा हा हा

    इसमें कोई बुराई नहीं है जी

    ऐसा इलाहाबाद में भी होता था २० साल पहले 🙂

    अगर कोई उच्च शिक्षा के लिएय विधेश जा रहा हो तो परिवार वाले पूरी शहर में पम्पलेट बाट देते थे 🙂

    अब भी होता है क्या ऐसा ?

  2. खुशियाँ प्रकट करने का अपना अपना तरीका है और सम्मान योग्य है ! कौन सी ख़ुशी किसको कितना आनंदित करेगी इसे व्यक्ति विशेष ही समझ सकता है !
    बढ़िया पोस्ट !

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पतंगबाजी की हमारी कुछ पुरानी यादें, और धागा को सूतकर मांझा बनाना जिसे धार में गुँडे कहते हैं… मकर संक्रांति की याद में… अपना बचपन..

कल अपने ऑफ़िस जाते समय बीच में मलाड़ में एक पतंग की सजी हुई दुकान दिख गई, एक नजर में तो हमारा मन ललचा गया पतंग देखकर, और साथ में मांझा और चकरी भी था।

images तो बस हमें अपने पुराने दिन याद आ गये जब नौकरी की कोई चिंता नहीं थी, अपने स्कूल में पढ़ते थे और मजे में दिनभर पतंग उडाते थे। तब हम लोग राजा भोज की नगरी धार में रहते थे, जहाँ पर विवादित भोजशाला भी है, एक समय था जब धारा में  दंगे होना तो आम बात थी।

हम रहते थे गुरुनानक मार्ग पर बिल्कुल वैंकट बिहारी के मंदिर के पीछे, और् हमारे मोहल्ले के लगभग सभी लोग वहीं से पतंगबाजी करते थे। मकर संक्रांति के पहले से पतंगबाजी की तैयारी जोरशोर से शुरु हो जाती थी, हमारे पास भी एक बड़ा लकड़ी का चकरा था, जो कि हमने स्पेशली बनवाया था।

पतंगबाजी की तैयारी शुरु होती थी मांझा सूतने से, धार में मांझे को गुंडा कहा जाता है, धागा सूतने की प्रक्रिया भी कम दिलचस्प नहीं होती थी, बहुत मेहनत लगती है धागा सूतने में, ये बरेली वाला मांझा भी कहाँ लगता, हमारे सूते हुए मांझे के सामने।

मांझा सूतने की तैयारी शुरु होती थी काँच पीसने से, घर की पुरानी ट्यूबलाईट और् बल्ब के काँच को सावधानी से तोड़कर एक बड़े कपड़े में रखकर्, उसकी पोटली बनाकर् उसे कूट लेते थे जिससे वो काँच के टुकड़े छोटे छोटे हो जायें, और हाथ में भी न लगें,  फ़िर अपने लोहे के मूसल में कूटकर काँच को और बारीक कर लिया जाता था, फ़िर काँच को साड़ी के कपड़े से छानकर उसे अलग रख लेते थे। यह तो पहली चीज तैयार हो गई मांझा सूतने की।

अब और सामग्री होती थी, सरेस, रंग, छोटे छोटे कॉटन के कपड़े और एक छेद वाली डंडी।

सरेस को उबालकर उसमें रंग मिला दो और उसे एक बर्तन में कर लो, बर्तन खराब ही लें क्योंकि बर्तन सरेस डालने के बाद अच्छा नहीं रह जाता है। मांझा और चिकना करना हो तो साबुदाना भी डाल सकते हैं, सामग्री तैयार हो चुकी है, अब धागे और काँच के साथ तैयार हो जाते थे, धागा सूतने के लिये।

पीछे धागे की गिट्टी को इस प्रकार पकड़ा जाता है कि धागा आसानी से तेजी से निकले, फ़िर धागे को उस छेद वाली डंडी में से निकाल कर जो कि सरेस के बर्तन में डुबा कर रखी जाती है, और अब वो कॉटन के कपड़े को तह कर के उसके बीच में काँच भरकर उसे अपनी दो ऊँगलियों से पकड़ लें ध्यान रहे कि धागा इसके बीच में से जाना चाहिये, और अगर ज्यादा पतंग काटनी हो तो उसके बाद थोड़ी दूरी पर ही वापिस से एक और काँच चाला कपड़ा किसी को पकड़ा दें और फ़िर अपनी चकरी में लपेटते जायें। इससे काँच धागे में चिपकता जायेगा रंग के साथ जिससे आप ज्यादा पतंग काट पायेंगे।

ये तो धागा सूत लिया और् अब ये मांझे में बदल गया अभी तो ये गीला है, अब इसे किसी दूसरी चकरी में लपेट लें धीरे धीरे जिससे ये सूख जाये और ये प्रक्रिया तब तक दोहरायें जब तक कि मांझा पूरी तरह से सूख नहीं जाये।

बस फ़िर क्या है मांझा तैयार और पतंगें काटने को तैयार हो जाईये, वैसे हम मांझा इतना कांच वाला सूतते थे कि किसी पतंग को टिकने नहीं देते थे और अपने आसपास का आसमान साफ़ कर देते थे, कांच ज्यादा होता था हमारे गुंडों में इसलिये हमने कभी भी मांझा अपनी ऊँगलियों से नहीं पकड़ा और सीधे चकरी से ही पतंग उडाते थे,  उस समय अपना लोगों में बहुत डर था और् जब हम पतंग उड़ाने जाते थे तो आसपास वाले अपनी पतंगे उतार लेते थे। और आज भी हम सीधे चकरी से ही पतंग उड़ाते हैं, इससे फ़ायदा यह है कि किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है कि कोई अपनी चकरी पकड़े और हम हाथ से उड़ायें।

संक्रांति पर तो लगभग हर छत पर रेडियो, टेप, डेक, माईक और बड़े बड़े स्पीकर लगाकर लोग दूसरे की पतंग काटने पर "काटा हैं" या अपनी पतंग कटने पर "कटवाई है" चिल्लाते थे। और जोर जोर से गाने बजते थे, सारे आसमान में पतंगे ही पतंगे दिखती थीं।

सुबह पतंग उड़ाने जाते थे तो घर तो तभी लौटते थे जब शाम को पतंग दिखनी बंद हो जाती थी, या फ़िर हमारे माताजी या पिताजी में से कोई एक डंडा लेकर आता दिखता था।

इतनी ऊँची पतंग उड़ाते थे कि शाम को पतंग उतारने की हिम्मत ही नहीं होती थी, इसलिये अपने हाथ से धागा तोड़कर या तो किसी को दे देते थे या फ़िर वहीं कहीं बाँधकर घर चले जाते थे।

बहुत मधुर यादें हैं पतंगबाजी की, ऐसा लगा कि यह पोस्ट लिखते लिखते मैं अपने पुराने दिनों में चला गया। आप भी अपने पतंगबाजी के अनुभव बताईयेगा जरुर।

17 thoughts on “पतंगबाजी की हमारी कुछ पुरानी यादें, और धागा को सूतकर मांझा बनाना जिसे धार में गुँडे कहते हैं… मकर संक्रांति की याद में… अपना बचपन..

  1. क्या बात है जी, एकदम मजेदार यादें हैं ये तो। पतंगबाजी में हुनर के साथ थोडी हुल्लड भी जरूरी हो जाती है…वो काटा…..वो ढील….खींच…खींच….सभी आवाजें एकदम से याद आ गई हैं इस पोस्ट से।

  2. काश मेरी भी कभी पतंग उड़ पायी होती –कभी कमबख्त उडी ही नहीं ..
    अब आपका ये डिस्क्रिप्शन पढ़ कर फिर पूरी प्रक्रिया में मन डूबना चाहता है

  3. अनुभव …
    इसे हम गुड्डी उड़ाना कहते थे।
    पिताजी का थप्पड़।
    पीछे-पीछे और धड़ाम से नीचे।
    संक्रांति पर्व की बधाई।

  4. रंग बिरंगी पतंगों की छटा बड़ी निराली लगती है…उड़ाया तो कभी नहीं…पर इसका लुत्फ़ लेने छत पर जरूर पहुँच जाती थी…दिल्ली में १५ अगस्त को पतंग उडाई जाती है और मुंबई में मकर संक्रांति…दोनों जगह एक सा ही उत्साह देखा है,लोगों में ..
    आप प्लीज़ समय निकाल कर अपने बेटे को जरूर सिखाएं क्यूंकि मेरे बच्चे जब छोटे थे..पतंग ,चरखी सब खरीद लेते और जिद कर मुझे छत पर ले जाते…पर सिखाये कौन?…मुंबई में पतियों को कहाँ छुट्टी मिलती है…आप छुट्टी लेकर ही सही..उसके साथ जरूर पतंग उड़ायें.

  5. @रश्मिजी – मेरा बेटा अभी पाँच साल का है परंतु पतंगबाजी में उस्ताद है, बेटा बाप से आगे है। वह पतंगबाजी पिछले साल ही सीख चुका है। और मैं कोशिश करता हूँ कि और भी बच्चों को पतंगबाजी सिखाऊँ परंतु कुछ अभिभावक तैयार नहीं होते तो कुछ टीवीबाज बच्चे पतंगबाजी करना नहीं चाहते पर फ़िर भी मेरा तो यही अनुभव है कि पतंगबाजी एक नशा है और अच्छा खेल है। कोशिश रहती है हर साल कि कम से कम संक्रांति के दिन तो छुट्टी लें और पतंगबाजी करें नहीं तो हमेशा ३-४ दिन तो हम पतंगबाजी के लिये समर्पित करते ही हैं।

  6. पुराने दिन याद दिला दिए। माँजा हमने भी खूब सूँता है और पतंगें और गरारियाँ भी खुद ही बनाई हैं। पता नहीं क्या क्या तलाशते थे पसारी के यहाँ, समंदर फेन, धोली मूसली कमरकस और न जाने क्या क्या!

  7. वाह वाह आप ने तो हमे हमारी पिटाई याद दिला दी इस माँजा के चक्कर मै, माँजा तो हम भी ऎसे ही तेयार करते थे, लेकिन पीसा हुआ शीशा हम ने एक शीशी मै रखा था, पिता जी का पेट खराब रहता था, ओर वो कोई सफ़ेद चुरण वेसी ही शीशी मै लाते थे, ओर उन्होने उस शीशे को चुरण समझ कर फ़ांकना चाहा फ़िर कुछ सोच कर रुक गये, फ़िर जब हम घर आये तो हमारा क्या हाल हुआ होगा बताने की जरुरत नही, लेकिन हमारा प्रेम फ़िर भी इस मुये मांजे से नही टुटाआप ने बीते दिन याद दिला दिये,धन्यवाद

  8. हमें तो कभी पतंग उडानी आई ही नहीं। बस दोस्त की चरखी पकड़ लेते थे और पतंग को उड़ते हुए देखकर खुश हो लेते थे। एक बार एक पतंग लूटी और दस दिन तक उसे संभाल कर रखा। जब उड़ाने लगे तो एक मिनट में ही फट गई और खेल ख़त्म हो गया।

  9. छोटे भाई को सीखाने के बहाने मैने भी पतंग उडाने और धागे मजबूत करने के सारे गुर सीख लिए थे .. आपकी पोस्‍ट पढकर बचपन की यादें ताजी हो गयी !!

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बड़ी फ़ाईलें कैसे भेजें या ज्यादा डाटा नेट पर थोड़े समय तक कैसे सुरक्षित रखें..

      अगर कोई फ़ाईल बहुत बड़ी है जो कि जिप करने के बाद भी ईमेल पर अटैच नहीं कर पाते हैं पर जल्दी ही जरुरी में कहीं भेजनी है, क्योंकि ईमेल पर ज्यादा से ज्यादा १० एम.बी या २० एम.बी. की फ़ाईलें ही भेजी जा सकती हैं।

    इस प्रकार की सर्विसेस देनेवाली बहुत सारी साईटें हैं पर कुछ विश्वसनीय और तेज साईटें हैं जिनका उपयोग किया जा सकता है, इन साईटों पर बिना किसी लोगिन के आप फ़ाईल अपलोड कर सकते हैं और इसकी दो लिंक आपके बताये हुए ईमेल पते पर आ जाती हैं, एक तो डाउनलोड करने के लिये और दूसरी इस फ़ाईल को डिलीट करने के लिये (जब आपका काम हो जाये तो आप इस लिंक से डिलीट कर सकते हैं।) | निम्न साईटों पर बिना लोगिन फ़्री में आप कितना अपलोड कर सकते हैं वो आप देख सकते हैं –

१.मेगाअपलोड   – 100 mb free

२.रेपिडशेयर – 100 mb free

३.बिगअपलोड – 2000 mb

४.वीट्रांसफ़र – 2 gb आपको इसका पार्श्व भी अच्छा लगेगा जो समय समय पर अपने आप बदलता रहता है।

     अपलोड और डाउनलोड आपकी ब्राडबेन्ड की स्पीड पर निर्भर करता है जैसे कि मेरे पास २५६ केबीपीएस से १०० एमबी अपलोड करने में लगभग १ घंटा लगता है। अगर आपके पास इससे कम स्पीड है तो और ज्यादा समय लगेगा व और ज्यादा स्पीड वाला होगा तो कम समय लगेगा।

    पर जहाँ हम अपनी फ़ाईलें अपलोड कर रहे हैं वह भी सुरक्षित जगह होना चाहिये, इसके लिये हम कुछ उपाय कर सकते हैं कि जब फ़ाईल को जिप करें तो उसे एनक्रिप्टेड पासवर्ड से सुरक्षित कर दें। क्योंकि जब आप इन सर्विसेस वाली साईटों पर फ़ाईल अपलोड करेंगे तो ये सर्च इंजिन की नजर में भी आ जाता है। इसलिये इन फ़ाईलों को कुछ अजीब नाम दें जिससे आपकी फ़ाईल में क्या है वह फ़ाईल के नाम से पता न चले।

    अगर ये लिंक किसी को पता न हो तो कोई फ़ाईल डाउनलोड नहीं कर सकता है, और ये बिल्कुल यूनिक की (unique key) होती है।

    अब अगली बार जब आप अपना कम्पयूटर फ़ार्मेट कर रहे हों या फ़िर कहीं आपको फ़ाईल ले जानी हो पर साधन न हो या कुछ और बस अपनी फ़ाईल अपलोड कीजिये और बाद में डाउनलोड कर लीजिये, हो गया न आपका काम।

3 thoughts on “बड़ी फ़ाईलें कैसे भेजें या ज्यादा डाटा नेट पर थोड़े समय तक कैसे सुरक्षित रखें..

  1. जानकारी अच्छी है. पर अपने लिये काला अक्षर भैंस के दुध बराबर. सो हाजिरी लगीने को कमेंट करके जा रहे हैं.:)

    रामराम.

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २२ [कर्ण के नये गुरु, जो खुद कर्ण ने बनाये..]

     जैसे ही मैं राजभवन पहुँचा, पिताजी ने मुझको तैयार रहने को कहा। क्योंकि युद्धशाला में जाना था, इसलिए मैं तुरन्त ही तैयार हो गया। माँ ने जो पेटिका दी थी, वह मैंने एक आले में सँभालकर रख दी थी । उस पर पारिजात के चार पुष्प चढ़ाये। उसको वन्दन कर मैं धीरे से बोला, “माँ ! मुझको आशीर्वाद दो । तुम्हारा वसु जीवन के मार्ग पर एक महत्वपूर्ण मोड़ आज ले रहा है । युद्धशाला में जाने का आज पहल दिन है ।“

पिताजी ने बाहर से ही पुकारा, “कर्ण ! शोण ! जल्दी चलो।“

    हम तीनों युद्धशाला में आये । कल की अपेक्षा आज तो वहाँ बहुत अधिक युवक एकत्रित थे। वे सभी मध्य में स्थित उस चबूतरे के चारों ओर शान्तिपूर्वक बैठे हुए थे। सबके सम्मिलित शान्त और गम्भीर स्वर सुनाई पड़ रहे थे। शायद प्रात:काल की प्रार्थना हो रही थी।

    “ऊँ ईशावास्यम इदम सर्वम…” । प्रार्थना बहुत देर तक चलती रही। मैंने पिताजी को वापस जाने को कहा।

“अनुशासन रखना।“ यह कहकर वे लौट गये।

    बीच में बैठे हुए गुरुदेव द्रोण शान्तिपूर्वक उठकर खड़े हो गये। उन्होंने अपने दोनों हाथ उठाकर अपने सभी शिष्यों को आशीर्वाद दिया। मैं शोण को लेकर आगे बढ़ा । हम दोनों ने झुककर गुरुदेव को प्रणाम किया। मुझको आशा थी कि अपना हाथ उठाकर वे हमको भी आशीर्वाद देंगे। लेकिन इतने में ही अर्जुन उनके सामने आ गया और वे अर्जुन के कन्धे पर हाथ रखकर उससे कुछ बातें करते हुए वहाँ से चले गये।

     मैंने सदैव की तरह पूर्व दिशा में आकाश की ओर देखा । तप्त लाल लोहे के गोले की तरह सूर्यदेव आकाश की नीली छत को जला रहे थे। मेरी निराशा क्षण-भर में नौ-दो ग्यारह हो गयी। बस, महासामर्थ्यशाली उस तेज के अतिरिक्त अधिक योग्य गुरु इस त्रिभुवन में दूसरा कौन होगा ? किसी अन्य के आशीर्वाद की भीख माँगने की आवश्यकता ही क्या है ? आज से मेरे वास्तविक गुरु ये ही हैं। आज से बस इन्हीं की पूजा, आज से इन्हीं की आज्ञा। तत्क्षण मैं पत्थर के उस चबूतरे पर चढ़ गया। वहाँ पुष्पों से सजा हुआ धनुष रखा था। वह मैंने हाथ में उठा लिया और जितना ऊँचा उठा सकता था, उतना ऊँचा उठाकर मैं बोला, “संसार के समस्त अन्धकार को नष्ट करने वाले सूर्यदेव ! आज से मैं तुम्हारा शिष्य हूँ। मुझको आशीर्वाद दो। मुझको मार्ग दिखाओ।“ उस धनुष को मस्तक से लगाकर मैंने झुककर उस तेज को प्रणाम किया।

One thought on “सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २२ [कर्ण के नये गुरु, जो खुद कर्ण ने बनाये..]

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ११

उज्जयिनी के लिये मेघदूतम़् में महाकवि कालिदास ने लिखा है –
यक्ष मेघ को निर्देश देता है कि अवन्ति देश में पहुँचकर उज्जयिनी
में अवश्य जाना –
प्राप्यावन्तीनुदयनकथाकोविदग्रामवृद्धाऩ़्
पूर्वोद्दिष्टामुपसर पुरीं श्रीविशालां विशालाम़् ।
स्वल्पीभूते सुचरितफ़ले स्वर्गिणां गां गतानां
शेषै: पुण्यैर्हतमिव दिव: कान्तिमत्खण्डमेकम़्॥
अनुवाद : – जहाँ के ग्रामों के वृद्ध जन उदयन की कथाओं के जानने वाले हैं, ऐसे अवन्ति प्रदेश को प्राप्त कर, पहले बतायी गयी, सम्पत्ति से सम्पन्न, उज्जयिनी नाम की नगरी में जाना, (जो) मानो पुण्य कर्मों के फ़ल के कम हो जाने पर पृथ्वी पर आये हुए स्वर्ग वालों के (देवताओं के) शेष पुण्यों के द्वारा लाया गया स्वर्ग का एक उज्जवल टुकड़ा है।
उदयनकथाकोविदग्रामवृद्धाऩ़् – कवि ने उदयन की कथा की और संकेत किया है। यह कथा मूल रुप से गुणाढ़्य की वृहतकथा में मिलती है, परन्तु यह ग्रन्थ पैशाची में लिखा है और अपने मूलरुप में आज अप्राप्य है। इसका संस्कृत अनुवाद सोमदेव ने कथासरित्सागर तथा क्षेमेन्द्र ने वृहत्कथा-मञ्जरी नाम से किया है। कथासरित्सागर में यह कथा लम्बक २ से ८ तक विस्तृत रुप से वर्णित है। संक्षेप में कथा इस प्रकार है – “पृथ्वी पर वत्स नाम का एक देश है, जिसमें कौशाम्बी नाम की नगरी है। वहां परीक्षित का पौत्र जनमेजय का पुत्र शतानीक राजा था। उसके सहस्त्रानीक नामक पुत्र था। सहस्त्रानीक की पत़्नी का नाम मृगावती था। उनके पुत्र का नाम उदयन था। उदयन ने उज्जैन के राजा चण्डमहासेन की पुत्री वासवदत्ता का अपहरण कर उससे विवाह किया। उसके बाद मगध के राजा प्रद्योत की पुत्री पद्मावती से विवाह कर लिया। उसके वासवदत्ता से एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम नरवाहनदत्त रखा।
इसके अतिरिक्त यह कथा भास के सवप्नवासवदत्तम़् तथा प्रतिज्ञायौगन्धरायणम़् नामक नाटकों में भी लगभग इसी रुप में मिलती है।

3 thoughts on “कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ११

  1. विवेक भाई, ये कालिदासजी हम जैसे कूप-मंडूकों के लिए थोड़ी आसान हिंदी में नहीं लिख सकते थे क्या…वैसे एक राज़ की बात बताऊं, बचपन में और कोई भी पीरियड मिस चाहे कर देते थे, लेकिन जिस दिन गुरुजी कालिदास के बारे में पढ़ाते थे, उस दिन फुल अटैंडडेंस रहती थी…गुरुजी मिलन-विरह के किस्से ही इतने रस के साथ सुनाते थे

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पत़्नी के कर्तव्य जो पत़्नी को निभाने चाहिये

पति की तरह ही पत़्नी के भी कुछ कर्तव्य होते हैं, जिनका पालन कर गृहस्थाश्रम का पूर्ण आनन्द लिया जा सकता है। किसी ने ठीक कहा है – ईंट और गारे से मकान बनाये जा सकते हैं, घर नहीं। मकान को घर बनाने में गृहिणी का ही पूरा हाथ होता है। वैसे भी इतिहास साक्षी है कि बहुत से महापुरुषों जैसे तुलसीदास, कालिदास, शिवाजी आदि के उत्थान पतन में स्त्री की ही मुख्य भूमिका रही है। मधुर भाषी स्त्री घर को स्वर्ग बना सकती है तो कर्कशा व जिद्दी स्त्री घर को नर्क बना देती है। पत़्नी को निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिये –

  • पति के माता – पिता एवं परिवार के अन्य सदस्यों का आदर करे तथा उनकी सुविधा का हमेशा ध्यान रखे।
  • कभी भी अपने पीहर में ससुराल वालों की निंदा या बुराई न करे।
  • कभी भी पति पर कटु, तीखे एवं व्यंग्यात्मक शब्दों का प्रयोग न करें। सब समय ध्यान रहे कि तलवार का घाव भर जाता है, बात का नहीं।
  • पति के सामने कभी भी ऐसी मांग न करे जो पति की सामर्थ्य के बाहर हो।
  • कभी भी झूठी शान शौकत के चक्कर में पैसे का अपव्यय न करे। पति से सलाह मशविरा करके ही संतुलित एवं आय के अनुसार ही व्यय की व्यवस्था करें। पति के साथ रिश्ते को पैसे का आधार नहीं बनाकर सहयोग की भावना से गृहस्थी चलानी चाहिये।

सर्वोपरि पति – पत़्नी में एक दूसरे के प्रति दृढ़ निष्ठा एवं विश्वास भी होना चाहिये। दोनों का चरित्र संदेह से ऊपर होना चाहिये। कभी – कभी छोटी – छोटी बातें भी वैवाहिक जीवन में आग लगा देती हैं, हरे भरे गृहस्थ जीवन को वीरान बना देती है। आपसी सामंजस्य, एक दूसरे को समझना, किसी के बहकावे में न आना, बल्कि अपनी बुद्धि से काम लेना ही वैवाहिक जीवन को सुन्दर, प्रेममय व महान बनाता है।

पहले की कुछ ओर कड़ियाँ परिवार के संदर्भ में –

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3 thoughts on “पत़्नी के कर्तव्य जो पत़्नी को निभाने चाहिये

  1. देखिये जी आपने लिख तो दिया है हमसे बिना पूछे यह लेख अभी ब्लॉग पुलिस आती ही होगी , फ़िर हमसे न कहना कि बचाओ यारों 🙂

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शादी के लिये एक बहुत ही अच्छी वेबसाईट

9 thoughts on “शादी के लिये एक बहुत ही अच्छी वेबसाईट

  1. विवेक भाई मै तो बड़ी उम्मीद से आया था।कुंआरो के साथ ऐसा मज़ाक ठीक नही। हा हा हा हा ।इससे तो अच्छा कुंआरा ही रहना ठीक है।

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