“ऐ टकल्या”, विरार भाईंदर की लोकल की खासियत और २५,००० वोल्ट

    हम चल दिये ५ दिन के लिये मुंबई से बाहर, बोरिवली स्टेशन से हमारी ट्रेन थी, हम ट्रेन के आने के ठीक १० मिनिट पहले प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँच गये, तो चार नंबर प्लेटफ़ार्म से ट्रेन जाती है, और इसी प्लेटफ़ॉर्म से विरार, भाईंदर की लोकल ट्रेनें भी जाती हैं। इन लोकल ट्रेन में पब्लिक को देखते ही बनता है, बाहर की पब्लिक तो इन लोगों को देखकर आश्चर्य करते हैं।विरार भाईंदर की लोकल ट्रेन को देखकर बाहर के लोगों को आप आँखें फ़ाड़ फ़ाड़कर देखते हुए देखे जा सकते हैं ।

    विरार भाईंदर लोकल ट्रेन की बहुत सारी खासियत हैं, मसलन ट्रेन की छत पर यात्रा करना, बाहर से खिड़की के ऊपर चढ़कर यात्रा करना, बंद दरवाजे की रेलिंग पर चढ़कर यात्रा करना, गेट पर खड़े हुए हीरो लोग प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े हुए लोगों पर फ़ब्ती कसते हैं, डब्बे में इतनी भीड़ होने के बाबजूद और लोगों का चढ़ जाना, और सबसे बड़ी खासियत गुटबाजी अगर आप पहली बार जा रहे हैं तो गेट पर खड़े लोग आपको चढ़ने ही नहीं देंगे, और अगर उतरना है तो उतरने नहीं देंगे।

    भले ही बेचारे रेल्वे वाले चिल्ला चिल्लाकर अधमरे हो जायें, कि ट्रेन की छत पर यात्रा न करें २५,००० वोल्ट का करंट बहता है, कई लोग तो निपट भी चुके हैं, पर हीरोगिरी करने से बाज आयें तब न, बस इनको नहीं सुनना है तो नहीं सुनना है, शायद कानून को मजाक समझते हैं ये लोग।

    हम अपनी हेयरश्टाईल याने कि टकले थे, (टकलापुराण और टकले होने के फ़ायदे रोज ४० मिनिट की बचत) तो एक फ़ब्ती हमें भी मिली “ऐ टकल्या”, तो हमने पहले अपने आसपास खड़े लोगों को देखा तो पाया कि “केवल अपन ही टकले हैं, और कोई टकला नहीं है”, बड़ा ही आनंद आया कि चलो कोई तो है जो हमको फ़ब्ती कस सकता है।

8 thoughts on ““ऐ टकल्या”, विरार भाईंदर की लोकल की खासियत और २५,००० वोल्ट

  1. अरे आपने कब देखा मुझे आँखें फाड़ फाड़ कर देखते हुए…….
    पिछले महीने पहली बार मुंबई आया था तब मैंने भी ये दृश्य देखा था
    पक्के जिगर के हैं भाई हीरो लोग

  2. हा हा हा तो गोया मामला ये कि बालों की कुर्बानी देकर ….

    एक पहचान कायम कर ली आपने स्टशन पर ।

  3. भाई रोज ही टकले टकले कह कर चिढाते है एक दिन किसी टकले की फ़ोटो भी तो दिखाओ, फ़िर आप को हम सही टकला मानेगे, आज तक तो बम्बे मै एक ही टकला है… बताईये कोन?
    .
    .
    ७.
    ,
    .
    .अजी अपना शेटी

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

नेहरु प्लेनिटोरियम मुंबई की सैर और तारों की छांव में हमारी नींद

    सपरिवार बहुत दिनों से कहीं घूमने जाना नहीं हुआ था, और हमने सोचा कि इस भरी गर्मी में कहाँ घूमने ले जाया जाये तो तय हुआ कि नेहरु प्लेनिटोरियम, वर्ली जाया जाये। पारिवारिक मित्र के साथ बात कर रविवार का कार्यक्रम निर्धारित कर लिया गया। बच्चों को साथ मिल जाये तो उनका मन ज्यादा अच्छा रहता है और शायद बड़ों का भी।

    सुबह ९ बजे घर से बस पकड़ने के लिये प्रस्थान किया गया, बस पकड़ी ए ७० सुपर ए.सी. बस जो कि वर्ली सीलिंक होती हुई नेहरु प्लेनिटोरियम तक जाती है, और एक्सप्रेस होने के कारण रुकती भी बहुत कम है, यह फ़्लॉयओवर के ऊपर से होती हुई निकल जाती है, और रविवार होने के कारण ज्यादा ट्रॉफ़िक भी नहीं था, बच्चों को भी मजा आ रहा था, थोड़े समय पश्चात ही बस पहुँच गयी वर्ली सी लिंक पर, पहली बार इस अद्भुत रास्ते से हम निकल रहे थे, जो कि समुद्र के ऊपर से होते हुए जा रहा था। रास्ते से गुजरते समय अजीब सा उत्साह था।

    बहुत पुराने जमाने की गाड़ियाँ एकाएक हमें दिखने लगीं तो हमें लगा कि शायद हम कोई सपना देख रहे हैं, पर एक से एक पुराने जमाने की गाड़ियाँ, ऐतिहासिक…। उस दिन विन्टेज कार रैली थी हम नेहरु प्लेनिटोरियम के स्टॉप पर उतरकर फ़िर से विन्टेज कारों को देखकर लुत्फ़ ले रहे थे।

    हम सुबह १०.२० पर नेहरु प्लेनिटोरियम पहुँच गये और वहाँ जाकर देखा कि पहला शो १२ बजे हिन्दी का है और टिकिट ११ बजे से मिलेंगे केवल ५७५ सीटें उपलब्ध हैं, और हमारे मित्र लाईन में लग गये, बड़ों का टिकिट ५० रुपये है और ४ से ११ वर्ष के बच्चों का २५ रुपये। शो शुरु होने का समय था १२.०० बजे दोपहर का, वैसे शो मराठी और अंग्रेजी में भी उपलब्ध है। उनके समय १.३० बजे और ३.०० बजे है और ४.३० वापिस से हिन्दी का शो है। शो में प्रवेश का समय ११.४५ बजे से था, जो हम वहीं पास में संग्रहालय घूम आये जो कि हमारी मानवीय सभ्यता की अच्छी झलक देता है।

    संग्रहालय इतनी बड़ी जगह पर बनाया गया है कि बस !! क्योंकि यह बनाया गया था सन १९७७ में, अगर आज बनाया गया होता तो वर्ली जैसी पाश इलाके में इतनी जगह के लिये माफ़िया एड़ी चोटी का जोर लगा देते, और संग्रहालय की जगह कोई बड़ी सी बहुमंजिला इमारत खड़ी होती।

    समय होते ही वापिस से नेहरु प्लेनिटोरियम चल दिये जो कि पैदल मात्र २ मिनिट के रास्ते पर ही है, पर मुंबई की गर्मी, जो कि बरस रही थी। सबकी हालत खराब थी, इतनी गर्मी और इतने दिनों बाद घूमने के लिये निकले थे।

    नेहरु प्लेनिटोरियम के अंदर प्रवेश करते ही बहुत सुकून मिला, वहाँ पर ब्रह्मांड के बारे में बहुत ही सरल तरीके से सबकुछ समझाया गया है, हमने वहाँ चंद्रमा के ऊपर अपना वजन किया तो मात्र १५ किलो निकला और मंगल पर २४० किलो। फ़िर ब्रह्मांड के ग्रहों के एक गोल मोडल के नीचे सबको खड़ा कर दिया गया और पूरे सौर मंडल के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई, फ़िर १० मिनिट की फ़िल्म कल्पना चावला के ऊपर दिखाई गयी।

    हमें शो के लिये हॉल में जाने के लिये कहा गया और हम चल दिये हॉल में, जहाँ ब्रह्मांड के रहस्य समझाये जाने थे, हम भी अपनी कुर्सी पर लेट गये मतलब कुर्सी कुछ इस प्रकार से डिजाईन की गई है कि आप पूरे लेट सकते हैं और शो सामने दीवार पर नहीं था, शो था छत पर जो कि गोलाकार था, और डिजिटल ३ डी तकनीक से नेहरु प्लेनिटोरियम में हम ब्रह्मांड का आनन्द लेने को तैयार थे। शो शुरु हुआ और फ़िर ब्रह्मांड का सफ़र और हम ब्रह्मांड में डूबने लगे।

    इसी बीच ए.सी. की ठंडक से हमारी थकी हुई देह आराम लेने की कोशिश करने लगी थी, और तारों की छांव में बहुत सालों बाद हम झपकी ले रहे थे। ऐसा लगा कि हम अपनी छत पर सो रहे हैं, तभी एक हल्का सा टल्ला लगा जो कि हमारी धर्मपत्नी जी का था कि खर्राटे की आवाज आ रही है, यथार्थ की दुनिया में आ जाइये। हमारी नींद को थोड़ी देर की नजर जरुर लगी पर फ़िर से हमने छत पर सोने का आनन्द लिया और यह क्रम चलता ही रहा ।

    वहाँ से टेक्सी पकड़कर हम पहुँच गये कैमी कार्नर, फ़िर सबसे पहले ढूँढा गया पेटपूजा का स्थान जो कि गिरगाँव चौपटी पर आराम गेस्ट हाऊस के नीचे याने के ग्राऊँड फ़्लोर पर है, पुराना लुक और खाना भी बहुत ही बजट में, पर जब भूख लगती है तो खाना कैसा भी हो परम आनन्द आता है, आत्मा तृप्त हो जाती है, वही हाल हमारा था। बस फ़िर थोड़ी देर शापिंग काम्प्लेक्स में घूमकर मुंबई लोकल में सफ़र करके वापिस घर की ओर चल दिये।

    फ़ोटो अपने मोबाईल से खींचे थे पर वो लगा नहीं पा रहे हैं क्योंकि तकनीकी समस्या है हमारी पेनड्राईव हमारे एक मित्र के पास है और उसके बिना अपने पीसी पर अपने लेपटॉप से फ़ाईल ट्रांसफ़र नहीं कर पा रहे हैं, फ़ोटो फ़िर कभी दिखा दी जायेगी।

11 thoughts on “नेहरु प्लेनिटोरियम मुंबई की सैर और तारों की छांव में हमारी नींद

  1. विवेकजी, हमे सूचित करते तो नेहरु प्लेनिटोरियम तो हम भी साथ हो लेते भाई …..तारों की छांव में हम भी नींद क़ी आगोस में समा जाते ……..

  2. बहुत ही रोचकता के साथ बयाँ किया हैं आपने……प्लेनिटोरियम देखने का अपना अलग ही अनुभव …और आपने विंटेज कार रैली का भी आनंद ले लिया…बहुत खूब…तस्वीरों का इंतज़ार

  3. तारो के छावं में रात में ही तारे गिनने के बजाय आप सो गए -वेरी बैड !

  4. ५० रूपये में इतनी बढ़िया नींद । क्या बात है ।
    चाँद और मंगल पर तो ठीक है , पृथ्वी पर वज़न नहीं किया क्या । 🙂

  5. ताराघर जाना एक अच्छा शौक है।

    मैं जब भी किसी शहर जाता हूं यदि वहां ताराघर है तो अवश्य जाने का प्रयत्न करता हूं।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

पैंटिंग्स अमिताभ बच्चन की और अमिताभ बच्चन की टिप्पणियाँ

ये फ़ोटो नहीं हैं, ये पैंटिंग्स की फ़ोटो हैं । पैंटिंग्स वर्ल्ड आर्ट वर्क्स इंडिया के डॉ.  अनिल  कुमार ने बनाये हैं।

“These above are NOT pictures, they are pictures of paintings. Paintings done by Dr T Anil Kumar of World Art Works India Pvt Ltd, who has visited me this morning with this incredible piece of artwork. Quite quite overwhelming !! 68 characters over a period of 41 years and their distinct looks being put up asa a school classroom concept or on mugs. Absolutely amazing !! They shall be autographed by me and auctioned and the funds collected will be given in charity to the Siddhivinayak Temple at Prabha Devi in Mumbai.”  – Amitabh Bachchan


फ़ोटो देखने के लिये क्लिक करके देखिए ।

8 thoughts on “पैंटिंग्स अमिताभ बच्चन की और अमिताभ बच्चन की टिप्पणियाँ

  1. बहुत बढ़िया. एक दिन देखा था बिग बी के ब्लॉग पर इन्हें. आभार आपका प्रस्तुत करने के लिए.

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

तुम हो मेरे जीवन का आधार प्रिये…मेरी कविता…विवेक रस्तोगी

तुम हो तो सब कुछ है जीवन में,

तुम हो तो सब सुख है प्रिये,

तुम हो तो मैं हूँ प्रिये,

तुम हो तो हर क्षण हर्ष का है प्रिये,

तुम मेरी कविता तुम मेरी आराधना,

तुम ही मेरी प्रियतमा,

तुम ही मेरी जीवनसंगिनी प्रिये,

तुम हो मेरे जीवन का आधार प्रिये,

अर्पण प्यार तुम्हें है प्रिये..

16 thoughts on “तुम हो मेरे जीवन का आधार प्रिये…मेरी कविता…विवेक रस्तोगी

  1. आपकी कविता के भाव बहुत सुन्दर है
    हम तो किसी को भाव बताते फ़वि बने
    और फिर हास्य फ़वि बने……न जाने कवि कब बनेगें

  2. तुम हो मेरे जीवन का आधार प्रिये,
    अर्पण प्यार तुम्हें है प्रिये..

    आज के दिन के लिये सटीक

  3. यार इसे ही कापी पेस्ट करके अपनी वाली को पढा देता हू
    कहुन्गा – सुर्फ़ तुम्हारे लिये

    बस कापी राइट या कविता चोरी मे मत घेर लेना.

  4. तुम ही मेरा चौका ,तुम ही मेरे बर्तन .क्या मेरा क्या तेरा सब तुझको ही अर्पन ,तुम ही मेरा नाश्ता तुम ही मेरा खाना ,तुझसे ही यह जीवन है जाना ,तुमसे मेरे कपड़े तुमसे मेरे लत्ते , मै एक अकेला गुलाम ,तुम बाकी सब पत्ते । धन्य हो धन्य हो ।

  5. लग रहा है भाभीजी ने धमकिया दिया होगा

    ब्‍लॉगिंग रूपी सौत को दी जानी होगी सजा

    परन्‍तु आपने धर्मपत्‍नी आराधना कर एक

    ऐसा रास्‍ता दिया है खोल

    सबकी पत्नियां कहेंगी

    हमें भी चाहिए

    अपने पति से

    ऐसे ही बोल।

  6. बड़ी खुशकिस्मत हैं भाभी जी…इतनी सुन्दर कविता लिखी है,आपने…और आपकी वाणी में सुनकर तो जरूर उनका रंग हाथों में थामे गुलाब सा ही सुर्ख हो गया होगा…ढेरों शुभकामनाएं आप दोनों को…

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

शायद सारे चिट्ठाचर्चा वाले चर्चाकार नाराज हैं…. इसीलिये तो हमारे पोस्ट की लिंक नहीं दी जाती है… चलो छोड़ो… पर क्या करें आज लिख ही दिया दिल नहीं माना तो

    हम बहुत दिनों से देख रहे हैं कि सारे चिट्ठाचर्चा वाले चर्चाकार शायद हमसे नाराज हैं क्यों, क्योंकि हमें लगता है कि सब हमसे नाराज हैं, क्योंकि हमारे ब्लॉग की लिंक ही नहीं दी जा रही है। हमें लगता है कि यह हमें नहीं कहना चाहिये पर फ़िर भी आज पता नहीं क्यों फ़िर भी कह ही रहे हैं। हाँ भई हम कोई प्रसिद्ध ब्लॉगर तो नहीं फ़िर भी ब्लॉगर तो हैं, कुछ हमारे रोज के पाठक तो हैं ही जो कि हमें ब्लॉग लिखने के लिये प्रेरित करता है, अब देखते हैं कि आखिर हमें ये चर्चाकार कब तक इग्नोर करते हैं।

    ब्लॉगर भले ही उम्र में बढ़े होते हैं पर फ़िर भी हमेशा यही मन करता है कि हमारी चर्चा कहीं न कहीं हो, क्योंकि कहीं न कहीं मन बालसुलभ या हठी होता है। सोचा था कि कभी भी यह बात न बोलेंगे और चुपचाप ब्लॉगरी करते रहेंगे। पर पता नहीं आज जब विन्डोज लाईव राईटर खोला ब्लॉग लिखने के लिये तो अपने आप ही कीबोर्ड पर ऊँगलियाँ चलने लगीं और यह सब लिख दिया।

24 thoughts on “शायद सारे चिट्ठाचर्चा वाले चर्चाकार नाराज हैं…. इसीलिये तो हमारे पोस्ट की लिंक नहीं दी जाती है… चलो छोड़ो… पर क्या करें आज लिख ही दिया दिल नहीं माना तो

  1. विवेक भाई चिंता मत करिये जिस दिन मैं चर्चा करना शुरू करूंगा आपको ज़रूर याद रखूंगा।आपको संक्रांति की बहुत बहुत बधाई।

    तिळ गुळ घ्या आणी गोड़ गोड़ बोला,यानी तिल-गुड़ खाईये और मीठा-मीठा बोलिये।

  2. आप अच्‍छा विषय चुनकर लिखते हैं .. चर्चा होने से भी कोई उस लिंक से पढने नहीं आता है .. इन सब बातों की चिंता न करें .. आप अपने ब्‍लॉग को प्रभावी बनाने की कोशिश करें .. आपके पोस्‍ट युगों युगो तक पढे जाएंगे .. हो सकता है अब चिट्ठाकारों काध्‍यान आपके ब्‍लॉग में जाए !!

  3. मेरी तो शामत है विवेक भाई ,जब किसी की पोस्ट चर्चा में लगाता हूं तो शिकायत मिलती है , पढता टीपता हूं नहीं , बस चर्चा में लगा देता हूं । आपको नियमित पढता टीपता हूं तो शायद जाने अनजाने आपकी पोस्ट छूट जाती होगी, फ़ंस गया न । आज की आपकी शिकायत भी मेरी चर्चा के तुरंत बाद आ गई है और आपकी शिकायत को बाकायदा आज की चर्चा में ही दर्ज़ किया गया है , देख लीजीएगा ॥

    अब बात चिट्ठाचर्चाकार के रूप में : – दूसरों का तो मैं नहीं कह सकता ,मगर मेरा तो सचमुच ही कोई criteria नहीं है , कोई दिन निश्चित नहीं , कोई ब्लोग ,कोई ब्लोग्गर,कोई पोस्ट ऐसी नहीं होती जिसके लिए मैं सोच के चलता हूं कि मुझे चर्चा में इसे शामिल करना ही होगा , और यही विश्वास दिलाता हूं कि जिस दिन ऐसा मन ऐसा पक्षपाती होगा, उस दिन से चर्चा बंद कर दूंगा , वो मैं वैसे भी अब अपनी चर्चा को विराम देना चाहता हूं ।क्योंकि चर्चाओं की कोई कमी नहीं रही है , फ़िर जैसा कि संगीता जी ने सही कहा कि चर्चा होने से भी कोई उस लिंक से पढने नहीं आता । हालांकि मैं खुद कई पोस्टें चर्चा में घुसने के बाद ही पढता हूं । अब इससे ज्यादा सफ़ाई में क्या कहूं
    अजय कुमार झा

  4. भाई आपको नियमित पध रहा हू.
    टिपियाता नही हू आगे ध्यान रखून्गा
    अच्छा लिखना छोड दोगे तो चर्चा भी हो जायेगी पर आप ऐसा करना मत.

  5. पीड़ा कभी ना कभी प्रदर्शित हो ही जाती है
    मैं तो नियमित पाठक हूँ, बस इतना ही कह सकता हूँ। चिट्ठाचर्चा ब्लॉग की बात तो नहीं कह सकता, किन्तु बाकी लोगों ने तो जानबूझ कर ऐसा नहीं किया होगा इतना तो आश्वस्त मैं हूँ

    बी एस पाबला

  6. विवेक भाई-हमने तो चार दिन पहले ही चर्चा प्रारंभ की है। अजय भाई का कहना सही है। चार दिन मे एक दो चर्चा मे तो आपके लिंक मिल जाएंगे। आप तलाश करिये। शायद उस चर्चा पर नही जा पाए होगें।
    मै तो पुरा समय देता हुँ। जिसकी चर्चा करता हुं उसका ब्लाग भी पढता हुं, किंतु टिप्पनी करने का समय नही मिल पाता। बाकी अजय जी ने कह ही दिया है।

  7. अरे जाने दीजिये जनाब ..न हो चर्चा, रहें अपनी चर्चा के साथ खुश ..हमारा, आपका धर्म है लिखना …बस लिखिए लोग पढ़ते हैं ,टिपियाते हैं काफी है हमारे लिए ..वैसे चर्चा करना कौन बड़ी तोप है. आज हम कर देते हैं एक शुरू, आपस में करते रहेंगे एक दुसरे के ब्लॉग की चर्चा..

  8. अजय झा जी…हाय हाय!!

    आईये, आंदोलन की राह पकड़ें. 🙂

    ईंट से ईंट बजायें…

    मजाक अलग…लेकिन आप कब से इस बात की चिन्ता करने लगे भई..आपको पाठकों की क्या कमी आन पड़ी. लिखिये….

  9. अच्छा जी , हमारी ही हाय हाय ,नहीं जी एलियन जी का आंदोलन नहीं चलेगा , हम खुद इस आंदोलन को चलाएंगे , झाजी हाय हाय , पाजी हाय हाय , वैसे एलियन जी ,आपके यहां भी ईंट वैगेरह होती क्या ….
    अजय कुमार झा

  10. सबका नाम ले रहे थे तो एलियन भी हाय हाय कर ही डालते भाई..बहुत शर्माते हो आप…हा हा!!

    ईंट यहाँ शो के लिए लगाते हैं मकान में नकली वाली…मगर बजाई तो जा ही सकती है. 🙂

  11. क्या विवेक जी,,
    आप भी ना…क्या बात ले बैठे….!!
    अरे हम कहते हैं ..
    जोन गाँव में मुर्गा नहीं बोलता का उहाँ बिहान नहीं होता है …??? हाँ नहीं तो…
    चर्चा करेंगे तो ….उनके ब्लॉग की ही शोभा बढ़ेगी …
    नहीं करेंगे तो …who the hell is the looser ???? Certainly not you ..!!!
    मस्त रहिये….जिनको जानना चाहिए ..वो सबलोग जानते हैं ..आप बहुत अच्छा लिखते हैं….

  12. और हाँ अब अब आप बोल दिए हैं ना…तो अभी चार दिन तक सारे पिरोग्राम आप द्वारा ही प्रायोजित होंगे …फिर वही टांय-टांय फिस..

  13. विवेक जी, इसमें परेशान होने की क्या बात है? चर्चामंच पर चर्चा और पोस्ट की गुणवत्ता में कोई सीधा संबंध नहीं होता। और ब्लाग भी अब तो इतने हैं कि चर्चाकारों की भी मजबूरी है। आप लिखते रहें जो आपको पढ़ते हैं वो आयेंगे ही, चाहे चर्चा हो या न हो।

  14. विवेक भाई, किसी ब्लागिया चर्चा का मोहताज नही है आपका ब्लाग. आपके ब्लाग मे उपस्थित आलेखो की उपयोगिता सर्च इंजनो के द्वारा भी बनी रहेगी.

  15. संजीव तिवारी जी की बात से सहमत…
    आप लिखते रहें बस…
    और आपसे किसने कह दिया कि चि्ठ्ठाचर्चाओं में अच्छे-अच्छे चिठ्ठे शामिल किये जाते हैं? आपने मेरा चिठ्ठा कब और कितनी चर्चाओं में देखा है, कभी शोध की्जियेगा…। अब सुन लीजिये खरी-खरी (हालांकि इससे कई पिछवाड़े सुलग सकते हैं) फ़िर भी आपने विषय छेड़ ही दिया है तो चिठ्ठा चर्चा में शामिल होने के विभिन्न क्राईटेरिया बता देता हूं…

    1) अपना चिठ्ठा किसी खूबसूरत महि्ला के नाम और फ़ोटो के साथ बनाईये… तड़ से चर्चा में आयेगा…

    2) आपस में दोस्तों का एक गुट बनाकर खुद ही चर्चाकार बन जाईये… एक गुट को दूसरे से भिड़ाते रहि्ये, कोई न कोई बिन्दु निकालकर आलोचना करते रहिये, एक-दूसरे के पोस्ट को बैकलिंक करते रहिये, शायद गूगल रैंक में पोस्ट ऊपर आ जाये… (इसे कहते हैं "गैंग" बनाना)

    3) किसी विवादास्पद मुद्दे को लेकर जमकर भड़ास निकालिये, हो सके तो चर्चाकार को ही गरिया डालिये्…

    4) एक-दूसरे की टांगखिंचाई, आपसी आलोचना, महिलाओं-नारी पर फ़ालतू सी टिप्पणी कीजिये, देश-दुनिया जाये भाड़ में, किसी भी फ़ोकटिया मुद्दे पर बहस चालू कीजिये…

    उपरोक्त चार में से दो (विशेषकर प्रथम दो बिन्दु) पर भी अमल कर लेंगे तो नियमित रूप से चर्चा में शामिल रहेंगे… तथास्तु… 🙂

  16. कल्पतरु तो सभी की इच्छा पूरी करता है…

    आप कंहा उलझ गए.. जब ऐसा लगे तो दिल से पूछिए की "किसके लिए ब्लॉग लिख रहे हें?"

  17. आपको सही सही और उत्तम राय सुरेश चिपलुणकर जी ने दे दी है जो हम देना चाहते थे.

    आप स्वयम का एक चर्चा ब्लाग शुरु करें. बाकी सब काम अपने आप होजायेगा.

    आपको इसके लिये अग्रिम शुभकामनाएं.

    रामराम.

  18. आपने अपनी बात जोरदार तरीके से उठाई। इसकी लीजिए बधाई।

    चर्चाकार भी आदमी है। हमारी आप की तरह साधारण सा। यदि उसे आप इतनी ऊँचाई पर बैठा देंगे कि आपके ब्लॉगपोस्त की अच्छाई या कराबी का आइना ब जाय तो आपको निराशा हाथ लगने की पूरी सम्भावना है। भौतिक रूप से यह किसी एक व्यक्ति के लिए सम्भव नहीं है कि वो दस-बारह हजार चिट्ठों के रोज देखे फिर उन्हें पढ़कर अच्छा और खराब छाँटे और फिर उनकी वरीयता सूची बनाकर चर्चा लिखे और पोस्ट करे। निश्चित ही एक सामान्य अपरिचित ब्लॉगर की पोस्ट रैण्डम आधार पर ही चर्चा में स्थान पाती होगी। बिल्कुल लॉटरी माफ़िक।

    इसके अतिरिक्त चर्चाकार की व्यक्तिगत पसन्द और नापसन्द पर पाबन्दी लगाने की चेष्टा भी बेमानी है। उसने अपना समय और श्रम दिया है, तो अपनी सोच और समझ के अनुसार ही चर्चा करेगा।

    यह खुशी की बात है कि अब चर्चाकारों की संख्या बढ़ रही है। इसका लाभ हम चिट्ठाकारों को मिलना तय हैं।

    एक बात और… मुझे तो लगता है कि आपकी पोस्ट पर टिप्पणी करने वाला प्रत्येक पाठक भी एक तरह से चर्चाकार ही है आपकी पोस्ट का। उन्हें धन्यवाद दीजिए और मस्त रहिए।

  19. चर्चा पे चर्चा
    विवेक जी लोग तो कहने पे परेशान होते हैं आप न कहने पर 🙂
    (कुछ तो लोग कहेंगे के तर्ज पर)
    गुणी जानो ने कई सुझाव दे दिये हैं चाहें तो आजमा सकते हैं .
    दरअसल बात यह है की भारतीय मीडिया की तरह हिन्दी ब्लॉगिंग में भी विशेषज्ञ की अभी पहचान बननी बाकी है. ज्यादा लोग कवि या साहित्यकार हैं तो चर्चा उनकी ही ज्यादा होगी .
    हाँ यह सही है लोग पढ़ तो लेते हैं लेकिन टिपियाने में कंजूसी कर जाते हैं . फिर वही भारतीय चरित्र .
    आप तो गीता के संदेश पर चलते रहिए . कर्म कीजिये फल की चिंता मत करिये .
    कुछ ज्यादा तो नहीं हो गया न !

  20. भैय्या जी आपकी चर्चा कर आज हमने आपकी लिंक दी है . कृपया समयचक्र की चिट्ठी चर्चा जरुर देखा करें ..आपकी चर्चा मै हमेशा करता रहता हूँ पर लगता है आप ब्लॉग का अवलोकन नहीं करते है .

  21. विवेक जी आप बहुत अच्छा और सार्थक लि्खते हैं, किसी प्रमाणपत्र की जरूरत ही नहीं। हम सिद्धार्थ जी की बात से सहमत हैं ।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २७ [राजमाता कुन्तीदेवी का पाँच घोड़ों का रथा….]

    एक दिन मैं और शोण यों ही नगर घूमने गये थे। सदैव की भाँति घूमघामकर हम लौटने लगे। राजप्रासाद के समीप हम आ चुके थे। इतने में ही सामने से आता हुआ एक राजरथ हमको दिखाई दिया। उस रथ के चारों और झिलमिलाते हुए वस्त्रों के परदे लगे हुए थे। रथ के घोड़े श्वेत-शुभ्र थे। मुझको उनका रंग बहुत ही अच्छा लगा।

    इतने में ही शोण अकस्मात मेरे हाथ में से अपना हाथ छुड़ाकर उस रथ की ओर ही दौड़ने लगा। मैं समझ ही नहीं पा रहा था कि वह पागलों की तरह रथ की ओर क्यों दौड़ रहा था ? और वह रथ के सामने कूद पड़ा और बड़ी फ़ुर्ती से कोई काली सी चीज उठायी। शोण को देखकर सारथी ने अत्यन्त कुशलता से सभी घोड़ों को रोका। मैं हांफ़ता हुआ उसके पास गया मुझे देखते ही बोला “भैया यह देखो । यह अभी रथ के नीचे आ जाता !” मैंने देखा वह एक बिल्ली का बच्चा था। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि शोण से अब कहूँ तो क्या कहूँ ? उस पर क्रोध भी नहीं किया जा सकता था। मैं कुछ आश्चर्य से उसकी ओर देखने लगा। यह क्या वही शोण है जो हमारे रथ के पीछे रोता हुआ दौड़ता आया था ?

    इतने में ही उस राजरथ के रथनीड़ पर बैठे हुए सारथी ने कहा, “जल्दी कीजिए, झटपट अलग हटिए । रथ में राजमाता कुन्तीदेवी हैं !”

“राजमाता कुन्तीदेवी !”

   मैंने शोण की बाँह पकड़कर उसको झट से एक ओर खींच लिया। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ । उस रथ में छह घोड़े जोड़ने की भली-भाँति व्यवस्था होने पर भी केवल पाँच ही घोड़े जोड़े गये थे। एक घोड़े का स्थान यों ही रिक्त छोड़ दिया गया था।

   “राजप्रासाद में घोड़े नहीं रहे हैं क्या ?” मैंने मन ही मन कहा।

5 thoughts on “सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २७ [राजमाता कुन्तीदेवी का पाँच घोड़ों का रथा….]

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – १६

प्राप्त्तवानीरशाखम़् – ग्रीष्म ऋतु आने पर नदी का प्रवाह कम हो जाता है और किनारे छोड़ देता है, किन्तु फ़िर भी झुकी हुई बेंत की शाखायें उसका स्पर्श किये रहती हैं।
सलिलवसनम़् – यहाँ कवि ने कल्पना की है कि जिस प्रकार कोई प्रियतम नवयुवती के नितम्बों से वस्त्र खिसकता है और वह नवयुवती उस वस्त्र को अपने हाथों में पकड़ लेती है

उसी प्रकार मेघ ने अपनी प्रेयसी गम्भीरा के जल रुपी वस्त्र को उसके नितम्बों से हटा दिया है। उसका कुछ भाग ही गम्भीरा के हाथ में रह गया है। इस प्रकार यहाँ कवि ने मेघ में नायक का, गम्भीरा में नायिका का, वानीर शाखा में हाथ का, जल में नील वस्त्र का और तट में नितम्ब का आरोप किया है। (गम्भीरा नाम की एक छोटी सी नदी, जो कि मालव देश में ही बहती है और क्षिप्रा की सहायक नदी है।)

देवगिरी पर्वत – इस पर्वत पर भगवान कार्तिकेय स्थायी रुप से निवास करते हैं, वहीं कार्तिकेय का मन्दिर भी है।
व्योमगड़्गा – गंगा को आकाश, पृथ्वी, और पाताल तीनों लोकों में स्थिति मानी जाती है तथा क्रमश: देवता, मनुष्य और नागों का सन्ताप हरती है। इसलिये इसे  त्रिपथगा भी कहते हैं तथा क्रमश: आकाश गंगा, भागीरथी गंगा और भोगवती गंगा भी कहते हैं।
नवशशिभूता – यहाँ नवशशिभूता शब्द का प्रयोग करके महाकवि ने पौराणिक कथा की और संकेत किया है, समुद्र मंथन के समय उत्पन्न हलाहल का शिव ने पान किया था तथा उसके प्रभाव को शान्त करने के लिये समुद्र मंथन से निकले हुये चन्द्रमा को उन्होंने धारण किया था। इसलिये इन्हें नवशशिभूता कहते हैं।
वैदिक साहित्य में यद्यपि शिव और चन्द्रमा का उल्लेख है, परन्तु शिव द्वारा चन्द्रमा को धारण करने का उल्लेख नहीं है, वाल्मीकि रामायण में समुद्र मंथन की कथा है, परन्तु शिव द्वारा चन्द्रमा को धारण करने का वर्णन नहीं है। यह वर्णन विष्णुपुराण १/९/८२-९७ में वर्णित है।

8 thoughts on “कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – १६

  1. उचित यह हुआ होता की पहले मेघदूत का सार संक्षेप आप अपने आडियेंस को बताते -फिर इन उद्धरणों को विस्तार से -अन्यथा ये प्रसंग से कटे कटे और संदर्भ हीन से लग रहे हैं उनके लिए जिन्होंने इस महान ग्रन्थ के बारे में पहली बार जाना है !

  2. भाई बहुत ही सुंदर काम कर रहे है, इअतने कठीन शव्दो का अर्थ हमे समझा कर, कभी कालिदास ओए शकुंतला के बारे भी लिखना.
    धन्यवाद

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

दिल्ली सुधारो पर पहले दिल्ली वालों को सुधारो

अभी हाल ही में अविनाशजी की एक पोस्ट आयी थी दिल्ली सुधारो। पर हमें लगता है कि उसे होना चाहिये दिल्ली वालों को सुधारो। उस पोस्ट में अविनाशजी ने बताया था कि कैसे दिल्ली के आटो वालों से निपटा जाये मतलब ज्यादा किराया मांगने पर उनकी शिकायत कहाँ की जाये।

अब हमें तो रोज कनाट प्लेस से आटो चालकों से झिकझिक करनी पड़ती है, क्योंकि कोई भी मीटर से चलने को तैयार नहीं होता और अगर मीटर से चलने को कहो तो इस अजीब तरह से हमें देखेगा कि जैसे हम अजायबघर से आये हों, फ़िर वही मोलभाव करो। अब कल का किस्सा बतायें आटो चालकों से झिकझिक कर रहे थे समय था रात के ११.२५ बजे का चूँकि आखिरी मेट्रो जा चुकी थी इसलिये आटो से ही जान पड़ेगा, जितने भी आटो वाले थे सब पूरे डबल पैसे माँग रहे थे और हम वीरता के साथ ईमानदारी (ज्यादा रुपये न देने के लिये) का झंडा लिये करीबन ३०-४० आटो वालों से पूछ चुके थे।

वहाँ पर दिल्ली पुलिस की पीसीआर वैन खड़ी थी, उस पर लिखा था दिल्ली पुलिस की चलती फ़िरती पुलिस चौकी और वो किन बातों पर एक्शन लेते हैं वो तीन बातें क्रमबद्ध तरीके से लिखी हुई थीं। हमने उनसे मदद लेने की कोशिश की तो जबाब मिला ये हमारा काम नहीं है ये ट्राफ़िक पुलिस का काम है। अरे भाई पुलिस तो होती है कानून का पालन करवाने के लिये पर यहाँ तो मामला ही उलट था, हमने भी उनसे पूछा कि देखो भाई वो एक्शन में तीसरे नंबर पर लिखा है कि क्राइम होने पर आप काम आयेंगे तो जबाब मिला कि अरे भाई ये भी कोई क्राइम है तब हमें आभास हुआ कि क्राइम का मतलब भी अलग हो गया है या हमने शायद उनके कार्यकौशलता पर संदेह किया है वे लोग तो वहाँ बंदूकवाले आतंकवादियों से लड़ने के लिये बैठे हैं न कि अपने देश के अंदर होने वाले इस तरह की छोटी छोटी मानसिक आतंकवादी गतिविधियों से लड़ने के लिये।

फ़िर याद आया कि अरे अविनाश भाई ने एक नंबर दिया था ट्राफ़िक पुलिस का, हमने मोबाईल से नंबर डायल किया और उसे शिकायत की तो उसका जबाब सुनकर हमें लगा कि हमारा फ़ोन लगाना उसे पसंद नहीं आया और गलती से फ़ोन उठा लिया है। हमने बताया कि कोई भी आटो वाला तय किराये पर जाने को तैयार नहीं है क्या किया जाये। ज्यादा हील हौल करने पर उधर से डिमांड आयी कि आटो का नंबर बता दीजिये कार्य़वाही की जायेगी तो हमने एक बचकानी सी बात पूछी “तो क्या ३०-४० आटो के नंबर आपको देने पड़ेंगे यहां पर तो कोई भी तय भाव से जाने को तैयार ही नहीं है”, तो उधर से जबाब आया तो क्या हरेक आटो वाले पर कार्यवाही करें क्या, अब मैं क्या जबाब देता क्योंकि वो खुद ही असहाय नजर आया। हमने फ़ोन काट दिया फ़िर १५-२० आटो वालों से पूछा और तय भाव से थोड़ा ज्यादा देकर, मोलभाव कर अपने गंतव्य पहुँच गये।

तो हमें लगा कि दिल्ली सुधारो पर पहले दिल्ली वालों को पहले सुधारो, पुलिस वालों को उनके कार्यक्षैत्र का पता होना चाहिये, खुलेआम लूट को रोकना चाहिये जैसे कि कोल्ड ड्रिंक या बोतलबंद पानी पर पूरे कनाट प्लेस में २ से ३ रुपये ज्यादा लिये जाते हैं, झिकझिक करो तो वो हाकर कहता है कि ये पुलिस वालों को चार्ज देना पड़ता है यहाँ खड़े होने के लिये।

5 thoughts on “दिल्ली सुधारो पर पहले दिल्ली वालों को सुधारो

  1. apka lekh bahut mazedar tha aur vicharneey bhi, ki delhi sudhar se pehle to delhi walo ko sudhrane or sudhrane ki bhi jarurate hai, apka lekh padkar aise laga ki apne to man ki baat keh di lekin sir apko ek cheez or bata du ki female ke liye aise cheezo se niptana aur bhi zyada mushkil ho jata hai, lekhin apne jo likha wkay umda likha,
    apke agle lekh ka intezaar rahega

  2. सही कह रहे हैं विवेक भाई
    दिल्‍ली वालों को सुधारने पर
    दिल्‍ली अपने आप सुधर जाएगी
    पर वो सुखद शाम या सुबह
    कभी आएगी या यूं ही धूप
    भीषण ताप से तपाएगी।

  3. जिस देश का तंत्र काहिल, नेता बईमान और जनता गूंगी हो उसका यही हाल होना ही है:)

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

क्या हिन्दी दिवस मनाना उचित है ।

क्या हिन्दी दिवस मनाना उचित है। कि हमें हमारी मात्रभाषा की रक्षा करना पड रही है और इस लिये हमें सरकारी रुप से यह दिन याद करना पड रहा है। लेकिन हम भी तो बडे बिगडेल हैं व हमारी सरकार भी कि आज हिन्दी दिवस मनाने के बाद फ़िर एक साल के लिये भूल जायेंगे ।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भाषा को एक दायरे में बांधने का मतलब…….

भाषा को एक दायरे में बांधने का मतलब खुद की दुनिया को समेट लेना है ।

2 thoughts on “भाषा को एक दायरे में बांधने का मतलब…….

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

अनुगूँज १८ :-: मेरे जीवन में धर्म का महत्व

पहली कोशिश कर रहा हूँ आप सभी महारथियों के बीच में धर्म एक बहुत बड़ा विषय है पर आज सभी लोग अपने अपने स्वार्थानुसार परिभाषित करते हैं मेरे लिये तो धर्म ऐसा है जैसे कि मेरी श्वास शायद बिना धर्म के जीवन नहीं होता मेरे धर्म की मेरी परिभाषा यही है

4 thoughts on “अनुगूँज १८ :-: मेरे जीवन में धर्म का महत्व

  1. भाई विवेक जरा अनुगूंज का लोगो भी चस्पा दो. वैसे इस विषय पर सबसे छोटी प्रविष्टी होगी आपकी 🙂
    हिन्दी चिट्ठा जगत में आपका स्वागत हैं.

  2. जो आपके लिए अर्थ स्‍पष्‍ट कर भाव बना दे, वही परिभाषा उपयुक्‍त है.

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *