उलझनें जिंदगी की …. मेरी कविता …. विवेक रस्तोगी

उलझनें जिंदगी की

बढ़ती ही जा रही हैं

जैसे इनके बिना जीना

दुश्वार हो

उलझनें हों तभी

प्रेम की कीमत

सुलझन की कीमत

पता चलती है

क्यों

इतने बेकाबू हो जाते हैं

कुछ पल

कुछ क्षण अपनी जिंदगी के

कुछ बेहयाई भी

छा जाती है

पर फ़िर भी इम्तिहान

खत्म नहीं होता

कहीं झुरमुट में दूर

कोई शाख पर छुपकर

बैठकर

देख रहा है

पता ही नहीं है

वो उलझन है

या सुलझन है…

12 thoughts on “उलझनें जिंदगी की …. मेरी कविता …. विवेक रस्तोगी

  1. जीवन एक ऊन की उल्झी गुच्छी है, और हम सब इसी उलझन, सुलझन की गांठे खोलते रह जाते हैं

  2. उलझनें हों तभी

    प्रेम की कीमत

    सुलझन की कीमत

    पता चलती है….
    अच्छी रचना.

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मुंबई से चैन्नई की उड़ान यात्रा और कुछ अनुभव.., बादलों के बीच में उड़ना जैसे कि देवलोक में आ गये हों

    कल सुबह हम अपने एक प्रोजेक्ट के लिये थोड़े दिनों के लिए चैन्नई आये हैं, सुबह ७.०५ की उड़ान थी हमारी मुंबई से चैन्नई के लिये। विमान था इंडियन एयरलाईन्स का हमें लगा सरकारी है खटारा ही होगा, पर जब विमान ने उड़ान उड़ी आशाओं के विपरीत विमान तो बहुत ही अच्छी श्रेणी का निकला, खैर फ़िर जब उड़े तो पहुँच गये बादलों के देश में उससे पहले खिड़की से नजारा देखा तो पूरी मुंबई एक जैसी ही नजर आ रही थी, पहचान नहीं सकते थे कि कौन सी जगह है। बादलों के देश में एक तरफ़ से सूर्य भगवान थे तो लोगों ने अपने खिड़कियों के शटर गिरा लिये। हम दूसरी तरफ़ थे तो बादलों को देख रहे थे, ऐसा लगा कि हम कहीं देवलोक में आ गये हों। या ये सब कोई रुई के पहाड़ हों।

    जैसे कि धरती पर हम लोग एक जमीन के टुकड़े की खरीद फ़रोख्त करते रहते हैं, वैसे ही ये लोग भी अपनी इस बादलों की दुनिया के लिये करते होंगे और हम मानव उनकी दुनिया में अपना विमान घुसाकर उन्हें परेशान करते होंगे। तो यहाँ के प्राणियों को भी तकलीफ़ होती होगी, तभी हमारा नाश्ता आ गया, जो शायद टिकिट पर नहीं लिखा था खैर हमें तो जबरदस्त भूख लगी थी, क्योंकि सुबह ४ बजे के उठे थे, हालांकि घर से हलका नाश्ता कर लिया था, पर फ़िर भी।

    विमान परिचारिका आयी और हमारे सीट में से एक टेबल नुमा चीज निकाली और पूछा कि वेज या नॉनवेज, तो हमने अपनी पसंद वेज बतायी और उसने वेज नाश्ता रख दिया, जिसमें इडली बड़ा सांभर, ब्रेड, कुछ कटे हुए फ़ल, निंबु पानी, चाय के लिये कप और एक पानी की छोटी बोतल। नाश्ता कर लिया पेटपूजा हो गई, फ़िर वही परिचारिका आकर नाश्ते की प्लेट ले गयी, चूँकि नाश्ते की प्रक्रिया के लिये बहुत ही सीमित समय होता है, तो विमान की सारा स्टॉफ़ बहुत ही मुस्तैदी से कार्य कर रहा था। जैसे ही उन लोगों ने नाश्ते की प्लेट्स ली सभी से वैसे ही कैप्टन का मैसेज आ गया कि आप चैन्नई कामराज विमानतल पर उतरने वाले है और फ़िर मौसम की जानकारी दी गई।

    बाहर निकले अपना बैग कन्वेयर बेल्ट से उठाया। और चल पड़े प्रीपैड टेक्सी के लिये क्योंकि हमें बताया गया था कि यहाँ पर कुछ भी मीटर से नहीं चलता है। सब जगह जबरदस्त मोलभाव करना पड़ता है। करीब १ घंटा लगा हमें अपने गंतव्य पहुंचने में क्योंकि चैन्नई में ट्राफ़िक की रफ़्तार बहुत ही सुस्त है। और तापमान लगभग मुंबई जैसा ही है।

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  1. म्रत्यु से देवलोक और फिर मृत्युलोक तक सकुशल पहुँचने के लिए बधाई और वापसी की भी इसी मार्ग से शुभकामनाएं !

  2. बढ़िय यात्रा वृतांत रहा…छोटी दूरी की यात्रा इतनी फटाक से हो जाती है कि पता ही नहीं लगता.

  3. @ललित जी – अगर आप प्रीपैड टैक्सी लेते हैं तो कम से कम आपको लुटने का डर तो नहीं रहता, हमें तो इतने रुपये नहीं लगे।

    @अजय जी – बस इंतजार कीजिये जमीनी यात्रा भी शुरु करेंगे अगर समय मिल पाया तो।

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३३ [द्वन्द्वयुद्ध के दाँव….]

     छह वर्षों का समय तो ऐसे उड़ गया जैसे पक्षियों का झुण्ड उड़ जाता है। उसका पता भी न चला। युद्धशास्त्र में कुछ भी सीखना शेष नहीं बचा। बल्कि मैंने और शोण ने रात में जो अतिरिक्त अभ्यास किया था, उसके कारण हमने प्रत्येक शास्त्र के कुछ ऐसे विशिष्ट कौशल सीख लिये थे जो केवल हम ही जानते थे। कुश्ती के अखाड़े में मैंने केवल लगातार परिश्रम ही नहीं किया, बल्कि एक ही समय चार-चार मल्लयुवकों के साथ मैंने कुश्ती भी लड़ी थी। न जाने क्यों व्यायाम करते समय मुझको थकावट कभी नहीं मालूम पड़ती थी। इसके विपरीत जैसे-जैसे मैं व्यायाम करता जाता वैसे ही वैसे मेरा शरीर तप्त होता जाता। कभी-कभी वह इतना तप्त हो जाता था कि मेरे साथ कुश्ती लड़नेवाले जोड़ीदार कहते, “कर्ण, सीधा जा और दो-चार घड़ी गंगा के पानी में अच्छी तरह डुबकी लगाकर पहले अपना शरीर थोड़ा ठण्डा कर उसके बाद ही हमको अपने साथ कुश्ती लड़ने के लिये बुला। यह तेरा शरीर है या रथ की प्रखर तप्त हाल ?”

     मेरे बाहुकण्टक दाँव से तो वे इतने घबराते कि उस दाँव को चलाने के लिए मैं जैसे ही चपलतापूर्वक अपने शरीर्को सक्रिय करने लगता, वे अपने-आप एकदम चित्त हो जाते । इस दाँव की एक विशेषता थी। प्रतिद्वन्द्वी की गरदन इस दाँव में जकड़ ली जाती थी। शरीर की सारी शक्ति हाथ में एकत्रित कर उसका दबाब धीरे-धीरे बढ़ाते जाने पर प्रतिद्वन्द्वी का दम घुटने लगता था और वह मर जाता था। उस समय उसके हाथ और पैर पीठ पर गट्ठर की तरह ऐसे बँध जाते थे कि गरदन पर रखे हाथ को हटाने की शक्ति उसमें होने पर भी वह उसको हटा नहीं पाता था। यह मेरा विशेष सुरक्षित दाँव था। और युद्धशास्त्र के नियम के अनुसार वह केवल द्वन्द्वयुद्ध के समय ही इतनी क्रूरता से प्रयोग में लया जा सकता था। द्वन्द्व का अर्थ एक ही था। उसमें दो योद्धाओं में से एक ही बचता था। इस युद्ध जब मरने के डर से शरण में आ ही जाता था, तो उसको जीवनदान मिलता था। परन्तु वह जीवनदान विधवा स्त्री के जीवन की तरह होता था। योद्धाओं के राज्य में इस प्रकार जीवनदान माँगनेवाले का मूल्य तिनके के बराबर भी नहीं होता है। ऐसे द्वन्द्वयुद्ध में काम आनेवाले सभी दाँव मैंने सीख लिये थे। परन्तु मेरा सबसे अधिक विश्वास एक ही दाँव पर था – बाहुकण्टक पर।

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मैं तो मर ही जाता अगर मुझे हनुमान चालीसा न याद होती…!!

पत्नी – शादी की रात तुमने जब मेरा घूँघट उठाया तो कैसी लगी थी…

पति – मैं तो मर ही जाता अगर मुझे हनुमान चालीसा न याद होती…!!

——

क्यों प्रेमविवाह ज्यादा अच्छा है ????

क्योंकि “जाना हुए शैतान” अच्छा है एक “अज्ञात भूत” से।

——

पत्नी – मैं तुम्हारी याद में बीस दिन में ही आधी हो गयी हूँ,

मुझे लेने कब आ रहे हो ?

पति – बीस दिन और रुक जाओ..

——

पति होटल मैनेजर से – “जल्दी चलो ! मेरी बीबी  खिड़की से कूदकर जान देना चाहती है”

मैनेजर – “तो मैं क्या करुँ ?”

पति – “कमीने, खिड़की नहीं खुल रही है”

—–

हरेक आदमी “स्वतंत्रता सेनानी” होता है…. शादी के बाद !!

—–

वो कहते हैं कि तुम्हारी बीबी स्वर्ग की अप्सरा है,

हमने कहा खुशनसीब हो भाई, हमारी तो अभी जिंदा है….

23 thoughts on “मैं तो मर ही जाता अगर मुझे हनुमान चालीसा न याद होती…!!

  1. हा हा!! नारी शाक्ति आती ही होगी..कुछ दिन हेलमेट धारण करने की सलाह है आपको. 🙂

  2. @ काजल कुमार – हम महिला शक्ति से बहुत डरते हैं, घर में ही इतनी सख्ती है, बाहर की महिला शक्ति के डर से ही हम मरे जा रहे हैं।
    @ उड़नतश्तरी – हेलमेट धारण करने के बाद ही ये पोस्ट ठेली है।

  3. हनुमान जी ही बचे के रखे है भैया हमको तो,

    अब समीर जी भी गुप्त चेतावनी दे चुके है इसलिये सिर्फ़ इतना ही,

    भूतपिसाच निकट नही आवे………………………॥

  4. ऐसा क्यों है कि शादी के बारे में क्रूर मजाकों के बाबजूद लोग शादी करते है? क्योंकि वे केवल मजाक में ये सब कहते हैं. दूसरा, वे अपने जीवन लिये एक गवाह चाहते हैं. शादी में आप एक दूसरे के बारे में सब कुछ शेयर करते हैं … अच्छी बातें, बुरी बातें, भयानक चीजें, यह सब … हर समय, हर दिन.

    शादी के दौरान, हम एक दूसरे से 7 वादे करते हैं सात कदम एक साथ चलते चलते और कहते हैं कि सात कदम साथ चल आप दोस्त बन जाते हैं और हर कदम एक दूसरे से एक प्रतिज्ञा होती है.
    तो दोस्तो, उपर जो कुछ है बस एक मजाक है.

  5. .
    .
    .
    हंसते हंसते पेट दर्द हो गया भाई, हमारी पत्नी श्री का… बोलीं देखो दूसरों को क्या क्या झेलना पड़ता है…तुम तो जन्मजात खुशनसीब हो जो मेरे जैसी है…साथ में…

    आओ 'शाश्वत सत्य' को अंगीकार करें……..प्रवीण शाह

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३

        मेरे पिता कौरवराज धृतराष्ट्र के रथ के राजसारथी थे। वे अधिकतर कौरवों की राजधानी हस्तिनापुर में रहा करते थे। वह नगर तो बहुत दूर था। कभी कभी वे वहाँ से एक बड़ा रथ लेकर चम्पानगरी में आते थे। उस समय मेरे और शोण के उत्साह का रुप कुछ और ही होता था। जैसे ही पर्णकुटी के द्वार पर रथ खड़ा होता था, शोण उसमें कूद पड़ता और घोड़ों की वल्गाएँ पिताजी के हाथों से हठात़् अपने हाथों में लेकर जोर से मुझको पुकारता, “वसु भैया, अरे जल्दी आ । चलो, हम गंगा के किनारे से सीप ले आयें।“ उसकी पुकार सुनकर मैं अपूप खाना वैस ही छोड़कर पर्णकुटी से बाहर आता।

         फ़िर हम दोनों मिलकर पिताजी के रथ में बैठकर वायुवेग से नगर के बाहर गंगा के किनारे की ओर जाते। हलके पीले रंग के वे पाँच घोड़े अपने पुष्ट पूँछों के बालों को फ़ुलाकर, कान खड़े कर स्वच्छन्द उछलते जाते। जब वह वल्गाओं से घोड़ो को नियन्त्रित करने की कोशिश करता तो उसे देखते ही बनता और मुझे बुलाता, तो मुझको उससे विलक्षण प्रेम होने लगता। वल्गाएँ मैं अपने हाथ में ले लेता और वह प्रतोद का दण्ड उलटा कर घोड़ों के अयाल तितर बितर कर देता। ’हा ऽऽ हा ऽऽ’ कहकर उनको दौड़ाने के लिये प्रतोद के डण्डे से जब वह मारता तब घोड़े चेतकर पहले की अपेक्षा और अधिक तेज दौड़ने लगते। फ़िर हम दोनों लगभग आधा योजन की दूरी पार कर गंगामाता के किनारे रुकते। लेकिन मेरे हाथ पैर सुन्न हो जाते, अकारण ही मुझे लगता कि अवश्य ही इस पानी से मेरा कुछ संबंध है, उसी क्षण दूसरा विचार आता । छि:, भला पानी से मनुष्य का क्या नाता हो सकता है ? वह तो प्यास से व्याकुल प्राणी को तृप्ती प्रदान करने वाला एक साधन मात्र है वह ! अपनी छोटी-छोटी आँखों से मैं उस पात्र को गटागट पी लेता। उस समय मेरी इच्छा होती कि यदि मेरे सम्पूर्ण शरीर में आँखें होतीं, तो कितना अच्छा होता !

       शोण के बालप्रश्नों की बौछारें होने लगती – “भैया, ये सीपियाँ क्या पानी से ही बनती हैं रे ?”

“हाँ”

“फ़िर तो इनपर ये सारे रंग पानी ने ही किये होंगे ?”

“हाँ”

“तो फ़िर पानी में ये रंग क्यों नहीं देखाई पड़ते ?”

        और मैं उसके प्रश्नों का उत्तर देना कभी कभी टाल देता था। क्योंकि मैं जानता था कि एक प्रश्न के बाद दूसरा प्रश्न उसके पास अवश्य तैयार होगा। और सच पूछो तो कभी-कभी उसके प्रश्न का उत्तर मुझे भी ज्ञात नहीं होता था। उसके प्रश्नों को दूर करने का प्रयत्न करने के लिये मैं कहता “चल, हम लोगों को बहुत देर हो गयी है।“

5 thoughts on “सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३

  1. सालो पहले पढा था और मराठी मे पहली बार मैने पढा था।अरविंद जी सही कह रहे हैं जारी रहे।

  2. घर में maujuud होने के बावजूद ये पुस्तक मै पढ़ न सकी ab tak –यहाँ अंश पढ़कर – ruchi jag rahii hai …शुक्रिया

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – २३

बलिनियमनाभ्युद्यतस्य विष्णो: – बलि प्रह्लाद का पौत्र तथा विरोचन का पुत्र था। वह असुरों का राजा था तथा दानशीलता के लिये प्रसिद्ध था। विष्णु वामन का अवतार लेकर ब्राह्मण के वेश में बलि के यहाँ पहुँचे और तीन पग पृथ्वी की याचना की और बलि के स्वीकार कर लेने पर पहले पग में पृथ्वी और दूसरे

पग में आकाश को नाप लिया। तीसरे पग के लिये जब कोई स्थान न रहा तब बलि ने अपना सिर विष्णु के समक्ष रख दिया। विष्णु ने तीसरे पग में उसे नापकर बलि को पाताल भेज दिया।


दशमुखभुजोच्छ्वासितप्रस्थसन्धे: – यहाँ महाकवि कालिदास ने वा.रा. के उत्तरकाण्ड सर्ग १६ की कथा की ओर संकेत किया है कि जब रावण अपने भाई कुबेर को जीतकर वापिस आ रहा था तभी उसका पुष्पक विमान रुक गया। रावण ने देखा वहाँ शिव के गण खड़े थे। उन्होंने रावण को पर्वत से होकर जाने को मना किया, जब गण नहीं माने तब रावण को बड़ा क्रोध आया और उसने कैलाश पर्वत को उखाड़ फ़ेंकना चाहा। तभी शिव ने पर्वत को अपने पैर के अँगूठे से दबा दिया। पीड़ा से वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा; इसलिये उसे रावण (रुशब्दे – रवीति इति रावण:) कहने लगे। तब उसने शिव की पूजा की तथा शिव ने प्रसन्न होकर चन्द्रहास खड़्ग दी।

त्रिदशवनितादर्पणस्य – कैलाश पर्वत इतना निर्मल है कि उसमें देवाड्गनाएँ अपना मुख देखकर प्रसाधन कर लेती हैं। इसीलिए इसको देवताओं की स्त्रियों का दर्पण कहा गया है। त्रिदश देवता को कहते हैं। इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार दी है – तिस्र: दशा: येषां ते त्रिदशा: अर्थात़् जिनकी तीन अवस्थाएँ शैशव, कौमार्य और युवावस्था होती हैं, उनकी वृद्धावस्था नहीं होती। दूसरे – तृतीया दशा येषां ते अर्थात जिसकी केवल तृतीय ही अर्थात़् युवावस्था ही होती है। तीसरे – त्रि:दश परिमाणमेषामस्तीति त्रिदशा: अर्थात़् तीन बार दश – तीस अर्थात ३० वर्ष की अवस्था वाले, देवता सदा तीस वर्ष की अवस्था के ही रहते हैं।

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उज्जैन यात्रा, महाकाल बाबा की शाही सवारी के दर्शन… भाग – १

      हम उज्जैन गये थे 5 दिन की छुट्टियों पर, और खासकर गये थे महाकाल बाबा की शाही सवारी के दर्शन करने के लिये। पहले ही दिन १४ अगस्त को जन्माष्टमी थी, हम अपनी धर्मपत्नी के साथ निकले भ्रमण पर, दर्शन किये गये गोपाल मंदिर के जहां गिरधर गोपाल की बहुत ही सुन्दर, मनभावन रुप के दर्शन हुए, और पूरा गोपाल मंदिर जगमगा रहा था, भव्य लाईटिंग की गई थी। गोपाल मंदिर सिंधिया परिवार ने बनवाया था और आज भी यह ट्रस्ट उन्हीं के पास है, शाही सवारी वाले दिन और बैकुण्ठ चतुर्दशी “हरिहर मिलन” वाले दिन आज भी सिंधिया परिवार से आकर महाकाल बाबा की आगवानी और पूजन करते हैं। इस बार शाही सवारी पर ज्योतिरादित्य सिंधिया आगवानी के लिये आये थे।

mahakaleshwar

       फ़िर चले हम महाकाल बाबा के दर्शन करने के लिये थोड़ी सी भीड़ थी, फ़िर भी बहुत जल्दी दर्शन हो लिये, और फ़िर वही क्रम साक्षी गोपाल, बाल विजय मस्त हनुमान के दर्शन और फ़िर क्षिप्रा नदी का किनारा। परम आनंद की अनुभूति होती है।

        फ़िर १६ अगस्त को हम गये क्षिप्राजी की आरती में । क्षिप्रा नदी बहुत प्राचीन नदी है, महाकवि कालिदास के मेघदूतम में भी इसका वर्णन मिलता है, क्षिप्रा का मतलब होता है “ब्रह्मांड में सबसे तेज बहने वाली नदी”। फ़िर वहाँ से सम्राट विक्रमादित्य की आराध्य देवी और शक्तिपीठ माँ हरसिद्धी की आरती में, माँ हरसिद्धी की सवारी सिंह मंदिर के बाहर शोभायमान था और माँ हरसिद्धी के दर्शन करके आत्मा तृप्त हो गई, हम आरती के समय गये थे और भव्य आरती में शामिल होकर आनंद में भक्तिभाव से सारोबार हो गये। कहते हैं कि ये जागृत शक्तिपीठ है और आप इसका अहसास यहाँ संध्याकालीन आरती में शामिल होकर कर सकते हैं। फ़िर चल दिये घर की ओर महाकाल बाबा के शिखर दर्शन करके। कहते हैं कि महाकाल बाबा के दर्शन से जितना पुण्य मिलता है, शिखर दर्शन से उसका आधा पुण्य मिलता है।

        घर जाते समय सवारी मार्ग की रौनक तो देखते ही बनती थी, पूरा सवारी मार्ग दुल्हन की तरह से सजाया गया था, भव्य लाईटिंग थी और भव्य मंच स्वागत के लिये। वहीं बीच में छत्री चौक पर फ़ेमस कुल्फ़ी खाई जो कि बहुत फ़ेमस है, और हमारे बेटेलाल को बहुत पसंद है।

महाकाल की शाही सवारी का वर्णन अगले भाग में –

महाकाल की शाही सवारी के बारे में ज्यादा जानकारी के लिये चटका लगायें।

3 thoughts on “उज्जैन यात्रा, महाकाल बाबा की शाही सवारी के दर्शन… भाग – १

  1. @दिनेशजी – इतनी अटाटूट भीड़ थी कि खुद को संभालना मुश्किल हो रहा था, इसलिये हम फ़ोटो नहीं खींच पाये अगर संभव हुआ तो कहीं से हम मंगवाते हैं और जरुर आपकी निराशा दूर करेंगे। ॥जय महाकाल॥

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हरिओम पँवार की कविताएँ

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आज भी वो दिन याद है जब हम रात रात भर कवि सम्मेलन में हरिओम पँवार को सुनने के लिये बैठा करते थे और उस जमाने में अपना टेपरिकार्डर और ३-४ खाली कैसेट, और ४-६ बैटरी लेकर बिल्कुल मंच के सामने आसन जमा लेते थे।

 

हरिओम पँवार जब कविता पाठन करने मंच पर आते तो सबसे पहले वो कहते कि अगर किसी को उठ कर जाना है तो पहले ही निकल जाये और अगर कोई बीच में से उठा तो उसे गद्दार घोषित कर दिया जायेगा और वाकई अगर कोई उनके कविता पाठन के  बीच में से उठता तो उसे वो हाथों हाथ सीधा कर देते थे। पेशे से वकील हैं पर वीर रस के कवि हैं मेरठ के रहने वाले हैं, मतलब हमारे पैतृक शहर के।

 

जब हरिओम जी मंच पर कविता पाठन के लिये खड़े हो जाते तो खून में जोश आ जाता था और लगता था कि बस अब पाकिस्तान सामने हो तो हम उसे ध्वस्त कर दें।

 

अब वो हमारी कैसेट सब खराब हो गई हैं हमारा संग्रह खत्म हो गया है, गूगल पर बहुत ढूंढने की कोशिश की पर एमपी३ भी नहीं मिली और न ही कोई छपी हुई अगर मिली भी तो इक्का दुक्का।

अगर किसी के पास एमपी३ में हो तो कृप्या हमसे शेयर करें।

१-२ कविता यूट्यूब पर मिली। यहां चटका लगाइये  उनकी एक कविता “घायल घाटी का दर्द सुनाने निकला हूँ, कश्मीर का दर्द”  देखने के लिये और वीर रस के जोश से अपने आप को सारोबार कीजिये।

5 thoughts on “हरिओम पँवार की कविताएँ

  1. हरिओम पँवार जब कविता पाठन करने मंच पर आते तो सबसे पहले वो कहते कि अगर किसी को उठ कर जाना है तो पहले ही निकल जाये और अगर कोई बीच में से उठा तो उसे गद्दार घोषित कर दिया जायेगा .
    सही कहा है आपने.

  2. आनन्द आ गया पुनः सुन कर बहुत दिन बाद!! वाणी और शब्दों मं ओज गजब का है.

  3. हरीओम पँवार जी को बाबा राम देव जी के मँच पर ही सुना है और सुनते ही मन उत्साह से भर जाता है शायद उन जैसा कवि पहले नहीं सुना बहुत बहुत शन्यवाद्

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अगले सप्ताहों के लिये मार्केट टिप्स – सेनसेक्स एवं निफ़्टी के लिये

अगले सप्ताहों के लिये मार्केट टिप्स – सेनसेक्स एवं निफ़्टी के लिये

खरीदें –

GVKPL – BSE CODE – 532708 – रु. 38

IDFC – BSE CODE – 532659 – रु. 135

Federal Bank – BSE CODE – 500469 – रु. 250

GIC Housing – BSE CODE – 511676 – रु. 85

Titan Ind. – BSE CODE – 500114 – रु. 1179

कृपया अपने विवेक से निर्णय लें। हानि या लाभ की स्थिती में ब्लाग की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी।

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