ऑटो की हड़ताल , किराये में बढ़ौत्तरी और हम आम आदमी… मुंबई में विवेक रस्तोगी

    सुबह ९ बजे तक सब ठीक था, परंतु एकाएक सीएनबीसी आवाज पर एक न्यूज फ़्लेश देखा कि मुंबई में ऑटो की हड़ताल, फ़िर हम दूसरे न्यूज चैनलों पर गये परंतु कहीं भी कुछ नहीं आ रहा था।  अपने सहकर्मी के साथ रोज ऑटो में जाते थे उसका फ़ोन आया कि आ जाओ हम घर से निकले तो वो अपनी मोटर साईकिल पर आया हुआ था, हम उसकी मोटर साईकिल पर लद लिये। सड़कों पर दूर दूर तक ऑटो और टेक्सियाँ कहीं दिखाई नहीं दे रही थीं।

    पर आज कमाल की बात हुई कि हम केवल १० मिनिट में ही ऑफ़िस पहुँच गये जो कि रोज से लगभग आधा है, और तो और बसें भी अपनी पूरी स्पीड से चल रही थीं, ऐसा लगा कि ये ऑटो और टेक्सी वाले ही ट्राफ़िक न्यूसेंस करते होंगे, तभी तो कहीं भी कोई ट्राफ़िक नहीं, ऐसा लग रहा था कि हम मुंबई नहीं कहीं ओर हैं, और इस शहर में ऑटो और टेक्सियों की पाबंदी है।

    सी.एन.जी. गैस की कीमत ३३% बढ़ायी गई है, और ऑटो यूनियनों की मांग थी कि बेस फ़ेयर १.६ किमी के लिये ९ रुपये से बढ़ाकर १५ रुपये कर दिया जाये और उसके बाद प्रति किमी ५ से बढ़ाकर ६.५० रुपये कर दिया जाये। तो मांग मान ली गई और बेस फ़ेयर ९ रुपये से बढ़ाकर ११ रुपये कर दिया गया और उसके बाद प्रति किमी. ५ से बढ़ाकर ६.५० रुपये कर दिया गया है। सीधे सीधे २५% की ऑटो किराये में बढ़ौत्तरी कर दी गई है। अभी तक हमें एक तरफ़ के ४० रुपये लगते थे अब ५० रुपये लगेंगे, याने कि महीने के ५०० रुपये ज्यादा खर्च होंगे।

    अब सरकार को कन्वेन्स एलाऊँस ८०० से बढ़ाकर २००० रुपये कर देना चाहिये जिससे आयकर में ही कुछ राहत मिले।

    पूरा मुंबई बिना ऑटो और टेक्सी के बहुत ही अच्छा लग रहा था, अगर इनको हटा दिया जाये और बेस्ट अपनी बसें बड़ा दे तो ज्यादा अच्छा है।

    शाम को ऑफ़िस से निकले तो फ़िर ऑटो की तलाश शुरु की, क्योंकि हमारे सहकर्मी को कुछ काम था तो पहले आधे घंटे तक तो ऑटो ही नहीं मिला फ़िर सोचा कि चलो बस से बोरिवली जाते हैं और फ़िर वहाँ से अपने घर तक की बस मिल जाती है, तो थोड़े इंतजार के बाद ही सीधे घर के ओर की ही बस मिल गई। बस के पिछले दरवाजे पर लटकते हुए अगले स्टॉप पर अंदर हो पाये। फ़िर थोड़ी देर में ही बस लगभग खाली जैसी थी, तो हमने कंडक्टर से पूछा ये रोज ऐसी ही खाली आती है क्या ? वो बोला कि आज खाली है ऑटो के हड़ताल के कारण लोग ऑफ़िस नहीं जा पाये।

    खैर हम घर पहुँचे तो टीवी पर खबर देखी कि दिल्ली में तो लूट ही मच गई है, पहले २ किमी के लिये २० रुपये और फ़िर २ किमी. के बाद ६.५० रुपये कर दिया गया है। शायद अब दिल्ली में ऑटो वाले मीटर से चलें।

    खैर अपन तो आम जनता है और हमेशा से अपनी ही जेब कटती है और हम कुछ बोलते नहीं हैं, बोल भी नहीं पाते हैं। बस हमेशा लुटने को तैयार होते हैं, और हम कर भी क्या सकते हैं।

13 thoughts on “ऑटो की हड़ताल , किराये में बढ़ौत्तरी और हम आम आदमी… मुंबई में विवेक रस्तोगी

  1. आज का दिन आपका अच्च्छा बीता या बुरा ? ऐसे भी अनुभव होते ही रहने चाहिए !

  2. ऑटो वाले की मजबूरी भी तो समझो। वे भी तो अपना परिवार चलाएंगे ही ना।

  3. हमारे यहां तेल पेट्रोल ओर गेस के दाम बढते ओर घटते रहते है, क्या भारत मै भी दाम घटते है? या सिर्फ़ ऊपर जाना ही जानते है? ओर वो भी ३३% जब कि यहां १, २ पेसे ही बढते है

  4. सरकार का क्या जाता है…………मरता तो हमेशा आम आदमी ही है ना ! चाहे वह मेरी और आपकी तरह हो या फिर ऑटो या टेक्सी वाला !

  5. @अरविन्द जी – दिन तो ठीक ही रहा ज्यादा परेशानी नहीं हुई।

    @अजीत जी – आप सही कह रही हैं, पर जब ऑटो वाला लूटता है तब भी तो उसे अपने परिवार के बारे में सोचना चाहिये ना ।

    @ राज जी – ऐसा हमारे यहाँ कहाँ, यहाँ पर तो दाम बस बढते ही जाते हैं, क्या आपको पता है पेट्रोल पर कितना टैक्स है १००% से भी ज्यादा, पर हमारा भारत महान हम चुप रहते हैं।

  6. @ वन्दना जी – मेरी बात मानें तो बेस्ट की बसों से अच्छा कुछ नहीं है, परंतु समस्या है अंतराल की, अगर मुझे कहीं जाना होता है तो मैं बस पहले और ऑटो टेक्सी बाद में देखता हूँ। और हाँ बाहर वालों के लिये क्या सबके लिये मुंबई बहुत अच्छी है, क्योंकि यहाँ पर आपको सब मदद के लिये तत्पर होते हैं।

    @ शिवम जी – सही कहा आम आदमी तो होता ही इन सबको झेलने के लिये।

    @ राम जी – हालत बुरे हैं, पर सरकार सो नहीं रही है, सरकार भी ऑटो टेक्सी वालों के साथ मिल गई है, आम जनता की कोई नहीं सोच रहा है।

  7. विवेक जी..चाहे खरबूजा छुरी पे गिरे या फिर छुरी खरबूजे पे..कटना तो खरबूजे को ही है…
    कटना हमारी नियति में लिखा है …हमेशा गाज आम जनता पर ही गिरती है

  8. अजित जी सही कह रही हैं आटो वाले ने भी तो पेट पालना है।शाम को उसकी सारे दिन की कमाई तो एक डाक्टर ही निकाल लेगा अगर उसका बच्चा बीमार हुया आपना तो चाहे इलाज ही न करवाये
    उसका आटा दाल कैसे चलता होगा ये भी सोचने की बात है आभार।

  9. ऑटो व टैक्सी प्रति व्यक्ति जितनी जगह घेरते हैं, उतनी बस व ट्रेन नहीं घेरती हैं । केवल अन्तिम 1 किमी के लिये इन पर निर्भरता के कारण ऑटो व टैक्सी इतना उत्पात मचाते हैं ।

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ऐसे ही कुछ भी, कहीं से भी यात्रा वृत्तांत भाग – २ [मोबाईल ट्रेकर की जानकारी साझा की]

    इस मवाली युगल ने ही दो सीटों को ८०० रुपये देकर अपने नाम करवा लिया था, बंदा लगता तो भाई ही था। बिल्कुल अनिल कुमार स्टाईल के बाल और फ़िल्मी अंदाज में शर्ट के दो बटन खुले हुए। और उनकी पत्नी बिल्कुल हीरोईन श्टाईल में वस्त्र धारण किये हुए थीं।
    उनकी बातें चल रही थीं, बिल्कुल चिपक कर बैठे हुए थे और आसपास की दीन दुनिया से अनजान अपनी बात में गुम थे। लड़का कह रहा था कि कुछ नहीं हुआ था, तो लड़की बोल रही थी नहीं हमने सुना था कि फ़लाने ने पहले तो धमकाने के लिये हाथ उठाया फ़िर बाद में गुस्से में आकर किसी को चाकू मार दिया। तो लड़का बोला अरे वो तो है ही ऐड़ा, अकल वकल लगाता नहीं है और जिधर देखो उधर अपना गुस्सा निकालता है। बस ऐसी ही मवालीगिरी की उनकी बातें चल रहीं थीं।
    गर्मी के मारे बुरा हाल हुआ जा रहा था, जो ठंडा पानी हम एक बोतल लाये थे, वह तो सीहोर आने तक ही खत्म हो चुका था या कहें उबल गया था और वह पानी पीने की तो बिल्कुल इच्छा भी नहीं हो रही थी। मिनरल वाटर की बोतलें बिक तो रही थीं पर ठंडी नहीं, फ़िर भी हमने एक बोतल पानी की ले ही ली और अपनी प्यास बुझाई, बोतल थी बैली की। जब बोतल ली तो हमें याद आया कि शायद पहली मिनरल वाटर बनाने वाली कंपनी बिसलरी थी, और अब मिनरल वाटर के लिये बिसलरी शब्द पर्यायवाची बन गया है, ब्रांड बन गया है। मवाली युगल भी गर्मी से परेशान था और थोड़ा पानी पीने के बाद जब थोड़ी देरे में ही पानी उबलने लगता तो उसी मिनरल वाटर से हाथ मुँह धो लेता। अब बताईये मिनरल वाटर से मुँह धो रहे हैं, और गर्मी का हवाला दे देकर बोल भी रहे हैं कि गर्मी के कारण बिसलरी से मुँह हाथ धोने पड़ रहे हैं।
    तभी डॉक्टर साहब से हमारी बातचीत शुरु हुई, तो बातों में ही बात आ गई कि अगर आजकल किसी का भी मोबाईल नंबर या कोई और आवश्यक जानकारी होती है वह हम सीधे मोबाईल में ही लिख लेते हैं और अगर बाईचांस किसी का मोबाईल गुम जाता है तो बस उसकी तो आफ़त ही समझो। हमने उन्हें बताया कि हमारा मोबाईल भी गुम चुका था पर मोबाईल ट्रेकर होने के कारण हमें वापिस मिल गया। फ़िर तो सारे कंपार्टमेंट में बैठे लोगों का ध्यान हम पर केन्द्रित हो गया। तो डॉक्टर साहब की मिसेस बोलीं कि मोबाईल ट्रेकर क्या होता है और कैसे काम करता है।

मोबाईल ट्रेकर –
    मोबाईल ट्रेकर सेमसंग कंपनी के मोबाईल में ही एक फ़ीचर होता है जो कि साथ में आता है, अगर आपका मोबाईल कहीं गुम जाता है, और चोर दूसरी सिम जैसे ही बदलता है तो उस सिम का नंबर आपके द्वारा की गई सैंटिंग्स के मोबाईल नंबर पर एस.एम.एस. के माध्यम से आ जाता है, और चोर कितने भी नंबर बदल ले, आपके पास सारे नंबरों के एस.एम.एस. आते रहेंगे। और चोर मोबाईल ट्रेकर बंद भी नहीं कर सकता क्योंकि उसे उसका पासवर्ड पिन पता नहीं होता है। इस स्थिती में चोर के पास केवल दो ही रास्ते होते हैं कि या तो मोबाईल को फ़ेंक दे या फ़िर आपको वापिस करे दे।
    वैसे मोबाईल ट्रेकर सोफ़्टवेयर आप अपने मोबाईल में डाउनलोड कर सकते हैं, जैसे मैंने अभी नोकिया E63 मोबाईल लिया तो सबसे पहले OVI Store से मोबाईल ट्रेकर ही डाउनलोड किया और पासवर्ड पिन सेट किया।
    अगर आपने भी मोबाईल ट्रेकर अपने मोबाईल में संस्थापित नहीं किया है तो आज ही करें। क्योंकि हर दिन या सप्ताह में नियमित रुप से डाटा का बेकअप लेना असंभव होता है।
    तो हाथोंहाथ डॉक्टर साहब के मोबाईल पर जो कि सेमसंग का था, सेटिंग्स करवा दी वे भी खुश हो गये और अपने ये मवाली भाई उनके पास २-३ मोबाईल थे उसमें से १ सेमसंग का था उन्होंने तो मोबाईल ट्रेकर की सेटिंग करके उसकी सिम भी बदल कर सफ़लतापूर्वक परीक्षण भी कर डाला।

जारी…

10 thoughts on “ऐसे ही कुछ भी, कहीं से भी यात्रा वृत्तांत भाग – २ [मोबाईल ट्रेकर की जानकारी साझा की]

  1. हम तो सोच रहे हैं कि अगर वह परिक्षण असफल हो जाता तो आपका क्या होता? 😀

  2. हमारा तो नोकिया का है तो क्या डाउनलोड हो जायेगा। हम भी मोबाइल चोरी के शिकार हो चुके हैं और बहुत नुकसान हो गया था…जानकारी के लिए आभार

  3. अरे वाह टके जी, सारी विवेक जी बहुत सुंदर, अब बताईये क्या से सोनी एरिक्सोन पर भी हो जायेगा, ओर नोकिया पर भी, वेसे आप तो उस दिब्बे मै छा गये होगे ओर सफ़र केसे बीता पता ही नही चला होगा, गर्मी से भी ध्यान हट गया होगा.
    मजेदार

  4. पढ़ कर मजा आया… पता नहीं भाग तीन में क्या हो.. पर अनजान कपल के लिए आपने मवाली लिखा.. हमें समझ नहीं आया.. शायद मुम्वई में नहीं रहा इसलिए पता नहीं ये शब्द किसके लिए इस्तेमाल करते है..

  5. रस्तोगी साहब,
    लगता है कि अभी तक तो सीहोर भी नहीं पहुंचे।
    दो दिन हो गये। कब भोपाल पहुंचोगे, कब झांसी, कब धौलपुर?

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सुबह का अलार्म अच्छा लगता है क्या “किर्र किर्र” ? आप भी बताईये अपने अनुभव…. ? हमने तो इस पर विजय प्राप्त कर ली :)

रोज सुबह उठने के लिये अलार्म की आवाज अच्छी लगती है क्या ?
अलार्म की “किर्र किर्र” किसे अच्छी लगती है, जब हमने सुबह घूमने जाने का निर्णय लिया था तब तो अलार्म दुश्मन जैसा जान पड़ता था कि “हाय” अभी तो मीठी नींद चल ही रही थी, अभी तो सोये ही थे और ये मुआ अलार्म बज पड़ा और जैसे ही अलार्म की किर्र किर्र कान में पड़ती, हम उसका टेंटुआ ऐसा दबाते कि जैसे किसी दुश्मन का दबाते हों, पर ये मुआ अलार्म तो रोज ही बजता जाता है। अगर दुश्मन का टेंटुआ दबाते तो वो शायद ही उठ पाते पर ये अलार्म जान पर ही आ पड़ता है।
अब धीरे धीरे अलार्म की जरुरत खत्म हो गयी है, हमारी जैविक घड़ी अब सक्रिय हो गई है। इसलिये अब अलार्म का “किर्र किर्र” करने का भाने या न भाने का संबंध ही खत्म हो गया है।
अब हमारी तो जैविक घड़ी अपनी सक्रियता से चल रही है, और हम तो अलार्म बजने के पहले ही उठ पड़ते हैं।
आप बताईये अपने अनुभव कि कैसा अनुभव है अलार्म का ….?

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  1. हमें भी बताईये विजय पाने की तरकीब हम तो 4.30 का अलार्म लगाते हैं और 7 बजे उठ पाते हैं|
    रत्नेश त्रिपाठी

  2. हम तो मोबाइल अलार्म का इस्तेमाल करते हैं…. धूम मचा ले धूम……..मचा ले…….. धूऊऊम ……..यही बजता है….

  3. अलार्म लगाना बन्द,अब कोई अपराधबोध नहीं । जो फरियाना होगा मन से, हम बिना अलार्म क्लॉक फरिया लिया जायेगा ।

  4. हम गृहणियों का जीवन तो अलार्म के बिना चलता ही नहीं…एक दिन ये ना बजे तो बच्चे समय पर स्कूल ना जा पायें,पतिदेव को लंच ना मिलें. नींद समय से हमारी भी खुल जाती है पर अलार्म ना लगाने का रिस्क नहीं लिया जा सकता.

  5. पहले अलार्म लगाया करती थी पर किर्र-किर्र कभी अच्छी नही लगी…….एक उपाय किया …सोते समय एक बार मन मे सोच लिया कि सुबह कितने बजे उठना है….समय तय किया…..और ये भी कि अलार्म नही लगाया है …..यकीन मानिये हमेशा समय से पहले ही नीद खुल जाती है …..

  6. कमरे की खिड़की पर पर्दा न डालें तो आँख अपने आप सूर्योदय के साथ खुल जाएगी ।
    बायोलोजिकल क्लोक तो होता ही है।

  7. एक सी घटना और एक सा अनुभव। मेरे साथ भी यही हुआ। शुरू में मोबाइल पर अलार्म लगाया लेकिन अब जैविक घड़ी सही समय पर उठा देती है। ब्‍ला्गिंग करने वालों को तो घूमना अनिवार्य हो गया है। सारा दिन कम्‍प्‍यूटर मोटा कर रहा है।

  8. आज तक हम तो बिना अलार्म के उठे नहीं। चाहे नींद खुल जाए फ़िर भी घड़ी के अलार्म बजाने का इंतजार करते रहते हैं जैसे बचपन में मां की आवाज का इंतजार रहता था बिस्तर छोड़ने से पहले…:)
    आप के ब्लोग पर आ कर एक नया शब्द सीख गये जिसका हिन्दी अनुवाद हमें नहीं मालूम था…।सिर्काडियन रिदम मतलब जैविक घड़ी…।वाह
    धन्यवाद

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३४ [कर्ण की अपने गुरु के प्रति श्रद्धा…..]

       काल के वायु के साथ ही ऐसे दिन और रात के अनेक सूखे-हरे पत्ते उड़ गये। प्रतिदिन प्रत्युषा में उठना, गंगा में जी भरकर डुबकियाँ लगाना, प्रात:काल से दोपहर तक, जबतक पीठ अच्छी तरह गरम न हो जाये, गंगा में रहकर ही सूर्यदेव की आराधना करना, दिन-भर युद्धशाला में शूल, तोमर, शतघ्नी, प्रास, भुशुण्डी, खड़्ग, गदा, पट्टिश आदि भिन्न-भिन्न प्रका के शस्त्र फ़िराना, समय अपर्याप्त लगने पर रात में शोण को लेकर पलीते के धूमिल प्रकाश में अचूक लक्ष्य-भेद करना और अन्त में सारे दिन की घटनाओं का चिन्तन करते हुए, कभी-कभी चम्पानगरी की स्मृतियाँ मन ही मन दुहराते हुए, सो जाना। इसी लीक पर चलते हुए छह वर्ष बीत गये।

      बचपन का वसु अब मन के प्रांगण में दौड़ नहीं लगाता था। चम्पानगरी का स्थान अब हस्तिनापुर ने ले लिया था। चम्पानगरी में गंगा के किनारे बालू में अंकित होनेवाले छोटे-छोटे पैर अब हस्तिनापुर की भूमि पर दृढ़ता से पड़ने लगे थे। काल का अजगर छह वर्ष निगल चुका था। छह बर्ष ! इन छह वर्षों में क्या हुआ और क्या नहीं हुआ, यह सब कहा जाये तो वह अलग ही कहानी बन जायेगी। इन छह वर्षों में मैं तो युद्धशाला का एक शिष्य मात्र था। यहाँ कभी किसी ने मेरे साथ शिष्य का-सा व्यवहार नहीं किया। द्रोणाचार्य की देख-रेख में कृपाचार्य के पथक में मेरा नाम था। उस पथक में हस्तिनापुर के सभी साधारण शिष्य थे। उन साधारण शिष्यों में मैं सबसे अधिक साधारण था। शिष्यों की भीड़ में कृपाचार्य अथवा द्रोणाचार्य ने कभी मुझसे पूछताछ नहीं की थी। और सच पूछो तो वे मुझसे कुछ पूछें, मेरी पीठ पर अपना हाथ फ़ेरें, यह इच्छा मेरे मन में भी कभी नहीं हुई। जब-जब शास्त्र का कोई कठिन दाँव मेरी समझ में न आता, तब तब मैं क्षण-भर आँखें बन्द कर अपने गुरु का – सूर्यदेव का – स्मरण करता और पल-भर में उस दाँव को समझकर अलग हट जाता, जैसे यक्षिणी ने जादू की छड़ी घुमा दी हो। श्रद्धा में बड़ी शक्ति होती है। किसी न किसी पर श्रद्धा रखे बिना मनुष्य जीवित ही नहीं रह सकता।

       शिष्यावस्था में मेरी सारी श्रद्धा अपने गुरु पर थी। भय से तो मेरा लेशमात्र भी परिचय नहीं था। परन्तु कभी-कभी मेरा मन केवल इसी बात के लिए विद्रोह कर उठता था कि शाला के ये दोनों गुरुदेव कभी मुझसे बात क्यों नहीं करते ? कर्ण को वे पत्थर का एक पुतला समझते हैं क्या ? प्यासे व्यक्ति को समुद्र में रहते हुए भी एक बूँद पानी पीने को नहीं मिले, मेरी दशा भी ऐसी ही हो जाती। अपने इन विचारों को मैं यदि किसी से प्रकट भी करता तो शोण के अतिरिक्त और था ही कौन मेरे पास ! मेर मन घुटता जा रहा था। बड़े लोग छोटों को अपने पास बुलाकर उनके दोष दिखायें तब तो ठीक है। लेकिन यदि उनकी उपेक्षा करें तो ?…तो उनके मन का अंकुर घुटने लगता है। फ़िर जहाँ उसको रास्ता मिलता है वहीं से वह बाहर निकलता है। इन छह वर्षों में मुझको क्या प्राप्त हुआ था ? घोर असह्य उपेक्षा। ज्वलन्त तिरस्कार। कर्ण नामक कोई एक शिष्य इस युद्धशाला में भी अपने आप ही बनय गया। कृपाचार्य और द्रोणाचार्य के प्रति आदर होने के बजाय शंका आ पैठी। मुझे ऐसा लगता कि वे मेरे नाममात्र के लिये गुरु हैं। जो शिष्यों के मन नहीं जानते हैं, वे कैसे गुरु ? जो प्रेम की फ़ूँक से शिष्यों के मन की कली प्रफ़ुल्लित नहीं करते, वे कैसे गुरु ? मेरा मन गुरु-प्रेम के लिए तरसता था। इसीलिए मैं प्रतिदिन अपने गुरु का हाथ अपनी पीठ पर तब तक फ़िरवाता था, जबतक कि पीठ गर्म नहीं हो जाती थी। हाँ तब तक सूर्यदेव को अर्ध्य देता रहता। नित्य इसी प्रकार तप्त होने के कारण मेरी पीठ प्रखर हो गयी थी।

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हमने अपना फ़्लैट शिफ़्ट किया और मुंबई में लोगों को बहुत करीब से देखा देखिये और बताईये कि आपका नजरिया क्या है…. उत्तर भारतीय और मराठी मानुष ….

   हमने अभी अपना फ़्लैट अपने बेटे के स्कूल के पास ले लिया है और घर बदलना मतलब बहुत माथाफ़ोड़ी का काम ।

   अब अपन तो कितनी भी दूरी तय कर लो ऑफ़िस के लिये पर बच्चे को ज्यादा दूर नहीं होना चाहिये इसलिये हमने आखिरकार अपना फ़्लैट बदल लिया और स्कूल के नजदीक ही फ़्लैट ले लिया। अब मेरे बेटे को स्कूल जाने में केवल पाँच मिनिट लगते हैं, और आने में भी, हम निश्चिंत हैं।

   जब अपना फ़्लैट शिफ़्ट किया तो तरह तरह के लोगों से सामना हुआ, सबसे पहले अपने फ़्लैट के ब्रोकर का (इस पर अलग से पोस्ट लिखेंगे) जो कि पंजाबी निकले और बहुत ही प्रेमी लोग हैं, एक अंकल और एक आंटी हैं पर स्वभाव से बहुत ही अच्छे। फ़िर हमारे फ़्लैट के मालिक वो निकले इलाहाबाद के मतलब हमारे ससुराल के। फ़िर हमारे एक आल इन वन मैन हैं जो कि सब काम कर देते हैं प्लंबिंग, कारपेन्टर, इलेक्ट्रीशियन और भी बहुत कुछ वो भी उत्तरप्रदेश से। (ऐसे आदमी को ढूँढ़ना मुंबई में बहुत मुश्किल है।) फ़िर हमारे अलमारी को खोलने और लगाने वाला @होम से जो शख्स आया वो भी इलाहाबाद से। जो मजदूर था हमारा समान को जिसने शिफ़्ट किया और हमने उसके साथ बराबार हाथ बंटाया वो भी इलाहाबाद से। ट्रक ड्रायवर मुंबई का ही था खालिस मराठी।

    अब हमने सबकी तुलना की उनके व्यक्त्तिव की तो हमने पाया जो मुंबई के बाहर के हैं उनमें काम करने की आग है और काम को अपने जिम्मेदारी से करते हैं और जो मुंबई के हैं वे काम को अहसान बताकर कर रहे हैं।

   बाहर का आदमी यहाँ पैसा कमाने आया है मजबूरी में आया है पर इनकी कोई मजबूरी नहीं है, इनकी मजबूरी है कि इन्हें केवल बिना काम के दारु मिलना चाहिये और अगर कोई उस काम को करे तो उसका विरोध करें। सीधी सी बात है न काम करेंगे न करने देंगे। भाव ऐसे खायेंगे कि पैसे लेकर काम करने पर भी अहसान कर रहे हैं, और कोई थोड़ा सा कुछ बोल दो तो बस इनकी त्यौरियाँ चढ़ जायेंगी।

    अरे दम है तो रोको प्राईवेट बैंको को, व्यावसायिक संस्थाओं को, सॉफ़्टवेयर कंपनियों को जिनमें बाहर के लोग याने कि अधिकतर उत्तर भारतीय या दक्षिण भारतीय लोग चला रहे हैं, वहाँ मराठियों का प्रतिशत देखो  तो इनको अपनी औकात पता चल जायेगी। ये वहाँ टिक नहीं पायेंगे क्योंकि इन लोगों को काम नहीं करना है केवल हरामखोरी करना है सरकारी कार्यालयों में।

    मैं इस विवादास्पद मुद्दे पर लिखने से बच रहा था पर क्या करुँ जो कसैलापन मन में भर गया है उसे दूर करना बहुत मुश्किल है। अगर ये लोग उत्तर भारत के लोगों को मार रहे हैं तो उत्तर भारत के लोगों को मराठी लोगों को मारना चाहिये जो वहाँ रह रहे हैं और उनको महाराष्ट्र भेज देना चाहिये। ऐसा लगता है कि राजनीति में ये लोग देश को भूल गये हैं और पाकिस्तान और हिन्दुस्तान की लड़ाई बना रहे हैं।

   थू है मेरी ऐसे लोगों पर जो ये सब कर रहे हैं और जो इनको समर्थन कर रहे हैं। मैं अपना विरोध दर्ज करवाता हूँ।

14 thoughts on “हमने अपना फ़्लैट शिफ़्ट किया और मुंबई में लोगों को बहुत करीब से देखा देखिये और बताईये कि आपका नजरिया क्या है…. उत्तर भारतीय और मराठी मानुष ….

  1. आप ने बहुत गुस्से मै यह पोस्ट लिखी है, ओर आप की बात से सहमत हुं, लेकिन फ़िर भी हमे ऎसा नही करना चाहिये, अगर हम सब ऎसा करने लग गये तो भारत के टुकडे टुकडे हो जायेगे,चारो तरफ़ खुन खरावा होगा, बल्कि हमे इन राजनीति करने वालो को घेरना चाहिये, लोगो को जागरुक करन चाहिये कि इन की बातो मै ना आये, वोट उसे दे जो साफ़ हो गुंडो मवालियो ओर चोर उच्चाको को मत दे अपना वोट चाहे बेकार चला जाये, जो धर्म भाषा, जात पात ओर राज्य की बात करे, अपनी ताकत की बात करे , जिस का चरित्र सब को पता हो, जो झुठे वादे करे मत दो उस कमीने को वोट, ओर बिरोध करे सब मिल कर.
    अगर यह ठाकरे इअतन ही बलवान था तो क्यो नही उस समय अपनी बिल से निकला जब आतंकवादियो ने अपना भायंकर खेल खेला, कुछ बेवकुफ़ लोगो के लिये सब को बुरा मत कहो.

  2. किसी भी क्षेत्र के स्थानीय निवासियों की बनिस्बत बाहरी व्यक्ति अपना स्थान व आजीविका सुरक्षित कर ही लेता है। फिर चाहे वह पंजाब हो या कनाडा, अमेरिका या फिर महाराष्ट्र!

    बी एस पाबला

  3. बड़े गुस्से में हैं भाई!! खैर, है तो बात सरासर गलत. विरोध होना ही चाहिये.

  4. "अगर ये लोग उत्तर भारत के लोगों को मार रहे हैं तो उत्तर भारत के लोगों को मराठी लोगों को मारना चाहिये जो वहाँ रह रहे हैं और उनको महाराष्ट्र भेज देना चाहिये।"
    1. आपकी पीड़ा समझी जा सकती है मगर यह कोई हल नहीं है !
    2. यह मामला राज सरकार /केंद्र सरकार का है वह सख्ती से निपटे

  5. आपकी सोंच सही है .. मेरे ख्‍याल से भारत के सभी महानगर पूरे भारत के हैं .. जो भी उसे अपने प्रदेश का समझते हैं .. वो महानगर छोडकर उस प्रदेश के गांवों में चले जाएं .. इससे समस्‍या समाप्‍त हो सकती है !!

  6. पहले भी मराठियों को "गोड़से" होने की वजह से 50 साल पहले मार-मार कर भगाया गया था, अब फ़िर से हिन्दी प्रदेशों से "ठाकरे" होने की वजह से मार-मार कर भगा दो भाई… कौन रोक सकता है… मूल समस्या को समझने की बजाय किसी एक व्यक्ति के कर्मों की सजा पूरे समुदाय को दे दो…।
    नोट – "सरकारी कार्यालयों" में काम करने वाले सचमुच के "हरामखोरों" में से कितने प्रतिशत मराठी हैं यह भी पता करना पड़ेगा अब तो…

  7. dekhiye ise pradesh ka mudda nhi banana chahiye balki ye samajhna jaroori hai ki hum sab sabse pahle bhartiya hain uske baad hindu,muslim,marathi ya koi aur. agar hum sachche hindustani hain to is pher mein padenge hi nhi aur ye bhawana hi sabmein jagrit karna chahenge kyunki agar hum apne apne pradesh ki sochenge to ek baar phir hindustan usi tarah bant jayega jaise pahle banta tha aur baar baar ek hi galti nhi dohrayi jani chahiye kyunki bhagatsingh, lakshmibai jaise yodhha baar baar janam nhi lete.

  8. भाई , एक गलती वो कर रहे हैं। तो क्या वही गलती हम भी करें।
    ये तो हल नही है।
    लेकिन जो हो रहा है, वो भी सरासर ग़लत है।

  9. हरामखोरी तो भाई इधर यू0 पी० और बिहार में भी कम नहीं है. यही लौंडे जो मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद, सूरत में जाकर ठेला-रिक्शा खींचते हैं, मजदूरी करते हैं, सब्जी- दूध बेचते हैं, यहाँ अपने खेतों में काम करते इनकी नानी मरती है. गाँव में मजदूर ढूंढें नहीं मिल रहे और यह जूता -गाली खाने चले जाते हैं मुंबई-दिल्ली. यहाँ अपने खेतों में काम करते शर्म आती है. खेत दे दिया है बटाई पर और बम्बई जाकर कलक्टरी कर रहें हैं.जिस कारण से पिट रहे हैं वो गलत है लेकिन हैं पिटने के काबिल ही.

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    "अब हमने सबकी तुलना की उनके व्यक्त्तिव की तो हमने पाया जो मुंबई के बाहर के हैं उनमें काम करने की आग है और काम को अपने जिम्मेदारी से करते हैं और जो मुंबई के हैं वे काम को अहसान बताकर कर रहे हैं।

    बाहर का आदमी यहाँ पैसा कमाने आया है मजबूरी में आया है पर इनकी कोई मजबूरी नहीं है, इनकी मजबूरी है कि इन्हें केवल बिना काम के दारु मिलना चाहिये और अगर कोई उस काम को करे तो उसका विरोध करें। सीधी सी बात है न काम करेंगे न करने देंगे। भाव ऐसे खायेंगे कि पैसे लेकर काम करने पर भी अहसान कर रहे हैं, और कोई थोड़ा सा कुछ बोल दो तो बस इनकी त्यौरियाँ चढ़ जायेंगी।

    अरे दम है तो रोको प्राईवेट बैंको को, व्यावसायिक संस्थाओं को, सॉफ़्टवेयर कंपनियों को जिनमें बाहर के लोग याने कि अधिकतर उत्तर भारतीय या दक्षिण भारतीय लोग चला रहे हैं, वहाँ मराठियों का प्रतिशत देखो तो इनको अपनी औकात पता चल जायेगी। ये वहाँ टिक नहीं पायेंगे क्योंकि इन लोगों को काम नहीं करना है केवल हरामखोरी करना है सरकारी कार्यालयों में।"

    विवेक जी,
    ऊपर जो कुछ उद्धरित किया है आपके आलेख से, अत्यंत आपत्तिजनक और निंदनीय है। आप पूरे मराठी समाज का ऐसा जनरलाइजेशन कैसे कर सकते है वह भी उस मराठी ट्रक ड्राईवर के बहाने। एक और बात आपके संज्ञान मेंलाना चाहूंगा कि ड्राईवर पुरे हिन्दुस्तान यहां तक कि फौज के भी एक मामले में एकमत हैं कि हम सामान उतारने चढ़ाने में हाथ नहीं बंटायेंगे।

  11. कुछ गिने चुने स्वार्थी तत्वों के कारण सबको गाली देना कितना उचित है . यह देश की विडंबना है कि अपने प्रदेश में काम नहीं करना चाहते लेकिन बाहर जाकर सब करने को तैयार हैं. अपने क्षेत्र में लोगों को सिर्फ बरगलाना ही धंदा है

  12. कुछ दिन बाद जब आप फिर से ये पोस्ट पढेगे तो लगेगा कि शायद आप गलत है… अच्छे बुरे हर प्रदेश/समाज/देश/जाती में होते है.. आप सामान्यकरण नहीं कर सकते…

  13. उत्तर प्रदेश के लोगो को पहले अपने नेताओं को ठिक करना चाहीये फिर बाद मे महारास्ट्र के ईन नेताओं को।

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ४

    लौटते समय सन्ध्या हो जाने के कारण श्येन, कोकिल, कपोत, भारद्वाज, पत्ररथ, क्रौंच आदि अनेक पक्षियों के झुण्ड चित्र-विचित्र आवाजें करते हुए, धूम मचाते नीड़ों की ओर लौटते हुए हमको दिखाई देते। उस समय सूर्यदेव पश्चिम की ओर स्थित दो अत्युच्च पर्वतों के पीछे प्रवेश कर रहे होते थे। दिन भर अविरत दौड़ने के बाद भी उनके रथ के घोड़े जरा भी थके हुए नहीं होते थे। वे दो पर्वत मुझको उनके प्रासाद के विशाल द्वार पर खड़े हुए दो द्वारपाल से लगते थे। क्षण-भर में ही वह तेजपुंज हमारी दृष्टि की ओट में हो जायेगा, इस कल्पना से ही वियोग की एक प्रचण्ड लहर अकारण ही मेरी नस-नस में फ़ैल जाती । मैं एकटक उस बिम्ब की ओर देखता रहता। शोण मुझको जोर से झकझोरकर आकाश में शोर मचाता हुआ गरुड़ पक्षियों का झुण्ड दिखाता। अन्य समस्त पक्षियों की अपेक्षा ये बहुत अधिक ऊँचाई पर उड़ते हुए जाते थे। शोण पूछता, “भैया, ये कौन से पक्षी हैं रे ?”

“गरुड़ ! सभी पक्षियों का राजा !”

“भैया, तू जायेगा क्या रे इन गरुड़ों की तरह …. खूब-खूब ऊँचा ?” वह अनर्गल प्रश्न पूछता ।

“पगले ! मैं क्या पक्षी हूँ जो ऊँचा जाऊँगा ?”

“अच्छा भाई, मैं जाऊँगा गरुड़ की तरह खूब ऊँचा। इतना ऊँचा कि तू कभी देख नहीं पायेगा। बस, अब ठीक है न ?”

    पश्चिमीय क्षितिज की ओर देखने लगता और अन्त में मैं ही उससे एक प्रश्न पूछता, “शोण, वह सूर्य-बिम्ब देख रहे हो ? उस बिम्ब की ओर देखने पर क्या अनुभव कर रहे हो तुम ?”

     मुझे लगता कि वह सूर्य बिम्ब की ओर देखकर जैसा मुझे लगता है उसी तरह की कोई बात अपने शब्दों में कहेगा। लेकिन सूर्य बिम्ब की ओर देखकर उसकी नन्ही आँखें उसके तेज से मिंच जातीं और फ़िर थोड़ी देर बाद आँखें मीड़ता हुआ मेरे कानों की ओर देखकर वह जल्दी कहता, “तेरे चेहरे जैसा लगता है वह, वसु भैया !”

मैं अपने कानों से हाथ लगाता। दो मांसल कुण्डल हाथ में आ जाते। कहते हैं कि ये मेरे जन्म से ही हैं !

     शोण की शिकायत शुरु हो जाती , “तुझपर ही माँ का प्यार अधिक है, भैया ! देख ले, इसीलिए उसने तुझको ही ये कुण्डल दिये हैं ! मेरे पास कहाँ है कुण्डल ?”

     आवेश में मैं हाथ में लगे प्रतोद का प्रहार घोड़ों की पीठ पर करने लगता। अपने खुर उछालकर रास्ते पर धूल उड़ाते हुए वे हिनहिनाते हुए वायुवेग से दौड़ने लगते । पास बैठा हुआ, शोण, दौड़ते हुए घोड़े, पीछे छूटते जाते अशोक, ताल, किंशुक, मधूक, पाटल, तमाल, कदम्ब, शाल, सप्तपर्ण आदि के ऊँचे घने पत्तोंवाले वृक्ष – इनमें से किसी का भी मुझको भान नहीं रहता। केवल सामने का पीछे भागता हुआ मार्ग और उसके मोड़ – बस यही दिखाई देते। मेरे मन में एक विचार कौंध जाता —- “ पीछे छूटते हुए इस रास्ते के साथ साथ मैं प्रकाश के साम्राज्य से किसी अन्धकारमय भयानक समुद्र की ओर खिंचा चला जा रहा हूँ ।“

9 thoughts on “सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ४

  1. आपने  अच्छा प्रसंग चलाया है अब तो ब्लॉग पढ़ने का मजा बढ़ता जा रहा है

  2. युगंधर और मृत्‍युंजय ये दोनों उपन्‍यास पढ़कर मुझे एक ही बात लगी कि कितनी मेहनत की होगी लेखक ने दोनों को लिखने में । विशेषकर मृत्‍युंजय तो मुझे युगंधर से भी अधिक पसंद है । आपने उसमें से बहुत सुंदर प्रसंग निकाला है । आपकी पसंद श्रेष्‍ठ है ।
    पीछे छूटते हुए इस रास्ते के साथ साथ मैं प्रकाश के साम्राज्य से किसी अन्धकारमय भयानक समुद्र की ओर खिंचा चला जा रहा हूँ ।“
    ये पंक्तियां हर युग के हर मानव को अपनी ही लगती हैं ।

  3. काफी समय से मृत्युंजय पढ़ने के बारे में सोच रही हूं, पर पढ नहीं पाई, एक अंश पढना भी भला लगा

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – २४

हलभृत इव – बलराम गौरवर्ण के थे और वे नीले वस्त्र धारण करते थे। जब वे कन्धे पर नीला दुपट्टा रखते थे तो और भी सुन्दर प्रतीत होते थे। इसी की कल्पना कवि ने की है कि कैलाश पर्वत श्वेत है और उस पर काला मेघ बलराम की शोभा को धारण कर लेगा।

हेमाम्भोजप्रसवि – यह मान्यता है कि गंगा आदि के दिव्य जलों में स्वर्णकमल
उगते हैं, परन्तु यहाँ स्वर्णकमल कहने का अभिप्राय यह है कि उषाकाल में सूर्य की किरणों से उनकी छटा सुनहरी हो जाती है।

कल्पद्रुम – कल्पवृक्ष पाँच देव वृक्षों में से है, ऐसी मान्यता है कि यह मन के अनुकूल वस्तुएँ प्रदान करने वाला वृक्ष है –
नमस्ते कल्पवृक्षाय चिन्तितान्न्प्रदाय च।
विश्वम्भराय देवाय नमस्ते विश्वमूर्तये॥
लीलाकमलम़् – कमल का पुष्प जब क्रीड़ा के लिए हाथ में लिया जाता है तब उसे लीलाकमल कहते हैं। कालिदास ने कुमारसम्भव और रघुवंश में भी उसका उल्लेख किया है। कमल ग्रीष्म और शरद़् में खिलता है। कुन्द हेमन्त ऋतु में, लोध्र शिशिर में, कुरबक वसन्त में, शिरीष ग्रीष्म में खिलता है तथा कदम्ब वर्षा ऋतु के आने के साथ विकसित होता है। इस प्रकार वर्णन करके महाकवि ने यह दिखाया है कि अलकापुरी में छ: ऋतुओं की शोभा सदा रहती है।

लोध्र प्रसवरजसा – लोध्र पुष्प की धूलि से – यह मुख पर लगाने के लिये पाउडर की तरह प्रयुक्त होता है। इससे स्पष्ट होता है कि प्राचीन काल में भी स्त्रियाँ मुख पर पाउडर का प्रयोग करती थीं।

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बैंकज्ञान ब्लोग का नया बैनर मेरे ब्लोग कल्पतरु पर

चिट्ठाजगत टैग्स: बैंकज्ञान, बैनर

आज बहुत ढ़ूँढ़ने के बाद मैं अपने बैंकज्ञान ब्लोग का बैनर बना पाया हूँ, जरा देखिये ओर बताईये कैसा है।

अगर किसी को पता हो तो बतायें कि आसान तरीके से बैनर कैसे बना सकते हैं।

वैसे यह सलाह मुझे कुवैत वाले जीतू भाई ने दी थी, उनका धन्यवाद।

4 thoughts on “बैंकज्ञान ब्लोग का नया बैनर मेरे ब्लोग कल्पतरु पर

  1. चकाचक

    हो सके तो ब्लिंकिंग बंद कर दीजिये ध्यान बटता है
    वीनस केसरी

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