ऐसे ही कुछ भी, कहीं से भी यात्रा वृत्तांत भाग – ५ [“जो भक्त हो आठ हाथों वाली का, उसका क्या बिगाड़ लेंगे ये दो हाथ वाले”]

    थोड़ी देर में ही विदिशा आया जो कि मेरी जन्मस्थली है, मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब मैं अपने होश में पहली बार विदिशा से मालवा एक्सप्रेस से ही निकला था तब मैंने ट्रेन से उतरकर विदिशा की माटी को अपने माथे पर लगाया था, पता नहीं बड़ी अजीब सी झनझनी आयी थी, कुछ लोग तो एकटक मुझे देखे जा रहे थे, पर मैं अपने में मशगूल मातृभूमि के प्रेम में मगन था।
    विदिशा में डॉक्टर साहब से कुछ लोग मिलने वाले आये थे,  इसलिये उनके मित्र डॉक्टर साहब पहले ही चले गये थे,  शायद उनके परिवार के ही थे और उनके ससुराल पक्ष के लग रहे थे, क्योंकि जितनी इज्जत लड़के को ससुराल पक्ष की ओर से मिलती है वह अपने पक्ष से नहीं, आखिर दामाद होता है, वे मिलने वाले खिड़की से ही मिल लिये २ लीटर की ठंडी बोतल भी दे गये।
    ललितपुर आने को था और हम लोगों की बातचीत अपने पूरे जोर पर थी, तभी वो मवाली लड़का बोला कि मैं वैष्णोदेवी जा रहा हूँ और अब तक लगभग ९० बार जा चुका हूँ, मैं देवी भक्त हूँ इसलिये गुजरात में भी देवी के मंदिर में भी जाता हूँ, नाम नहीं बताया कि कौन सा मंदिर, और फ़िर एक डॉयलाग कि “जो भक्त हो आठ हाथों वाली का, उसका क्या बिगाड़ लेंगे ये दो हाथ वाले”।
    मवाली श्रीमती जी के पास उनके मोबाईल पर फ़ोन पर फ़ोन आये जा रहे थे, और उनके चेहरे से उनकी परेशानी झलक रही थी सारे कॉल को मिस काल जान बूझकर करवाती जा रही थीं। और मुँह में ही कुछ गाली जैसा बुदबुदा रही थीं, खैर हमें तो इतना समझ में आया कि दाल में कुछ काला है और ये वैधानिक रुप से पति पत्नि नहीं हैं, क्योंकि उनकी हरकतें नये पति पत्नि से ज्यादा प्रेमी प्रेमिका की लग रहीं थी।
    ललितपुर गार्ड साहब को भी उतरना था और डॉक्टर साहब के दोस्त डॉक्टर साहब को भी, गार्ड साहब तो केवल ट्रेन के बाहर देखते और बिल्कुल सही समय बता देते कि अब केवल ३० मिनिट का रास्ता है, अब १५ मिनिट बचे हैं, हम उनसे बहुत प्रभावित हुए आखिर उन्होंने अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण वर्ष गार्ड की नौकरी करते हुए निकाले थे और उनको रास्ता याद नहीं होगा तो किसे होगा। थोड़ी देर बाद कहीं ट्रेन को रोक दिया गया, शायद आऊटर था, तो गार्ड साहब बोले कि ध्यान रखना पड़ता है कि कहीं ललितपुर तो नहीं, अभी पिछले दो –तीन दिन से ललितपुर में इस समय लाईट नहीं रहती है, तो कई बार तो लोगों को पता ही नहीं चलता है कि ललितपुर आ गया है। खैर थोड़ी देर में ही ललितपुर आ गया, और हमारे पास वाली डॉक्टर दंपत्ति अपने डॉक्टर मित्र को विदा देने गये, तभी अचानक ट्रेन की खिड़की पर उतरने वाले डॉक्टर साहब हमसे हाथ मिलाने आये और बोले कि मिलकर बहुत खुशी हुई। वाह साहब केवल ट्रेन में कुछ देर बैठकर बातें करने से भी अच्छी दोस्ती हो जाती है।
    ट्रेन चल दी तो डॉक्टर दंपत्ति ने अपना खाना शुरु कर दिया, खाना हमारे पास भी था परंतु पेट भरा सा लग रहा था, इसलिये सोचा कि थोड़ी देर बाद खायेंगे। मवाली लड़का बहुत शेखी बघार रहा था कि अपने दोस्त तो भोपाल से लेकर झाँसी तक रहते हैं, खाना बाहर से आ जायेगा, और वो बेचारा अपने फ़ोन से फ़ोन खटकाते हुए परेशान हो गया परंतु दोस्त लोग तो सो रहे थे न क्योंकि उसके दोस्त भी निशाचर थे, जब फ़ोन आया तब गाड़ी विदिशा में खड़ी थी, तो वह बोला कि अब रहने दो मैं ट्रेन में ही खाने का आर्डर कर रहा हूँ। तो गार्ड साहब ने भी चुटकी ले ही ली थी, “कितना भी बड़ा भाई हो, परंतु भूख तो सभी को लगती है, और कभी कभी दोस्त भी काम नहीं आते हैं।” हम उसकी और देख रहे थे, वो खिसियाये जा रहा था, बेचारा कर भी क्या सकता था।
    झांसी रात को ९.३० का सही समय था ट्रेन का परंतु ट्रेन कुछ देरी से चल रही थी, डॉक्टर साहब अपने ससुराल किसी की शादी में जा रहे थे, और उनको लेने उनके साले साहब स्टेशन पर आ रहे थे, डॉक्टर दंपत्ति को ४-५ दिन रहना था और झांसी की गर्मी की सोच सोचकर ही आधे हुए जा रहे थे। क्योंकि हम भी झांसी की गर्मी झेल चुके हैं पूर्व में केवल ७ दिन में ही हालत खराब हो गयी थी। वे अपने साले साहब से लगातार फ़ोन पर संपर्क साधे हुए थे, ट्रेन लगभग १०.१५ पर झांसी आयी, हमने डॉक्टर दंपत्ति को विदा दी और उन्होंने कहा कि जब भी उज्जैन आयें मिलने जरुर आयें।

21 thoughts on “ऐसे ही कुछ भी, कहीं से भी यात्रा वृत्तांत भाग – ५ [“जो भक्त हो आठ हाथों वाली का, उसका क्या बिगाड़ लेंगे ये दो हाथ वाले”]

  1. बहुत बढ़िया रहा…हम तो पिछली बार समझे कि समापन करदिये काहे कि लिखे नहीं थे न जारी…

    हाय!! मैं मूरख!

  2. @उडनतश्तरी जी – जारी… न लिखने के लिये "हमसे भूल हो गई, हमका माफ़ी देई दो"

  3. Hari Bhau Joshi ji of Ujjain is nomore now. We attended his 50Th marriage anniversary two years back. He is Marathi but he wrote many books in Hindi. He gifted me two of his books…'Jijeevisha" and one more.

    Been to Mahakaleshwar mandir also in Ujjain.

    Nice description of train-travel.waiting for the next post.

  4. आप इस मावली पर ज्यादा लिखे, मुझे तो यह गडबड लग रहा है कही पुलिस ही ना आ जाये… बाकी यात्रा मजे दार है जी

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२ सेव और ३ सेव कितना होता है ५ सेव, और दूसरा अध्यापक उनको शिक्षा देता है ४ केला और १ केला ५ केला होता है, अभी दोनों गणित सिखा रहे हैं, दोनों में कोई अंतर है,

२ सेव और ३ सेव कितना होता है ५ सेव, और दूसरा अध्यापक उनको शिक्षा देता है ४ केला और १ केला ५ केला होता है, अभी दोनों गणित सिखा रहे हैं, दोनों में कोई अंतर है, तो एक कहेगा नहीं कोई अंतर नहीं है, दोनों बराबर सिखा रहे हैं, दूसरा कहेगा नहीं बहुत बड़ा अंतर है ये तो सेव है, और ये तो केला है। तो केला और सेव को लेकर झगड़ा शुरु !!! और मूल सिद्धांत जो गणित सीखना है वो रह गया । तो उसी प्रकार भक्ति में भी कई बार मूल सिद्धांत को छोड़कर किस प्रकार से उस गणित को समझाना है इस मसले को लेकर मतभेद उत्पन्न हो जाता है। तो इसीलिये सर्वप्रथम दृष्टि यह है कि दूसरों में दोष देखना ।


आगे पढ़ें

6 thoughts on “२ सेव और ३ सेव कितना होता है ५ सेव, और दूसरा अध्यापक उनको शिक्षा देता है ४ केला और १ केला ५ केला होता है, अभी दोनों गणित सिखा रहे हैं, दोनों में कोई अंतर है,

  1. सही कहा सर जी , दूसरों में दोष देखना

    एक आग्रह भी है कि आपका ब्लॉग पहले तो खुलता ही नहीं खुलता भी है तो बहुत देर से , कुछ उपाय करे !

  2. देखिये जर क्रोम में बराबर खुलता है। नहीं तो फ़िर तकनीकी रुप से कुछ फ़ेरबदल करते हैं।

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चैन्नई मरीना बीच पर सुबह की तफ़री और समुद्र के कुछ फ़ोटो..

वैसे तो आजकल सुबह शाम घूमना बहुत जरुरी हो गया है, क्योंकि अब घूमना भी मजबूरी है, पसीना बहाओ, जितना हो सके और अपना वजन कम करो, अब चैन्नई में हैं तो आज सुबह का घूमना हमने मरीना बीच जाना तय किया और कुछ फ़ोटो भी निकाले। सुबह लोग समुद्र के पानी में लहरों के साथ मस्ती कर रहे थे, तो अनायास ही मुझे अपने बेटे की याद आ गयी, उसे भी ये अठखेलियाँ करना बहुत पसंद है, किनारे पर नावों का जमावाड़ा लगा था, वे नावें अपने नाविकों का इंतजार कर रहीं थीं।

देखिये और बाकी सुबह घूमने का आनंद और सुख केवल वही जान सकते हैं जो सुबह घूमने जाते हैं, सार्वजनिक करना ठीक नहीं है :)

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पहला दिन था अंदाजा ही नहीं लगा कि कितनी दूर आ गये हैं वहीं से पता लगाकर बस पकड़कर वापिस आ गये, तो उस बस के टिकट का भी फ़ोटो चस्पा दिये हैं, और साथ ही आजकल छावा पढ़ रहे हैं, जब भी जैसे भी समय मिल जाता है तो पढ़ते रहते हैं।

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24 thoughts on “चैन्नई मरीना बीच पर सुबह की तफ़री और समुद्र के कुछ फ़ोटो..

  1. तस्वीरे बहुत बढिया है
    परिवाएर के साथ होती तो सोने पे सुहागा होता.

  2. चलो अच्छा है, बीच की बजन घटाउ सैर के साथ-साथ वहां के कंप्यूटरों को भी हिन्दी फांट के इनपुट संभालने की आदत हो रही होगी.

  3. वाह विवेक ्भई चार रुपए में इत्ता ढेर सारा घूम लिए आप तो बधाई हो ..कमाल की फ़ोटुएं भेजी आपने ..और हां वो सार्वजनिक न की जाने वाली हमारी मेल पर भेज दें :) :) :)
    अजय कुमार झा

  4. काश…मैं भी वहाँ होता…सुन्दर तस्वीरें…..
    ……………..
    विलुप्त होती… …..नानी-दादी की पहेलियाँ………परिणाम….. ( लड्डू बोलता है….इंजीनियर के दिल से….)
    http://laddoospeaks.blogspot.com/2010/03/blog-post_24.html

  5. अरे वापिस भी पेदल ही आये तो बात बनेगी, वेसे भारत मै तो इतनी गर्मी है कि सारा दिन पानी पी पी कर ही वजन घट जाता है, चलिये अब रोजाना घुमने जाये ओर वापिस भी घुमते हुये आये

  6. बढ़िया है ऐसे ही टहलिये और तस्वीरें बांटते रहें. हम भी देख देख कर स्वस्थ हो लेंगे. :)

  7. @ डॉ दराल साहब – हम भी तो सलाह पर अमल ही कर सकते हैं :)

    @सोनल जी – धन्यवाद

    @सिद्धेश्वरजी – छावा अद्भुत कृति है, जरुर पढ़ने के बाद लिखेंगे।

    @हरि भाई – जल्दी ही परिवार के साथ की फ़ोटो भी दिखाएँगे।

  8. @काजल कुमारजी – अपना लेपटॉप होने के कारण यहाँ के कम्प्यूटर हिन्दी फ़ोंट इनपुट के लाभ से वंचित हैं।

    @अजय कुमार झा जी – चार रुपये में तो केवल वापिस आये थे, क्योंकि जाते समय पता ही नहीं चला कि कुछ ज्यादा ही चल लिये हैं। और मेल के बारे में फ़िर कभी बात करते हैं। :)

    @ कृष्ण जी – धन्यवाद

    @ राज जी – जी आपका आदेश सर आँखों पर ।

  9. @ रानी जी – चार रुपये का तो केवल वापसी का टिकट था या यूँ कल लें कि हमने जाने के चार रुपये बचा लिये थे जो कि लगभग ७ किमी बस के सफ़र का टिकट होता है।

    @ Yes, Nature is awesome !!

    @ काश तस्वीरें देखने से ही स्वस्थ होते तो हम रोज सुबह उठते ही तस्वीरें देखते रहते ये कौन फ़ंडा है कृप्या करके हमें भी बताईये। :)

  10. विवेक भाई डाक्टर ने मुझे भी कहा है सैर के लिये लेकिन नींद और आलस कुछ करने दे तब ना।बहुत बढिया पोस्ट।

  11. वाह बड़ी सुन्दर तस्वीरें हैं…आप रोज़ नयी जगह जाइए सैर को….और ऐसी ही सुन्दर तस्वीरें खींच लाइए :)

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हिन्दी ब्लॉगजगत की सदाबहार टिप्पणियां बतायें और कुछ यहाँ पायें।

आज ज्ञानदत्तजी का बज्ज आया तो कुछ अच्छा मसाला मिल गया पोस्ट बनाने के लिये।
कृप्या जिन लोगों की टिप्पणियों को यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है, वे बुरा न माने कि हमारी टीपणी को सदाबहार करार क्यों दिया जा रहा है।
और कोई भी सज्जन यहाँ से टीपणी को कॉपी पेस्ट करने की धृष्टता न करे, कोई नई टीपणी टीपे जो कि यहाँ पर उपलब्ध न हो। :)
बहरहाल हम ज्ञानदा की बज्ज ऐसी ही पेस्टिया रहे हैं, बिना उनकी इजाजत के पब्लिक कन्टेन्ट मानते हुए –
Gyan Dutt Pandey – Buzz – Public

हिन्दी ब्लॉगजगत की सदाबहार टिप्पणियां बतायें। कुछ मैं बताता हूं –
बधाई!
Nice
आपका लेखन अनुकरणीय है।
बहुत बढ़िया पोस्ट; धन्यवाद।
… !!!

2 people liked this – shreesh pathak and Arvind k Pandey

Vivek Rastogi – बहुत सुंदर पंक्तियाँ…..
बहुत बढ़िया उम्दा रचना …
बढ़िया जानकारी.
आभार..
ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha…..
रोचक संस्मरण।
आभार जानकारी का
अच्छी जानकारी!!
जानकारी के लिए धन्यवाद।
बहुत सुंदर जानकारी
abhi to itni hi mili hai, ab baaki baad me batate hai..Edit4:38 pm

Sanjeet Tripathi – sehmat
;)4:50 pm

sanjay bengani – यह तो कुछ भी नहीं….अगले की लिखी कविता मत पढ़ो और आँखे मूँद कर दो एक लाइन कॉपी-पेस्ट कर दो….हो गई टिप्पणी :)5:06 pm
Prashant Priyadarshi – “Very nice” :P5:23 pm

Pankaj Upadhyay – meri fav – ‘nice’ aapke blog par kaafi time dekhi hai…aur kavitayon mein Sanjay Bengani ji se agree…
‘aap bahut achha likhte hain..mere blog
http://pupadhyay.blogspot.com par bhi padharen ;)10:18 pm

Sanjeeva Tiwari – मित्रों और वाक्य देंवें, मुझे सेव कर उपयोग करना है, प्यासे ब्लागरों के लिये टिप्पणियॉं गंगाजल है इसका एक बून्द भी बुझते ब्लागरी पोस्टों मे जान डाल देती है. :)10:25 pm
Pankaj Upadhyay – ’महाराज आपका जवाब नही’…’क्या कह दिये गुरु’…,’ओह! अच्छा’…और एवरग्रीन ’बधाई’ :P10:32 pm

30 thoughts on “हिन्दी ब्लॉगजगत की सदाबहार टिप्पणियां बतायें और कुछ यहाँ पायें।

  1. वो ऊपर भी एक टिप्पणी है, कई बार मजबूरन टिप्पणी निकालनी पड़ती है तो वो टिप्पणी आती है
    और टिप्पणी को सबकी टीप मिलती रहेगी ये नियम है ब्लोगजगत का

  2. अब देखियें ना जब भी टिप्पणी पर लिखा जाता है तो उसके विरोध और समर्थन में सब तरीके की टिप्पणी चली आती है,
    यहाँ तक कि टिप्पणी पर पोस्ट लिखने वाला भी देखता है "यार, कितनी टिप्पणी आयी है जरा गिन कर देखा जाये"

  3. बहुत सुंदर जानकारी
    आभार जानकारी का
    आपका लेखन अनुकरणीय है।
    बधाई!
    हा हा हा !
    अब इनको मना कर क्यों कंगाल बनाना चाहते हो भाई।
    मजेदार रचना।

  4. कुछ और टिप्पणियों को देखें –

    Sameer Lal – साधुवाद!! :)12:36 am
    Sameer Lal – सटीक. :)12:36 am
    Arvind k Pandey – Have a look at hit Hindi comments :

    अच्छा लगा पढ़ कर ..वाह

    ज्वलंत विषय पर लिखी गई इस सार्थक पोस्ट के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई

    काफ़ी उम्दा लेख

    समयोचित एवं स्टीक लेख।

    अत्यंत सधी हुई और सारगर्भित पोस्ट के लिए बधाई

    बहुत सार्थक लेख लिखा है

    From English Blogosphere :

    Keep writing.

    A Nice write-up.

    Keep it up.

    Well said.6:54 am
    Sameer Lal – मजा आ गया!7:02 am

  5. सुन्दर,सार्थक,उम्दा पोस्ट…बेहतरीन,भावपूर्ण पंक्तियों में लिखी हुई..

  6. Buzz के कुछ फ़ायदे है तो अधिकतर नुकसान भी… :) सारा चिठ्ठा (कच्चा) खोलकर रख दिया आपने सभी लोगों का :)

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दक्षिण भारतीय व्यंजन की स्वादिष्टता जिसमें तमिल और आन्ध्रा दोनों तरह के व्यंजन शामिल हैं.. अद्भुत स्वाद है यहाँ के खाने का.. चैन्नई में खाने का मेरा अनुभव..

    यहाँ चैन्नई में जब से आये हैं रोटी तो देखने को भी नहीं मिली है, शुरु दिन ही दोपहर के खाने में मिनी मील सरवाना भवन का खाया, सरवाना भवन जो कि दक्षिण भारतीय खाने की अंतर्राष्ट्रीय श्रंखला है। और यहाँ तरह तरह के दक्षिण भारतीय खाने उपलब्ध हैं।

    पहले दिन मिनी मील खाया जिसमें ३ तरह के चावल एक दही के साथ, दूसरा सांभर के साथ और तीसरा पता नहीं किसके साथ शीरा और ३-४ चटनियाँ।

    फ़िर शाम को खाना खाया आन्ध्रा की प्रसिद्ध अंतर्राष्ट्रीय श्रंखला अमरावती में आन्ध्रा थाली, जिसमें तीन तरह की सब्जियाँ, १ चटनी, सांभर, रसम, दही और आन्ध्रा का खास मसाला, और दो विशिष्ट अचार चावल के साथ, स्पेशल पापड़, सूखी लंबी लाल मिर्ची, और चावल के छोटे पापड़, खाने के बाद केला, आन्ध्रा की कोई एक प्रसिद्ध मिठाई और आन्ध्रा स्टाईल पान।

नीचे फ़ोटो देखिये पर मेरे मोबाईल कैमरे से –

image2

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    खाने का तरीका भी विशिष्ट है, चावल में घी (आप जितना चाहे घी डलवा सकते हैं) और फ़िर आन्ध्रा का खास मसाला मिलाकर खाने पर अद्भुत स्वाद आता है। साथ में सब्जियाँ मिला सकते हैं। फ़िर खाने में ज्यादा इमली वाले सांभर से कम इमली वाली रसम और फ़िर दही से खान खत्म करते हैं, यहाँ बेधड़क आप अपने हाथ से खा सकते हैं, और जम के अपने हाथ चाट भी सकते हैं, क्योंकि यह यहाँ की संस्कृति में शामिल है, अगर आप चम्मच से खायेंगे तो मजा भी नहीं आयेगा। थाली का खाना अनलिमिटेड है जितना चाहें उतना ले सकते हैं।

    हमने यहाँ आकर बहुत चावल खाया पर कभी भारी नहीं लगा, शायद यहाँ का पानी वैसा है या फ़िर भौगोलिक स्थिती इस प्रकार है।

    सरवाना भवन में हमने अभी तक मिनी मील, प्याज का उत्तपम, सांभर चावल, टमाटर का सूप, मसाला डोसा, पाव भाजी, मिनि टिफ़िन जिसमें एक डोसा, ५ छोटी इडली, शीरा, सांभर, स्पेशल चावल और चटनियाँ होती हैं। सरवानन भवन की विशेषता है कि वहाँ की क्वालिटी, पर हाँ थोड़ी मात्रा कम होती है।

यहाँ की एक और विशेषता है कि खाना परोसा जायेगा केले के पत्ते लगाकर सीधे प्लेट में नहीं।

10 thoughts on “दक्षिण भारतीय व्यंजन की स्वादिष्टता जिसमें तमिल और आन्ध्रा दोनों तरह के व्यंजन शामिल हैं.. अद्भुत स्वाद है यहाँ के खाने का.. चैन्नई में खाने का मेरा अनुभव..

  1. बहुत सुंदर जी कभी आये तो जरुर खायेगे, लेकिन मैने यहां यह खाने तो खाये है इन लोगो के परिवार मै जा कर जिस मै मिर्च हद से ज्यादा होती है, नाम सब भूल गया हुं, चावल मुझे पसंद नही लेकिन इन के खाने के संग चावल ही मिलते है,ओर स्वाद भी लगते है, हर जगह का अपना अपना खाना है
    धन्यवाद

  2. विवेक जी , चेन्नई में हैं तो साउथ इन्डियन खाने का पूरा लुत्फ़ उठाइये। घर में तो शायद श्रीमती जी कभी हाथ से खाने न दें और चाटने तो बिलकुल ही नहीं।

  3. @दराल साहब – हम तो घर पर भी हाथ से ही खाते हैं और खूब चाटते भी हैं, पर हाँ अगर बाहर कहीं खाने जाओ तो एटीट्य़ूड मैन्टॆन करना पड़ता है।

  4. Yaar Vivek, tumne mera chennai kaa yaaden taazaa kardiya… Sarvana Bhavan Ka Mini Tiffin mera favourite hai. Tum udhar ka cofee, carrot juice, aur masala milk jo shaam ko milta hai zaroor peena. Tum enjoy zaroor karoge.

  5. अरे क्या कर रहे हैं विवेक जी ! इस तरह के फोटो लगा कर क्यों जुल्म कर रहे हैं हम गरीबों पर? वैसे सरवाना भवन तो यहाँ भी है ..और हमारे लिए तो जन्नत समान है :) मजा आया आपकी tasty पोस्ट खाकर..सॉरी पढ़कर ही ही ही

  6. "पहले दिन मिनी मील खाया जिसमें ३ तरह के चावल एक दही के साथ, दूसरा सांभर के साथ और तीसरा पता नहीं किसके साथ"

    बस इसके आगे पढ़ा नहीं जा रहा है.. हंस रहा हूँ… 😀

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३६ [कर्ण का तारुण्य… यौवन के रथ के पाँच घोड़े.… पुरुषार्थ, महत्वाकांक्षा, निर्भयता, अभिमान और औदार्य ]

     तारुण्य ! जवलन्त धमनियों का अविरत स्पन्दन । प्रकृति द्वारा मानव को प्रदत्त सबसे श्रेष्ठ वरदान। जीचन के नगर का एकमात्र राजपथ। प्रकृति के साम्राज्य का वसन्त, मन-मयूर के पूर्ण फ़ैले हुए पंख, विकसित शरीर-भुजंग का सुन्दर चितकबरा फ़न, भावनाओं के उद्यान का सुगन्धित केवड़ा, विश्वकर्ता के अविरत दौड़नेवाले रथ में सबसे शानदार घोड़ा, मनुष्य का गर्व से सिर उठाकर चलने का समय, कुछ न कुछ अर्जन करने का समय, शक्ति का और स्फ़ूर्ति का काल, कुछ न कुछ करना चाहिए, इस भावना को सच्चे अर्थों में प्रतीत कराने वाला काल।

    बचपन की सभी वस्तुओं का रंग हरा होता है। युवावस्था की सभी वस्तुओं का रंग गुलाबी और केसरिया होता है। युवक की दृष्टि की उडान क्षितिज को छूनवाले आकाश को भी पार कर जाती है। प्रत्येक गतिअमान और प्रकाशवान वस्तु की ओर उसका सहज सुन्दर खिंचाव होता है। जहाँ-जहाँ जो कुछ असम्भव होता है उसको सम्भव करने की अंगभूत तरंग उसमॆं होती है।

    आजकल मुझको अपनी ही, बचपन की और किशोरावस्था की, कुछ बातों पर हँसी आती थी। गंगा को गंगामाता कहनेवाला कर्ण, उसके किनारे पर उत्तरीय में सीपियाँ इकट्ठी करनेवाला कर्ण, गरुड़ की तरह आकाश में उड़ने की बात करनेवाला कर्ण, बालकों के आग्रह को स्वीकार कर राजा के रुप में पत्थर के सिंहासन पर बैठनेवाला कर्ण, अपने कुण्डल कैसे चमकते हैं – यह गंगा के पानी में निहारनेवाला कर्ण ! – कितनी प्रवंचना थी उस समय के आन्न्द में ! कितनी अन्धी थी उस समय की श्रद्धा ! कितना सन्देह ! कितना अज्ञान !

    यह सब धुँधला होता गया। काल के प्रहार ने सब कुछ ध्वस्त कर दिया। जीवन के रथ की वल्गाएँ युवावस्था के सारथी ने अपने हाथ में ले लीं। इस रथ में पाँच घोड़े होते हैं। पुरुषार्थ, महत्वाकांक्षा, निर्भयता, अभिमान और औदार्य।

     जो सामर्थ्यशाली होता है, वही है यौवन। प्रकाश कभी काला होता है क्या ? ऐसा सामर्थ्यशाली यौवन ही अपने साथ औरों का मान बड़ाता है।

   महत्वाकांक्षा तो युवक का स्थायी भाव है। मैं महान बनूँगा। परिस्थिति के मस्तक पर पैर रखकर मैं उसको झुका दूँगा, यह विचारधारा ही तरुण को ऊँचा उठाती है।

   निर्भयता तरुण के जीवन-संगीत का सबसे ऊँचा स्वर है। इस स्वर की भग्न और बिखरी हुई ध्वनि है भय। फ़टे बाँस की-सी ध्वनि भी कभी-कभी किसी को अच्छी लाती है। जग ऊँचे स्वर की तान सुनने को उत्सुक होता है, फ़टी हुई आवाज नहीं।

   अभिमान है युवावस्था का आत्मा। जिस मनुष्य में श्रद्धा नहीं है, वह मनुष्य नहीं है। और जिस तरुण में अभिमान नहीं है, वह तरुण नहीं है। तरुण मनुष्य अपनी श्रद्धाओं पर सदैव अभिमान करता है। समय आने पर उनके लिए प्राण तक देने को वह तैयार रहा करता है।

   और उदारता है यौवन का अलंकार। अपनी शक्ति का अन्य दुर्बलों के संरक्षण के लिये किया गया उपयोग। स्वयं जीवित रहकर दूसरों को जीने देने का अमूल्य साधन।

   ऐसी होती है तरुणाई। जहाँ यह होती है वहाँ अपमान से व्यक्ति चिढ़ता है। जहाँ यह होती है वहाँ अपने न्यायपूर्ण अधिकार पर किसी के आक्रमण से व्यक्ति क्रुद्ध हो उठता है। जहाँ यह होती है वहाँ यह अन्याय के पक्ष का उन्मूलन कर देती है। जहाँ यह होती है वहीं वास्तव में विजय होती है, वहीं प्रकाश होता है। प्रकाश न हो तो फ़िर अन्धकार ! अपमान का आलिंगन करने वाला अन्धकार ! पराजय के विष को अमृत समझकर पचा जानेवाला अन्धकार ! अन्याय का समर्थन करनेवाला अन्धकार ! आक्रमण से भयभीत होनेवाला अन्धकार !!

2 thoughts on “सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३६ [कर्ण का तारुण्य… यौवन के रथ के पाँच घोड़े.… पुरुषार्थ, महत्वाकांक्षा, निर्भयता, अभिमान और औदार्य ]

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फ़ोरेनरों को उनके देश से पढ़ा के भेजा जाता है कि “भारतीय चोर होते हैं”, और वे खुद…

    क्या आपने कभी सुना है कि भारत का वीसा मिलने के बाद फ़ोरेनरों के लिये उनका दूतावास एक मोडरेशन क्लास लेता है और उसमें भारत में बरती जाने वाली सावधानियों के बारे में बताया जाता है और लगभग यह वाक्य हर बार दोहराया जाता है “कि भारतीय चोर होते हैं..”, और वे खुद..

    हम कल का टाईम्स ऑफ़ इंडिया आज सुबह पखाने में पढ़ रहे थे क्योंकि हमारा समाचार पत्र थोड़ा लेट आता है और हमको सुबह उठकर एकदम प्रेशर बन जाता है, तो कुछ समाचार वहीं पर इत्मिनान से पढ़ लेते हैं।

    तो उसमें एक खबर थी कि वकील अपना फ़ोन एटीएम में भूल गया और फ़ोरेनर ने उसे उठा लिया।

   हाईकोर्ट वकील एटीएम में पैसे निकालने गया और अपना कीमती ब्लैकबैरी मोबाईल एटीएम के ऊपर ही भूल गया, जब १५ मिनिट बाद उसे ध्यान आया कि मोबाईल तो एटीएम में ही भूल गया हूँ, लेकिन वापिस आने पर मोबाईल वहाँ नहीं मिला। उन्होंने पहले पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई और फ़िर एचडीएफ़सी बैंक के वीडियो क्लिप देखने पर पता चला कि उनके बाद तीन फ़ोरेनरों ने एटीएम का उपयोग किया था और उसमें से एक उनका मोबाईल उठा कर ले गया मतलब कि चोरी की। वकील ने एचडीएफ़सी बैंक के चैन्नई ऑफ़िस से जानकारी निकाली तो पता चला कि चोर आस्ट्रेलिया का है। वहीं से उनको उसका नाम और बैंक एकाऊँट नंबर भी मिल गया जब मोबाईल को ट्रेस किया गया तो पता चला कि अभी वह दिल्ली में है, उससे ईमेल पर अपील भी की है कि मोबाईल वापिस दे दे और आस्ट्रेलियन दूतावास को भी ईमेल कर शिकायत कर दी गई है, पर अभी तक कुछ नहीं हुआ है, कोलाबा पुलिस मामले की छानबीन कर रही है।

    तो इस बात से ये तो साबित हो गया कि मुफ़्त की चीज सभी को अच्छी लगती है, चोरी के कीटाणु सभी में होते हैं बस किसी के एक्टीवेट होते हैं किसी के नहीं।

पूरा समाचार आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

18 thoughts on “फ़ोरेनरों को उनके देश से पढ़ा के भेजा जाता है कि “भारतीय चोर होते हैं”, और वे खुद…

  1. मुफत का माल सबको अच्छा लगता है – बिदेशियो इंसाने हैं। अरे वो नहीं उठाता तो कोई ऐसा वैसा उठा कर बाहर जाती टरेन पर सवार हो जाता। कोलाबा पुलिस को ढूढ़ते नानियाँ याद आ जातीं ।
    मोबैल तो मिल ही जाएगा, मामला इंटरनेशनल जो हो चुका है।
    मिल जाने पर एक ठो पोस्ट जरूर करिएगा।

  2. फ़ोरेनरों के लिये उनका दूतावास एक मोडरेशन क्लास लेता है और उसमें भारत में बरती जाने वाली सावधानियों के बारे में बताया जाता है और लगभग यह वाक्य हर बार दोहराया जाता है “कि भारतीय चोर होते हैं..”, और वे खुद..

    -कुछ अतिश्योक्ति लगती है भाई इस बात में…और यह आलेख से डिसकनेक्टेड भी लगता है.

  3. @समीर जी – अतिश्योक्ति नहीं है ये बात कई बार इलेक्ट्रानिक मीडिया में भी उछल चुकी है, और हमने अपने बहुत से मित्रों से भी इस बाबद सुन रखा है। डिसकनेक्टेड नहीं है यह इस आलेख की पृष्ठभूमि बयां करता है।

  4. ऐसा कुछ नहीं है , जितनी चोरिया फ्रैंकफर्ट हवाई अड्डे पर
    और कनाडा में होती है विदेशियों की ,उतनी विदेशियों के साथ इंडिया में नहीं होती !

  5. विवेक जी , आप सही कह रहे है ,
    उन्हें तो यहाँ तक कहा जाता है की अपना सेल नंबर किसी को ना दें –
    ( फिर चाहे वो आपका दोस्त ही क्यों ना हो, और चाहे कितनी इमरजेंसी क्यों ना हो )
    मेरी एक परिचित ने तो मेरे दोस्त की बाइक पर ही बैठने से मना कर दिया था – जबकि उस समय उसको चोट आई हुई थी
    ( उसका कहना था की उसके दूतावास ने मना किया है )
    ये मन में डाला जा रह है विदेशी नागरिको के –
    Udan Tashtari जी ये बात सही है अतिश्योक्ति नहीं – क्यों में खुद भुक्त- भोगी हूँ

  6. विवेक जी मै भी आप की बात से सहमत नही, जब हमे वीजा मिलता है तो हमे वो वीजा भारतीया दुतावास से मिलता है, ओर उसी देश मै उसी देश का दुता वास नही होता, जेसे जर्मन तो ऎसी पट्टी हमे कोन पढायेगा? शायद भारतीया दुता वास ही ना, तो भाई हम दुसरो को क्यो बुरा कहे, फ़िर चोर तो हर जगह होते है, ओर जितने भी फ़ार्नेर सब का तो पता नही( जर्मन) भारत आते है, वो बहुत खुश हो कर जाते है( ८०%)ओर बहुत तारीफ़ भी करते है आम जनता की, लेकिन हमारी व्यवस्था की पुलिस की नही, हादसे सभी जगह होते है, लेकिन कोई भी देश अपने नागरिको को निर्देशक तो देता है, सावधान रहने के लेकिन कोई एक्स्ट्रा कलास नही लगती, ओर जो निर्देशक देता है उस मै खाने पीने के बारे ओर हारी सभ्यता के बारे की वहां खुले मै चुम्मा चपटी नही, ओर पहरावे के बारे होते है, आप बेफ़िक्र रहे अभी तक भारतियो की छवि बहुत अच्छी है एक भारतिया ही है जिन को सब देशो मै इज्जत मिलती है

  7. इंसानों की प्रवर्ती तो सब जगह एक सी ही होती है।
    लेकिन फर्क होता है, देशों के कानून में और इसके पालन में।
    हमारे यहाँ सब कागज़ पर होता है।

  8. मेरे एक मित्र ने अपना लैपटॉप europe के एक एअरपोर्ट में रख कर थोड़ी देर ध्यान नहीं दिया तो पाया वह गायब हो चुका है . शायद इन्सान ही चोर होता है

  9. @राज जी – अगर ऐसा है कि भारतीयों की सभी जगह सम्मान है तब तो कोई समस्या ही नहीं है क्योंकि आप इस बारे में ज्यादा अच्छे से बता सकते हैं।

  10. देख पराई चूपड़ी मत ललचावै जीव .. अब जीव तो देशी-विदेशी सभी का होता है ना ? लेकिन बेचारे को क्या पता हम भी हाईटेक हैं .. ।

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ६

    हमारी पर्णकुटी के सामने एक बड़ा वट वृक्ष था। वृक्ष क्या, अनेक रंगों के और अनेक प्रकार की बोली बोलने वाले पक्षी जिस पर रहते थे, ऐसा छोटा-सा एक पक्षि-नगर ही था।

    मैं उस वृक्ष की ओर देख रहा था। उसका आकार गदा की तरह था। ऊपर शाखाओं का गोलाकार घेरा और नीचे सुदृढ़ तना। इतने में अजीब-सी ’खाड़’ आवाज हुई, इसलिए मैंने उस ओर देखा। हमारे पड़ोस में रहनेवाला भगदत्त नामक सारथी अपने हाथ में लगे हुए प्रतोद को फ़टकार रहा था। मैंने आश्चर्य से उसकी ओर देखा। हाथ में लगे प्रतोद को गरदन के चारों ओर लपेटता हुआ वह बोला, “क्यों वसु, क्या देख रहे हो?”

“कुछ नहीं, वह पक्षी देख रहा हूँ।“ मैंने उत्तर दिया।

     “इस वटवृक्ष पर क्या पक्षी देखते हो, पक्षी देखने हों तो अरण्य में अशोक-वृक्ष के पास जाकर देखो। इस वटवृक्ष पर अधिकतर कौए ही रहते हैं। सड़े पके फ़लों को खाने के लिए वे ही आते हैं।“ हाथ में लगे प्रतोद के डण्डे से नीचे पड़े हुए फ़लों को फ़ेंकता हुआ वह बोला।

“कौए ?”

“हाँ ! भारद्वाज, श्येन, कोकिल आदि पक्षी भूले-भटके भले ही आ जायें यहाँ। एकाध कोकिल आ जाता है, वह भी कोकिल की धूर्तता से।“

“धूर्तता कैसी ?” मैंने उत्सुकता से उससे पूछा।

     “अरे, कोकिला अपना अण्डा मादा कौआ की अनुपस्थिती में चुपचाप उसके घोंसले में लाकर रख देती है। अण्डे का रंग और आकार बिल्कुल मादा कौए के अण्डे जैसा ही होता है। इसलिए मादा कौआ को यह सन्देह ही नहीं होता कि अपने घर में किसी और का अण्डा रखा है। फ़िर मादा कौआ कोकिला के अण्डे को सेती है। उसके बाद सप्तस्वर में तान लेकर आस-पास के वातावरण को मुग्ध कर देने वाली कोकिल मादा कौआ के नीड़ में बड़ा होने लगता है।“ उसने प्रतोद को कण्ठ के चारों ओर लपेट लिया।

     “कोकिल और वह मादा कौआ के घोंसले में ?” मैं विचार करने लगा। यह कैसे सम्भव हो सकता है ? भगदत्त की बात असत्य न होगी, इसका क्या प्रमाण है ? और थोड़ी देर के लिए यदि यह सत्य मान भी लिया जाये तो क्या हानि है। हो सकता है मादा कौआ के घर में कोकिल पलता हो। लेकिन वह कौआ बनकर थोड़े ही पलता है। वसन्त ऋतु का अवसर आते ही उसकी सप्तस्वरों की तान पक्षियों से स्पष्ट कह ही देती है कि, “मैं कोकिल हूँ। मैं कोकिल हूँ।“

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – २६

कुसुमशरजात़् – कामदेव के धनुष का दण्ड इक्षु से बना माना जाता है तथा प्रत्यञ्चा काले काले भौरों की श्रेणी से तथा उससे छोड़े जाने वाले वाण पाँच माने जाते हैं


इष्टसंयोगसाध्यात़् – अलका निवासी ज्वरादि से पीड़ित नहीं होते थे और यदि वे किसी से पीड़ित होते थे तो काम जन्य सन्ताप से
और वह प्रिय मिलन से दूर हो जाता था।


प्रणयकलहात़् – प्रेमी पति के किसी अपराध के कारण पत्नी के रुठ जाने को प्रणयकलह कहा जाता है। यक्षों का पत्नियों से केवल मान के कारण ही क्षणिक वियोग होता था, किसी वैधव्य या प्रवास आदि के कारण नहीं।


वित्तेशानाम़् – वित्त का ईश अर्थात धन का स्वामी। वित्तेश कुबेर और यक्ष दोनों के लिये प्रयुक्त होता है। यक्ष चूँकि कुबेर के कोष की रक्षा करते हैं इसलिए उन्हें भी वित्तेश कहा जाता है।


यौवनात़् – यक्ष देवयोनि मानी जाती है, इसलिए उनमें वृद्धावस्था नहीं होती, वे सदा युवावस्था में ही रहते हैं।


मन्दाकिन्या: – गंगा के अनेक नाम हैं; जैसे – जह्नुतनया, जाह्नवी, भागीरथी, मन्दाकिनी आदि। गंगा स्वर्ग, मर्त्य और पाताल तीनों लोकों में अवस्थित है। स्वर्ग में रहने वाली गंगा को मन्दाकिनी, मर्त्यलोक में स्थित गंगा  को भागीरथी तथा पाताल में स्थित गंगा को भोगवती कहते हैं। केदारनाथ से होकर बहने वाली गंगा की धारा को भी मन्दाकिनी कहते हैं। पौराणिक आख्यानों में हिमालय को देवताओं का वास स्थान बताया गया है। इसी कारण कैलाश में स्थित अलका की समीपवर्तिनी गंगा को मन्दाकिनी कहा जाता है।


कनकसिकतामुष्टिनिक्षेपगूडै: – यह एक देशी खेल है । इसमें एक बालक हाथ में मणि आदि को लेकर किसी रेत के ढेर में छिपाता है और दूसरे बालक एकत्रित किये गये रेत में उसे ढूँढते हैं। शब्दार्णव में इस खेल को गुप्तमणि या गूढ़्मणि नाम से पुकारा जाता है।

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बारिश में अपना धंधा बहुत अच्छा चलता है।

रोज ऑफ़िस आना जाना हम ऑटो से करते हैं और ऑटो में बैठते ही अपनी हिन्दी की किताब पढ़ना शुरु कर देते हैं पूरा आधा घंटा मिल जाता है। रोज आधा घंटा या कभी ज्यादा कभी थोड़ा कम समय का सदुपयोग हम हिन्दी साहित्य पढ़ने में व्यतीत करते हैं, शाम को लौटते समय अँधेरा हो जाता है तो शाम का वक्त फ़ोन पर बतियाते हुए अपने रिलेशन मैन्टेन करने मैं व्यतीत करते हैं। इस आधे घंटे में हम शिवाजी सामंत का प्रसिद्ध उपन्यास “मृत्युंजय” पढ़ चुके हैं, जिसके बारे में कभी ओर चर्चा करेंगे। आजकल महाकवि कालिदास का प्रसिद्ध खण्डकाव्य “मेघदूतम” पढ़ रहे हैं।

आज सुबह जब मैं  ऑटो से अपने ऑफ़िस जा रहा था, तो बहुत धुआंधार हवा के साथ बारिश हो रही थी। आटो में दोनों तरफ़ प्लास्टिक का पर्दा गिराने के बाद भी कुछ बूँदे हमें छू ही रही थीं। हम बारिश का मजा ले रहे थे तभी ऑटोवाला बोला कि आप किधर से जायेंगे “मलाड सबवे” से या कांदिवली के नये “फ़्लायओवर” से, हमने कहा कि हमारा रास्ता तो “फ़्लायओवर” वाला ही है क्योंकि यह रास्ता बारिश में सबसे सुरक्षित है, कहीं भी पानी नहीं भरता है। “मलाड सबवे” में तो थोड़ा बारिश होने पर ३-४ फ़ीट पानी भर जाना मामूली बात है।

 

फ़िर ऑटो वाला बोला कि साहब ये बारिश में अपना धंधा बहुत अच्छा चलता है क्योंकि हर आदमी ऑटो में आता जाता है, पैदल चलने वाला भी ऑटो में सवारी करता है। बस की सवारी भी ऑटो में यात्रा करती है  वह भी यह सोचती है कि कहां बस में भीगते हुए जायेंगे। लोकल ट्रेन में पास के स्टेशन पर जाने वाले भी ऑटो में ही यात्रा करते हैं तो कुल मिलाकर यात्री ज्यादा हो जाते हैं और ऑटो कम। अमूमन आधे ऑटो वाले ही बारिश में ऑटो बाहर निकालते हैं क्योंकि बारिश में ऑटो खराब होने का डर ज्यादा रहता है। वह ऑटोवाला शुद्ध हिन्दी भाषा में बात कर रहा था और जौनपुर टच टोन लग रही थी। वैसे यहाँ पर ज्यादातर ऑटो वाले यूपी या बिहार से ही हैं और उनसे ही शुद्ध हिन्दी सुनने को मिलती है, नहीं तो यहां हिन्दी भाषा का विकृत रुप ही बोला जाता है।

12 thoughts on “बारिश में अपना धंधा बहुत अच्छा चलता है।

  1. ऑटो वाले, टैक्सी वाले, दूध वाले सारे भईय्या कितने अपने होते हैं यह अहसास है मुझे बम्बई में कई साल व्यतित कर..दर रोज आधे घंटे साहित्य पढ़कर आप तो चंद महिनों में साहित्यकार हो लोगे..याद रखना भाई जी!!! बस यही गुजारिश है.

  2. यह दिनचर्या -साहित्य चर्या बनी रहे यही शुभकामनाएं !

  3. हामरे यहां तो बारिश ही नहीं हो रही… लगता है बिल्‍कुल मंदा रहेगा अपना धंधा। बहरहाल आप सहैं।मय का सदुपयोग अच्‍छा कर रहे हैं।

  4. भाई आप भाग्यशाली हो जो इतनी अच्छी सडको पर चलते हो कि आटो मे बैठकर मेघदूतम पढ रहे हैं. हमारे यहां तो सडक ऐसी हैं कि दही की हांडी गोड मे लेकर आटो मे बैठ जाओ तो आधे घंटे मे उसमे मक्खन निकल आता है. हम तो इसी तरह बिजली भी बचा लेते हैं. यानि एक पंथ दो काज.:)

    रामराम.

  5. बिलकुल ठीक कहा..बारिश में तो हर कोई ऑटो में ही जाता है..ऑटो वालो का धंधा बढ़ ही जाता है..

  6. सबों को अपने अपने कमाई की पडी रहती है .. आटो वाले बारिश में खुश रहते होंगे .. बाकी को जो भी परेशानी हो !!

  7. बारिश मे आटो मे बैठ्कर मेघदूतम पढने का मजा ही कुछ और है.

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मुफ़्त साफ़्टवेयर

मुफ़्त चीज हमेशा अच्छी नहीं होती यह मानसिकता हमें बदलने की जरुरत है पर कुछ ३-४ मुफ़्त सा्फ़्वेयर के संयोजन से सुरक्षा प्रणाली अच्छी हो सकती है। क्योंकि मुफ़्त वाले साफ़्टवेयरों में कुछ न कुछ कमी अवश्य होती है पर वह हम किसी और सा्फ़्टवेयर से पूर्ण कर सकते हैं।

5 thoughts on “मुफ़्त साफ़्टवेयर

  1. कहने को तो ये भी कह सकते हैं कि कोई चीजपरिपूर्ण नहीं होती चाहे वह महंगा दाम देकर खरीदा हुआ सॉफ्टवेयर ही क्यों न हो।

    मुझे तो अपने उपयोग के बीसों सॉफ्टवेयर जरूरत से अधिक उपयोगी लगे।

  2. अनुनाद जी

    आपने जो नाद स्‍वर दिया है

    अच्‍छा लगा है

    विश्‍वास है आप सूची भी उपलब्‍ध करायेंगे

    विवेक जी

    आप भी उन साफ्टवेयरों

    के मेल की जानकारी

    अपनी पोस्‍टों में दिया करें

    हम जानने के लिए भागे

    भागे आ रहे हैं

    सुरक्षा तो सभी चाह रहे हैं।

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