मैं जीवन में बहुत चंचल और वाचाल रहना चाहता था… मेरी कविता

मैं जीवन में बहुत चंचल और वाचाल रहना चाहता था। मैं मेरे जीवन को मेरे हिसाब से जीन चाहता था। मैं जी भी रहा था… पर फिर एक ऐसा मोड़ आया, जहाँ सब कुछ बदल गया, मेरा जीवन बदल गया। उस मोड़ के कारण मैं धीर गंभीर हो गया। मैं जीवन को रफ्तार से हराना […]
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बस बड़ा हो जाऊँ

आज ऑफिस से आते आते कुछ ऐसे विचार मन में आये कि हमेशा ही हम बड़े होने की बात सोचते हैं, परंतु कभी भी कितने भी बड़े हो जायें पर हमें खुद पर यकीन ही नहीं होता है, कि अब भी हम कोई काम ठीक से कर पायेंगे, हमेशा ही असमंजस की स्थिती में रहते […]
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जख्म इतना भी गहरा न दिया करो

कुछ लाईनें जो ट्विटर पर लिख दी थीं, तो सोचा कि अपने ब्लॉग पर लिख दें ताकि सनद रहे कि हमने ही लिखी थीं –   ये भी मत सोचकर मतवाला होना कि, हवा तुम्हारे कहने से ही चलेगी, कभी हमारे बारे में भी सोचना, कि तुम्हें पता न हो हम तूफानों में ही खेलते […]
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विराम – मेरी कविता – विवेक रस्तोगी

भले मैं बोल रहा हूँ हँस रहा हूँ पर अंदर तो खाली खाली सा हूँ कुछ तो है जो खल रहा है कुछ तो है मन और दिल कहीं और है तन तम में कहीं और है याद तो बहुत कुछ है पर वो यादें कहीं कोने में सिमटी सी अपने आप को सँभाले हुए […]
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जीवन का पेड़ धड़धड़ाती बेपरवाह बहती सी नदी के बीच कहीं बियाबान जंगल में

अपने ही बनाये हुए सपनों के महल में ऐसा घबराया सा घूम रहा हूँ, कब कौन से दरवाजे से मेरे सपनों का जनाजा निकल रहा होगा, भाग भाग कर चाँद तक सीढ़ीयों से चढ़ने की कोशिश भी की, पर मेरे सपनों की छत कांक्रीट की बनी है किसी विस्फोट से टूटती ही नहीं। दम भी […]
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समाज में आवारा हवाओं के रुख

(स्टेज पर हल्की रोशनी और, एक कोने में फोकस लाईट जली होती हैं और खड़ी हुई लड़की बोलती है)     मैं एक लड़की जिसे इस समाज में कमजोर समझा जाता है, और वहीं पाश्चात्य समाज में लड़की को बराबर का समझ के उसकी सारी इच्छाओं का सम्मान किया जाता है। जब से घर से बाहर […]
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जंग .. मेरी कविता.. (विवेक रस्तोगी)

कठिनाईयाँ तो राह में बहुत हैं, बस चलता चल, राह के काँटों को देखकर हिम्मत हार दी, तो आने वाली कौम से कोई तो उस राह की कठिनाईयों पर चलेगा, तो पहले हम ही क्यों नहीं, आने वाली कौम के लिये और बड़ी उसी राह की आगे वाली कठिनाईयाँ छोड़ें, नहीं तो वे इन कठिनाईयों […]
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बस तुम्हें… अच्छा लगता है.. मेरी कविता

मुझे पता है तुम खुद को गाँधीवादी बताते हो, पूँजीवाद पर बहस करते हो, समाजवाद को सहलाते हो, तुम चाहते क्या हो, यह तुम्हें भी नहीं पता है, बस तुम्हें बहस करना अच्छा लगता है । जब तक हृदय में प्रेम, किंचित है तुम्हारे, लेशमात्र संदेह नहीं है, भावनाओं में तुम्हारे, प्रेम खादी का कपड़ा […]
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प्रेमपत्र.. मेरी कविता

वे प्रेमपत्र जो हमने एक दूसरे को लिखे थे कितना प्यार उमड़ता था उन पत्रों में तुम्हारा एक एक शब्द कान में लहरी जैसा गूँजता रहता था   पहला प्रेमपत्र तब तक पढ़ता था जब तक नये शब्द ना आ जायें तुम्हारे प्रेमपत्रों से ऊर्जा, संबल और शक्ति मिलते थे कई बातें और शब्द तो […]
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मैं झूठ क्यों बोलने लगा हूँ

मैं झूठ क्यों बोलने लगा हूँ कारण ढूँढ़ रहा हूँ, पर जीवन के इन रंगों से अंजान हूँ, बोझ हैं ये झूठ मेरे मन पर..   ऐसे गाढ़े विचलित रंग, जीवन की डोर भी विचलित, मन का आकाश भी, और तेरा मेरा रिश्ता भी..   तुमसे छिपाना मेरी मजबूरी, मेरी कमजोरी, मेरी लाचारी, हासिल क्या […]
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