विराम – मेरी कविता – विवेक रस्तोगी

भले मैं बोल रहा हूँ हँस रहा हूँ पर अंदर तो खाली खाली सा हूँ कुछ तो है जो खल रहा है कुछ तो है मन और दिल कहीं और है तन तम में कहीं और है याद तो बहुत कुछ है पर वो यादें कहीं कोने में सिमटी सी अपने आप को सँभाले हुए […]
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जिंदगी अगर दूसरा मौका दे तो (Second Chance in Life)

जिंदगी में सबकी अपनी अपनी तमन्नाएँ होती हैं पर बहुत ही कम लोग अपनी तमन्नाओं के अनुसार काम कर पाते हैं, सबको अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिये, अपने उत्तरादायित्व पूरे करने के लिये, अपने सपनों के अरमानों को कहीं अपने दिल में दफन करना पड़ते हैं, पर बीच बीच में कहीं न कहीं ये […]
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मैं तुम और जीवन (मेरी कविता …. विवेक रस्तोगी)

मैं तुम्हारी आत्मीयता से गदगद हूँ मैं तुम्हारे प्रेम से ओतप्रोत हूँ इस प्यार के अंकुर को और पनपने दो तुममें विलीन होने को मैं तत्पर हूँ।तुम्हारे प्रेम से मुझे जो शक्ति मिली है तुम्हें पाने से मुझे जो भक्ति मिली है इस संसार को मैं कैसे बताऊँ तुम्हें पाने के लिये मैंने कितनी मन्नतें […]
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“सन्ध्या-सुन्दरी” कविता सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’ रचित “कविश्री” से

दिवसावसान का था समय, मेघमयआसमान से उतर रही है वह सन्ध्या-सुन्दरी परी-सी धीरे धीरे धीरे। तिमिराञ्चल में चञ्चलता का नहीं कहीं आभास, मधुर मधुर है दोनों उसके अधर, किन्तु जरा गम्भीर, – नहीं है उनमें हास-विलास,। हँसता है तो केवल तारा एक गूँथा हुआ उन घँघराले काले-काले बालों से, हृदयराज्य की रानी का वह करता […]
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“बादल राग” कविता सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’ रचित “कविश्री” से

निर्दय विप्लव की प्लावित माया – यह तेरी रण-तरी, भरी आकांक्षाओं से, घन भेरी-गर्जन से सजग, सुप्त अंकुर उर् में पृथ्वी के, आशाओं से नव जीवन की, ऊँचा कर सिर, ताक रहे हैं, ऐ विप्लव के बादल !                                            फ़िर फ़िर बार बार गर्जन, वर्षण है मूषलधार, हृदय थाम लेता संसार, सुन-सुन घोर वज्र हुंकार। […]
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“मुझे स्नेह क्या मिल न सकेगा” कविता सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’ रचित “कविश्री” से

मुझे स्नेह क्या मिल न सकेगा ? स्तब्ध दग्ध मेरे मरु का तरु क्या करुणाकर, खिल न सकेगा ?                  जग दूषित बीज नष्ट कर,                  पुलक-स्पन्द भर खिला स्पष्टतर,                  कृपा समीरण बहने पर क्या,                  कठिन हृदय यह हिल न सकेगा ? मेरे दुख का भार, झुक रहा, इसलिए प्रति चरण रुक रहा, […]
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ज़ूही की कली कविता सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’ रचित “कविश्री” से

विजन-वन-वल्लरी पर सोती थी सुहागभरी- स्नेह-स्वप्न-मग्न-अमल-कोमल-तनु तरुणी जूही की कली, दृग बन्द किये, शिथिल, पत्रांक में। वासन्ती निशा थी; विरह-विधुर प्रिया-संग छोड़ किसी दूर-देश में था पवन जिसे कहते हैं मलयानिल। आई याद बिछुड़न से मिलन की वह मधुर बात, आई याद चाँदनी की धुली हुई आधी रात, आई याद कान्ता की कम्पित कमनीय गात, […]
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भारती वन्दना कविता सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’ रचित “कविश्री” से

भारती जय, विजय करे  कनक-शस्य-कमल धरे ! लंका पदतल-शतदल, गर्जितोर्मि सागर-जल धोता शुचि चरण-युगल स्तव कर बहु-अर्थ-भरे! तरु-तृण-वन-लता-वसन, अंचल में खचित सुमन, गंगा ज्योतिर्जल-कण धवल-धार हार गले! मुकुट शुभ्र हिम-तुषार, प्राण प्रणव ओङ्कार, ध्वनित दिशाएँ  उदार, शतमुख-शतरव-मुखरे ! कुछ शब्दों के अर्थ – कनक-शस्य-कमल धरे ! – प्राकृतिक वैभव से सुसज्जित है। स्तव – प्रार्थना, […]
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