केलोग्स वाले गुप्ताजी का नाश्ता

दीपो भक्षयते ध्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते | यदन्नं भक्षयेन्नित्यं जायते तादृशी प्रजा || जैसे दीप का उजाला अँधेरे को खा जाता है, और काजल को उत्पन्न करता है, वैसे ही जिस तरह का भोजन हम ग्रहण करते हैं, वैसे ही हम उसी तरह का व्यवहार करते हैं।  उपरोक्त श्लोक आज भी पुरातनकाल की बात को सत्य साबित करता है। […]
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हरिओम पँवार की कविताएँ

Technorati टैग्स: {टैग-समूह}हरिओम पँवार,कविता,कैसेट,एमपी३ आज भी वो दिन याद है जब हम रात रात भर कवि सम्मेलन में हरिओम पँवार को सुनने के लिये बैठा करते थे और उस जमाने में अपना टेपरिकार्डर और ३-४ खाली कैसेट, और ४-६ बैटरी लेकर बिल्कुल मंच के सामने आसन जमा लेते थे।   हरिओम पँवार जब कविता पाठन […]
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