कला, साहित्य और राजनीति

कला, साहित्य और राजनीति तीनों पृथक कलायें हैं परन्तु इसके घालमेल से व्यक्ति सफलता के चरम शिखर तक जा पहुँचता है। संघर्ष हर कोई करता है, योग्यता भी हर किसी में होती है। निसंदेह कुछ लोगों को छोड़कर जो कि अपवाद होते हैं। परन्तु जो केवल एक ही चीज पकड़कर आगे बढ़ता है वह हमेशा […]
Continue reading…

 

बेटी तू कितना भी विलाप कर ले, तुझे मरना ही होगा (नाटक)

माँ और उसकी कोख में पल रही बेटी के मध्य संवाद  पार्श्व में स्वरघोष के साथ ही बताया जाता है – ( जैसे ही बहु के माँ बनने की सूचना मिली परिवार खुशियों से सारोबार था, परिवार में उत्सव का माहौल था। उनके घर में वर्षों बाद नये सदस्य के परिवार में जुड़ने की सूचना जो मिली थी, परिवार रहता […]
Continue reading…

 

ब्लॉगिंग की शुरूआत के अनुभव (भाग ३)

ब्लॉगिंग की शुरूआत के अनुभव (भाग १) ब्लॉगिंग की शुरूआत के अनुभव (भाग २) हमने २००५ में कृतिदेव फ़ोंट(kruti dev Font)  से विन्डोज ९५ (Windows 95) में ब्लॉग लेखन (blog writing)  की शुरूआत की थी, उस समय और भी प्रसिद्ध फ़ोंट (Famous font) थे, पर हमें क्या लगभग सभी को कृतिदेव (Kruti Dev Font) ही […]
Continue reading…

 

ब्लॉगिंग की शुरूआत के अनुभव (भाग २)

ब्लॉगिंग की शुरूआत के अनुभव (भाग १)     हम उन बैंक अधिकारी के साथ अपने मित्र के सायबर कैफ़े गये, जहाँ रोज शाम वे इन्टरनेट का उपयोग करने जाते थे, उन्होंने हमें सबसे पहले गूगल में खोजकर हिन्दी के बारे में बताया, फ़िर हिन्दी में कुछ लेख भी पढ़वाये, अब याद नहीं कि वे सब […]
Continue reading…

 

वैश्वीकरण के दौर में हिन्दी भारतीयों के लिये..

    हिन्दी दिवस हमें क्यों मनाने की जरूरत पड़ी, ये बात समझ से परे है, हमने तो आजतक अंग्रेजी दिवस या किसी और भाषा का दिवस मनाते नहीं देखा । यह ठीक है कि भारत पर कभी ब्रतानिया साम्राज्य शासन किया करता था, परंतु हमने आजाद होने के बाद भी अपनी भाषा का सम्मान वापिस […]
Continue reading…

 

शब्द-शक्ति के भेद (३) व्यंजना – 2 – रस अलंकार पिंगल

(१) शाब्दी व्यंजना – शाब्दी व्यंजना वहाँ होती है, जहाँ व्यंग्यार्थ शब्द के प्रयोग पर आश्रित रहता है। इसके दो भेद किये गये हैं – (अ) अभिधामूला और लक्षणामूला । (अ) अभिधामूला – एक शब्द के कई अर्थ हो सकते हैं लेकिन जब अनेक अर्थ वाले शब्द को संयोग, वियोग साहचर्य आदि के प्रतिबन्ध द्वारा […]
Continue reading…

 

शब्द-शक्ति के भेद (३) व्यंजना – 1 – रस अलंकार पिंगल

(३) व्यंजना – कवि महत्व की दृष्टि से व्यंजना का महत्व सर्वाधिक माना गया है। वही काव्य श्रेष्ठ माना जाता है जिसमें व्यंजना शक्ति या व्यंग्य मुख्य हो। जब वाच्यार्थ या लक्ष्यार्थ के अभाव में अन्य अर्थ ग्रहण किया जाता है, तब वहाँ व्यंजना शक्ति मानी जाती है। उदाहरणार्थ – सूर की निम्न पंक्तियों में […]
Continue reading…

 

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 3 – रस अलंकार पिंगल

(२) उपादान लक्षणा या अजहतस्वार्था – लक्षण-लक्षणा में मुख्यार्थ को बिल्कुल तिरस्कृत कर दिया जाता है, लेकिन उपादान लक्षणा में लक्ष्यार्थ के साथ मुख्यार्थ का सम्बन्ध भी रहता है; उदाहरणार्थ – ‘’बढ़ी आ रही हैं तोपें तेजी से किले की ओर।’ तोपों के साथ तोपों के चालक भी किले के ओर आ रहे हैं – […]
Continue reading…

 

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा– 2 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद – (2) शुद्धा प्रयोजनवती लक्षणा – जहाँ गुण सादृश्य के अतिरिक्त अन्य किसी सादृश्य से लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाये, वहाँ शुद्धा प्रयोजनवती लक्षणा होती है। सादृश्य सम्बन्ध निम्न प्रकार से हो सकते हैं – (१) सामीप्य सम्बन्ध – ‘अरूण’ शब्द का मुख्यार्थ ‘सूर्य का सारथी’ है किन्तु ‘अरूण’ का लक्ष्यार्थ ‘सूर्य’ ही […]
Continue reading…

 

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 1 – रस अलंकार पिंगल

(१) रूढ़ि लक्षणा – जहाँ किसी शब्द के मुख्यार्थ को छोड़कर उससे सम्बन्धित अन्य अर्थ परस्पर अथवा रूढ़ि द्वारा निश्चित होता है। जैसे – ‘बम्बई फ़ैशनिबल है’, इस पंक्ति में बम्बई नगर अभीष्ट या लक्ष्यार्थ नहीं है, अपितु ‘बम्बई नगर के निवासी’ इसका लक्ष्यार्थ है। बम्बई नगर के निवासियों के लिए ‘बम्बई’ कहना रूढ़ हो […]
Continue reading…