नवभारत टाइम्स मुंबई ने हिन्दी के अपमान करने का जैसे फ़ैसला ले लिया है ?

आज सुबह जैसे ही हिन्दी का अखबार संडे नवभारत टाइम्स ( जो कि रविवारीय नवभारत टाइम्स  होना चाहिये) आया तो पहले पेज के मुख्य समाचारों को देखकर ही हमारा दिमाग खराब हो गया।
आप भी कुछ बानगी देखिये –

१. बातचीत में पॉजिटिव रुख (२६/११ के आरोपियों के वॉइस सैंपल देने की पाक ने भरी हामी)
२. २६/११ का वॉन्टेड जिंबाब्वे से गिरफ़्तार
३. धारावी ने कलप ने की खुदकशी
४. यूएस सक्सेस में इलाहाबादी हाथ

अब बताइये इनका क्या किया जाये, जैसे हिन्दी का अपमान करने की ही ठान रखी है, इस अखबार ने।
क्या हिन्दी को समर्पित लोगों की कमी है, भारत में, या फ़िर नवभारत टाइम्स हिन्दी अखबार को लेकर पाठकों के प्रति प्रतिबद्ध नहीं हैं। ये तो पाठकों के साथ सरासर धोखा है। ऐसी हिन्दी का मैं सरासर विरोध करता हूँ।
अगर कोई मेरी बात को उनके प्रबंधन तक पहुँचाये तो शायद प्रबंधन भी नींद से उठे।

11 thoughts on “नवभारत टाइम्स मुंबई ने हिन्दी के अपमान करने का जैसे फ़ैसला ले लिया है ?

  1. हिन्दी की रोटी खाने वाले इस तरह हिन्दी से ही बलात्कार करते है।

  2. उनकी भी मजबूरी हो शायद..आजकल की नयी पैदावार को यही हिंदी समझ में आती है शायद …
    लेकिन कुछ भी हो ..अफसोसजनक बात है ये ..

  3. अखबार बंद कर दोगे क्या? फिर कौनसा लोगे.. सब तो ऐसे ही आने वाले है.. ये घालमेल तो चलेगा ही.. और ये तो हमारी बोली में भी है.. जब हम हिंदी बोलते है… तो कितने शब्द अंग्रेजी के यूज करते है….. जब शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है तो बातचीत में अंग्रजी के शब्द आते ही है..

    जब व्यवसाय की भाषा अंग्रेजी है.. तो बातचीत में अंग्रेजी आएगी न….

    और वो अखबार ने लिख दिया तो क्या गलत.. .. वो भी तो नए प्रयोगों से अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचना चाहता है…

  4. ye aaj se nahin hai bhaaiji !

    ye tab se dekh raha hoon jab mumbai se aur bhi ek bada dainik nikalta tha

    apko achraj hoga ye jaankar ki ye apmaan hindi ka hindi bhaashi hi kar rahge hain kyonki navbhaarat me zyadatar log hindi bhaashi hi hain ha ha ha

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सरदार के किस्से हमारी जबानी (कृप्या कोई और सरदार बुरा न माने)

अगर सरदार को ९४४९४९४४९४ डायल करना है ..
..

तो वो क्या करेगा …..?

पहले वो डायल करेगा ९४४९४ और फिर रिडायल करेगा ……
……………………
एक सरदार के पिता का देहांत हो गया और वो जोर जोर से रो रहा था

थोड़ी देर बाद वो और जोर जोर से रोने लगा

दोस्त ने उससे पूछा कि "अब क्या हुआ ?"

सरदार बोला : अभी मेरी बहन का फोन आया था किस उसके भी पिताजी नहीं रहे ….
……………………
सरदार – मुझे फ़ोन पर धमकियाँ मिल रही हैं

पुलिस – कौन दे रहा है …?

सरदार – बी एस एन एल वाले, बोलते हैं कि अगर बिल नहीं भरा तो काट देंगे….
…………………….

नासा ने तीन  सरदारों को चाँद पर भेजा, रॉकेट उड़ा मगर आधे रास्ते से वापिस आया …

उनको पुछा गया तो बोले … : आज अमावस है चांद तो होगा ही नहीं ..
……………………
एक बार सरदार जंगल में घूम रहा था तभी उसे एक सांप पेड़ पर लटका हुआ दिखाई दिया ..

..

सरदार उस पेड़ के थोड़ा पास गया और सांप के पास गया और बोला : "ऐसे लटकने से लम्बाई नहीं बढती है, मम्मी को बोलो कि कोम्प्लेंन पिलाए"
……………………..

14 thoughts on “सरदार के किस्से हमारी जबानी (कृप्या कोई और सरदार बुरा न माने)

  1. डायलिंग का यह सिस्ट्म पसन्द आया
    पहले क्यों नहीं बताया

  2. वाह,मज़ा आ गया।अच्छा है भाई लोग है वर्ना चुटकुले बनाने के लिये किसे ढूंढते।

  3. वाह,मज़ा आ गया।अच्छा है भाई लोग है वर्ना चुटकुले बनाने के लिये किसे ढूंढते।

  4. सरदारों के असरदार चुटकुले कई सुने, मगर झूठ नहीं बोल रहा, इनके जैसा कभी नहीं सुना!

  5. हा हा
    विवेक जी ने पहले ही मान लिया है कि मैं तो बुरा नहीं मानूँगा! इसीलिए तो विनती कर दी कि भई कोई और सरदार बुरा न माने!!

    इसी बात पर मुझे फिर शर्म से सिर झुकाती विनिता देशपांडे याद आ गई

    अगले दौर की प्रतीक्षा रहेगी विवेक जी 🙂

    बी एस पाबला

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काश कि हम पतले ही रहते मोटे न होते, और अब ….. हाल बुरा है…. और क्या जबाब दें अपनी इस मोटी चर्बी की बेशर्मी का !!!

पता नहीं कि हम मोटे हैं या स्वस्थ्य, किस श्रेणी में रखे जाते हैं, पर हाँ सभी लोग जिसे भी जब भी मौका लगता है भाषण जरुर पिला डालता है कि भाई बहुत हैल्थी हो गये हो, लगता है कि खाते पीते घर के हो।

हम भी हमारे पुराने दिन याद करते हैं जब कभी हम पतले हुआ करते थे, कभी हमारी कमर का नाप २८-३० इंच का हुआ करता था, और अब ज्यादा नहीं है पर फ़िर भी बताने में शर्म आती है। सोचते हैं कि काश कुछ ४-६ इंच कम हो जाये।

सोचते भी हैं कि रोज खूब चलें, दौड़ें, जिम मॆं जायें, ये करें वो करें, ये न खायें और कुछ ऐसा खायें जिससे किसी तरह से पतला हुआ जा सके पर हे भगवान !!! कुछ नहीं हो रहा है। कुछ भी शुरु करो तो अपने मन के सातों घोड़ों को काबू में रखना मुश्किल होता है, और समय निकालना भी। क्योंकि चर्बी चढ़ाने के लिये समय हमें बहुत मिल जाता है परंतु कम करने के लिये समय निकालना बहुत मुश्किल होता है, दुनिया का सबसे बड़ा सत्य यही है। शायद सभी लोग मेरी बात से सहमत भी होंगे। हम पीना चाहते हैं, जीना चाहते हैं, खाना चाहते हैं, परंतु कैसे मोटे होकर !!!!

सोचते भी हैं शुरु भी करते हैं परंतु कुछ दिन करने के बाद सब वही ढ़ाक के तीन पात, थोड़े दिन सुबह घूमने गये पूरे जोश के साथ फ़िर वो जोश और जुनून उतर गया और आ गये वापिस अपनी वाली पर, फ़िर जिम जाना शुरु किया फ़िर वो भी बंद कर दिया, अब ये हालत है कि कोई पूछता है कि भई नया क्या शुरु किया है, तो अपनी बगलें झाँकने लगते हैं। अब तो हम यही बोलने लगे हैं हाँ सुबह ५-७ किलोमीटर घूम लेते है और दौड़ भी लेते हैं, उठने के पहले। 🙂

अब और क्या जबाब दें अपनी इस मोटी चर्बी की बेशर्मी का। शायद मोटे लोग ओह !!!! माफ़ कीजियेगा हैल्थी लोग ही कुछ नया नुस्खा बताकर मेरी मदद करेंगे और अपनी भी।

19 thoughts on “काश कि हम पतले ही रहते मोटे न होते, और अब ….. हाल बुरा है…. और क्या जबाब दें अपनी इस मोटी चर्बी की बेशर्मी का !!!

  1. मोटे लोग नुस्खा बता कर आपकी मदद करेंगे यह कैसे सोच लिया आपने । नुस्खा पूछना है तो हम जैसो से पूछें जो कभी मोटे हुए ही नहीं ,यानि मोटे होने से कैसे बचे रहे । मगर इसके लिये फीस लगेगी भैया .. वह क्या होगी यह तो अभी नहीं बतायेंगे ।

  2. @शरद भाई,

    जल्दी से नुस्खा बता दीजिये, फ़ीस के रुप में रोज एक चिट्ठा लिखते रहेंगे। 🙂

  3. जबतक काम करने में फुर्ती बनी रहेगी तो मोटे और पतले में अधिक फर्क नहीं .. इसपर बहुत चिंतित होने की जरूरत भी नहीं .. पर जब अपने शरीर की वजह से काम करने में कठिनाई आ जाए .. मोटापे को कम करने के उपाय सोंचने पडेंगे।

  4. मोटे हैं या पतले इसको जानने का तो फार्मूला है .वजन और हाइट बताइये

    फीस में टिप्पणी का चलन है आप पोस्ट पकड़ा रहे हैं 🙂

  5. सर्दियों में मोटापा वैसे भी बढ़ जाता है…. मैं खुद परेशां हूँ…. आजकल बहुत वेट गेन हो गया है…. मौसम के साथ वेट भी कम होता है…. वैसे हल्का फैट होना चाहिए….

  6. @संगीता जी – बिल्कुल सत्य है, परंतु कितनी भी फ़ुर्ती हो पर मोटापे के कारण कहीं न कहीं तो मात खा ही जाते हैं। इसलिये ये सब सोचना पड़ा।

    @महेश जी – फ़ीस में हम टिप्पणी का वादा नहीं कर सकते थे पर जो हम कर सकते थे वह हमने किया, याने कि रोज एक चिट्ठे का वादा।

  7. @महफ़ूज भाई,

    अपना वजन तो मौसम के साथ बड़ता जाता है पर मौसम बदलने पर कम होने का नाम नहीं लेता है। अपनी आलस और मन के बहकने के कारण इस मामले को सीरियस होते हुए भी सीरियसली नहीं ले पाते हैं।

  8. अपने कमरे में दुनिया के ऐसे मोटे लोंगो की फोटो चिपकाइए जो आपसे दो गुना हों। आप को ऐसे करोंडो लोग मिलेगें जो आपसे बढ़ कर होंगे। उन्हें देख कर सुखी रहिए। और बेखुदी में रहिए।
    इस सलाह की कोई फीस नहीं है।

  9. @ महफूज भाई

    इसी इन्तजार में न जाने कितनी ठंड बीत गई कि इसके बाद ठीक हो जायेगा. 🙂

    तब परमानेन्ट ठंडी जगह ही आकर बस गये कि न गर्मी आयेगी, न कोई उम्मीद रहेगी. 🙂

    कम करने के लिये समय निकालना बहुत मुश्किल होता है, दुनिया का सबसे बड़ा सत्य यही है।

    -कितना सच बोलते हो विवेक भाई..

  10. इतने से मोटापे से परेशान है आप . यहा तो १६० किलो अफ़ोर्ड कर रहे है . मुझसे प्रेरणा ले . आज तक जो कुछ बडा कभी घटा है क्या . वह चाहे मोटापा हो या महंगाई

  11. @ धीरु सिंह जी,

    सही कह रहे हैं, अपने अपने अफ़ोर्डेबिलिटी होती है, कि कौन कितना अफ़ोर्ड कर सकता है, महँगाई का पता नहीं परंतु हाँ अगर मेहनत की जाये तो मोटापा तो कम हो सकता है।

    ये मेरा मानना है हालांकि इस तथ्य को परखना बाकी है।

  12. अरे भाई खुब सारा कर्जा ले लो, फ़िर सब जुये मै हार जाओ… जब पेसे बचेगे ही नही तो कर्जा केसे चुकता करोगे, बस फ़िकर मै अपने आप पतले हो जाओ गे 🙂
    लेकिन ऎसा मत करना यह तो हुया मजाक, मेने अपना वजन कम किया है, शाम का खाना शाम ६ बजे से पहले खाये, तली हुयी चीजे महीने मै एक आध बार खाये,खाना कम खाये शुरु शुरु मै थोडी तकलीफ़ होगी फ़िर आदत बन जायेगी, खाने की जगह फ़ल खाये

  13. अरे भाई, मोटा होने के भी कई फायदे हैं।
    एक तो मोटे aadmi को ठण्ड कम लगती है।
    दूसरे कोई आपकी कुर्सी शेयर करने की सोचेगा भी नहीं।
    चोर को पकड़ कर ऊपर बैठ जाओ, चोर की चीं निकल जाएगी।

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३९ [यज्ञ के लिए गुरु द्रोणाचार्य की एक विचित्र प्रथा और मेरा बाघ को लाने का प्रण.. ]

    प्रत्येक वर्ष के अन्त में युद्धशाला में एक विशाल यज्ञ हुआ करता था। उस यज्ञ के लिए गुरु द्रोणाचार्य ने एक विचित्र प्रथा चला रखी थी। युद्धशाला के प्रत्येक शिष्य को यज्ञ में बलो देने के लिए एक-एक जीवित प्राणी अरण्य से पकड़कर लाकर अर्पण करना पड़ता था। किसी ने उनसे उस प्रथा के सम्बन्ध में पूछा था। उसका उत्तर देते हुए उन्होंने कहा था कि इससे विद्यार्थी स्वावलम्बी और साहसी बनता है।

   एक बार वार्षिक यज्ञ के समय एक अविस्मरणीय घटना घटी। हम सभी लोग जीवित प्राणी लाने के लिए राजनगर से अरण्य की ओर चले। अरण्य प्रारम्भ होते ही सभी लोग भिन्न-भिन्न दिशाओं में फ़ैल गये। मैंने पूर्व दिशा को पकड़ा। चलते-चलते मन में विचार आया कि इससे पहले हरिण, साँभर, वन्य शूकर आदि प्राणी मैं अर्पण कर चुका हूँ। इस वर्ष इनसे बलवान कोई प्राणी मुझको अर्पण करना चाहिए। इनसे अधिक बलवान प्राणी कौन-सा है ? हाथी ? छि:, लकड़ियाँ तोड़नेवाला भारी-भरकम और कुडौल प्राणी है वह तो ! अश्व ? नहीं जी, अश्व को पड़ा तो जा सकेगा। फ़िर कौन-सा प्राणी ? चित्रमृग, वृक, तरस ? छि: सबसे अधिक सामर्थ्यवान प्राणी कौन-सा है? बाघ ! बस, इस वर्ष में बाघ ही अर्पण करुँगा। उसके लिए घोर अरण्य में जाना पड़ेगा। कोई चिन्ता नहीं। अवश्य जाऊँगा। सीमा पार करते हुए ही मैंने निश्चय किया।

    लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ, चौकन्नी दृष्टि से चारों ओर देखता हुआ मैं आगे बढ़ने लगा। दिन-भर घनघोर अरण्य में भटका। अनेक प्राणी मिले, प्रन्तु बाघ दिखाई ही नहीं दिया। दिन-भर भटकने के कारण प्यास बड़ी जोर की लग रही थी। सन्ध्या घिरती जा रही थी। विहग नीड़ों की ओर लौट रहे थे। मुँह का पसीना पोंछता हुआ मैं बहुदा नदी के किनारे पर आया। वहाँ खड़े होकर मैंने सूर्यदेव को वन्दन किया और मन ही मन कहा, “आज आपके शिष्य का संकल्प व्यर्थ हो रहा है।“

    एक काले पत्थर पर बैठकर मैंने अंजलि में पानी लिया। उस पानी को मुँह से लगाने ही जा रहा था कि एक प्रचण्ड भारी-भरकम पशु पीछे से मेरे ऊपर आ गिरा। मेरा सन्तुलन बिगड़ गया और मैं आगे बहुदा नदी के पानी में गिर पड़ा। मेरे साथ ही वह पशु भी पानी में आ गिरा। बहुदा का जल खबीला हो गया। मैंने उस पशु की ओर देखा। श्वेत और काले धब्बोंवाला वह एक चीता था। सन्ध्या होने के कारण वह पानी पीने के लिए घाट पर आया था। उसका मुख कुम्हड़ा-जैसा गोलमटोल था। उसकी आँखें गुंजा की तरह लाल थीं।

    मेरी आँखें आनन्द से चमकने लगीं। मैं पानी में हूँ, मेरे वस्त्र भीग गये हैं – इन बातों का मुझको बिलकुल भान नहीं रहा। मुझको मारने के लिए उसने अपना पंजा उठाया, उसे मैंने अपने हाथ से ऊपर का ऊपर ही पकड़ लिया और उसको खींचता हुआ एकदम पानी के बाहर ले आया। परन्तु पानी के बाहर आते ही चीते की और अधिक आवेश आ गया। मेरे हाथ से झटका देकर उसने अपना पंजा छुड़ा लिया। जल के स्पर्श से तथा मेरे विरोध से वह बौखला गया था। उसकी क्रुद्ध आँखों से आग बरसने लगी। जोर-जोर से गर्जना करता हुआ वह बार-बार मुझपर भयानक आक्रमण करने लगा। कभी-कभी वह पाँच-छह हाथ ऊँची छलाँग लगाता। उसकी रक्तवर्ण जीभ मेरा रक्त पीने के लिए निरन्तर लपलपाने लगी। जबड़ा फ़ाड़कर वह मेरे ऊपर झपटा। मैं उसके आक्रमणों का प्रत्युत्तर देने लगा। आधी घड़ी तक मैं अपनी रक्षा करने का प्रयत्न करता रहा। लेकिन मैं उसको रोक नहीं पा रहा था। मैंने अपनी देह की ओर देखा। उस क्रूर वन्य पशु ने सैकड़ों बार झपट्टे मारे होंगे, परंतु फ़िर भी उसके तीक्ष्ण दाँतों की अथवा नाखूनों की जरा-सी नोंक भी मेरी देह में घुसी नहीं थी। मेरी त्वचा अभेद्य है। यह अकेला ही क्या, ऐसे दस चीते मुझको नींद में भी नहीं खा सकते। विद्युत की एक तरंग-सी मेरी देह में सनसनाती चली गयी। क्षण-भर में ही मेरा शरीर रथ की तप्त हाल की तरह जलने लगा। मेरी सम्पूर्ण त्वचा अभेद्य है – केवल इस प्रतीति मात्र से ही मेरा शरीर अंगारे की तरह फ़ूल उठा। अकस्मात मैंने उस क्रूर पशु के मुँह पर कसकर तमाचा मारा।

5 thoughts on “सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३९ [यज्ञ के लिए गुरु द्रोणाचार्य की एक विचित्र प्रथा और मेरा बाघ को लाने का प्रण.. ]

  1. बहुत हिम्मत वाला था कर्ण जो एक चीते से डरना तो दुर उसे बिना हथियार पकडना चाहाता था.
    बहुत सुंदर. धन्यवाद इस अच्छी जानकारी के लिये

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लगभग १० साल बाद वापिस से कविता लिखी है, “इंतजार है उस दिन का”… इंतजार है आपकी प्रतिक्रियाओं का

इंतजार है उस दिन का

जब तुम अपनी बाँहों मॆं

भरकर मुझे गर्मजोशी से

प्यार से दिल से मन से

मुझे अलसुबह उनींदे बिस्तर से

उठाओगी, और हल्के से कहोगी

प्रिये सुप्रभात, तुम्हारे लिये

मैंने नई दुनिया गढ़ी है

वो तुम्हारा इंतजार कर रही है…

16 thoughts on “लगभग १० साल बाद वापिस से कविता लिखी है, “इंतजार है उस दिन का”… इंतजार है आपकी प्रतिक्रियाओं का

  1. प्रिये सुप्रभात!! कुछ झुनझुनी लगी… 🙂

    काश, कोई कहने वाला मिले कि लगे!!

  2. चालिसे या उसके आस पास एक बार व्यक्ति फिर रोमानी होता है ।
    अबकी रची गई कविताएँ अलग सी तासीर लिए होती हैं – अब आप की अवस्था तो मुझे नहीं मालूम लेकिन कुछ ऐसा ही लगा।
    सरल जाना पहचाना तरीका पर प्रभाव नई दुरुस्ती लिए हुए।
    आभार।

  3. गिरिजेश जी का अनुभव सत्य है, अब हम भी इंतजार कर रहे है कि जबके किताबों मे दबे हुए फ़ूल एक बार फ़िर सुरभित हो जाए,
    एक बार वो फ़िर से दबे पांव चले आएं, और मुस्कुराकर कहें "आज श्रीमान जी टुर पर हैं"-हा हा हा
    विवेक जी बहुत बढिया-आज सुबह से हमारा भी मुड कुछ ऐसा ही है।

  4. मैंने नई दुनिया गढ़ी है

    वो तुम्हारा इंतजार कर रही है…

    बहुत ही सुंदर पंक्तियाँ….

    दस साल बाद वापसी के लिए बहुत बहुत बधाई…

    पर इतना लम्बा अंतराल क्यूँ? कुछ ख़ास…….?

  5. प्रिये सुप्रभात, तुम्हारे लिये

    मैंने नई दुनिया गढ़ी है

    प्रेम की सार्थकता तो सृजन में ही है..और ये व्यक्त हो गयी उस रोमानी सुबह में ..!

    देखो; आज कल्पतरु में एक नन्हा फूल आया है…!!!

  6. विवेक भाई मुझे कविता की बहुत ज्यादा समझ है नही और फ़िर रोमांटिक मूड की कविता पर मैं बजरंगबली भक़्त कहूं भी तो क्या?वैसे गिरिजेश कुछ कह रहे हैं।दस साल बाद ही सही कविता लिखने का सिलसिला शुरू हुआ तो सही और कविता मेरे खयाल से दिल के बहुत ज्यादा करीब होती है इसे सिर्फ़ लिखने की फ़ार्मेलिटी के नाम पर नही लिखा जा सकता।चलिये बधाई आपको,बहुत सुन्दर रचना है ये,समीर जी टाईप मुझे भी थोड़ी सी झुनझुनी लगी।हा हा हा हा हा।

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ९

       जो कुछ हुआ था, उसका पूरा हाल शाम को शोण ने मुझे सुनाया कि उस वृषभ ने मुझको परास्त करने का बहुत प्रयास किये थे, लेकिन मेरे आगे उसकी एक न चली। लगभग दो घण्टों तक वह उछल-उछलकर अपने सिर को झटकता रहा था। उसने अपने शरीर को बहुत-से विचित्र झटके दिये। बीच-बीच में वह जोर से कूदता, पैरों के खुरों से जमीन कुरेदता; लेकिन अन्त में वह थक गया और चुपचाप खड़ा हो गया। उसके मुँह से झाग निकलने लगा। वह लगातार ’फ़ूँ-फ़ँ’ कर रहा था। इतने में शोण भागते हुए गया और पिताजी को बुला लाया। उन्होंने ही उसके नाथ डाली, लेकिन मेरे हाथों की पकड़ छुड़ाते समय उन्हें बहुत ही परेशानी हुई। सुनते हैं कि मेरी देह के हाथ लगाते ही ऐसी जलन होती थी, जैसे कि आग को छू लिया हो।

      मैं विचारम्ग्न हो गया। दो घंटे तक एक जंगली पशु से जूझते रहने पर भी मेरे शरीर पर कोई खरोंच तक नहीं आयी। क्यों ? मेरा शरीर इतना कैसे तप्त हो गया कि छूते ही छाला पड़ जाता था ?

     मैंने उत्सुकतावश शोण से पूछा, “शोण, खेलते समय कभी तुझे चोट लगी है क्या ?”

वह बोला, “अनेक बार”।

      शोण को चोट लगती है। उसकी देह से रक्त बहता है। तो फ़िर मेरी देह से भी वह बहना ही चाहिए। मैं झटपट उठा और सीधा पर्णकुटी में गया। वहाँ अनेक धनुष-बाण पंक्ति-बद्ध रखे हुए थे। सर्र से उनमें से एक बाण मैंने खींच लिया । निश्चय कर हाथ से उस बाण को मैंने सिर से ऊँचा उठाया कि अब उसकी तीक्ष्ण नोक ठीक पैर के पंजे पर आयेगी, और उस बाण को हाथ से छोड़ दिया। अब वह कच से मेरे पैर में घुस जायेगा, यह सोच सिहरकर मैंने तत्क्षण आँखें मीच लीं। बाण पैर पर पड़ा, लेकिन मुझको केवल इतना ही लगा जैसे कि घास की सींक-सी चुभ गयी हो ! बाण की नोक मेरे पैर की खाल में घुसी नहीं थी। मुझे लगा कि मैंने बाण छोड़ने में ही भूल कर दी है, इसलिये बार-बार मैंने वो बाण अपने पैरों पर गिराया। लेकिन एक बार भी उसकी नोक मेरे पैर की त्वचा में नहीं घुस पायी। मैंने गौर से अपने पैर की ओर देखा। वहाँ छोटा सा घाव तक नहीं हुआ था।

        उत्सुकता और संदेह का राक्षस मेरे सामने अनेक प्रश्नों की लटें बिखारकर नाचने लगा। मैं अपने हाथ में लगे बाण को नोक को विक्षिप्त की तरह जंघा में, बाँहों में, छाती में, पेट में – जहाँ जगह मिली वहीं पूरी शक्ति से घुसाने का प्रयत्न करने लगा। लेकिन कहीं भी वह शरीर के भीतर तिल-भर भी नहीं घुस सका। क्यों नहीं घुस सका वह ? क्या मेरे शरीर की त्वचा अभेद्य है ? मन के आकाश में सन्देह की एक बिजली इस ओर से उस छोर तक चमक गयी। हाँ ! निश्चय ही मेरी सम्पूर्ण देह पर किसी से भी न टूट सकनेवाला अभेद्य कवच होना चाहिये। अभेद्य कवच ! वाह, दौड़ते हुए रथ में से भी यदि मैं कूद पड़ूँ तो मुझको कभी चोट नहीं लगेगी ! पत्थर, कंकड़ या किसी शस्त्र से भी मैं कभी घायल नहीं हो सकूँगा। घायल नहीं हो सकूँगा मतलब – मैं कभी मरुँगा नहीं। कभी नहीं मरुँगा। मेरी यह सुवर्ण रंगी त्वचा सदैव इसी तरह चमकती रहेगी। मैं अमर रहूँगा। मुझे कवच मिला है, मेरे कानों मे जगमगाते हुए कुण्डल हैं। अकेले मुझे ही क्यों मिले हैं ? मैं कौन हूँ ?

      सन्देह की टिटहरी मेरे मन के आकाश में कर्कश स्वर में किकियाने लगी। ऐसा प्रतीत होने लगा कि मैं इन सबसे अलग कोई हूँ, इनमें और मुझमें बहुत बड़ा अन्तर है। लेकिन इन विचारों से स्वयं मुझको बहुत दुख होने लगा । जिस राधामाता का मैंने दूध पिया था, जिसके रक्त-मांस का उत्तराधिकार पाकर मैं बड़ा हुआ था, जिसने मेरे लिए कठिन परिश्रम के पर्वत को धारण किया, उसके प्रेम से – उपर्युक्त विचारों द्वारा क्या मैं कृतघ्न नहीं हो रहा था ? मेरा मन विद्रोह कर उठा और कठोर शब्दों में मुझको चेतावनी देने लगा, “मैं कौन हूँ ? मैं कौन हूँ ? – यह पागलों की तरह मत चिल्ला ! ध्यान रख कि तू तात अधिरथ और राधामाता का पुत्र है ! सूतपुत्र कर्ण है ! शोण का बड़ा भाई कर्ण है ! सारथियों के कुल का एक सारथी है ! एक सारथी !”

7 thoughts on “सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ९

  1. यहाँ पर कर्ण का अन्तरद्वन्द चरम पर है, ओर सोचने को मजबूर है कि मैं बाकी दुनिया से अलग क्यों हूँ ।

  2. नहीं जानता क्यों पर कर्ण क्यों इतने लोगो के प्रिय है ?मेरे भी ……विवेक जी आज से कई साल पहले इसी कलह के मोर्डन अवतार पे श्याम बेनेगल ने शशि कपूर के लिए एक फिल्म बनायीं थी "कलयुग ".जिसमे शशि कपूर ने कर्ण का रोल किया था .देखिएगा …

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – २९

दिनकरहयस्पर्धिन: – (सूर्य के घोड़ों से प्रतिस्पर्धा करने वाले) अलकापुरी के घोड़े पत्तों के समान हरे वर्ण वाले हैं। क्योंकि सूर्य के घोड़े भी हरे वर्ण के माने जाते हैं, अत: अलकापुरी के घोड़े रंग में भी तथा वेग में भी सूर्य के घोड़ों से स्पर्धा करते हैं।

प्रत्यदिष्टाभरणरुचय: – आभूषणों की अभिलाषा छोड़े हुए । वीर योद्धाओं का आभूषण शक्तिशाली शत्रु के प्रहार से हुए घाव के निशान होते हैं, स्वर्ण आदि के आभूषण नहीं। अलका के योद्धा रावण की तलवार
के प्रहार सह चुके हैं, इसलिए उनकी आभूषणों की इच्छा समाप्त हो गयी है। पौराणिक आख्यान के अनुसार कुबेर विश्रवा का इडविडा से उत्पन्न पुत्र था। इस तरह वह रावण का अनुज था। कहा जाता है कि एक बार रावण ने कुबेर पर आक्रमण करके उसका पुष्पक विमान तथा कोष छीन लिया था, अत: उस युद्ध में अलकापुरी के योद्धा रावण की तलवार के प्रहार सह चुके थे।

चन्द्रहास – चन्द्रहास रावण की तलवार का नाम था, क्योंकि वह तलवार चन्द्र का उपहास करती थी अर्थात चन्द्र से अधिक चमकने वाली थी, इसलिए उसे चन्द्राहास कहते थे।

भयात़् – शिव पुराण की एक कथा के अनुसार भगवान शिव ने कामदेव को अपने तृतीय नेत्र से भस्म कर दिया था। तभी से उसे अनड़्ग: कहते है और वह भगवान शिव से भयभीत रहता है तथा उनके समक्ष अपने धनुष आदि को धारण नहीं करता। इसलिए अलका में शिव की उपस्थिती से उसे भस्म होने का निरन्तर भय बना रहता है।

वापी – बावड़ी, जिसमें उतरने के लिए सीढ़ियाँ बनी हों । काव्यों में धनिकों के गृहों में एवं राजभवनों में इस प्रकार की वापी का प्राय: उल्लेख मिलता है।

इन्द्रनीलै: – यह नीले रंग का एक बहुमूल्य पत्थर होता है। इसे नीलम भी कहते हैं।

3 thoughts on “कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – २९

  1. वापी – ऐसा शब्द जो अब तक व्यव्हृत और परिचित रहा है । यद्यपि अब इसका व्यवहार कम हो गया है ।
    जानकारी का आभार ।

  2. बहुत सुंदर जानकारी दी,
    धन्यवाद.आप ओर आप के परिवार को दुर्गा पूजा व विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं

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ऑनलाईन मूवी टिकिट करने के लिये कुछ वेबसाईट्स

movieये कुछ वेबसाईट्स हैं जिससे आप सीधे ऑनलाईन टिकिट बुक करवा सकते हैं और अच्छे अच्छे ऑफ़र्स का लाभ भी उठा सकते हैं।

क्याजुँगा –  KyaZoonga.com    

फ़नसिनेमा -  FunCinemas.com

एडलेबसिनेमा -  AdlabsCinemas.com

बुकमायशो -  BookMyShow.com

इटझसिनेमा -  ITZcinema.com

आइनोक्स मूवी – InoxMovies.com

पीवीआर सिनेमा -  PVRcinemas.com

इसिमूवीइंडिया -  EasymoviesIndia.com

फ़ेमसिनेमा – Famecinemas.com

सत्यमसिनेप्लेक्स -  Satyamcineplexes.com

दसिनेमा -  TheCinema.in

तो भूल जाइये वो लंबी लाईनें और खरीदिये ऑनलाईन टिकिट अपने घर या दफ़्तर से ही, साथ ही टेन्शन भी खत्म कि टिकिट मिलेगी या नहीं, पिक्चर देख पायेंगे या नहीं।

3 thoughts on “ऑनलाईन मूवी टिकिट करने के लिये कुछ वेबसाईट्स

  1. विवेक जी जानकारी तो बहुत बडिया है मगर हमारे शहर मे एक सिनेमा घर था वो भी आजकल बन्द पडा है संभाल कर रख ली ये जानकारी कभी खुला तो देख लेगे आभार्

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झमाझम बरसात मुंबई में और आखिरी जलप्रदाय नलों के द्वारा उज्जैन में।

अभी तीन-चार दिनों से मुंबई में झमाझम बरसात हो रही है और कल से ज्यादा झमाझम बरसात हो रही है तो इसके कारण ट्रैफ़िक का बुरा हाल है, जगह जगह पानी भरा हुआ है सड़क पर भी और रेल्वे ट्रेक पर भी। चलो मन को तसल्ली हुई कि इस साल का मानसून आखिरकार आ ही गया।

आज सुबह ही उज्जैन अपने घर पर बात हुई, आज मेरे माताजी पिताजी की शादी की ३५ वीं सालगिरह है तो पहले तो हमने उन्हें शुभकामनाएँ दी फ़िर वो बोले कि १ घंटे बाद बात करेंगे क्योंकि आज आखिरी बार नल से जलप्रदाय हो रहा है। नगरनिगम ने कहा है कि पानी खत्म हो गया है और अब केवल टेंकरों के द्वारा जलप्रदाय किया जायेगा। महाकाल की नगरी में जल की भीषण त्रासदी है और यह केवल इस वर्ष नहीं है यह लगभग पिछले ६-७ वर्षों से है।

पानी की समस्या से निपटने के लिये कुछ उपाय भी किये गये हैं और नागरिक जागरुक भी हो गये हैं। सरकार ने ट्य़ूबवेल खोदने पर रोक हटा ली और कहा कि कालोनी के १५-२० घरों के समूह बनाकर आप अपना एक ट्यूबवेल खुदवा लीजिये और पानी को आपस में उपयोग में ले लीजिये, इस तरह पानी की समस्या से कुछ हद तक छुटकारा तो मिला क्योंकि सबके निजी जलस्त्रोत सूख चुके थे या सूखने की कगार पर थे। लेकिन इन सबके पीछे एक गंभीर बात ओर है कि जलस्तर इतना नीचा जा चुका है उसे वापिस अपने पुराने स्तर पर आने में कितना समय लगेगा कह नहीं सकते। अभी जो ट्यूबवेल खुदा था उसमें जल आया लगभग ९६२ ft. पर। सबने वाटर हारवेस्टिंग अपने घर पर स्थापित करवा लिया है जिससे जलस्तर में सुधार आये। उज्जैन में भी पिछले तीने दिनों से रात को आधे घंटे बरसात हो रही है, महाकाल से विनती है कि इस बार सिंहस्थ जैसा पानी बरसा दें।

हम तो बचपन से ही इस समस्या से निपटते रहे हैं इसलिये हमारी आदत में शामिल हो गया है, कम पानी खर्च करना।

11 thoughts on “झमाझम बरसात मुंबई में और आखिरी जलप्रदाय नलों के द्वारा उज्जैन में।

  1. आपके माताजी एवं पिताजी को विवाह की सालगिरह पर बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं .. हमलोग भी मानसून का इंतजार ही कर रहे हें।

  2. आपके माताजी एवं पिताजी को विवाह की सालगिरह पर बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं .

    महाकाल जरुर उज्जैनवासियों की सुनेंगे।

  3. जी हम भोपाल से बोल रहे हैं. उज्जैन का तो हमें पता है. भोपाल में इतना संकट कभी नहीं आया था. दो दिन से यहाँ भी एक एक घंटे बारिश हो रही है जिससे गर्मी कुछ कम हो गयी. प्रसन्नता है की मुंबई में मानसून आ गया. क्योंकि उसके बाद ही यहाँ आता है. आश्चर्य की बात है की कल खंडवा में मानसून पहुँच गया. रविवार शाम तक भोपाल में भी पहुँचने की उम्मीद है.

  4. सब से पहले तो आपके माताजी एवं पिताजी को उन के विवाह की सालगिरह पर बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं .
    पहले तो हम तरसते है कि बरसात नही होती, ओर जब होती है तो हम सए समभलती नही, सरकार हर बार शोर तो मचाती है हम ने यह किया वो किया… लेकिन करती कुछ नही, आओ हम सब अपने अपने हिस्से की बरसात के पानी को जमा करे, ताकि वो हमारे ओर इस धरती के काम आये,
    अपने आंगन मै जमीन के नीचे बडे बडॆ टेंक बना सकते है, उपर से ठके हुये, एक बार तो खर्च होगा, लेकिन कितना पानी जमा हो जायेगा,तलाब बनाये, अगर पहले से है तो बरसात आने से पहले उन्हे गहरा करवाये, पेसा सब मिल कर लगाये, इन तलाबो के किनारो पर सुंदर घास ओर पेड लगवाये, ओर भी बहुत से ढंग है पानी जमा करने के.

  5. आपके माताजी एवं पिताजी को उन के विवाह की सालगिरह पर हार्दिक बधाईं और शुभकामनाएं . अब महान काल की नगरी मे पानी का ये हाल है तो औरों का क्या होगा?

    रामराम.

  6. कम बारिश का कष्ट हमसे ज्यादा कौन जानेगा, टैंकरों से पानी देने का प्रशासन का दावा मात्र एक छलावा भर है… प्रायवेट टैंकर 400 से 500 रुपये वसूल रहे हैं एक टैंकर के। जबकि अधिकारी-पार्षद मिलकर योजनायें बना रहे हैं कि कैसे पैसा खाया जा सकता है… उज्जैन पर महाकाल की कृपा तो रहती है, लेकिन उसके नकली भक्तों से कौन निपटेगा?

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कम्प्य़ूटर के मुफ़्त सुरक्षा उपकरण – भाग ३ (Free Tools for PC Security – Part ३)

५. विनपेट्रोल (Winpetrol) – विनपेट्रोल मजबूत सुरक्षा की निगरानी कर हाइजेकिंग से, मैलवेयर हमलों, और आपके सिस्टम में आपकी अनुमति के बिना परिवर्तनों के लिए बनाया है। पारंपरिक सुरक्षा कार्यक्रम (Anti-viruses), हार्ड ड्राइव स्कैन एवं कुछ थ्रेट्स को ही खोजते हैं। विनपेट्रोल अनुमान से पता लगाता है कहीं आपके सिस्टम पर आपके अनुमति के बिना महत्वपूर्ण संसाधनों का स्नैपशॉट लेकर हमला और सुरक्षा का उल्लंघन करने की कोशिश तो नहीं की जा रही है और अगर ऐसा है तो विनपेट्रोल आपको चेतावनी दे देगा ।

६. सीकुनिया (Secunia) निजी सॉफ्टवेयर इंस्पेक्टर (SPI) – हम में से अधिकांश ने हमारे सिस्टम में कम से कम एक असुरक्षित प्रोग्राम तो अवश्य स्थापित किया हुआ है जो हमारे सिस्टम को खतरे में डालता है। सीकुनिया (Secunia) निजी सॉफ्टवेयर इंस्पेक्टर (SPI) असुरक्षित कार्यक्रम के लिए आपके पीसी को स्कैन करता है। यह आपके स्थापित प्रोग्राम के लिए आपको अद्यतन (updates) और पैच(patches) की सूचना भी रखता है.

ज्यादा जानकारी के लिये पढ़ें –
कम्प्य़ूटर के मुफ़्त सुरक्षा उपकरण – भाग १ (Free Tools for PC Security – Part १)कम्प्य़ूटर के मुफ़्त सुरक्षा उपकरण – भाग २ (Free Tools for PC Security – Part २)

5 thoughts on “कम्प्य़ूटर के मुफ़्त सुरक्षा उपकरण – भाग ३ (Free Tools for PC Security – Part ३)

  1. जानकारी काम आने वाली है । कई बार इस प्रकार के सोफ्टवेयर झूट मूठ की वार्निँग भी देने लग जाते है । यह भी एक सिरदर्दी वाला काम है ।

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शेयर बाजार और आम निवेशक

शेयर मार्केट के उतार चढाव जारी हैं और अब तो साफतौर पर यह देखा जा सकता है कि विदेशी संस्थागत निवेशकों के हाथ की कठ्पुतली हो चुका है हमारे भारत का शेयर बाजार। अब सुबह टी.वी. पर विदेशी बाजारों के हाल देखकर ही यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि आज बाजार का क्या हाल होने वाला है। टी.वी. चैनल जिस भी शेयर की टिप देते हैं, अब तो ऐसा लगने लगा है कि उन्हें उस कंपनी से टिप मिलती है। कुछ चैनल तो नामी गिरामी हैं पर लगातार आप उनकी खबरों को देखकर अंदाजा लगा सकते हैं, और तो और एक चैनल ने तो अपने जालघर को ही पैसा कमाने का जरिया बना लिया है। सरकार को इन पर त्वरित कार्यवाही करनी चाहिये न कि बेवजह ब्लॉगरों पर। उनके विश्लेषक भी गुमराह करने की कोशिश ही करते हैं पता नहीं कब हमारा शेयर बाजार वापस पटरी पर आ पायेगा।

3 thoughts on “शेयर बाजार और आम निवेशक

  1. विवेक,

    अखबार, मैगजीन, टीवी चैनल इन का काम कभी हुआ करता था समाचार, मनोरंजन इत्यादि। आज के समय में यह केवल व्यापार है व बस। इसलिए मीडिया के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह लोग समाचार दे रहे हैं बस कुछ परोस रहे हैं क्यों कि इस कुछ परोसने के साथ विज्ञापन भी परोसे जा सकते हैं। इसे बुरा तो नहीं समझूंगा। पर याद रखना चाहिए कि मीडिया की सलाह पर निवेश किया तो ज्यादा कुछ नहीं हासिल होने वाला।

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