ब्लॉगिंग में ५ वर्ष पूरे अब आगे… कुछ यादें…कुछ बातें… विवेक रस्तोगी

    आज से ठीक ५ साल पहले  मैंने अपना ब्लॉग बनाया था और आज ही के दिन पहली पोस्ट दोपहर २.२२ पर “छाप”  प्रकाशित की थी, हालांकि उस पर एक भी टिप्पणी नहीं आयी, फ़िर एक माह बाद जुलाई में एक और पोस्ट लिखी “नया चिठ्ठाकार” जिस पर आये ४ टिप्पणी, जिनमें देबाशीष और अनूप शुक्ला जी प्रमुख थे, एक स्पाम टिप्पणी भी थी, वह आज तक वहीं है क्योंकि उस समय हमें स्पाम क्या होता है पता नहीं था 🙂

   फ़िर नारद, अक्षरग्राम शुरु हुए, शायद आज के नये हिन्दी ब्लॉगरों ने जीतू भाई की पुरानी पोस्टें नहीं पढ़ी होंगी अगर पढ़ेंगे तो आज भी तब तक हँसेंगे कि पेट में बल ने पढ़ जायें, छोटी छोटी बातों को इतने रसीले और चुटीले तरीके से लिखा है कि बस !!

    उस समय के कुछ चिठ्ठाकारों में कुछ नाम ओर याद हैं, ईस्वामी, मिर्चीसेठ, रमन कौल, संजय बेंगाणी, उड़नतश्तरी, अनुनाद सिंह, उनमुक्त, रवि रतलामी। और भी बहुत सारे नाम होंगे जो मुझे याद नहीं हैं, पर लगभग सभी का सहयोग रहा है इस सफ़र में और मार्गदर्शन भी मिला।

    अभी तक कुल ५३५ पोस्टें लिख चुके हैं, हालांकि पोस्टों की रफ़्तार पिछले वर्ष से बढ़ी है, और उम्मीद है कि आगे भी कुछ सार्थक ही लिख पायेंगे।

    मैंने अपने लिये जो विषय चुने हैं, वे हैं वित्तीय उत्पाद पर लेखन, वित्तीय प्रबंधन पर लेखन, बीमा क्षैत्र पर लेखन जिन विषयों पर उनके विशेषज्ञों को भी लिखने में संकोच होता है वह भी हिन्दी में, तो मैंने एक छोटी सी कोशिश शुरु की है, इसमें मेरी सराहना की है कमल शर्मा जी ने, मेरे लेखों को मोलतोल.इन के खास फ़ीचर में स्थान देकर।

    इस ५ वर्ष के सफ़र में तकनीक और ब्लॉगरों को बदलते देखा है, पहले जब २००५ में मैंने हिन्दी चिठ्ठाकारी शुरु की थी, मुझे थोड़ा सा याद है कि मैं शायद ८० वाँ हिन्दी ब्लॉगर था, वो भी इसलिये कि उस समय शुरुआती दौर में माइक्रोसॉफ़्ट ने शुरुआती १०० हिन्दी ब्लॉगरों की एक सूची अपने अंतर्जाल पर लगायी थी, अब वह लिंक मेरे पास नहीं है, गुम गया है अगर किसी के पास हो तो जरुर बताइयेगा। मुझे अच्छा लगता था कि अब अंतर्जाल पर हिन्दी भी शुरु हो चुकी है और जल्दी ही अपना पराक्रम दिखायेगी, हमारे भारत के लोगों के लिये संगणक एक साधारण माध्यम हो जायेगा, क्योंकि अंग्रेजी सबकी कमजोरी है। परंतु यह हिन्दी आंदोलन इतनी तेजी से नहीं चला और न ही अंतर्जाल कंपनियों ने हिन्दी को इतना महत्व दिया पर अब भारतीय उपभोक्ताओं को रिझाने के लिये हिन्दी की दिशा में कार्य शुरु किया गया है, या यूँ कहें बहुत अच्छा काम हुआ है।

    पहले कृतिदेव फ़ोंट में हिन्दी में लिखते थे फ़िर ब्लॉगर.कॉम पर आकर उसे कॉपी पेस्ट करते थे, इंटरनेट कनेक्शन ब्रॉडबेन्ड होना तो सपने जैसा ही था, एक पोस्ट को छापने में कई बार तो १ घंटा तक लग जाता था। अब पिछले २ वर्षों से हम हिन्दी लिखने के लिये बाराह का उपयोग करते हैं, फ़ोनोटिक कीबोर्ड स्टाईल में। पहले जब हमने लिखना शुरु किया था तो संगणक पर सीधा लिखना संभव नहीं हो पाता था, पहले कागज पर लिखते थे फ़िर संगणक पर टंकण करते थे, पर अब परिस्थितियाँ बदल गई हैं, अब तो जैसे विचार आते हैं वैसे ही संगणक पर सीधे लिखते जाते हैं, और छाप देते हैं। अब कागज पर लिखने में परेशानी लगती है, क्योंकि उसमें अपने वाक्यों को सफ़ाई से सुधारने की सुविधा नहीं है, पर संगणक में कभी काट-पीट नहीं होती, हमेशा साफ़ सुथरा लिखा हुआ दिखाई देता है।

    इतने समय अंतराल में केवल यही सीखा है कि अपने लिये लिखो जैसे अपनी डायरी में लिखते हो, अब अपने पाठकों के लिये भी लिखो जो चिठ्ठे पर भ्रमण करने आते हैं। अब देखते हैं कि यह चिठ्ठाकारी का सफ़र कब तक अनवरत जारी होगा।

“चिठ्ठाकारी चलती रहे” [Happy Blogging]

46 thoughts on “ब्लॉगिंग में ५ वर्ष पूरे अब आगे… कुछ यादें…कुछ बातें… विवेक रस्तोगी

  1. बधाई हो बंधु… आज आपने पांच साल पूरे किए। यह सफर निश्चित तौर पर रोमांचक रहा होगा।
    आप यूं ही लगे रहे यही शुभकामनाएं। एक बार फिर से बधाई।

  2. वाह जी बधाई! पांच साल पूरे करने की झकाझक बधाई! जीतेंद्र के कमेंट और ब्लॉगिंग में हलचल तो कमाल की थी। अब पता नहीं किधर बिजी हो गया। देबाशीष का भी ऐसा ही है। ग्रेट हैं वो।

    आपकी इस पोस्ट से तमाम सारी बातें याद आ गयीं। सच में डायल अप जमाने के किस्से याद करके मजा आ जाता है।

    फ़िर से बधाई!

  3. विवेक जी, बहुत बहुत बधाई …भाई आप तो नींव के पत्थर हो !!
    ये प्रयास जारी रहना चाहिए …मेरी और से बहुत बहुत शुभकामनायें !!
    पुरानी यादों के बारे में पढकर बहुत अच्छा लगा !!

  4. ब्‍लॉगिंग के पांचसाला सफर के लिए बधाई हो विवेक भाई.
    पुराने दिनो को याद करना अच्‍छा लगा, जित्‍तु भाई उस जमाने के ताउ थे समय समय पर भतीजों का कान उमेठते रहते थे. 🙂

  5. वीर तुम बढे चलो…धीर तुम बढे चलो…
    हिंदी ब्लॉग्गिंग के इतिहास में आपका नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा…
    पांच वर्ष पूरे करने पर बहुत-बहुत..बहुतायत में बधाई…

  6. राजीव जी 5 साल के सफल ब्लागिन्ग इतिहास के लिये बहुत बहुत बधाई। कामना करती हूँ कि इस 5 के आगे शून्य लगते जायें 50—- 500 — बहुत बहुत बधाई।

  7. बधाई । आप पांच साल से टिके हैं । वर्ना ब्लोगिंग तो पानी के बुलबुले की तरह है । जाने कब फूट जाये । जाने कितने आये और कितने गए ।
    आपका प्रयास सार्थक है । कृपया बनाये रखिये । शुभकामनायें ।

  8. बधाई हो..आप इत्ते पुराने चावल हो, हमें पता ही न था. 🙂

    समीर भाई से!!

  9. पांच साल पूरे करने पर ग्रेच्यूटी बनती है जी 🙂

    बधाई स्वीकारें।

    वैसे मुझे पता नहीं था कि आप प्राचीनकाल के हैं….जबकि मैं अभी तक आपको अपनी तरह मध्यकाल का ही समझ रहा था 🙂

  10. आप लोगों के प्रारम्भिक परिश्रम ने ही ब्लॉगजगत को ऐसी स्थिति पर ला दिया है जहाँ पर हम जैसे नवागन्तुकों को समुचित वातावरण मिल पा रहा है । आपको व्यक्तिगत रूप से बधाई इस यात्रा में अग्रणी बने रहने के लिये ।

  11. बधाई हो विवेक जी. अपने ब्लॉग-रोल मे कल से ये हैडिंग देख रही हूं, लेकिन पेज़ खुल ही नहीं रहा था. आज चर्चा में दिये गये लिंक के ज़रिये पहुंची हूं.

  12. बहुत बहुत बधाई। यूँ ही लिखते रहिए हम कभी न कभी कुछ न कुछ तो सीख ही लेंगे।
    घुघूती बासूती

  13. बहुत बहुत बधाई हो विवेक भाई । आपने पांच वर्षों तक इस ब्लोग सरकार को चलाया …आगे भी ये सरकार जारी रहे ..यही शुभकामना है ।

  14. @ राजकुमार जी – बहुत बहुत धन्यवाद, सफ़र कोई भी हो हमेशा रोमांचक रहता है। आप भी सफ़र में हैं और महसूस करते ही होंगे।

    @ उड़नतश्तरी जी – पुराने चावल यह तो आपकी जर्रानवाजी है 😀

    @ अनूप जी – वाकई पुरानी यादें एकदम जहन में आ जाती हैं और उन्हें सुनाना तो और भी मजेदार होता है।

    @ राम त्यागी जी – बहुत बहुत धन्यवाद

  15. @ संजीव जी – बिल्कुल सही कहा आपने जीतू भाई उस जमाने के ताऊ थे 🙂

    @ दिव्यांश – धन्यवाद

    @ पंकज जी – कीबोर्ड तोड़कर लेखन 🙂

    @ राजीव जी – हम वाकई वीर हो गये हैं:) धन्यवाद

  16. बहुत बहुत बधाई भाई साहब, अनवरत हिन्‍दी चिट्ठकारी मे आपके कारण विविध जानकारी का भंडार संकलित हुआ है।

  17. @ निर्मला जी – आपने राजीव जी को बधाई दे दी, उन्हें भी दी जानी चाहिये उनके तीन वर्ष पूर्ण हुए हैं। हम बधाई स्वीकार कर लेते हैं आपकी, और आशीर्वाद भी।

    @ डॉ. दराल साहब – हमारा बुलबुला पाँच साल में पक्का हो गया है 🙂 अब नहीं फ़ूटेगा।

    @ संगीता जी – धन्यवाद।

    @ रंजन जी – पुराने चावल के लिये धन्यवाद 😀

  18. @ सतीश जी – हा हा तो आज पता चल ही गया कि हम प्राचीनकाल के हैं और ग्रेच्युटी के अधिकारी भी हो गये हैं।

    @ शिवम जी – धन्यवाद ।

    @ उन्मुक्त जी – धन्यवाद यात्रा चलती ही रहेगी।

    @ प्रवीण जी – धन्यवाद।

  19. @ संजीव जी – धन्यवाद।

    @ सतीश जी – धन्यवाद।

    @ राज जी – धन्यवाद ।

    @ वन्दना जी – कल गलती से पोस्ट हो गई थी, जबकि पाँच वर्ष पूरे आज हुए हैं।

    @ आनन्द जी – धन्यवाद ।

    @ नीरज जी – धन्यवाद ।

  20. @ शिखा जी – धन्यवाद ।

    @ घूघुती जी – धन्यवाद हम लिखते रहेंगे।

    @ अजय भाई – आगे भी लेखन जारी रहेगा धन्यवाद।

    @ सुब्रामनियम जी – धन्यवाद।

    @ रश्मि जी – धन्यवाद।

    @ महाशक्ति जी – धन्यवाद।

  21. महराज आप तो पुराने दाने के निकले -बहुत बहुत बधाईयाँ !आपका लेखन भी एक विशेषज्ञता के क्षेत्र से है -एक हजार पोस्ट तक चलते रहें -तब समीक्षाहोगी !

  22. ब्लागिंग में ५ वर्ष..! जानकार प्रसन्नता हुई.
    वाकई उन दिनों ब्लागिंग करना बड़ा कठिन काम रहता होगा.
    …मेरी भी बधाई स्वीकार करें.

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इसी का नाम दुनिया है : हमारे मित्र का उवाच –

हमारे मित्र हैं, जिनसे वर्षों हो चुके हैं मिले हुए उनके उवाच ( मनीष हाड़ा उवाच J

इसी का नाम दुनिया है :

* कोई दूसरा चमचागिरी करे तो वो जी-हुजूरी है,हम करें तो वो उच्चाधिकारी के लिए सम्मान है.
*
कोई दूसरा टिप न दे तो वो कंजूस है,हम टिप न दें तो हम पैसे की कीमत समझने वाले हैं.
*
कोई दूसरा “आउट” हो जाये तो वो पी के उधम मचाने वाला गैर-जिम्मेदार शख्स है,उन्ही हालत मैं हम पार्टी की जान हैं.
*
कोई दूसरा कहीं लेट पहुंचे तो वो वक़्त का पाबन्द नहीं, हम वक़्त के गुलाम थोड़े ही हैं.
*
कोई दूसरा मुंह फाड़े तो उसे अपनी जुबान पर काबू नहीं है,हम ऐसा करें तो इसलिए क्योंकि हम मुक्त संवाद में आस्था रखते हैं.
*
कोई दूसरा नुक्ताचीनी करे तो वो खुन्दकी है,हम ऐसा करें तो हम पारखी निगाह रखते हैं.
*
कोई दूसरा कोई नुकसान करे तो वो गैर-जिम्मेदार है,उसे कमाना नहीं पड़ता न, वही नुकसान हम करें तो आखिर गलती इंसान से ही होती है.
*
कोई दूसरा चुगली करता है, हम वही कहते हैं जो सच है.

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विद्रोह मेरे मन का, भड़क रहा है….. मेरी कविता….विवेक रस्तोगी

विद्रोह मेरे मन का,

भड़क रहा है,

चिंगारियों से,

आग निकल रही है,

मेरे मन के,

मेरे दिल के,

कुछ जज्बात हैं,

जो दबे हुए हैं,

कहीं किसी चिंगारी में,

और जो,

हवा के रुख का,

इंतजार कर रहे हैं,

और वहीं कहीं,

रुख हवा का,

हमसे बेरुखी कर चुका है,

पर…

विद्रोह मेरे मन का,

भड़क रहा है.. !!

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  1. जब भी परिवार से दूर होने की परिस्थितियां आती हैं मैं सीमा पर तैनात सिपाही की सोचता हूं व पाता हूं कि कितना भाग्यशाली हूं मैं…जब चाहूं घर हो आता हूं, न ही अनुशासन की बंदिश…

  2. दो चार नारे भी लगाये ऊंची आवाज मै, ताकि पडोसियो को भी पता चले आप के विद्रोह का…. वेसे विद्रोह कर कहां रहे है दफ़तर मै या घर पर???
    सुंदर रचना

  3. हवा के रूख का
    मत कर इंतजार
    अपना दावानल और भड़का
    क्योंकि विद्रोह जब मरेगा तो
    बहुत कुछ अनर्गल करेगा

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ४० [यज्ञ के लिए गुरु द्रोणाचार्य द्वारा मेरे लाये गये चीते को यज्ञ के लिए निषिद्ध बताना….]

    वह झपटकर दूर हट गया। अब मैंने उसपर भयंकर आक्रमण करना प्रारम्भ किया। एक के बाद एक। बँधी हुई मुट्ठी के सशक्त प्रहार उसकी पीठ पर, पेट पर, गरदन पर, जहाँ स्थान मिला वहीं पर करने लगा। वह अब पहले से अधिक बौखलाया हुआ-सा मुझपर आक्रमण करने लगा। लगभग दो घड़ी तक हम दोनों में द्वन्द्व होता रहा। अन्त में वह थक गया। मेरे रक्त की एक बूँद तक उसकी जीभ को प्राप्त नहीं हो सकी थी। थोड़ी देर पहले गरजनेवाला वह चीता अब भीतर ही भीतर गुर्राने लगा। भय से उसने अपनी पूँछ दोनों पैरों के बीच कर ली थी। मैं उसकी छाती पर बैठ गया। आस-पास पन्द्रह-बीस हाथ के घेरे में घास बुरी तरह कुचल गयी थी। पास की झाड़ी से एक वन्य लता मेरे पैरों तक आ गयी थी। एक हाथ से मैंने उसको खींच लिया। जोर से एक झटका मारते ही पन्द्रह-बीस हाथ लम्बी वह दृढ़ लता जड़ से उखड़कर मेरे हाथ में आ गयी। उस लता से मैंने उस चीते के दो-दो पैर एक जगह कसकर बाँध दिये। हाड़-मांस की सफ़ेद-काली एक भारी गठरी तैयार हो गयी।

    अन्धकार घिरने लगा था। उस विशाल प्राणी को कन्धे पर रखकर चन्द्रकला के धूमिल प्रकाश में मैं नगर की ओर मुड़ा । नगर में मैं जिस समय पहुँचा उस समय अर्धरात्रि हो गयी थी। अत्यन्त शीतल पवन शरीर को सुन्न किये दे रहा था। अपने उत्तरीय को मैं बहुदा नदी के पानी में भूल आया था। देह पर भीगे वस्त्र धूल से लथपथ हो गये थे। सम्पूर्ण नगर निद्राधीन था। केवल बादलों की गड़गड़ाहट-सी चीते के गुर्राने की आवाज ही आ रही थी। मैं युद्धशाला में आया। अन्य समस्त शिष्य वन-वन भटककर जिन प्राणियों को लाये थे, वे सब लकड़ी के एक घर में बन्द कर दिये गये थे। उन्हीं में मैंने अपने कन्धे पर रखा हुआ वह चीता फ़ेंक दिया जो अपनी मूँछों के बालों से मेरी गरदन पर अबतक गुदगुदी करता रहा था। उस घर के सभी प्राणी भय से किकियाने लगे। मैं जल्दी-जल्दी अपने कक्ष में गया और वस्त्र बदलकर सोने चला गया।

    प्रात:काल विधिवत यज्ञ प्रारम्भ हुआ। अन्त में वेदी पर बलि देने का अवसर आया। बलि लाने के लिए सभी लकड़ी के घर की ओर दौड़े । उनमें से एक शिष्य भीतर जाकर घबराकर, उलटे पैरों लौटकर यज्ञकुण्ड के पास आया। उसने गुरु द्रोण से कहा, “गुरुदेव, बलि के लिए कोई चीता ले आया है।“

   “चीता ! चलो देखें ।“ आश्चर्य से उनकी सफ़ेद भौंहें तन गयीं। गुरु द्रोणाचार्य के साथ हम सब लोग उस घर के पास आये। मुझको आशा थी कि उस चीते को देखते ही गुरुदेव पूछताछ करेंगे और मेरी पीठ ठोकेंगे। परन्तु मस्तक को अत्यधिक संकुचित करते हुए वे बोले, “इस चीते को कोई क्यों लाया है ? अरे यज्ञ तो शान्ति के लिये किया जाता है। यज्ञ में चीते की बलि देना निषिद्ध माना गया है। छोड़ दो इस चीते को।“

   परन्तु उसको छोड़ने के लिए कोई आगे ही नहीं बढ़ रहा था। अन्त में अकेला भीम आगे आया। मेरी बाँधी हुई बेलें उसने खोलीं। जो कुछ हुआ था, उससे वह चीता अत्यन्त भयभीत हो गया था। अपने प्राणों के डर से वह लकड़ी के घर की चहारदीवारी पर बहुत ऊँची छलाँग लगाकर क्षण-भर में अदृश्य हो गया।

    मेरी आशा खण्ड-खण्ड हो गयी। उसक दुख तो मुझको हुआ ही। परन्तु सच पूछो तो मुझे गुरुदेव द्रोण के उस निकम्मे जीवन-दर्शन से चिढ़-सी लगी। यज्ञ में क्रूर और हिंसक पशुओं की बलि क्यों न दी जाये ? निरपराध बकरे की अपेक्षा वास्तव में चीते-जैसे पशुओं की बलि ही दी जानी चाहिए।

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हाँ तुमने आकर, मेरी जिंदगी सँवार दी है …

तुमने मेरे अंदर,
प्रेम पल्लवित किया है,
तुमने मेरे अंदर्,
ऊष्मा भर दी है
तुमने जिंदगी को नये,
तरीके से जीना सिखाया है
हाँ तुमने आकर,
मेरी जिंदगी सँवार दी है

अब तुम,
मुझसे अलग नहीं हो,
तुम मुझमें इस तरह,
सम्मिलित हो गयी हो
इसलिये तुम्हरा,
अहसास ही नहीं होता
अहसास तो उसका होता,
है जो अपने मैं नहीं होता
हाँ तुमने आकर,
मेरी जिंदगी सँवार दी है ।

14 thoughts on “हाँ तुमने आकर, मेरी जिंदगी सँवार दी है …

  1. प्रवीण जी,

    पक्का हमारी घरवाली ही है, अरे अब वो हमारी जिंदगी में रच बस गई हैं, किसी ओर के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं, उनकी बड़ी शिकायत थी कि आप शादी के पहले बहुत कविता करते थे पर अब नहीं, तो अब जिंदगी के जहाज में तूफ़ान आना कम हो गये हैं, इसलिये फ़िर से मेरा कवि मन जागृत हो गया है। हाँ अब बस कविता उनके लिये ही होगी या सामयिक होगी संदर्भ हमेशा साथ में रहेगा।

    धन्यवाद आपका
    विवेक रस्तोगी

  2. विवेक भाई,

    जब अपनी गिच्ची (गला) ही हमेशा उन जी के हाथों में रहना है तो फिर क्या अहसास और क्या सांस…सब उन्हीं के रहमो-करम पर चलता है…मैं आपकी नहीं अपनी बात कर रहा हूं…

    जय हिंद…

  3. अच्छा लगा जान कर कि किसी नारी ने आपकी जिन्दगी संवार दी …और आप उसे कबूल भी कर रहे है …मानते तो और भी होंगे मगर प्रत्यक्षतः पति तो अक्सर तो स्यापा करते ही नजर आते हैं…. 🙂 !!

  4. वाणी गीत जी,
    जी हाँ सच कहा आपने नारी किसी की भी जिन्दगी सँवार सकती है और किसी की उजाड़ भी सकती है, घर को स्वर्ग और नरक बनाने में उसका ही १००% योगदान होता है। पतियों को अपनी पत्नियों की अहमियत समझनी चाहिये और उन्हें जताना ही चाहिये कि हाँ हम प्यार करते हैं, केवल दिल में रखने से प्यार दिखता नहीं है।

  5. अहसास तो उसका होता,
    है जो अपने मैं नहीं होता
    बहुत सही और सुन्दर अभिव्यक्ति है बधाई

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १०

     दूसरे दिन पिताजी ने मुझको हस्तिनापुर चलने के लिए तैयार रहने को कहा। मैं उनकी आज्ञानुसार आवश्यक एक-एक वस्तु एकत्रित करने लगा। मन में अनेक विचारों का जमघट लगा हुआ था। अब चम्पानगर छोड़ना पड़ेगा। यहाँ के आकाश से स्पर्धा करनेवाले किंशुक, सप्तपर्ण, डण्डणी, मधूक, पाटल और खादिर के वृक्ष अब मुझसे अलग होनेवाले थे। यहाँ के पत्ररथ, श्येन, कोकिल, क्रौंच, कपोत आदि पक्षियों से अब मैं बहुत दूर जानेवाला था।

    ऐसी बहुत सी बातें कर्ण सोचने लगा और हस्तिनापुर के बारे में सोचने लगा कि वह कैसा होगा –

    कैसा होगा वह हस्तिनापुर ! सुनते हैं, वहाँ बड़े-बड़े प्रासाद हैं। प्रचण्ड व्यायामशालाएँ, अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों से ठसाठस भरी हुई शस्त्रशालाएँ, हिनहिनाते हुए विशालकाय घोड़ों की पंक्तियों से भरी हुई अश्वशालाएँ, सप्तवर्ण बृक्ष की तरह आकाश के गर्भ में जिनके कलश विराजमान हैं, ऐसे भव्य मन्दिर वहाँ हैं। और द्वार की किवाड़ों की तरह जिनके वक्षस्थल हैं, जिनकी भुजाएँऔर जंघाएँ शक्तिशाली हैं, ऐसे असंख्य योद्धाओं से वह हस्तिनापुर भरा हुआ है। सुनते हैं कि वह कुरुकुल के राजाओं की राजधानी है ! किस दिशा मॆं होगी वह ?

     विचारों में लीन मैं, अपना समान रथ में रखता जा रहा था, शोण भी मेरी मदद कर रहा था, परंतु उसे अब भी यह पता नहीं था कि आज मैं भी जा रहा हूँ। “आज मैं तुझको छोड़कर जाऊँगा” यह बात उससे कैसे कहूँ, यही मेरी समझ में नहीं आ रहा था। जब जाने की तैयारी हो गई तो द्वार पर खड़ी राधामाता को झुककर वन्दन किया उसने मुझे ऊपर उठाते हुए मेरे मस्तक को आघ्राण किया। मुझको ह्र्दय से लगाकर शोक से अवसन्न हो बोली, “एक बात ध्यान रखना वसु ! गंगा के पानी में कभी गहराई में मत जाना !” उसकी आँखों से आँसुओं की झड़ी लग गयी । मेरे रक्त की एक-एक बूँद उन आँसुओं से अत्यन्त प्रेम से कह रही थी, “मात ! तुम्हारे इस उपदेश का मूल्य मैं कैसे सँभालकर रखूँ ? केवल इतना ही कहता हूँ कि साक्षात मृतु के आने पर भी तेरा वसु सत्य से तिल-भर भी कभी विचलित नहीं होगा !”

    उसे कुछ याद आ गया, पुन: पर्णकुटी में गय़ी, और मेरे हाथ पर एक चाँदी की एक छोटी-सी पेटी रख दी। अत्यन्त दुख-भरे स्वर में वह बोली, “वसु, जब-जब तुझको मेरी याद आये, तब-तब तू इस पेटी का दर्शन किया करना । मेरे स्थान पर इसी को देखना ! यह तुम्हारी माँ ही है, यह समझकर इसको सँभालकर रखना !”

     मैंने पेटी उत्तरीय में अच्छी तरह बाँध ली। माता को फ़िर एक बार वन्दन किया। उसने काँपते हाथ से दही की कुछ बूँदे मेरी हथेली पर डालीं। मैंने उनको ग्रहण किया। एकबार उस सम्पूर्ण पर्णकुटी पर दृष्टि डालकर मैंने उसको आँखों में भर लिया। पिताजी ने मुझसे रथ में बैठने को कहा।

     जैसे ही रथ में मैं बैठा, शोण ने पिताजी से पूछा, “भैया कहाँ जा रहा है ?” अब तक उसकी आँखों में आकुलता थी। वे अब रुआँसी हो गयी थीं।

    “मेरे साथ हस्तिनापुर जा रहा है। तू भीतर जा ।” पिताजी ने घोड़ों की वल्गाएँ अपने हाथ में लेकर एकदम उनकी पीठ पर जोर से कशाघात करते हुए कहा । घोड़े एकदम तेजी से उछले और तेजी से दौड़ने लगे।

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३०

रक्ताशोक: – अशोक दो प्रकार का होता है – (१) श्वेत पुष्पों वाला, (२) लाल पुष्पों वाला। रक्ताशोक का प्रयोग यहाँ साभिप्राय है; क्योंकि रक्ताशोक कामोद्दीपक होता है; अत: प्रेमी लोग अपने घरों में रक्ताशोक को लगाते हैं। कवि प्रसिद्धि के अनुसार किसी सुन्दर युवती के बायें पैर के प्रहार से अशोक वृक्ष में पुष्प निकलते हैं।

केसर: – अशोक वृक्ष की तरह केसर वृक्ष को भी कामोद्दीपक
बताया गया है। यह देखने में सुन्दर होता है तथा इसकी गन्ध भी अच्छी होती है। कवि प्रसिद्धि के अनुसार यह केसर का वृक्ष जब युवतियाँ अपने मुख में मदिरा भरकर इसके ऊपर कुल्ला करती हैं तभी विकसित होता है।

कुरबक – कुरबक वसन्त ऋतु में खिलने वाला गुलाबी रंग का पुष्प है। कवि प्रसिद्धि के अनुसार यह सुन्दर युवती के आलिंगन से विकसित होता है।

दोहद – दोहद का अर्थ गर्भिणी स्त्री की अभिलाषा या उसका इच्छित पदार्थ होता है। गौण रुप से उन वस्तुओं को भी दोहद कहा जाता है जिनसे वृक्ष आदि पर पुष्पादि आते हैं। कुछ स्थलों पर दोहद के स्थान पर दौर्ह्र्द अथवा दौह्र्द (द्वि+ह्रदय)  का प्राकृत रुप है, जो संस्कृत काव्यों में अपना लिया गया है।

वासयष्टि: – घरों में पक्षियों के बैठने के लिए एक लम्बा डण्डा तथा उसके ऊपर कुछ फ़ैली हुई छतरी सी होती है, उसे वासयष्टि कहते हैं। यक्ष के घर में यह वासयष्टि स्वर्णनिर्मित थी। उसको मजबूती प्रदान करने के लिए उसकी जड़ों में चारों ओर मरकत मणियों का चबूतरा बनाया गया था।

लिखितवपुषौ – शड़्ख और पद्य दोनों ही मांगलिक माने जाते हैं, इस कारण प्राय: लोग अपने घर के दरवाजे पर इन्हें बना लेते हैं। यक्ष के घर के द्वार के दोनों ओर शड़्ख और पद्य के पुरुषाकार चित्र बने हुए थे।

शड्खपद्यौ – आचार्य मल्लिनाथ ने शड़्ख और पद्य को कुबेर की निधियों के नाम माने हैं। ये निधियाँ नौ मानी जाती हैं – महापद्य, पद्य, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और खर्व। परन्तु यहाँ शड़्ख और पद्य का अभिप्राय शंख और कमल से भी हो सकता है। यद्यपि कमल अर्थ में पद्य शब्द का प्रयोग नपुंसकलिड़्ग में होता है, लेकिन यह पुंल्लिड़्ग में भी होता है।

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मंदिर क्यों जायें..

यदि आपमें आध्यात्म जीवित है, या आध्यात्मिक हो रहे हैं? तो आप इसे पसंद करेंगे!

यदि आपमें आध्यात्म मर गया हैं, तो आप इसे नहीं पढ़ना चाहेंगे।
यदि आप आध्यात्म में उत्सुक हैं तो वहाँ अभी भी आशा है!
कि मंदिर क्यों जायें? ?

एक ‘भक्त’ गोर ने  एक ? अखबार के संपादक को शिकायती पत्र लिखा कि मंदिर जाने का कोई मतलब नहीं।

‘मैं 30 साल से जा रहा हूँ  और आगे लिखा कि इतने समय में मैं कुछ 3000 मंत्र सुन चुका हूँ।

लेकिन अपने जीवन के लिए, मैं उनमें से एक भी याद नहीं कर  सकता हूँ।

इसलिये,  मुझे लगता है ये सब सेवाएँ देकर गुरु अपना समय बर्बाद कर रहे हैं और मैंने अपना समय बर्बाद किया?

इस पत्र को  “संपादक के नाम पत्र”  स्तम्भ में छापा गया और इससे असली विवाद शुरु हुआ, जिससे संपादक बहुत आनंदित हुआ।

ये सब ह्फ़्तों तक चलता रहा जब तक कि यह पक्की दलील नहीं दी गई –

मैं लगभग 30 साल से शादीशुदा हूँ और इस समय में मेरी पत्नी ने लगभग 32.000  बार भोजन पकाकर खिलाया होगा!

लेकिन जीवनभर खाना खाने के बाद भी मैं पूरी सूचि तो क्या ? मैं उनमें से कुछ एक भी याद नहीं कर सकता।

लेकिन मैं यह जानता हूँ … उस खाने से मुझे बल मिला और मुझे मेरा काम करने की जरूरत के लिये ताकत दी।

अगर मेरी पत्नी ने मुझे भोजन नहीं दिया होता, तो शायद आज मैं शारीरिक रूप से मर चुका होता ?

इसी तरह, अगर मैं मंदिर में पोषण के लिए नहीं गया होता तो मैं आज आध्यात्मिक रुप से मृत हो गया होता।

जब आपको कुछ भी समझ नहीं आता है …. तो भगवान ही कुछ करते हैं ! विश्वास दिखता है? अदृश्य, अविश्वसनीय को मानना ही पड़ता है और असंभव सी चीज भी प्राप्त हो जाती है!

भगवान का शुक्र है हमारे भौतिक और हमारे आध्यात्मिक पोषण के लिये!

अनुवादित – सोर्स

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9 thoughts on “मंदिर क्यों जायें..

  1. यदि मैं सही समझा हूँ तो आप यह कहना चाहते हैं कि जो व्यक्ति मंदिर नहीं जाता वह आध्यात्मिक नहीं होता,

    कह लीजिये !

  2. आध्यात्म बाहर से ज्यादा अन्दर की बात है और मंत्र भी यही करता है . इसका सही निर्देश इन पंक्तियों में है " जिन खोजा तिन पाईयां गहरे पानी पैठ "

  3. मंदिर जाना, नही जाना-इसका ईश्वर में विश्वास और आस्था से क्या लेना देना है. हम यहाँ मंदिर रोज जाने लगे, तो दो सौ किलोमीटर तो उसी में निपटा दें नित या हफ्ते में भी.

    हमारी भी आस्था है, पूरा विश्वास है कि ईश्वर साथ है किन्तु मंदिर जाना तो कम ही होता है तीज त्यौहार पर ही.

  4. आस्‍था और विश्‍वास अंदर का और मंदिर जाना बाहर का मामला है .. मंदिर जाना और तीर्थाटन करना उस जमाने के लिए महत्‍वपूर्ण माना जा सकता है .. जिस जमाने में लोगों के पास समय अधिक हुआ करता था .. और घर से बाहर निकलने के लिए एक बहाने की जरूरत होती थी .. आज लोग व्‍यस्‍त होते हैं .. फिर भी समय निकालकर खुद सैर सपाटे के लिए घर से निकलते हैं .. इसलिए मंदिर जाना अब तीज त्‍यौहारों या खास मौको के लिए ही आवश्‍यक बन गया है .. और इसका आध्‍यात्मिक पोषण में कोई महत्‍व नहीं .. मुंह में राम बगल में छुरी भी तो हो सकती है।

  5. Mandir jaane se kam se kam mujhe to shaanti ka anubhav hota hai…agar aapko ho to aap bhi jaaye…

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बैंक शेयर औसत कीमत से नीचे [खरीदें]

अभी ४-५ दिन में बैंक शेयर औसत कीमत से नीचे आ गये हैं। सभी बैंकों के शेयर अभी बहुत ही अच्छी कीमत में उपलब्ध हैं, अगर आज निवेश करें तो अल्पावधि में ही अच्छा लाभ मिलने की उम्मीद है। क्योंकि बैंक शेयरों के भाव उतनी तेजी से बढे नहीं थे, जितनी तेजी से सेन्सेक्स व निफ्टी बढा था, तुलना कर देखने से पता चलता है कि अभी बैंकिंग सेक्टर में बहुत तेजी से मंदी आई है। औसत कीमत देखें कीमत में अंतर –
बैंक औसत कीमत आज के भाव
देना बैंक ३२ २४
बैंक ऑफ बडोदा २५० २०५
इलाहाबाद बैंक ८१ ६३
पंजाब नेशनल बैंक ४०० ३४०
एस.बी.आई. ८९० ७८०
बैंक ऑफ महाराष्ट्र २३ १९
बैंक ऑफ इंडिया १३० १०८
आई.डी.बी.आई ८० ५४
ओरियेन्टल बैंक २२० १६५
यूनियन बैंक ११५ ९६
विजया बैंक ५२-५५ ४१

2 thoughts on “बैंक शेयर औसत कीमत से नीचे [खरीदें]

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छाप

दो दोस्त एक रेगिस्तान से गुजर रहे थे। बीच रास्ते में उनके बीच बहस छिड़ गई और पहले दोस्त ने दूसरे को थप्पड़ लगा दिया। जिसे थप्पड़ पड़ा उसने बिना कुछ कहे रेत पर लिखा, आज मेरे सबसे अच्छे दोस्त ने मुझे थप्पड़ मारा। ऐसा लिखकर वे दोनों साथ चल दिए। रास्ते में नदी आई, दूसरा दोस्त उसमें नहाने के लिए उतरा और डूबने लगा। पहले दोस्त ने तुरंत नदी में कूद कर उसकी जान बचा ली। इस बार उस दोस्त ने पत्थर पर लिखा, आज मेरे सबसे अच्छे दोस्त ने मेरी जान बचाई। पहले ने उससे रेत और पत्थर पर लिखने का कारण पूछा तो उसने जवाब दिया, जब कोई तकलीफ पहुँचाए तो उसे रेत पर लिखना चाहिए, ताकि क्षमा की हवा उसे मिटा सके लेकिन यदि कोई अच्छा करे तो उसे पत्थर पर लिखना चाहिए, जिससे कोई भी उस छाप को मिटा न सके।
दुख भुलाना और सुख को याद रखना, खुद अपने हाथ में है।

5 thoughts on “छाप

  1. आपके पहले पोस्ट पर पहला कमेन्ट करने कि उपलब्धि मेरे नाम.. 😀

  2. हे हे …….इत्ता मत उड़िए……..आप तीनों हमसे ही नमस्ते करके हमसे आगे लग गए थे ……कमेन्ट करने के लिए लाइन में 🙂

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