गूढ़ ज्ञान :- हमारे मित्र का उवाच –

मनीष हाड़ा उवाच (द्वितीय)

गूढ़ ज्ञान :-

* फैसला करूँ या न करूँ, ये फैसला है; फैसला कर न सकूँ, ये नाकामी है.
* बेवकूफ अगर अनगिनत हों तो उनकी ताक़त को कम कर के आंकना नादानी है.
* कृत्रिम बुद्धिमत्ता स्वाभाविक मूर्खता का मुकाबला नहीं कर सकती.
* आपके चारों ओर हाहाकार है,लेकिन आप शांत हैं तो इसका मतलब है कि स्थिति की गंभीरता आपके पल्ले नहीं पड़ी है.
* किसी चीज पर लिखा हो कि एक ही साइज़ सबको फिट आता है तो इसका मतलब है वो किसी को फिट नहीं होगा.
* इतना आसान कोई काम नहीं होता कि उसे बिगाड़ा न जा सके.
* खुद न करना पड़े तो कोई काम नामुमकिन नहीं होता.
* अगर आप कामयाब नहीं होते,तो इस बात के सारे सबूत नष्ट कर देना ही श्रेयस्कर होता है कि आपने कोशिश की थी.
* अगर आप कुशल कार्यकर्ता हैं तो सबसे ज्यादा काम आपके पल्ले पड़ेगा, आप अतिकुशल कार्यकर्ता हैं तो ज्यादा काम से पल्ला झाड़ने की जुगत आप यक़ीनन कर लेंगे.

9 thoughts on “गूढ़ ज्ञान :- हमारे मित्र का उवाच –

  1. @बेवकूफ अगर अनगिनत हों तो उनकी ताक़त को कम कर के आंकना नादानी है.
    मेरे ख्‍याल से बेवकूफ एक ही हे तब भी कम उनकी ताक़त को कम कर के आंकना नादानी है.

  2. गूढ़ नहीं ये सहज मन्त्र हैं जीवन के -संकलन के लिए बधाई और बाटने के लिए बधाई!

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ४१ [कर्ण के गुरु और चम्पानगरी जाने की उत्कण्ठा… ]

   बहुत दिन हो गये थे। मैं जब से हस्तिनापुर आया था, तब से केवल एक बार ही चम्पानगरी गया था। वह भी उस समय जब गुरुदेव द्रोण ने अपने शिष्यों की परीक्षा ली थी। उसके बाद पाँच वर्ष बीत गये थे। इच्छा होने पर भी इन पाँच वर्षों में मैं एक भी बार चम्पानगरी को नहीं जा पाया था। क्योंकि यहाँ मैं एक विद्यार्थी के रुप में आया था।

    सौभाग्य से मुझको अपने गुरु बहुत अच्छे मिले थे। जिनको गुरुओं का गुरु कहा जाता है, ऐसे ही थे वे। साक्षात सूर्यदेव मेरे गुरु थे। हस्तिनापुर के अखाड़े में पत्थर के चबूतरे पर खड़े होकर मन ही मन निश्चय कर मैंने उनका शिष्यत्व अंगीकार किया था। उन्होंने भी अबतक मेरे साथ अपने प्रिय शिष्य का सा व्यवहार किया था। छह वर्षों के इस कालखण्ड में उन्होंने कितने दुर्लभ रहस्य मुझको बताये थे, वे किस भाषा में बताते थे, यह तो मैं कह नहीं सकता। परन्तु उन्होंने मुझसे जो कुछ कहा था, वह मैंने तुरन्त ही ग्रहण कर लिया था। क्या नहीं सिखाया था उन्होंने मुझको ! बाणों के दुष्कर प्रक्षेप, द्वन्द्व के कठिन हाथ; घोड़ा, हाथी और ऊँटों की उच्छ्श्रंखल प्रवृत्तियों को वश करने की कलाएँ। सब बातें उन्होंने मेरे कानों में कही थीं। चुपचाप ! मौन-भाषा में।

    प्रतिदिन प्रात: अपनी कोमल किरणों से असंख्य कलियों के मुँदे पलक खोलते हुए वे मुझसे कहते थे, “कर्ण, तुझको भी ऐसा ही बनना चाहिए। अपना सर्वस्व मुक्त-हस्त से जो कोई माँगे उसको देकर अपने सम्पर्क में आने वाले सभी लोगों का जीवन तुमको ऐसे ही खिलाना चाहिए।“

    कितने श्रेष्ठ थे मेरे गुरु ! संसार के किसी गुरु ने अपने शिष्य को इतनी छोटी-छोटी बातों से इतना उदात्त उपदेश कभी क्या दिया है ? अब एक बार चम्पानगरी में जाकर उन गुरु के चरण गंगा के स्वच्छ जल से अवश्य धोने चाहिए। अब मैं गंगामाता नहीं कहता हूँ, गंगा कहता हूँ। क्योंकि शैशवावस्था की श्रद्धा व्यावहारिकता के पाषाण से भोंथरी हो गयी थी। माँ एक ही होती है। जो जन्म देती है और पालन-पोषण करती है वह। नदी तो नदी है। वह माता कैसे हो सकती है ? मेरी माता एक ही थी – राधामाता ! उससे मिले भी बहुत दिन हो गये थे। वह अब मुझको देखेगी तो क्या सोचेगी, मुझको पूरा विश्वास था कि मेरे जाने पर वह सबसे पहले मुझसे यही पूछेगी, “कितना लट गया है रे वसु तू ? और तू गंगा के पानी में तो नहीं गया न कभी ?” क्योंकि पुत्र कितना भी बड़ा क्यों न हो जाये, माता की दृष्टि में वह सदैव बालक ही रहता है। माता ही विश्व में एकमात्र ऐसा व्यक्ति है, जिसके प्रेम को व्यवहार की तुला का बिलकुल ज्ञान ही नहीं होता। वह जानती है अपने पुत्र पर केवल वास्तविक प्रेम करना।

    मैंने शोण को बुलाकर कहा, “शोण ! यात्रा की तैयारी करो। कल चम्पानगरी चलना है।“ उसका चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा। शाल वृक्ष की तरह लम्बे-तड़ंगे होकर अनेक वर्षों के बाद, पहली बार हम चम्पानगरी की ओर जा रहे थे। अपनी जन्मभूमि की ओर ।

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  1. बहुत बढ़िया..आभार.

    यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि आप हिंदी में सार्थक लेखन कर रहे हैं।

    हिन्दी के प्रसार एवं प्रचार में आपका योगदान सराहनीय है.

    मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

    निवेदन है कि नए लोगों को जोड़ें एवं पुरानों को प्रोत्साहित करें – यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

    एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाएँ और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।

    आपका साधुवाद!!

    शुभकामनाएँ!

    समीर लाल
    उड़न तश्तरी

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आज मन धीर है, गंभीर है…… मेरी कविता…..विवेक

आज मन धीर है,

गंभीर है,

भविष्य के गर्भ में,

क्या है,

वो जानने के लिये,

अधीर है,

कोई चिंता नहीं है,

फ़िर भी,

बहुत ही बैचेन है,

जाने क्यों,

जिंदगी की धार में,

बहते हुए,

जिंदगी की धार पर,

चलते हुए,

आज मन धीर है,

गंभीर है।

10 thoughts on “आज मन धीर है, गंभीर है…… मेरी कविता…..विवेक

  1. आज मन धीर है,

    गंभीर है,

    भविष्य के गर्भ में,

    क्या है,

    वो जानने के लिये,

    अधीर है,

    यह हम गंभीरता से ही जान सकते हैं।

  2. कभी कभी ऐसा भी होता है।
    भविष्य की चिंता नही, बस चिंतन कीजिये।
    अच्छा लिखा है, इस बार गंभीर।
    कभी पधारो म्हारे देश।

  3. सही है कई बार ऐसा होता है यही वो क्षण है जब आदमी अपने आप मे लौट आता है। चिन्तन के लिये यही क्षण सुन्दर हैं शुभकामनायें

  4. कोई चिंता नहीं है,

    फ़िर भी,

    बहुत ही बैचेन है,

    जाने क्यों ?

    वाकई कई बार ऐसा होता है

  5. @ वन्दना जी – कर्ण की जीवनगाथा बीच बीच में जारी रहेगी, अभी थोड़ा अंतराल हो गया।

  6. जिंदगी की धार पर,

    चलते हुए,

    आज मन धीर है,

    गंभीर है।
    यह सब तो होता ही है जी, चलिये आप को इस सुंदर कविता के लिये बहुत बहुत बधाई

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ११

    शोण हाथ उठाकर “भैया रुक जा ! भैया रुक जा ऽऽऽ – “ कहता हुआ रथ के पीछे दौड़ने लगा। माँ ने आगे बड़कर तत्क्षण उसको पकड़ लिया । मैंने सन्तोष की साँस ली। रथ आगे दौड़ने लगा । लेकिन शोण फ़िर माँ के हाथों से छूट गया था। दूर अन्तर पर उसकी छोटी-सी आकृति आगे बढ़ती हुई दिखाई दे रही थी। उत्तरीय सँवारता हुआ एक हाथ उठाये वह अब भी दौड़ रहा था।

    हम लोग नगरी की सीमा तक आ पहुँचे। मैंने सोचा था कि शोण हारकर अन्त में वापस लौट जायेगा। लेकिन हाथ उठाकर वह अब भी दौड़ रहा था। मैंने पिताजी को रथ रोकने को कहा। हमको रुकते देख वह और जोर से दौड़ने लगा। परन्तु भोले-भाले बालक-जैसे लगने वाले शोण में भी कितना बड़ा साहस था ! वह मेरे साथ आना चाहता था, इसलिए वह सब कुछ भूलकर दौड़ लगा रहा था। कितना हठी था वह ! हठी क्यों, कितना स्वाभाविक और निश्छल प्रेम था उसका मुझपर ! थोड़ी देर में ही वह हाँफ़ता हुआ हमारे पास आ गया।

    उसकी किशोर मुखाकृति स्वेद से तर हो गयी थी। वह बहुत थक गया था, लेकिन उस स्थिति में भी तत्क्षण आगे बढ़कर वह तेजी से उछलकर रथ में कूद पड़ा। रुआँसा होकर, हाँफ़ने के कारण टूटे-फ़ूटे शब्दों में, वह बोला, “मुझको छोड़कर जा रहा है ? क्यों रे भैया ? तू जायेगा तो…तो मैं भी तेरे साथ ही चलूँगा; वापस नहीं जाऊँगा मैं? मुझको शोण जैसा स्नेही भाई मिला था।

    नगरी के आस-पास के परिचित स्थल पीछे छूटने लगे। अगल-बगल की घनी वनराजि में चम्पानगरी अदृश्य होने लगी। मेरा बचपन भी अदृश्य होने लगा। आस-पास की वह हरियाली, जिस पर मेरे बचपन के चिह्न अंकित थे, क्षण-प्रतिक्षण मेरी आँखों से ओझल होने लगी।

    दो दिन पहले जिस पठार पर हमने राजसभा का खेल रचा था, नगरी के बाहर का वह पठार सामने आया। उस पर मध्य भाग में वह काल पाषाण एकाकी खड़ा-खड़ा तप रहा था। मुझको राजा के रुप में मान देनेवाला पाषाण का वह कल्पित सिंहासन – महाराज वसुसेन का वह सिंहासन – मुझको मौन भाषा में विदा करने लगा। हाथ उठाकर मैंने उसको और चम्पानगरी को वन्दन किया। मेरा जीवन बचपन की हरियाली छोड़कर दौड़ने लगा – चम्पानगरी से हस्तिनापुर की ओर ।

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  1. शोण का प्रेम अपने भाई कर्ण के लिये देखते ही बनता है।

    और जब हम अपनी प्रिय नगरी या गृहनगर को छोड़ते हैं तो हमारे मन में भी यह भाव आते हैं जो कर्ण के मन में आ रहे हैं, क्योंकि उस जगह से हमारा भावनात्मक लगाव होता है।

  2. दीपक भाई,

    मैं अपने समय के कारण मजबूर हूँ और ज्यादा समय नहीं दे पाता हूँ, मुझे पता है कि यह एक बांधने वाला उपन्यास है, आप इसकी भाषा देखेंगे तो साहित्य की चपलता और साधारणता दोनों दिखाई पड़ेंगी। लेखक ने बहुत मेहनत से भाषा में गढ़ा है। मुझे तो कई बार ये लगता है कि कल मैं नया पोस्ट पब्लिश कर भी पाऊँगा या नहीं, क्षमा करें अभी तो मैं इतना ही कर पाऊँगा पर हाँ आपकी बात का ध्यान जरुर रखूँगा। और आगे ज्यादा लिखने का प्रयास करुँगा।

    आपकी आत्मियता और टिप्पणी ही मेरे लिये संबल है।

    कई बार तो मैं सोचता हूँ कि क्यों न ये सब बंद कर दिया जाये, क्योंकि इसमें समय आरक्षित करने से मेरे मौलिक लेखन पर असर है, पर मेरा उद्देश्य इस उपन्यास के अंश देने का कुछ और है जो कि आप इस कड़ी की पहली पोस्ट पर देख सकते हैं।

    आपका प्रेम बना रहे, बस इतना ही ।

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३१

कलबतनुताम़् – यहाँ कलभ को उपमान बनाया गया है; क्योंकि कलभ और मेघ दोनों में ऊँचाई तथा वर्ण की समानता है तथा मेघ इच्छानुसार रुप धारण करने वाला है। यहाँ तनु का अर्थ शरीर न लेकर छोटा लिया गया है। बत्तीस साल की उम्र वाले हाथी के बच्चे को कलभ



कहा जाता है।

तन्वी – संस्कृत काव्यों में तनुता को सौन्दर्य माना गया है। कोमलांगी, कृशांगी आदि के लिये भी तन्वी पद प्रयुक्त होता है।

निम्ननाभि: – कामसूत्र के अनुसार गहरी नाभिवाली स्त्री में कामवासना का आधिक्य होता है।

चकितहरिणीप्रेक्षणा – मुग्धा नायिका की आँखें डरी हुई हरिणी के समान होती हैं। आचार्य मल्लिनाथ ने इस पर टीका करते हुए लिखा है कि एतेनास्या: पद्मिनीत्व व्यज्यते। पद्मिनी का लक्षण इस प्रकार है –
भवति कमलनेत्रा नासिका क्षुद्ररन्ध्रा अविरलकुचयुग्मा चारुकेशी कृशाड़्गी।
मृदुवचनसुशीला गीतवाद्यानुरक्ता सकलतनुसुवेशा पद्मिनी पद्मगन्धा॥
स्त्रियों के चार भेद माने गये हैम – पद्मिनी, हस्तिनी, शड़्खिनी और चित्रिणी।

परिमितकथाम़् – पतिव्रता स्त्री पति के दूर चले जाने पर श्रृंगार आदि छोड़ देती है तथा आकर्षित करने वाले वस्त्रों का भी त्याग कर देती है और कम बोलती है। कालिदास की यह नायिका भी पतिव्रता हैं और इसको प्रेषितपतिका नायिका कहा है। याज्ञवल्क्य स्मृति में इस प्रकार की नायिका के लिए क्रीड़ा, हास्य आदि का निषेध किया है –
क्रीड़ां शरीरसंस्कारं स्माजोत्सवदर्शनम़्।
हास्यं परगृहे यानं त्यज्येत़् प्रोषितभर्तृका॥
चक्रवाकीम़् इव – यह प्रसिद्ध है कि चकवा – चकवी दिन के समय साथ साथ रहते हैं, परन्तु रात्रि में एक – दूसरे से बिछुड़ जाते हैं। रात्रि वियोग का कारण किसी मुनि का शाप बताया गया है। कुछ विद्वानों की मान्यता है कि वियोग का कारण है – इन्होंने सीता जी के वियोग में रोते हुए रामचन्द्र जी का उपहास किया था। संस्कृत साहित्य में इनका दाम्पत्य प्रेम आदर्श माना जाता है।

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – १

मैंने महाकवि कालिदास का खण्डकाव्य ’मेघदूतम’ पढ़ा, और बहुत सारी ऐसी जानकारियाँ मिली जो हमारी संस्कृति से जुड़ी हुई हैं, जो कि मुझे लगा कि वह पढ़ने को सबके लिये उपलब्ध

होना चाहिये।

कालिदस
एक जनश्रुति के अनुसार कालिदास पहले महामूर्ख थे। राजा शारदानन्द की विद्योत्तमा नाम की एक विदुषी एवं सुन्दर कन्या थी। उसे अपनी विद्या पर बड़ा अभिमान था। इस कारण उसने शर्त रखी कि जो किई उसे शास्त्रार्थ में पराजित करेगा उसी से ही वह विवाह करेगी। बहुत से विद्वान वहाँ आये, परंतु कोई भी उसे परास्त न कर सका; इस ईर्ष्या के कारण उन्होंने उसका विवाह किसी महामूर्ख से कराने की सोची। उसी महामूर्ख को खोजते हुए उन्होंने जिस डाल पर बैठा था, उसी को काटते कालिदास को देखा। उसे विवाह कराने को तैयार करके मौन रहने को कहा और विद्योत्तमा द्वारा पूछे गये प्रश़्नों का सन्तोषजनक उत्तर देकर विद्योत्तमा के साथ विवाह करा दिया। उसी रात ऊँट को देखकर पत़्नी द्वारा ’किमदिम ?’ पूछने पर उसने अशुद्ध उच्चारण ’उट्र’ ऐसा किया।
विद्योत्तमा पण्डितों के षड़़यन्त्र को जानकर रोने लगी और पति को बाहर निकाल दिया। वह आत्महत्या के उद्देश्य से काली मन्दिर गया, किन्तु काली ने प्रसन्न होकर उसे वर दिया और उसी से शास्त्रनिष्णात होकर वापिस पत़्नी के पास आकर बन्द दरवाजा देखकर ’अनावृत्तकपाटं द्वारं देहि’ ऐसा कहा। विद्योत्तमा को आश़्चर्य हुआ और उसने पूछा – ’अस्ति कश़्चिद वाग्विशेष:’। पत़्नी के इन तीन पदों से उसने ’अस्ति’ पद से ’अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा’ यह ’कुमारसम्भव’ महाकाव्य, ’कश़्चिद’ पद से ’कश़्चित्कान्ताविरहगरुणा’ यह ’मेघदूत’ खण्डकाव्य, ’वाग’ इस पद से ’वागर्थाविव संपृक़्तौ’ यह ’रघुवंश’ महाकाव्य रच डाला।

9 thoughts on “कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – १

  1. बहुत रोचक जानकारी -जितनी बार जानंने को मिलती है अच्छी लगती है !
    वर्तनी शुद्ध करें -अनावृत ! (’अनावत्तकपाटं द्वारं देहि)

  2. @अरविंदजी – बहुत धन्यवाद, वर्तनी शुद्ध कर दी गई है, जल्दी में बिना प्रूफ़ रीडिंग के पोस्ट कर दी थी। बस आपका आशीर्वाद बना रहे।

  3. bahut hi gyanvardhak jankari di……….agar in kavyuon ke kuch ansh bhi padhwa dein to kitna achcha ho…….ummeed hai agle bhag mein wo hi padhne ko milenge.

  4. @महेश जी – सन्यास का भाव मनुष्य में तभी आता है जब उसका मन इस भौतिक जगत से हट चुका हो और केवल जीवित रहने की जरुरत लायक वस्तुओं का ही उपयोग करता हो।

    रही बात आयाम की तो ये तो जब भौतिक विषयों का विषाद मन से खत्म हो जाता है तो मन कहीं भी कहीं से भी सोच सकता है, जो कि बंधन में बहुत मुश्किल है।

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आज श्रावण मास का स्वाति नक्षत्र है क्या आप इसके बारे में जानते हैं..

आज श्रावण मास का स्वाति नक्षत्र है और इसमें हुई वर्षा का जल ही चातक याने कि पपीहा पीता है जिसके विषय में प्रसिद्ध है कि यह पृथ्वी पर गिरे हुए जल को नहीं पीता है। जिसके बारे में कालिदास ने “मेघदूतम” के पूर्वमेघ में लिखा है –

11

मन्दं-मन्दं नुदति पवनश्चानुकूलो यथा त्वां

वामश्चायं नदति मधुरं चातकस्ये सगन्ध:।

गर्भाधानक्षणपरिचयान्नून्माबद्धमाला:

सेविष्यन्ते नयनसुभगं खे भवन्तं बलाका:॥

यक्ष मेघ को अलका की ओर प्रस्थान के लिए शुभ शकुन का उल्लेख करते हुए कहता है –

“और जैसे कि अनुकूल वायु तुम्हें धीरे-धीरे प्रेरित कर रहा है तथा गर्व से भरा यह पपीहा तुम्हारे वाम भाग में स्थित होकर मधुर शब्द कर रहा है। निश्चय ही गर्भ धारण करने के आनन्द के अभ्यास के कारण पंक्तिबद्ध बगुलियाँ नेत्रों को सुन्दर लगने वाले आपकी आकाश में सेवा करेंगी॥”

माना जाता है कि जब कभी यात्रा पर निकलें तो बायीं ओर चातक का दिखायी देना शुभ माना जाता है। मोर, चातक आदि पक्षियों का तथा हरिणों का बायीं ओर होना शुभ माना जाता है। यह भी प्रसिद्ध है कि बगुलियां वर्षा में आकाश में पंक्तिबद्ध होकर मेघ के संयोग से गर्भ धारण करती है।

5 thoughts on “आज श्रावण मास का स्वाति नक्षत्र है क्या आप इसके बारे में जानते हैं..

  1. वाह खूब याद दिलाया आपने –
    रे रे चातक सावधान मनसा मित्रक क्षणं श्रूयतां
    बहुधा ही आम्बो सन्ति गगने अपि नैताद्रिषा
    केचिद वृष्टिभिः आर्द्र्यन्ति वसुधा गर्जन्ति केचित वृथा
    यम् यम् पश्यन्ति तस्य तस्य पुरुतो मान ब्रूहि दीनं वचः

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गूगल क्रोम के लोगो के पीछे माइक्रोसोफ़्ट की प्रेरणा !

कलाकार की कल्पना गूगल क्रोम के लोगो के पीछे –

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शेयर बाजार का रुख तेज

शेयर बाजार का रुख जितना तेज व अच्छा दिखाई दे रहा है, उतना है नहीं। बाजार के आखिरी २४-२५ व्यापारिक सत्र का विश्लेश्षण करें तो निवेशकों के साथ होने वाली धोखाधड़ी साफ दिखाई देती है। व्यापार स्त्र ७००-८०० अंक बढ़ता है व फिर उसके बाद लगभग समान अंकों में नीचे आ जाता है। बाजार का स्तर व शेयरों के भाव [Midcap] अभी ५५०० इंडेक्स वाले ही हैं। निवेशक केवल अच्छी कंपनियों [A Group] में ही निवेश करें।

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