भारत के विभिन्न भागों में कार ड्राइविंग :-

मनीष हाड़ा उवाच


भारत के विभिन्न भागों में कार ड्राइविंग :-

* एक हाथ स्टियरिंग व्हील पर,दूसरा हार्न पर.

यू.पी.

* एक हाथ स्टियरिंग व्हील पर, दूसरा खिड़की से बाहर.

पंजाब

* एक हाथ स्टियरिंग व्हील पर, दूसरा अखबार पर,पाँव एक्सीलेटर पर.

तमिलनाडु

* दोनों हाथ स्टियरिंग व्हील पर,आँखें बंद, दोनों पाँव ब्रेक पर.

बिहार

* दोनों हाथ इशारे करते हवा में, दोनों पाँव एक्सीलेटर पर, सिर पिछली सीट के सवार से बात करने के लिए एक सौ अस्सी के अंश पर घूमा हुआ.

हरियाणा

* एक घुटना स्टियरिंग व्हील पर,एक हाथ पेसेंजर सीट पर बैठी गर्ल फ्रेंड की पीठ पर, दूसरा उसके गिरहबान में, दूसरा पाँव दक्षता से बारी-बारी एक्सीलेटर, क्लच,ब्रेक पर.

इंदौर.

* एक हाथ हार्न पर-वहां नहीं तो खिड़की से बाहर -दूसरा गियर स्टिक पर,एक कान स्टीरियो सुनता,दूसरा मोबाइल सुनता,एक पाँव एक्सीलेटर पर,एक क्लच पर,ब्रेक पर कोई नहीं,दोनों आँखें बाजू में स्कूटी चलाती लड़की पर.

धार में आपका स्वागत है

8 thoughts on “भारत के विभिन्न भागों में कार ड्राइविंग :-

  1. विवेक भाई ,
    सेन्स ऑफ़ ह्यूमर और ज्ञान ,किस अंदाज़ में परोसा है . क्या बात है !
    सोचता हूँ की कभी तर्ज़ आपकी ,जुबाँ मेरी में यहाँ अलग अलग अमरीकियों की ड्राइविंग भी बताऊँ .( बशर्ते वल्गर न लगे ) 🙂 .
    मुझे खुशी है की ब्लोगर्स मीट के आपके चित्रों में मैं नहीं हूँ .बासूती घुघूती जी तो चाहती ही नहीं थीं और मेरा चेहरा फोटोजेनिक नहीं है .विस्तृत रिपोर्ट में भी यही ध्यान रखियेगा .
    फ़िलहाल फिर न्यू योर्क पहुँच गया हूँ . बीच में आने तक कोई मीट न रखवा दीजियेगा .

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टकलापुराण और टकले होने के फ़ायदे रोज ४० मिनिट की बचत

    पिछले महीने हम तिरुपति बालाजी दर्शन करके आये थे तो बालाजी को अपने बाल दे आये थे, और तब से हमने सोचा कि अब बस ऐसे ही रहेंगे मतलब गंजे याने कि टकले। पहले कुछ अजीब सा लगा पर अब सब साधारण सा लगने लगा है।



    जब हम वापिस मुंबई आये और अपने पास वाले ए.सी. सैलून में गये और बोले कि जरा हेड क्लीन शेव कर दीजिये पहले तो सैलून वाला हमें प्रश्न भरी दृष्टि से देखता रहा फ़िर वापिस से उसने पूछा कि क्या करना है तो हम शुद्ध हिन्दी में बोले टकली करनी है, याने कि हेड क्लीन शेव

    वो अपना सिर खुजाते हुए अपने सैलून के मालिक से मुखतिब हुआ और आँखों में ही उससे पूछा कि क्या अजीब ग्राहक है और कैसे इन भाईसाहब की टकली करुँ। तो वह खुद आ गया और फ़िर हमारे सिर पर पहले तो पानी का स्प्रे किया और फ़िर जिलेट का फ़ोम हाथ में लेकर पूरे सिर पर लगा दिया और फ़िर उस्तरे में नया आधा ब्लेड लगाकर पूरे सिर की शेव करना शुरु कर दिया, एक बार और यही प्रक्रिया दोहराई गई, फ़िर आफ़्टर शेव लगाया तो थोड़ी से जलन हुई पर अच्छा लगा। उसी समय हमारी ही बगल में एक मोटे से थुलथुल से नौजवान जो कि लगभग ४० वर्ष के होंगे, हमारे टकलापुराण को देख रहे थे और अपनी भैया वाली भाषा में बोले भाई साहब आपको देखकर हमें भी इन्सपीरेशन मिल रही है कि कम बाल होने पर बालों को सँवारने से अच्छा है कि उन्हें गायब ही कर दिया जाये।

    कोई जान पहचान वाला मिले तो वो पूछते ही रह जायें आल इज वेल, तो हम कहते कि जी हाँ आल इज वेल, यह तो हमारी नयी हेयर स्टाईल है। तो अब तक हम तीन बार सैलून पर टकलापुराण करवा चुके हैं और गंजे होने के फ़ायदे पर विश्लेषण बता रहे हैं –

  1. १.  १.  रोज सुबह उठने के बाद १० मिनिट की बचत, क्योंकि जब सोकर उठते हैं तो हमेशा बाल बेतरतीब ही रहते थे और सुबह की सैर पर जाने के पहले बाल धोकर फ़िर सुखाकर अच्छे से कंघी करना पड़ते थे।
२. 

  1. २.  २. नहाते समय शैम्पू की बचत और नहाने के बाद बाल सुखाने का समय, तेल की बचत और कंघी न करना। इन सबका समय हुआ लगभग १५ मिनिट।

  1. .३ ३. फ़िर दिनभर २-४ बार कंघी करना और बालों के प्रति चिंतित रहना कि कैसे हो रहे हैं, लगभग १० मिनिट की बचत।

  1. ४. ४.  शाम को घर पहुँचकर वापिस से बालों को सँवारने का समय लगभग ५ मिनिट।

  1. ५. ५.  हर १५-२० दिन में बालों को रंग करना क्योंकि बाल सफ़ेद हो गये हैं, बचत लगभग १ घंटा ।

तो तो आप ही बताईये कुल मिलाकर अगर टकले रहकर ४० मिनिट की बचत होती है तो कैसा है, आप भी इस बात पर ध्यान दीजिये और अपने अनुभव बताईये।

14 thoughts on “टकलापुराण और टकले होने के फ़ायदे रोज ४० मिनिट की बचत

  1. आप हमें चिढा रहे हैं या बता रहे हैं?? वैसे अभी तक तो मेरी शादी भी नहीं हुई है, आपकी हो गई है इसीलिए ऐसा लिख रहे हैं.. 🙁

  2. टकले से कोई पंगा नही लेता जी, बगल से निकल जते है लोग,
    एलर्जी का हमला कम होता है टकले को, मेरे सर पर बाल तो बहुत होते है, लेकिन मै उन्हे ३ मिली मीटर से ज्यादा नही बढने देता

  3. गिरीश जी की बात को मानें तो टकल होने से साबुन का खर्चा बढ़ जायेगा। पता ही न चलेगा कहां तक लगायें।

  4. अब बचत-वचत के बारे मे तो नही जानता मगर आपको ये नया हेयर स्टाईल सूट कर रहा है।सालों पुराने शाकाल की याद ताज़ा कर दी आपने।हा हा हा हा हा।भगवान बालाजी के दर्शन के बाद हम भी टकले हुये थे,देखते हैं अब कब बुलाते है गोविंदा।

  5. ब्लॉगिंग से गुस्सा हो कर बीबी बाल भी खींच सकती है, वो बचत बोनस में. 🙂

  6. इस टकला पुराण में यह भी तो जोड़िए-
    बीबी /प्रेमिका को अधर सुख देने का एक विस्तृत मैदान मिला जाता है .
    नगई लुच्चई करने पर बाल खीचे जाने का खतरा नहीं है -जैसे ब्रितानी स्किन हेड्स गुंडे मव्वाली
    खेल के मैदान में बालीबाल आदि की अच्छी पुशिंग आदि आदि ….
    कई लडकियां भी इस स्टाईल को पसंद करती हैं -रायशुमारी भी करा सकते हैं!

  7. कम बालों के लिए एक गंवई कहावत है .. थोडे तेल में चिकन चाकन, गर्दन मोटा होय, पकड सके ना कोई .. तकले होने पर तो फायदे दुगुने हो जाएंगे !!

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क्या खोया क्या पाया अपनी अभी तक की जिंदगी में…. अपना खुद का निजी हिसाब किताब..

आज ऐसे ही अपनी बीती हुई जिंदगी का मतलब निजी हिसाब किताब कर रहे थे। तो हमने पाया कि बहुत कुछ हमने खोया है और बहुत कुछ पाया है।

और शायद जो खोया है अब हमें मिल भी नहीं सकता है और जो हमने पाया है कभी भी हमसे छिन सकता है या खो सकता है, शायद यह सभी के साथ होता है।

जो खोया है वह है हमने अपनों के करीब रहने का सुख, खुद के लिये समय और परिवार के लिये नितांत निजी समय, पर अपने खुद में इतना उलझ गये हैं कि ये सब बेमानी हो गया है। और जो मिला वो है अपने आप की दुनिया, नेट की दुनिया, जिसे हम कभी भी खो सकते हैं। वैसे तो इस नश्वर शरीर का भी कोई भरोसा नहीं है, परंतु प्यार तो हो ही जाता है।

इसीलिये तो भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है इस दुनिया को “दुखालयम”, मतलब कि दुखों का घर। इस भौतिक दुनिया में दुखों के बिना जीवन संभव नहीं है।

खैर हमने खोया भगवान की भक्ति को भी, पर फ़िर भी उनके प्यारे भक्तों के मधुर धुनों और बातों को सुनते रहते हैं, नेट से शायद हमने सबसे अच्छी चीज यही पायी है। हम भले ही कितनी दूर हों पर भगवान की मधुर बातें उनके चर्चाकारों द्वारा की गई हमारे पास सभी जगह उपलब्ध हैं।

शायद बाहरी तौर पर केवल इतना ही प्रकट कर सकते हैं, क्योंकि और ज्यादा हम बताना नहीं चाहते हैं। खोते तो सभी हैं और पाते भी सभी हैं, हम कोई अनोखे थोड़े ही हैं, ये तो बस माया का खेल है। अगर कुछ बताना चाहें अपने खोये पाये के बारे में तो अवश्य टिप्पणी में बतायें।

9 thoughts on “क्या खोया क्या पाया अपनी अभी तक की जिंदगी में…. अपना खुद का निजी हिसाब किताब..

  1. भाई विवेक यही कहता है कि हम ये जीवन भगवान की मर्ज़ी से जी रहे है और हम निमित्त मात्र है लेना देना सब भगवान का सो खोय पया वो ही जाने

  2. और शायद जो खोया है अब हमें मिल भी नहीं सकता है और जो हमने पाया है कभी भी हमसे छिन सकता है या खो सकता है, शायद यह सभी के साथ होता है।
    kitna sach hai!


  3. खोना और पाना एक दूसरे के साक्षेप है, जैसे रात और दिन.. कालिमा और धवल.. इत्यादि !
    एक ही बिन्दु पर ठहर कर मनन करते रहने से बेहतर कि खोने के कारणों से कुछ सीख लेकर पाने की ओर सतत बढ़ते रहना !

  4. जीवन में क्या खोया क्या पाया ….
    उस उपरवाले की माया है …
    जो मिला जीवन से उसे उसका आशीष समझ कर लिया …फिर क्या हिसाब रखन क्या खोया क्या पाया …!!

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ४२ [चम्पानगरी जाते हुए प्रकृति का सुन्दर चित्रण… ]

    दूसरे दिन ही मैं और शोण दोनों हस्तिनापुर से चल दिये। यात्रा बहुत लम्बी थी इसलिए हमने श्वेत घोड़े लिये। हम दोनों को ही अब अश्वारोहण का अच्छा अभ्यास हो गया था। मुझे तो सब प्राणियों मॆं अश्व बहुत ही अच्छा लगता था। वह कभी नीचे नहीं बैठता है । सोते समय भी वह खड़े-खड़े ही एक पैर के खुर को मोड़कर नींद ले लेता है। अश्वों के सभी स्वाभाव का मैंने बड़ा सूक्ष्म निरीक्षण किया था। कितना ही उच्छश्रंखल क्यों न हो, उसको वश में कैसे किया जाता है, यह मैं अब अच्छी तरह जान गया था। और फ़िर वह हमारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आता हुआ व्यवसाय था। प्रत्येक को अपने व्यवसाय में प्रवीण होना ही चाहिए – संजय काका ने सारथी के रुप में यह जो उपदेश दिया था, उसको मैं कैसे भूल सकता था।

    हम लोग हस्तिनापुर की सीमा से बाहर निकले। वसन्त ऋतु के दिन थे वे। चारों ओर भिन्न-भिन्न रंगों के फ़ूल सुशोभित थे। बावा के वृक्ष छोटे-छोटे पीले फ़ूलों से लदे हुए थे। खैर के वृक्ष हलके लाल फ़ूलों से भरे हुए थे। अंजनी के वृक्षों पर नील कुसुम सुशोभित हो रहे थे। उन समस्त वृक्षों पर प्रकृति-देवता की इतनी कृपादृष्टि देखकर पलाश शायद अत्यधिक क्रुद्ध हो उठा था। उसका सम्पूर्ण शरीर रक्तवर्णी लाल सुमनों से आच्छादित था। यही कारण था कि सभी वृक्षों में वह अकेला ही अत्यधिक आकर्षक दिख रहा था।

    उन समस्त पुष्पों की एक सम्मिश्रित सुगन्ध वातावरण में तैर रही थी। श्येन, क्रौंच, भारद्वाज, कोकिल, कपोत आदि भिन्न-भिन्न प्रकार के पक्षियों के सम्मेलन का तो यह समय था ही। अपने-अपने गीत वे पंचम स्वर में गा रहे थे। वसन्त ! वसन्त का अर्थ है – प्रकृति-देवता की स्वच्छन्द रंगपंचमी ! वसन्त अर्थात एक-दूसरे का हाथ पकड़े खड़े हुए सप्तस्वरों के खिलाड़ियों का कबड्डी-संघ ! वसन्त है – काल के बाड़े में अटका हुआ निसर्ग देवता के अतलसी वस्त्र का एक सुन्दर धागा। अथवा वर्षाऋतु में चंचल वर्षा ने अपनी निरन्तर गिरती धाराओं की उँगलियों से वर्षाऋतु को जो गुदगुदी की थी, उससे हँसी आने के कारण इधर-उधर पैर पटकते समय नीचे गिरा हुआ उसके पैर का सुन्दर नूपुर ! छि:, किसी तरह भी उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। वसन्त तो बस वसन्त ही है!

    निसर्ग देवता के मनोहर रुपों को देखते हुए हम अपनी यात्रा कर रहे थे। रात होने पर समीप ही किसी नगर में ठहर जाते थे। इसी प्रकार आठ दिन बीत गये। अनेक नदियाँ और पर्वत पार कर हम नौवें दिन प्रयाग पहुँचे। प्रयाग ! यहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती इन तीन नदियों का संगम था। यहाँ से चम्पानगरी अब केवल पचीस योजन दूर रह गयी थी।

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मेरी तस्वीर जो केवल मेरे मन के आईने में नजर आती है….मेरी कविता ….. विवेक

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मेरी तस्वीर जो केवल,

मेरे मन के आईने में नजर आती है,

दुनिया को कुछ ओर दिखता है,

पर अंदर कुछ ओर छिपा होता है,

मेरा स्वरुप पारदर्शी है,

पर आईने को सब पता होता है,

जैसा मैं हूँ वैसा मैं ,

तत्व दुनिया को दिखाता नहीं हूँ,

आईना आईना होता है,

पर वो अंतरतम में कहीं होता है,

तस्वीर चमकती रहती है,

जिसे दुनिया तका करती है।

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १२

      हमारा रथ राजाप्रसाद के महाद्वार से भीतर प्रविष्ट हुआ। द्वारपालों ने आदर से झुककर पिताजी को अभिवादन किया। रथ अश्वशाला के पास रुका। सामने ही राजाप्रसाद में जाने के लिये ऊपर चढ़ती हुई असंख्य सीढ़ियाँ थीं| यों ही मेरे मन में आया और मैं उनको गिनने लगा । एक सौ पाँच थीं वे ! एकाध सीढ़ी कहीं छूट तो नहीं गयी, इस सन्देहवश मैं उनको पुन: गिनने लगा। अरे ! पिछली बार जब गिनीं थी, तब एक सौ पाँच थीं । अब एक सौ छ: कैसे हो गयीं ? मैं विचार करने लगा । पर मुझे क्या करना है ! यह सोचता हुआ अपना उत्तरीय सँभालता मैं हस्तिनापुर की उस वैभवशाली और पवित्र भूमि पर पैर रखने ही वाला था कि इतने में ही सात काले घोड़ों का रथ एकदम वायु की गति से, घड़-घड़ की ध्वनि करता हुआ महाद्वार से भीतर प्रविष्ट हुआ। किसी प्रतिहारी ने पुकार लगा दी, “हस्तिनापुराधिपति महाराज धृतराष्ट्रपुत्र युवराज शिरोमणी दुर्योधनऽऽ !” समस्त सेवक और द्वारपाल एकदम सावधान होकर खड़े हो गये। पिताजी ने भी रथ की ओर झुककर अभिवादन किया।

     “कहिए चाचाजी, चम्पानगरी से कब आये ?” युवराज ने रथ से उतरते हुए हँसकर पूछा ।

     “अभी-अभी ही आया हूँ, युवराज !” पिताजी ने सविनय उत्तर दिया।

        मैं रथ से उतरते ही युवराज दुर्योधन को देखने लगा । वह चौदह-पन्द्रह वर्ष का होगा। उसने वीर-भेष धारण कर रखा था। उस वेष में वह विष्णु की तरह सुशोभित हो रहा था। हाथ में गुम्बदवाली गदा के कारण तो वह बहुत ही प्रभावशाली दिखाई पड़ रहा था। एक ही झटके में कीदकर वह नीचे उतर आया और पिताजी के पास आया। उसकी गति ऐसी गर्वीली और मोहक थी, जो अन्यत्र दुर्लभ होती है। उसका प्रत्येक चरण मत्त हाथी के चरण की तरह दृढ़ता से पृथ्वी पर पड़ रहा था। भुजदण्ड पर से बार-बार फ़िसलते उत्तरीय को सँभालते हुए वह अपने हाथों को सगर्व झटके दे रहा था। उसकी कंजी आँखें बड़ी भेदक और पानीदार थीं। नाक भाले के फ़लक की तरह सीधी और पैनी थी। लेकिन न जाने क्यों, उसकी केवल एक बात अच्छी नहीं लगी, वह यह कि सारे संसार को किसी अजगर की तरह अपनी कुण्डली में कस लेने की इच्छा करनेवाली उसकी भौहें बड़ी ही मोटी और कुटिल थीं ।

मेरी ओर देखते हुए उसने पिताजी से पूछा, “चाचाजी ! यह कौन है ?”

“यह मेरा पुत्र कर्ण है, युवराज !” पिताजी ने उत्तर दिया।

“कर्ण ! बहुत अच्छा । लेकिन इसको आज किसलिए लाये हैं ?”

“आपकी राजनगरी दिखाने के लिए ।“

“ठीक है, अमात्य से मिल लीजिए । वे इसको सारा नगर दिखा देंगे ।“

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  1. इस उपन्यास को मैने मूल मराठी मे पढा था बचपन मे । इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे पढने के बाद कर्ण के आगे महाभारत के सारे पात्र गौण हो जाते हैं ।

  2. @ शरद कोकास जी,

    आप सही कह रहे हैं. शिवाजी सांवत साहब के लेखन की ये विशेषता है. जैसे छावा मे उन्होने संभाजी के चरित्र को निखार कर पेश किया है.

    बहुत बढिया.

    रामराम.

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३२

गाढोत्कण्ठाम़् – विरह वेदना से उत्पन्न प्रिय या प्रिया से मिलन की उत्कट इच्छा ही उत्कण्ठा कहलाती है। उत्कण्ठा का लक्षण इस प्रकार है –
रागेष्वलब्धविषयेषु वेदना महती तु या।
संशोषणी तु गात्राणां तामुत्कण्ठां विदुर्बुधा:॥
अर्थात जिससे प्रेम हो उसके न मिलने पर मन में ऐसी वेदना होने लगती है कि जिससे शरीर सूखता जाता है, उसे उत्कण्ठा कहते हैं।

बालाम़् –  षोडशी नवयुवती को कहते हैं। स्त्रियाँ १६ वर्ष तक बाला, ३० वर्ष तक

तरुणी, ५० वर्ष तक प्रौढ़ा तथा उससे ऊपर वृद्धा कहलाती है।


शिशिरमथिताम़् – आचार्य मल्लिनाथ ने शिशिर का अर्थ शीत ऋतु लिया है। विश्व कोश में शिशिर का अर्थ पाला भी है जो कि अधिक उपयुक्त जान पड़ता है, क्योंकि पाला कमलिनी को मार देता है।

अन्यरुपाम़् – यक्ष मेघ को बताता है कि उसकी प्रिया वियोग में इतनी दुर्बल हो गयी होगी कि उसका रुप जो कि पूर्व वर्णित (तन्वी श्यामा आदि) से अत्यन्त बदल गया होगा इसलिए उसे ध्यानपूर्वक देखकर पहिचानना।

असकलव्यक्ति – जैसा कि पीछे बताया गया है कि प्रेषितभर्तृका नायिका श्रृंगार नहीं करती है। अत: यक्षिणी ने भी श्रृंगार नहीं किया होगा तथा बालों को नहीं सँवारा होगा। इस कारण लटकते हुए बालों ने उसके मुख को ढक लिया होगा, जिससे वह पूर्ण रुप से दिखाई नहीं देगा।

बलिव्याकुला – बलि का अर्थ होता है – देवताओं की आरधाना; क्योंकि यक्षिणी का पति शाप के कारण बाहर गया था इसलिए सकुशल लौट आने के लिये सम्भवत: यक्षिणी बलि कार्य करती हो।

8 thoughts on “कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३२

  1. कालिदास के युग में बाला की परिभाषा <१६ वर्ष की रही होगी। पर वर्तमान सौन्दर्यप्रसाधनो की बदौलत बाला की आयु सीमा बढ़ गयी है। अब यह सिने तारिकाओं के लिये तो शायद प्रौढ़ा तक सरक गयी है!

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बार में – २

          महाकवि कालिदास के बारे में और भी किवदंतियां प्रचलित हैं-
          एक किंवदन्ती के अनुसार इनकी मृत्यु वेश्या के हाथों हुई। कहते हैं कि जिस विद्योत्तमा के तिरस्कार के कारण ये महामूर्ख से इतने बड़े विद्वान बने, उसकी ये माता और गुरु के समान पूजा करने लगे। ये देखकर उसे बहुत दु:ख हुआ और उसने शाप

दे दिया कि तुम्हारी मृत्यु किसी स्त्री के हाथ से ही होगी।

      एक बार ये अपने मित्र लंका के राजा कुमारदास से मिलने गये। उन्होंने वहाँ वेश्या के घर, दीवार पर लिखा हुआ, ’कमले कमलोत्पत्ति: श्रुयते न तु दृश्यते’ देखा। कालिदास ने दूसरी पंक्ति ’बाले तव मुखाम्भोजे कथमिन्दीवरद्वयम़्’ लिखकर श्लोक पूर्ण कर दिया। राजा ने श्लोक पूर्ति के लिये स्वर्णमुद्राओं की घोषणा की हुई थी। इसी मोह के कारण वेश्या ने कालिदास की हत्या कर दी। राजा को जब यह ज्ञात हुआ तो उसने भी आवेश में आकर कालिदास की चिता में अपने प्राण त्याग दिये।
    परन्तु कालिदास की रचनाओं का अध्ययन करने पर यह किंवदन्ती नि:सार प्रतीत होती है; क्योंकि इस प्रकार के सरस्वती के वरदपुत्र पर इस प्रकार दुश्चरित्रता का आरोप स्वयं ही खण्डित हो जाता है।
    एक अन्य जनश्रुति के अनुसार कालिदास विक्रमादित्य की सभा के नवरत़्नों में से एक थे । इस किंवदन्ती का आधार ज्योतिर्विदाभरण का यह श्लोक है –
धन्वन्तरिक्षपणकामरसिंहशकुर्वेतालभट्टं घटखर्परकालिदासा:।
ख्यातो वराहमिहिरो नृपते: सभायां रत़्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य॥
     वैसे तो कालिदास के काल के बारे में विद्वानों में अलग अलग राय हैं परंतु कालिदास के काल के बारे में एक तथ्य प्रकाश में आया है, जिसका श्रेय डॉ. एकान्त बिहारी को है। १८ अक्टूबर १९६४ के “साप्ताहिक हिन्दुस्तान” के अंक में इससे सम्बन्धित कुछ सामग्री प्रकाशित हुई। उज्जयिनी से कुछ दूरी पर भैरवगढ़ नामक स्थान से मिली हुई क्षिप्रा नदी के पास दो शिलाखण्ड मिले, इन पर कालिदास से सम्बन्धित कुछ लेख अंकित हैं। इनके अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि “कालिदास अवन्ति देश में उत्पन्न हुए थे और उनका समय शुड़्ग़ राजा अग्निमित्र से लेकर विक्रमादित्य तक रहा होगा।”  इस शिलालेख से केवल इतना ही आभास होता है कि यह शिलालेख महाराज विक्रम की आज्ञा से हरिस्वामी नामक किसी अधिकारी के आदेश से खुदवाया गया था।
      शिलालेखों पर लिखे हुए श्लोकों का भाव यह है कि महाकवि कालिदास अवन्ती में उत्पन्न हुए तथा वहाँ विदिशा नाम की नगरी में शुड़्ग़ पुत्र अग्निमित्र द्वारा इनका सम्मान किया गया था। इन्होंने ऋतुसंहार, मेघदूत, मालविकाग्निमित्र, रघुवंश, अभिज्ञानशाकुन्तलम़्, विक्रमोर्वशीय तथा कुमारसम्भव – इन सात ग्रंथों की रचना की थी। महाकवि ने अपने जीवन का अन्तिम समय महाराज विक्रमार्क (विक्रमादित्य) के आश्रय में व्यतीत किया था। कृत संवत के अन्त में तथा विक्रम संवत के प्रारम्भ में कार्तिक शुक्ला एकादशी, रविवार के दिन ९५ वर्ष की आयु में इनकी मृत्यु हुई। कालिदास का समय ईसा पूर्व ५६ वर्ष मानना अधिक उचित होगा।

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  1. बहुत अच्छा -कृपा कर संस्कृत के श्लोको का हिन्दी अनुवाद भी दिया करें -भले समय थोडा अधिक लगे . कालिदास कौन थे ,कहाँ के थे यद्यपि यह विवादास्पद है मगर उनकी रचनाओं की श्रेष्ठता और गुणवता में कहीं कोई विवाद नहीं है -हम निश्चिंत होकर उनकी रचनाओं का तो अवगाहन कर ही सकते हैं -आम खाने से मतलब है मेरा !

  2. @अरविंदजी – आपका स्नेह बना रहे और श्लोकों का हिन्दी अनुवाद का अब आगे से ध्यान रखूँगा, वैसे तो मेरी कोशिश रहती है कि अनुवाद के साथ ही प्रकाशित किया जाये पर कई बार ऐसा नहीं हो पाता है।

  3. bahut hi uttam jankari aap muhaiya karwa rahe hain……..dhanyawaad……….unke kuch khas charchit kavya ko hindi mein aur padhwa dein to hum aapke shukragujar honge.

  4. कमले कमलोत्पत्ति: श्रुयते न तु दृश्यते
    अर्थ – कमल में ही कमल का फूल खिलते नहीं देखा है.

    बाले तव मुखाम्भोजे कथमिन्दीवरद्वयम़्
    अर्थ – हमारा चेहरा भी तो कमल के सामान है और हमारे चहरे में ही ये आखें कमल के सामान खिल रहीं हैं…

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