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About Vivek Rastogi

मैं २००६ से हिन्दी ब्लॉगिंग कर रहा हूँ, और वित्त प्रबंधन मेरा प्रिय विषय है। मेरा एक यूट्यूब चैनल भी है जिसे आप https://youtube.com/financialbakwas देख सकते हैं।

गोल्ड लोन – चमक असली या नकली

    आजकल टीवी और रेडियो पर कितने ही लुभावने विज्ञापन आते हैं कि जब भी आपको रुपयों की जरुरत हो तो गोल्ड लोन लेना कितना साधारण है और एकदम और कभी भी ले सकते हैं। उतना ही महत्वपूर्ण है कि गोल्ड लोन के पीछे की सच्चाई जानना, क्या वाकई गोल्ड लोन लेना बहुत अच्छा है और सुरक्षित है ?

    “जब घर में पड़ा है सोना तो काहे का रोना” आजकल अक्षय कुमार टीवी और रेडियो के विज्ञापनों में मन्नपुरम फ़ाईनेंस के गोल्ड लोन के लिये कहते हुए नजर आते हैं। जितना साधारण गोल्ड लोन दिखता है कि बस गोल्ड को गिरवी रखा और उसके बदले में आनुपातिक रुप में फ़ाईनेंस कंपनी लोन दे देती है, उतना साधारण भी नहीं है, इसमें बहुत सारे जोखिम और कमियाँ हैं।

    पहले तो गोल्ड लोन केवल सुनारों और साहूकारों की बपौती थी, जो कि लोन का दोगुना तक वसूलते थे। पर अब सरकारी बैंक, निजी बैंक और बहुत सारी निजी फ़ाईनेंस कंपनियाँ गोल्ड दे रही हैं।

    गोल्ड लोन आपके सोने के गहने या शुद्ध सोना जैसे कि ईंट को गिरवी रखकर दिया जाता है। और यह जरुरी नहीं कि जो सोना आप गिरवी रखकर लोन लेने जा रहे हैं वह आपने घोषित किया हो, परंतु अगर सोना ज्यादा मूल्य का हो और लोन भी तो टैक्स विभाग बैंकों और फ़ाईनेंस कंपनियों से जानकारी लेकर आपके पीछे पड़ सकता है।

    गोल्ड लोन एक ऐसा उत्पाद है जो कि बहुत ही जल्दी आपको मिल जाता है। जल्दी से लोन मिलने का एकमात्र कारण है कि लोन आपको सोने को गिरवी रखकर मिलता है। लोन की रकम सोने की मात्रा और शुद्धता के ऊपर निर्धारित किया जाता है। पर यहाँ पर सबसे बड़ी बात यह है कि गोल्ड लोन देने वाली संस्थाएँ इस बात का ध्यान नहीं रखती हैं कि ऋणी ऋण चुका भी पायेगा या नहीं ?

    सोने का मूल्यांकन के पैमाने सभी कंपनियों के अलग अलग होते हैं, अगर आपका सोना हालमार्क है तो आपके सोने की कीमत अच्छी आंकी जायेगी और ज्यादा लोन मिल पायेगा। परंतु अगर सोना हालमार्क नहीं है तो आपको बहुत सतर्क रहने की जरुरत है क्योंकि आपके ज्यादा कीमत वाले सोने का मूल्यांकन बहुत ही कम किया जा सकता है और आपका सोना जो कि कीमत में बहुत ज्यादा है वह संस्था गिरवी रख लेगी। गोल्ड लोन केवल सोने के गहने के बदले ही मिल सकता है। अगर गहने में कोई महँगा पत्थर जड़ा है तो उसकी कीमत नहीं आंकी जाती है, और भार में पत्थर का भार कम कर दिया जाता है। मूल्यांकन केवल सोने का ही किया जाता है।

    लोन में कितनी रकम मिल सकती है यह सोने की मात्रा और शुद्धता पर निर्भर करता है, जो कि गिरवी रखा जाना है। जो कि  सोने के मूल्यांकन का ६० प्रतिशत से १०० प्रतिशत तक हो सकता है। यह सब तो ठीक है, परंतु यहाँ सोने के मूल्य के अनुपात जिस पर लोन दिया जा रहा है उसके लिये बाजार का अपना एक स्वाभाविक जोखिम है। जैसा कि बाजार में पिछले कुछ दिनों में देखने को मिला है कि सोना कभी बहुत ज्यादा ऊपर और फ़िर कम भाव हो जाते हैं। सोने के भाव में कमी होने पर ऋणकर्ता और ऋणदाता दोनों जोखिम में आ जाते हैं। बाजार में आजकल यही सोचा जाता है कि सोने का भाव केवल ऊपर ही जायेगा जो कि बाजार और ऐसी संस्थाओं के लिये बहुत ही बड़ा जोखिम है।

    गोल्ड लोन की अवधि साधारणतया: १ माह से लेकर २ वर्ष तक की होती है, और अगर लोन की अवधि बढ़ानी है तो बढ़ा भी सकते हैं, परंत उसके लिये ये संस्थाएँ कुछ अतिरिक्त शुल्क लेती हैं।

    गोल्ड लोन पर ब्याज दर ११ प्रतिशत से २८ प्रतिशत प्रतिवर्ष तक हैं। ब्याज दर गोल्ड लोन की रकम पर निर्भर करती है, जितना सोना आपने गिरवी रखा है और उसके बदले में मिलने वाली रकम अगर ज्यादा होगी तो ज्यादा ब्याज और कम रकम पर कम ब्याज। साथ ही यह निर्भर करता है गोल्ड लोन के अनुपात पर अगर अनुपात ज्यादा है तो ब्याज ज्यादा होगा और कम अनुपात होगा तो लगभग १२ प्रतिशत ब्याज होगा। ज्यादा समय के लिये ज्यादा ब्याज देय होता है और कम समय के लिये कम ब्याज देय होता है।

   ऋण देने वाली संस्थाओं और बैंकों को सुनिश्चित करना होता है कि सोना शुद्ध है और नकली नहीं है, नहीं तो उनके लिये तो पूरा ऋण ही घाटा है।

  ब्याज दर के अलावा अतिरिक्त शुल्क क्या हैं यह भी पहले पता लगा लेना चाहिये जैसे कि प्रोसेसिंग चार्जेस, समय के पहले ऋण अदा करने पर शुल्क जो कि गोल्ड लोन के ०.५ से १ प्रतिशत तक कुछ भी हो सकता है। फ़िर अगर लोन को रिनिवल करवाना है तो लोन की अवधिक के अनुसार उसका भी अतिरिक्त शुल्क लिया जाता है। और अगर इसी दौरान ऋणकर्ता को कुछ हो जाये तो ऋणदाता उसके लिये बीमा करवाते हैं, जिससे लोन की रकम भरी जा सके और सोना ऋणकर्ता के परिवार को लौटा दिये जाते हैं, बीमा का शुल्क भी अतिरिक्त होता है।

    गोल्ड लोन अधिकतर ईएमआई आधारित नहीं होता है। लोन की अवधि में कभी भी भुगतान किया जा सकता है। जैसे कि अगर एक वर्ष के लिये लोन लिया है तो आप एक वर्ष में  उस लोन का कभी भी भुगतान कर सकते हैं।

     गोल्ड लोन में चूककर्ता बहुत ही कम होते हैं, ३० प्रतिशत ॠणकर्ता तो उसी माह में लोन चुकता कर देते हैं और बाजार में २ प्रतिशत से भी कम ॠणकर्ता गोल्ड लोन में चूककर्ता होते हैं। अगर चूक होती भी है तो ऋणदाता गिरवी में रखा गया सोना या गहना बेचकर अपनी रकम वसूल कर लेते हैं।  पर गिरवी  रखे गये सोने की नीलामी की भी लंबी प्रक्रिया है पहले चूककर्ता को रजिस्टर्ड पत्र भेजा जाता है, साथ ही उनसे बात करके मामले को सुलझाने की कोशिश की जाती है, उन्हें कहा जाता है कि कम से कम ब्याज तो चुकायें तो फ़िर उन्हें और ॠण चुकाने के लिये समय देने की कवायद शुरु की जाती है।

    गोल्ड लोन सस्ता लोन नहीं है, और गोल्ड लोन तभी लेना चाहिये जब आप निश्चित हों कि निश्चित समय के बाद आप रकम वापिस भरकर गोल्ड लोन चुका सकते हैं। हाँ और किसी लोन से यह लोन लेना बहुत ही सरल है और लोन जल्दी भी मिल जाता है। और अगर समय पर लोन नहीं चुकाया जाता है तो आप अपने महँगे सोने के गहनों को कम रकम के लोन के चक्कर में गँवा सकते हैं।

आदमी की धूर्तता

    कल बेटे की स्कूलबस के स्टॉप पर लेने के लिये खड़ा था, वहीं ऑटो स्टैंड भी है। बस आने में समय था तो मैं अपने मोबाईल पर ही चैटिंग करने लग गया और साथ ही ऑटो भी देख रहा था, बिल्कुल नया चकाचक ऑटो था, और चालक शकल से ही घाघ लग रहा था, वह ऑटो में बैठे बैठे अंगड़ाईयाँ ले रहा था, उसका काम करने का कोई मूड लग ही नहीं रहा था, ऐसा लग रहा था कि वह खुद को ही वहाँ खड़ा कर अपने आप को बेबकूफ़ बना रहा है कि सवारी का इंतजार कर रहा हूँ, पर जाने क्यों मुझे लगा कि यह सवारी लेकर नहीं जायेगा।
अब चूँकि बहुत देर तक वहीं खड़ा था तो मन में बहुत सारे विचार आये और लीन भी हो गये।

थोड़ी देर बाद ही एक महिला अपने बच्चे के साथ बात करती हुई तेजी से आई और ऑटो वाले से किसी जगह का नाम लेकर पूछा भैया चलोगे, ऑटो वाले ने सहमति में अपनी गर्दन हिलाई और महिला ऑटो में बैठने लगी तो उसी समय हिकारत वाली नजरों से ऑटो वाले ने देखते हुए कहा कि १७० रुपये लगेंगे, महिला तेजी से उतरी और बिना बोले अपने बच्चे के साथ वहाँ से मुख्य सड़क की ओर चली गई। शायद वह महिला इन ऑटो वालों के नाज नखरों से अभ्यस्त होगी।
जब वह महिला वहाँ से चली गई, तो ऑटो वाला मुझसे मुखतिब हुआ बोला “मीटर से १४०-१५० रुपये किराया बनता और मैंने १७० रुपये ही तो मांगे थे, जान निकल गई”। मैं कुछ बोला नहीं क्योंकि मेरा मन भी खिन्न हो चुका था और अगर मैं कुछ बोलता तो यह तो तय था कि मैं जबरदस्त तरीके से झगड़ा करता, और मैं झगड़ा करना नहीं चाहता था।
मन ही मन सोच रहा था कि अगर इसी व्यक्ति को आज से हरेक चीज १०-१५ प्रतिशत महँगी दी जाने लगे जो कि उसके तय दामों से ज्यादा होगी तो क्या यह ऐसे ही आराम से दे देगा, क्या इसकी “जान नहीं निकलेगी” ? क्या केवल वही मेहनत से पैसा कमाता है और सब लोग आराम से या बेईमानी से कमाते हैं ? ऐसे लोगों के लिये, ऐसी मानसिकतावालों के लिये कठोर कानून होना चाहिये, एक तो महँगाई और ऊपर से ऐसे लूटने वाले…. सरकार तो लूट ही रही है… और सरकार ने ऐसी सेवा देने वालों को भी खुली छूट दे रखी है।

क्या वाकई ऐसा कोई कानून बन सकता है और उसे अमली जामा पहनाया जा सकता है जिससे जनता की मदद हो… ?

दे घुमा के … घुमा के … दे घुमा के… और ऊँगली में टिंगली

ऐसा लगता है कि ये गाना भारतियों के लिये बनाया गया है कि जब खिलाड़ी प्रदर्शन न करें तो दर्शकों को इस गाने पर अमल करना चाहिये और बस शुरु हो जाना चाहिये दे घुमा के … घुमा के … दे घुमा के…

विश्वकप तो लगता है कि भारत की तरफ़ से केवल २-३ खिलाड़ी ही खेल रहे हैं, बाकी टीम तो केवल इसलिये खेल रही है, क्योंकि चयनकर्ताओं ने उन लोगों को चुन लिया है और विश्वकप के रोमांच का मजा लेना चाहते हैं।

जब हमारे बल्लेबाज ही नहीं चल रहे हैं, तो भी कप्तान कहते हैं कि गेंदबाजों पर ज्यादा भरोसा नहीं है, पर भई बल्लेबाजों ने क्या उखाड़ लिया।

और अगर कुछ निर्णय गलत लिये गये जो कि मैच के दौरान तात्कालिक थे तो उसकी जिम्मेदारी तो केवल कप्तान की ही होती है। पर केवल कप्तान के गलत निर्णय के कारण भारत का हार जाना कितना सही है ? क्या कप्तान बचपना कर रहे हैं या फ़िर विश्चकप उन्हें मौहल्ला क्रिकेट लग रहा है।

बीच में एक समाचार चैनल पर सुना कि लगता है कि भारत की टीम अगले विश्वकप के लिये अभ्यास कर रही है, और अभी ये सब लोग जिम्मेदारी नहीं समझते हैं।

बस इनको श्टाईल विज्ञापन में मारना आता है, जैसे हरभजन सिंह का आता है पेप्सी का “दूसरा”, ऊँगली में टिंगली।

छोड़ो भारत छोड़ो ये क्या विश्वकप जीतेंगे, इनसे कोई उम्मीद करना बेमानी है, अब चूँकि भारत में क्रिकेट धर्म हो गया है, तो अब ऐसे धर्म को छोड़ दें, जो दुख दे रहा है।

इन सबको तो पेप्सी की एक बोतल में बंद करके इनकी ऊँगली में टिंगली करना चाहिये।

एक नाखुश क्रिकेट प्रेमी…

बस बहुत हुआ… मेरी कविता.. विवेक रस्तोगी

बस बहुत हुआ, जीवन का उत्सव

अब जीवन जीने की इच्छा

क्षीण होने लगी है

जीवंत जीवन की गहराइयाँ

कम होने लगी हैं

अबल प्रबल मन की धाराएँ

प्रवाहित होने लगी हैं

कृतघ्नता प्रेम के साथ

दोषित होने लगी है

मद कौन सा अच्छा भौतिक या श्रीमद…

    मद बहुत अच्छी चीज है, परंतु वह मद कैसा है इस पर निर्भर करता है कि उस मद में चूर होकर व्यक्ति कैसा व्यवहार करता है। व्यक्ति मद में आकर ही अपना व्यवहार बदलता है।

    भौतिक मद से व्यक्ति की बुद्धि मदमस्त हो जाती है और वह अन्य व्यक्तियों को नुक्सान पहुँचाने लगता है और खुद को भी नुक्सान पहुँचाता है।

    एक है श्रीमद, श्री याने कि राधारानी और मद नशा तो जो कृष्ण जी और राधारानी के मद में डूब गया वह दुनिया को हृदय से देता है क्योंकि वह हृदय से श्रीमद में है।

    कहने के लिये तो बहुत कुछ कहा जा सकता है, परंतु सबकी अपनी अपनी परिभाषाएँ हैं, और मद के बारे में भी ऐसा ही है, जो भौतिक मद में डूबा वह कभी उबर नहीं पाता और न ही खुद निकल पाता है और न ही दूसरों को निकाल पाता है। जो श्रीमद में डुबा वह खुद तो इस भवसागर से तर ही जाता है और दूसरों को भी तार देता है।

तो कोशिश करें कि श्रीमद में डूबे रहें, योगेश्वर श्रीकृष्ण की भक्ति में डूबे रहें।

   कहा गया है कि श्रीरामचंद्र जी का जीवन अनुकरणीय है परंतु श्रीकृष्ण जी का जीवन चिंतनीय है ।

जय श्री कृष्ण !

आज के परिपेक्ष्य में गोवर्धन पर्वत प्रसंग..

    आज श्रीमदभागवत कथा सुन रहे थे, तो उसमें एक प्रसंग था जब कृष्णजी इन्द्र के प्रकोप की बारिश से बचाने के लिये गोकुलवासियों के लिये गोवर्धन पर्वत को अपनी चींटी ऊँगली याने कि सबसे छोटी ऊँगली से तीन दिनों तक उठा लेते हैं, तो गोकुलवासी भी पर्वत को उठाने में अपने सामर्थ्य अनुसार योगदान करते हैं, कोई अपने हाथों से पर्वत को थामता है तो कोई अपनी लाठी पर्वत के नीचे टिका देता है। इस तरह से तीन दिन बीत जाते हैं, तो गोकुल वासी कृष्णजी से पूछते हैं “लल्ला तुमने तीन दिन तक कैसे गोवर्धन पर्वत को उठा लिया ?” अब कृष्णजी कहते कि मैं भगवान हूँ कुछ भी कर सकता हूँ तो गोकुलवासी मानते नहीं, इसलिये उन्होंने कहा कि “आप सब जब पर्वत के नीचे खड़े थे और सब मेरी तरफ़ देख रहे थे, तो मेरे शरीर को शक्ति मिल रही थी और उस शक्ति को मैंने अपनी चीटी यानी कि छोटी ऊँगली को देकर इस पर्वत को उठा रखा था” तो भोले भाले गोकुल वासी बोले “अरे ! लल्ला तबही हम सोच रहे हैं कि हम सभी को कमजोरी क्यों लग रही है ।”

    अब यह तो हुआ कृष्णजी के जमाने का प्रसंग अब अगर यही आज के जमाने में हुआ होता तो सबसे पहले तो उनको अस्पताल ले जाया जाता और पता लगाया जाता कि “लल्ला” में इतनी ताकत कैसे आई और इतना बड़ा पर्वत उठाने पर भी एक फ़्रेक्चर भी नहीं आया। फ़िर विरोधी पक्ष सदन में हल्ला मचाता कि इतनी मुश्किल से इंद्र देवता ने बारिश की थी और ई लल्ला ने ऊ सब पानी बहा दिया फ़िर सबही चिल्लाते हैं कि पानी की प्रचंड कमी है।

    और जो जबाब कृष्ण जी ने गोकुलवासियों को दिया था वही जबाब आज देते तो सब उनके पीछे पड़ जाते कि ई लल्ला ने किया ही क्या है, हमारी सबकी थोड़ी थोड़ी ताकत का उपयोग करके ई छॊटा सा पराक्रम कर दिया अब इस ताकत के बदले में हम सबको अनुदान दिया जाये और इस लल्ला के विरुद्ध एक जाँच कमेटी बनायी जाये कि इस लल्ला ने कौन कौन से पराक्रम किस किस की ताकत का उपयोग करके किये हैं।

वाकई भगवान श्रीकृष्ण अपना माथा ठोक लेते ….. ।

नींद के आलस में “ऐ लेडी, हैप्पी वूमन्स डे”…

    नींद से उठने के बाद, आँख मूँदे बिस्तर पर ही पड़ा हुआ था, बाहर कमरे से जोर जोर से आवाजें आ रही थीं, कुछ अंग्रेजी की स्पेलिंग याद करवाती हुई मम्मी बेटे को। सुनाई तो स्पष्ट दे सकता था, परंतु सुनने की वाकई इच्छा नहीं थी, इसलिये बिना रूई की फ़ाह डाले भी काम हो रहा था। बात कितनी सही है कि अगर किसी काम को करने की इच्छा नहीं हो तो उसके लिये कुछ करना नहीं पड़ता कितना आलस्य छिपा है इन बातों में.. यहीं सोच रहा था कि तकिये के पास रखे मोबाईल से गाना बजने लगा.. जो कि दरअसल मोबाईल की ट्यून है.. स्लमडॉग मिलिनियर की “जय हो”, और देखा तो अपने लंगोटिया यार का दोस्त था, सोचा था कि किसी का भी फ़ोन होगा उठाऊँगा नहीं, भरपूर आलसभाव में था, परंतु सामने स्क्रीन पर विनोद का नाम देखकर बात करने से रोक न सका।

    फ़ोन उठाते ही उधर से आवाज आई “अच्छा तू है क्या ?, अरे तेरा ये नया नंबर है क्या, नंबर बदल लिया ?” इधर से मैंने कहा “अबे ! जब नया नंबर लिया था तब सबको एस.एम.एस. किया तो था” उधर से वह बोला “आया भी होगा तो पता नहीं, मैंने ही ध्यान नहीं दिया होगा, चल और बता क्या चल रहा है, सो रहा था क्या ?” इधर से मैंने कहा “हाँ यार, सो रहा था, बस अब उठने की तैयारी है और अब ऑफ़िस जाना है ?” उधर से उसने कहा “क्यों ? क्या आजकल रात्रि पाली में है क्या ?” इधर से मैंने कहा “हाँ यार” और भी बहुत सारी बातें हुईं, आलस तो अब भी आवाज में था, परंतु अपना पुराना दोस्त था फ़ोन पर तो सब आलस फ़ुर कर दिया।

    बात करते करते बालकनी में घूम रहा था, तो बेटेजी जोर जोर से स्पेलिंग याद कर रहे थे, और हम उनको उनकी भावी सफ़लताओं के लिये देख रहे थे। कि इतने में हमें कमरे में आते देख बेटे जी पलट पड़े अब मेरा मन पढ़ाई में नहीं लग रहा है, मैं पता नहीं किन ख्यालों में ऐसे ही मुस्करा पड़ा। तो वैसे ही एक आवाज कान में आई “मैं तुम दोनों को बेबकूफ़ नजर आती हूँ, क्या ?”, यह थी बेटे की मम्मी जी की आवाज।

    “पढ़ लो बेटा नहीं तो तुम ही नुक्सान में रहोगे हमारा कोई नुक्सान नहीं होने वाला”, अब जरा सी औलाद को कहाँ फ़ायदे और नुक्सान का गणित समझ में आने वाला था, मैंने पूछा बेटे से कि क्या हुआ तो बोला “आई डोन्न नो !”

    अभी यही सोच रहा हूँ कि पढ़ाई न करने से क्या क्या नुक्सान होते हैं ? क्या पढ़ाई करने से ही जिंदगी अच्छे से कटती है? पैसे कमाये जा सकते हैं ? क्या जिंदगी का ध्येय केवल पैसे कमाना और फ़ायदे, नुक्सान का गणित है ? क्या हमारा मकसद आज के नौजवानों को पढ़ा लिखा कर नौकर बनाने का है? मेरा तो नहीं है, मैं चाहता हूँ कि उसे कम इतना पता होना चाहिये कि पैसे कैसे कमाये जाते हैं, क्योंकि दुनिया में यही एक ऐसा काम है जो कि सबसे सरल भी है और सबसे कठिन भी है।

इतने में बेटे जी मम्मी के पास गये  और बोले “ऐ लेडी, हैप्पी वूमन्स डे” ।

टिप बख्शीश का गणित.. (What about Tip..)

    अभी हाल ही में फ़िल्म “शहंशाह” देखी, जिसमें जे.के. याने के अमरीश पुरी और प्रेम चोपड़ा का एक सीन जहन में अटक गया, दोनों एक होटल में जाते हैं, और शक्ल से ही अमीर लगते tips हैं, जैसे ही रेस्टारेंट में प्रवेश करते हैं, एक वेटर आकर अभिवादन करता है और अमरीश पुरी अपनी जेब से बटुआ निकालकर एक सौ रुपये का नोट उसे वेटर को टिप देते हैं। प्रेम चोपड़ा बहुत ही अजीब तरीके से और आश्चर्यचकित तरीके से अमरीशपुरी को देखते हैं। जब  वे अपनी टेबल पर आते हैं, तो प्रेम चोपड़ा पूछ ही लेते हैं –

    “लोग बिल के बाद टिप देते हैं, और तुम हो कि पहले से ही टिप दिये जा रहे हो !, क्या अजीब आदमी हो, क्यों ?”

अमरीश पुरी जबाब देते हैं –

“बिल के बाद टिप देना तो रिवाज है, हम टिप पहले देते हैं जो कि  अच्छी सर्विस की गारंटी  है।”

    बात तो छोटी सी है पर अमरीश पुरी की बातों में दम लगा, वाकई बिल के बाद टिप देना रिवाज है, सर्विस अच्छी मिले या नहीं परंतु आप टिप दे ही देते हैं। पर अगर जिस जगह पर आप जा रहे हैं और वहाँ आप अक्सर जाते रहते हैं तो शायद पहले टिप देने से अच्छी सर्विस मिल सकती है।

    अब आते हैं अपनी बात पर तो पहले तो हम टिप देने में यकीन ही नहीं रखते, क्योंकि रेस्टोरेंट में खाना ही इतना महँगा होता है कि ऐसा लगता है कि होटल के मालिक के टिप भी इसमें ही जुड़ी रहती है, खैर फ़िर धीरे धीरे कुछ टिप देने का रिवाज समझ में आने लगा और कुछ रुपये टिप देने लगे। टिप को लेकर मुंबई में कई खट्टे मीठे अनुभव हुए, फ़िर धीरे धीरे यह सीख लिया कि अगर खाना अच्छा हो तो ही टिप दो, और सर्विस भी, क्योंकि खाना अच्छा होना न होना तो बनाने वाले शेरिफ़ पर निर्भर करता है, परंतु अगर आप शिकायत करते हैं या कुछ अन्य चीज आप मंगवाते हैं तो उसे कितनी प्राथमिकता के साथ पूरा किया जाता है।

    ऐसी बहुत सारी वस्तुस्थितियाँ होती हैं जो कि यह सुनिश्चित करती हैं कि आप कितनी टिप देते हैं, और वह भी अच्छे मन से या खराब मन से।

    हमने मुंबई में सुना है कि कुछ जगहों पर टिप भी बिल में लगाकर दे दिया जाता है, खैर आजतक तो हमें ऐसा कोई होटल नहीं मिला या यूँ कह सकते हैं कि हम इस तरह के होटल में गये नहीं ! 🙂

    टिप न मिलने पर वेटर की मुखमुद्रा बता देती है कि वह खुश है या नहीं, और तो और जब आप खाना खा रहे होते हैं, तभी वेटर समझ जाता है कि टिप मिलने वाली है या नहीं।

    कुछ वेटर ऐसे भी होते हैं, जब देखते हैं कि कोई टिप नहीं मिल रही है और बिल अदा करके निकले जा रहे हैं, तो भुनभुनाते हैं, या फ़िर इतनी आवाज में बोलते हैं कि कम से कम आपको तो सुनाई ही दे जाये, “क्या कंगले हैं, टिप के पैसे भी जेब से नहीं निकलते हैं”, और कुछ होते हैं जो सीधे पूछ लेते हैं कि “आपने टिप नहीं दी।”

    हमारे एक मित्र हैं उनकी फ़िलोसॉफ़ी है कि बिल का १०% टिप देना चाहिये, हमने कहा कि भई अपने बस की बात नहीं कि १०% टिप अपन अफ़ोर्ड कर पायें, जितनी अपनी जेब इजाजत देती है, अपन तो उतनी ही टिप पूर्ण श्रद्धा भक्ति से दे देते हैं।

कैसे हैं आपके अनुभव टिप के बारे में…

ओह मुंबई, मेरे अधूरे प्यार … मेरी कविता …. विवेक रस्तोगी

ओह मुंबई, मेरे अधूरे प्यार

ऐसी प्रेमिका जिसे प्यार किया

पर मजबूरी में वह साथ न रही

दरिया के लहरों में उमड़ती

तुम्हारी चंचल अंगड़ाइयाँ

बलखाती,

इठलाती अदाएँ

वो मरीन ड्राईव

जहाँ सड़क इठलाती है

कितने ही रंग के चेहरे रहते हैं

घूमते हैं,

चूमते हुए रंग बदलते हैं

मुंबई रात में अपनी जवानी में खोई रहती है

दरिया अपनी गहराई में सब राज रखता है

जूहु में रेत की गहराईयों को देखते ही बनता है

दीवारों के किनारे,

कहीं पेड़ और झुरमुट के पीछे

प्यार के दीवाने अपनी दीवानगियों में खोये हुए

रेत को अपना पनाहगार बनाकर

जालिम हसरतें पूरी करते हुए,

शैया बनाकर

कहीं भेलपुरी,

कहीं बड़ापाव का शोर

कहीं टैक्सी, ऑटो और बसों का शोर

सभी में जवानी अंगड़ाईयाँ लेती हैं

पर फ़िर भी मैं तुमसे दूर हूँ

मजबूरी में,

मेरी प्रेमिका

जिंदगी की रेलमपेल है,

भागादौड़ी है

वो भीड़ भरी चीखती हुई लोकल

एकाएक मुझे अच्छी लगने लगी है

वे टकराते,

भागते लोग मुझे अपने से लगने लगे हैं

फ़ुटपाथों पर चिल्लाते हुए वो भाजीवाले

वो फ़ुटपाथ जो मैंने मुंबई की हर सड़क

हर गली में देखे हैं

वो चीखती हुई आवाजें,

जो हर आँखों के पीछे से आती हैं

वो हाइवे के बाजू में टहलना,

आते जाते वाहनों के शोर से मिलने वाली अज्ञात शांति

महालक्ष्मी के पास वो रुकती हुई लहरें

वो सिद्धी विनायक के दर्शन

हाजी अली तक जाती वो सड़क

जहाँ लहरें टकराकर लौट जाती हैं अपने में

वो क्वीन नेकलेस मालाबार हिल्स तक

वो गिरगाँव चौपाटी का छोटा सा किनारा

एलीफ़ेन्टा गुफ़ाओं का गहन सौंदर्य

मोटरबोट में ठंडी हवा का आनंद

गेटवे ऑफ़ इंडिया पर फ़ोटो खिंचाना

सामने गर्व से खड़े ताज को देखना

और भी बहुत कुछ

बस तुम्हें बहुत बहुत याद करता हूँ

मेरी मुंबई … मेरी मुंबई

आम व्यक्ति के लिये निवेश के कुछ नुस्खे (Some tips for Investment for All)

    आज सबसे बड़ी समस्या है कि कैसे बेहतर तरीके से अपने धन का निवेश करें, और मेहनत से कमाये गये धन का उपयोग करें। धन अर्जन तो सभी करते हैं, परंतु उस धन को अपने भविष्य के लिये निवेशित करना भी अपने आप में चुनौती है। साथ ही अपने लक्ष्य को कैसे निर्धारित करें, परिवार को आर्थिक रुप से कैसे सुरक्षित रखें, यह सब भी बहुत जरूरी है।

    धन को निवेश करने के कुछ नुस्खे जो दिखने में छोटे हैं परंतु भविष्य की योजनाओं के लिये उतने ही कारागार भी हैं –

१. ८० सी आयकर अधिनियम के तहत पूरी बचत करें।

२. ८० डी आयकर अधिनियम के तहत बचत करें (मेडिक्लेम अगर उपयोक्ता ने ना दिया हो या फ़िर कम राशि का हो)

३. २०,००० रुपयों का इन्फ़्रास्ट्रक्चर बांड निवेश जो कि पिछले वित्तीय वर्ष से ही शुरु हुआ है।

४. अपनी बचत को अपनी जोखिम के अनुसार निवेश करें, अगर ज्यादा जोखिम ले सकते हैं तो शेयर बाजार में और कम जोखिम के लिये म्यूचुअल फ़ंड एस.आई.पी. में निवेश करें, बिल्कुल जोखिम न लेना चाहें तो फ़िर बैंक में सावधि जमा का उपयोग कर सकते हैं, साथ ही एम.आई.पी. डेब्ट फ़ंड भी बहुत सुरक्षित है, बस यहाँ ब्याज दर निश्चित नहीं होती।

५. ८० सी के तहत आयकर बचाने के लिये परंपरागत बीमा में निवेश करने से बचें, टर्म इन्श्योरेन्स लें (अपनी सालाना आय का २० गुना तक ले सकते हैं), परिवार को आर्थिक सुरक्षा दें, और बाकी का बचा हुआ धन ई.एल.एस.एस. म्यूचयल फ़ंड एस.आई.पी. के जरिये निवेश करें।

६. जब भी एस.आई.पी. म्यूचयल फ़ंड शुरु करें चाहें वह ई.एल.एस.एस. हो या किसी ओर स्कीम का जिस पर आयकर की छूट नहीं मिलती हो, आपकी निवेश समय सीमा कम से कम १० वर्ष के लिये होना चाहिये, तभी अच्छे रिटर्न की उम्मीद करें।

७. व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा लें, जो कि आपको और आपके परिवार को अतिरिक्त आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है।

८. आकस्मिक परिस्थितियों से निपटने के लिये अपने मासिक खर्च का कम से कम तीन गुना धन ऐसे निवेश करें जहाँ से आप एकदम से आहरण कर पायें, जैसे कि सावधि जमा जो कि बचत बैंक खातों से लिंक होती है, जिससे किसी भी आकस्मिक स्थिती में आप धन को ए.टी.एम. से आहरित कर सकते हैं।

९. अपने मासिक खर्च के बराबर का धन ही केवल अपने बचत खाते में रखें बाकी धन सावधि जमा में रखें या फ़िर कहीं और निवेश करें, जैसे कि म्यूचुअल फ़ंड, शेयर बाजार इत्यादि।

१०. क्रेडिट कार्ड का उपयोग करें, सबसे बड़ा फ़ायदा कि आपको महीने भर की खरीदारी का भुगतान एकमुश्त करना होता है, और जब क्रेडिट कार्ड का बिल आता है तब आप देख सकते हैं कि कौन सी गैर जरूरी चीज में आप खर्च कर रहे हैं। परंतु क्रेडिट कार्ड का उपयोग करते समय ध्यान रखें कि अभी भले ही आपको भुगतान न करना पड़ रहा हो, परंतु एक दिन तो आपको इसका भुगतान करना ही होगा, इसलिये संयम से खरीदारी करें।

११. भविष्य के आर्थिक लक्ष्य निर्धारित करें जैसे कि बच्चों की पढ़ाई, विवाह, कार, घर इत्यादि। और आर्थिक लक्ष्यों के अनुसार अपने निवेश की शुरुआत करें।

१२. निवेश करना जितनी जल्दी शुरु करेंगे उतनी जल्दी आप अपने भविष्य के आर्थिक लक्ष्यों समयबद्ध तरीके से प्राप्त कर पायेंगे।

बचत में हमेशा व्यक्ति को अनुशासित होना चाहिये, तभी आप बचत कर पायेंगे।

बीमा आर्थिक सुरक्षा के लिये होता है ना कि निवेश के लिये, अपनी सोच बदलें और व्यक्तिगत वित्त विषयों के बारे में पढ़कर अपना धन बेहतर तरीके से निवेशित करें।