शेयर बाज़ार पर ज्ञान की बकवास — भाग 8
ये सपोर्ट और रेजिस्टेंस आखिर क्या बला है?
शंकर आई हॉस्पिटल से लौटते समय बेटेलाल का मूड बड़ा दार्शनिक था। कार में बैठते ही बोले —
“डैडी, ये मार्केट बार-बार एक ही जगह से ऊपर क्यों भागता है… और एक ही जगह आकर नीचे क्यों गिर जाता है? जैसे कोई बड़ी शक्ति हो, जो जगह टकराकर बाजार वहाँ से फिर धाराशायी हो जाता हो।”
मैंने कहा — “बेटेलाल… आदमी बदल जाता है, लेकिन उसकी आदतें नहीं बदलतीं। मार्केट भी आदतों से चलता है।”
सिग्नल पर गाड़ी रुकी हुई थी।
सामने गोलगप्पे वाले के पास भीड़ लगी थी। एक आदमी बार-बार पूछ रहा था — “भैया 20 रुपये में कितने दोगे?”
गोलगप्पे वाला बोला — “20 में 5 ही मिलेंगे।”
आदमी थोड़ा पीछे हट गया। लेकिन जैसे ही उसने कहा — “चलो 6 दे दूँ…” तुरंत भीड़ बढ़ गयी।

मैंने बेटेलाल की तरफ देखा — “बस… यही है सपोर्ट और रेजिस्टेंस।”
बेटेलाल ने माथा खुजलाया — “गोलगप्पे में शेयर बाज़ार कहाँ से आ गया?”
मैं हँस पड़ा।
“देख बेटेलाल… जहाँ लोगों को चीज़ सस्ती लगने लगे, वहाँ खरीदारी बढ़ जाती है। और जहाँ चीज़ महंगी लगने लगे, वहाँ लोग रुक जाते हैं।”
“मार्केट में भी यही होता है।”
वहीं आगे एक ठेले पर टमाटर बहुत सारे थे, जो टमाटर पचास रुपए का एक किलो बिक रहा था, यहाँ उसने ४० रुपए किलो का स्टीकर लगा रखा था।
मैंने धीरे से कहा — “लो, एक और लाइव उदाहरण।”
बेटेलाल अब थोड़े उत्साहित हो चुके थे।
मैंने समझाया —
“मान लो किसी शेयर का दाम बार-बार 100 रुपये तक गिरकर वापस ऊपर चला जाता है। क्यों?”
“क्योंकि बहुत सारे लोग मानते हैं कि 100 रुपये पर शेयर सस्ता है। वहाँ खरीददार अचानक सक्रिय हो जाते हैं। इस जगह को कहते हैं — सपोर्ट।”
“और अगर वही शेयर बार-बार 130 पर जाकर नीचे गिर जाता है…”
“तो?”
“तो वहाँ बेचने वाले ज्यादा हैं। लोग सोचते हैं — ‘बस भाई, बहुत महंगा हो गया।’ इसे कहते हैं — रेजिस्टेंस।”
बेटेलाल ने मोबाइल खोल लिया। अब उसकी आँखों में वही चमक थी जो नए ट्रेडर की आँखों में पहले नुकसान से पहले आती है।
बोला — “मतलब सपोर्ट जमीन है और रेजिस्टेंस छत?”
मैंने कहा — “बिल्कुल… लेकिन मार्केट का घर किराये का होता है। कभी भी दीवार टूट सकती है।”
वो हँस पड़े।
असल खेल यहाँ से शुरू होता है।
मैंने कहा — “देखो बेटेलाल… सपोर्ट और रेजिस्टेंस सिर्फ लाइन नहीं हैं। ये लोगों की यादें हैं।”

वो थोड़ा चौंका।
“यादें?”
“हाँ। जिस आदमी ने 100 पर शेयर खरीदा था और फिर शेयर 130 चला गया… वो अगली बार फिर 100 आने का इंतजार करेगा।”
“क्यों?”
“क्योंकि इंसान को सस्ता खरीदने में गर्व महसूस होता है।”
“और जिसने 130 पर खरीदा और शेयर गिर गया…”
“वो?”
“वो बेचने का मौका ढूँढेगा कि बस भाई, मेरा पैसा वापस मिल जाये।”
मैंने धीरे से कहा — “मार्केट में चार्ट कम चलते हैं, जबकि लोगों के पछतावे ज्यादा चलते हैं।”
घर पहुँचे तो कार पार्क करने के बाद घर में गए, और जूते उतारकर सोफे पर बैठे ही थे कि –
बेटेलाल बोले — “डैडी, लेकिन अगर सपोर्ट इतना मजबूत होता है तो टूटता क्यों है?”
मैंने कहा — “क्योंकि डर, भरोसे से ज्यादा ताकतवर होता है।”
अब वो चुप।
“जब बहुत सारे लोग घबरा जाते हैं… तो वही सपोर्ट टूट जाता है जहाँ पहले लोग खरीद रहे थे।”
“और फिर?”
“फिर वही पुराना सपोर्ट नया रेजिस्टेंस बन जाता है।”
उसने सिर पकड़ लिया।
“ये तो बहुत गड़बड़झाला जैसा है।”
मैं मुस्कुरा दिया।
“हाँ बेटेलाल… जिस जगह से इंसान को कभी सहारा मिलता है, कभी-कभी वहीं से सबसे ज्यादा चोट मिलती है।”
थोड़ी देर बाद उसने पूछा — “तो क्या सिर्फ सपोर्ट-रेजिस्टेंस देखकर पैसा कमाया जा सकता है?”
मैंने कहा — “अगर इतना आसान होता… तो मोहल्ले का हर अंकल वॉरेन बफेट होता।”
फिर थोड़ा गंभीर होकर बोला —
“ये सिर्फ संकेत हैं। मार्केट कोई गणित की कॉपी नहीं है जहाँ हर सवाल का एक जवाब हो। ये भीड़ का दिमाग है… और भीड़ का दिमाग मौसम से भी जल्दी बदलता है।”
रात को बेटेलाल फिर मोबाइल में चार्ट देख रहे थे।
अब वो हर जगह लाइनें खींच रहा था। कभी तिरछी, कभी सीधी।
मैंने पूछा — “क्या कर रहे हो?”
बोला — “सपोर्ट ढूँढ रहा हूँ।”
मैंने कहा — “पहले खुद का सपोर्ट ढूँढ ले… मार्केट बाद में समझना।”
वो हँस पड़े।
लेकिन सच यही है।
मार्केट में सबसे बड़ा सपोर्ट पैसा नहीं… धैर्य होता है। और सबसे बड़ा रेजिस्टेंस लालच।
बाकी चार्ट तो बस बहाना हैं।
अगले भाग में बेटेलाल पूछेगा — “ये अलग-अलग तरह की कैंडल आखिर इंसानों के चेहरे जैसी क्यों लगती हैं?”
और अब शुरू होगी असली कैंडलस्टिक पैटर्न की कहानी…
क्रमश:
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