गिरते बाजार में बड़े निवेशक डरते क्यों नहीं?

शेयर बाज़ार पर ज्ञान की बकवास — भाग 5

गिरते बाजार में बड़े निवेशक डरते क्यों नहीं?

सुबह का समय था। बाहर बादल छाये हुए थे। खिड़की के बाहर पेड़ों की पत्तियाँ हवा से हिल रही थीं। ड्राइंग रूम में टीवी म्यूट पर चल रहा था और नीचे लाल रंग में लगातार एक ही बात चमक रही थी — “मार्केट में भारी बिकवाली।”

बेटेलाल सामने सोफे पर बैठे थे। हाथ में मोबाइल था और चेहरे पर वही टेंशन, जो रिज़ल्ट से पहले स्टूडेंट्स के चेहरे पर होती है।

“डैडी…” उन्होंने धीरे से कहा, “आज फिर पूरा पोर्टफोलियो लाल हो गया।”

मैंने ipad टेबल पर रखा और ब्लैक कॉफी का घूंट लेते हुए कहा — “अच्छा है।”

बेटेलाल तुरंत चौंक पड़े और बोले – “अच्छा है मतलब?”

मैं मुस्कुराया और कहा – “मतलब बाजार आज तुम्हें पढ़ा रहा है।”

कुछ पल कमरे में हल्की खामोशी रही। बाहर कहीं से हवा धीमी आ रही थी, पर बाहर धूप तेज हो चुकी थी, पर फिर भी थोड़ा ठंडा था।

बेटेलाल बोले —
“लेकिन डैडी, जब मार्केट गिरता है तो सब डर क्यों जाते हैं?”

मैंने कहा —
“क्योंकि इंसान को नुकसान का डर, मुनाफे की खुशी से ज्यादा बड़ा लगता है।”

बेटेलाल बोले – “हैं जी?”

मैंने हँसते हुए कहा —
“हाँ जी। अगर तुम्हें सड़क पर 1000 रुपये मिल जाएँ तो खुशी होगी। लेकिन अगर जेब से 1000 रुपये गिर जाएँ… तो उससे ज्यादा दुख होगा।”

“सही बात है,” बेटेलाल बोले।

“बस यही शेयर बाज़ार में भी होता है।”

मैंने आगे कहा —
“जब बाजार गिरता है, तो लोगों को लगता है उनका पैसा खत्म हो रहा है। फिर दिमाग डरने लगता है। और डर इंसान से गलत फैसले करवाता है।”

बेटेलाल अब ध्यान से सुन रहे थे।

मैंने कहा —
“शेयर बाज़ार में सबसे ज्यादा नुकसान खराब कंपनी नहीं करवाती… घबराहट करवाती है।”

टीवी पर अचानक एंकर ने हाथ हिलाते हुए कुछ जोर से बोलना शुरू किया। आवाज़ म्यूट थी लेकिन चेहरा देखकर ही डर लग रहा था।

मैं हँस पड़ा।
“इन लोगों का काम ही डर बेचने का है।”

बेटेलाल भी हल्का मुस्कुराये।

फिर उन्होंने पूछा —
“लेकिन डैडी, बड़े निवेशक गिरते बाजार में खरीदारी क्यों करते हैं?”

मैंने कहा —
“क्योंकि वे बाजार को दुकान की तरह देखते हैं… एग्जाम की तरह नहीं।”

“मतलब?”

मैंने टेबल पर रखा बिस्किट का डिब्बा उठाया।

“अगर तुम्हारी पसंद का बिस्किट कल 50 रुपये का था और आज वही 35 में मिल रहा है… तो तुम क्या करोगे?”

“खरीद लूँगा।”

“तो फिर अच्छी कंपनी सस्ती होने पर लोग डरते क्यों हैं?”

बेटेलाल कुछ सेकंड चुप रहे।

फिर बोले —
“क्योंकि वहाँ पैसा लगा होता है।”

मैंने मुस्कुराकर कहा —
“और वहीं असली खेल शुरू होता है।”

बाहर से ठंडी हवा आनने लगी थी। और अब कमरा भी ठंडा होने लगा था।

मैंने आगे कहा —
“बड़े निवेशक गिरावट में इसलिए नहीं डरते क्योंकि वे पहले से जानते हैं कि बाजार ऊपर-नीचे होता रहेगा।”

“मतलब उन्हें फर्क नहीं पड़ता?”

“फर्क सबको पड़ता है बेटेलाल। लेकिन अनुभवी निवेशक भावनाओं से फैसले नहीं लेते।”

मैंने ipad पर एक पुराना चार्ट खोलते हुए कहा —
“देखो, इतिहास में बाजार कई बार गिरा है। युद्ध में गिरा… महामारी में गिरा… मंदी में गिरा… लेकिन लंबे समय में फिर ऊपर भी गया।”

बेटेलाल स्क्रीन देखने लगे।

मैंने कहा —
“बाजार का गिरना असामान्य नहीं है। असामान्य ये है कि लोग हर बार भूल जाते हैं कि बाजार पहले भी संभला था।”

बेटेलाल ने पूछा —
“तो क्या गिरते बाजार में हमेशा खरीदना चाहिए?”

मैंने कहा —
“नहीं। आँख बंद करके कभी नहीं।”

“फिर?”
“पहले देखो कि गिरावट क्यों आई है।”

“मतलब?”

“अगर सिर्फ डर की वजह से अच्छी कंपनियाँ गिर रही हैं… तो मौका हो सकता है। लेकिन अगर कंपनी का बिज़नेस ही खराब हो गया हो, तो गिरावट जाल भी हो सकती है।”

बेटेलाल अब बहुत गंभीर होकर सुन रहे थे।

मैंने आगे कहा —
“शेयर बाज़ार में सबसे मुश्किल काम सही समय पर शांत रहना है।”

“और लोग शांत क्यों नहीं रह पाते?”

मैंने कहा —
“क्योंकि मोबाइल हर पाँच मिनट में उन्हें डर दिखाता रहता है।”

बेटेलाल हँस पड़े।

“सही पकड़े हैं डैडी।”

मैंने भी हँसते हुए कहा —
“पहले लोग साल में एक बार शेयर देखते थे। अब लोग washroom में भी portfolio check करते हैं।”

दोनों हँस पड़े।

फिर मैं थोड़ा गंभीर हुआ।

“याद रखना बेटेलाल… गिरते बाजार में इंसान का असली स्वभाव बाहर आता है।”

“मतलब?”

“कुछ लोग डरकर भाग जाते हैं… कुछ लोग सीखते हैं… और कुछ लोग मौका ढूँढते हैं।”

टीवी पर अब लाल पट्टी थोड़ी कम हो चुकी थी।

मैंने खिड़की की तरफ देखते हुए कहा —
“बाजार भी मौसम की तरह है बेटेलाल। हमेशा एक जैसा नहीं रहता।”

कुछ पल दोनों चुप रहे।

फिर बेटेलाल बोले —
“डैडी… तो सफल निवेशक बनने के लिए सबसे जरूरी क्या है?”

मैंने मुस्कुराकर कहा —
“ज्ञान जरूरी है… लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है — मुश्किल समय में शांत रहना।”

कमरे में हल्की शांति थी। टीवी अब भी म्यूट था। लेकिन इस बार बेटेलाल बार-बार मोबाइल नहीं देख रहे थे।

शायद पहली बार उन्हें समझ आ रहा था कि बाजार सिर्फ पैसा कमाने की मशीन नहीं… धैर्य की परीक्षा भी है।

फिर उन्होंने पूछा —
“डैडी, अगली बार क्या सीखेंगे?”

मैंने मुस्कुराकर कहा —
“अगले भाग में समझेंगे — SIP क्या होती है, और लोग धीरे-धीरे निवेश करके बड़ा पैसा कैसे बनाते हैं।”

क्रमशः…

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