मैं, मुक्तिबोध उज्जैन और मंगलनाथ घाट

अभी पिछले सप्ताह किसी से बात कर रहा था, तो उन्होंने कहा कि आप बातें अच्छी करते हैं, बहुत से साहित्यिक शब्दों का भी प्रयोग करते हैं, जो आजकल बहुत ही कम देखने को मिलता है।

हमने कहा – ऐसा आपको लगता होगा, परंतु हम ऐसी ही भाषा बोलचाल में प्रयोग करते हैं, कई बार बोलते बोलते कब हिन्दी से अंग्रेजी में आ जाते हैं, समझ ही नहीं आता। पर दिमाग अब दोनों भाषाओं को प्रोसेस कर लेता है।


फिर उन्हें बताया कि हिन्दी पर इतना अधिकार शायद इसलिए है कि हमने हिन्दी साहित्य में पढ़ाई भी की और उज्जैन रहते हुए जब पता चला था कि गजानन माधव मुक्तिबोध मंगलनाथ के घाटों की सीढ़ियों पर साहित्य सृजन करते थे, और हमने भी मंगलनाथ घाट की सीढ़ियों पर घंटों बिता दिये, अब उसका उद्देश्य क्या था, वह पता नहीं, पर वहां बैठकर जो शांति और सुकून मिलता था, वह कहीं नहीं था।


ऐसे ही पढ़ते समय कई साहित्यकारों का सान्निध्य मिला, तो उसका भी कुछ प्रभाव जरूर रहा होगा। पर हाँ मैंने उनसे पूछा कि आपने मुक्तिबोध का नाम सुना है, तो वे अंजान थे, मुझे लगा कि आगे की पीढ़ी में कम ही लोगों के पास यह धरोहर जा पायेगी।


इतना सब बोल तो दिया, पर पता नहीं उससे ऐसा कुछ होता भी है?


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