जब आप निवेश करते हैं, तो उसे सरल ही रखें। वही करें जो बिल्कुल सरल और स्पष्ट है, बफ़ेट सलाह देते हैं – जटिल प्रश्नों के लिये जटिल उत्तर देने की कोशिश मत करिये।
| जिस व्यापार को आप नहीं समझते हैं, उसमें कभी भी निवेश न करें। |
जब आप निवेश करते हैं, तो उसे सरल ही रखें। वही करें जो बिल्कुल सरल और स्पष्ट है, बफ़ेट सलाह देते हैं – जटिल प्रश्नों के लिये जटिल उत्तर देने की कोशिश मत करिये।
| जिस व्यापार को आप नहीं समझते हैं, उसमें कभी भी निवेश न करें। |
“प्रविसे नगर कीजै सब काजा, ह्रदय राखी कौसलपुर राजा…।”
“देखो… मैं अपने पापा के यहाँ स्वतंत्र विचारों से पली-बढ़ी हूँ। मुझे ये दकियानूसी तरीके ठीक नहीं लगते।”
संतुष्टि बड़ी गजब की चीज है, किस को कितने में मिलती है इसका कोई मापद्ण्ड नहीं है और मजे की बात यह की इंसान को हरेक चीज में संतुष्टि चाहिये चाहे वह खाने की चीज हो या उपयोग करने की। इंसान जीवन भर अपनी इंद्रियों को संतुष्ट करने मॆं लगा रहता है। इंद्रियाँ शैतानी रुप लेकर इंसान से अपनी तृप्ती पूर्ण करती रहती हैं।
किसी को केवल पेट भरने लायक अन्न मिल जाये तो ही संतुष्टि मिल जाती है, और प्रसन्न रहता है, पर इंसान की इंद्रियाँ बड़ी ही शक्तिशाली होती जा रही हैं, और केवल पेट भरने से आजकल कुछ नहीं होता, घर, गाड़ी, बैंक बैलेंस सब चाहिये, क्यों ? केवल इंद्रियों की संतुष्टि के लिये, अगर यह सब होगा तो गर्व नामक तरल पदार्थ की अनुभूति होती है ? पर इस सब में इंसान अपने भक्ति की संतुष्टि को भुल जाता है।
वैसे भी संतुष्टि इंसान की इंद्रियों की ही देन है और उसकी सोच पर ही निर्भर करता है कि उसकी इंद्रियाँ उस पदार्थ विशेष की कितनी मात्रा मिलने पर तृप्त होती हैं, उस इंसान की जीवन संरचना का भी इंद्रियों पर विशेष प्रभाव होता है। केवल इंद्रियों की तृप्ति याने संतुष्टि के लिये इंसान बुरे कार्यों के लिए उद्यत होता है, अगर इंद्रियाँ तृप्त होंगी तो बुरे कार्य भी नहीं होंगे।
इंसान को जीने के लिये चाहिये क्या दो वक्त की रोटी और तन ढ़कने के लिये कपड़ा, और भगवान ने हर इंसान के हाथों को इतनी ताकत प्रदान की है कि वह अपने लिये खुद यह सब कमा सके। परंतु इंसान ने अपनी ग्रंथियों के पदार्थों की संतुष्टि के लिये दूसरों की रोटी पर भी अधिकार करना शुरु कर दिया, अब हमें केवल रोटी की चिंता नहीं होती, हमें चिंता होती है ऐश्वर्य की, पर इंसान की ग्रंथियाँ यह नहीं समझ रहीं कि ऐश्वर्य पाने के चक्कर में वह कितने लोगों की रोटी ग्रन्थी की संतुष्टि से दूर कर रहा है।
कहाँ ले जायेगी इंद्रियों की तृप्ति के लिये यह संतुष्टि हमें अपने जीवन में यह तो हम भी नहीं जानते ? परंतु इतना तो है कि अगर सही दिशा में सोचा जाये तो कभी न कभी तो खोज के निष्कर्ष पर पहुँचेगें। खोज जारी है अनवरत है… वर्षों से… हम भी उसका एक छोटा सा हिस्सा हैं…
“जीवन अस्त व्यस्त हैबारिश बड़ी मस्त है”
पिछली पोस्ट पर “यादों के मौसम” का “तुझसे बिछुड़कर जिंदा है, जान बहुत शर्मिंदा है” , “जब हिज्र की शब पानी बरसे, जब आग का दरिया बहने लगे..” गीत सुनवाये थे आज सुनिये यह गाना –“चौदहवीं रात है, अब चाँद दिखा दे अपना, हम कई दिन से तेरी छत को तका करते हैं ..”
पिछली पोस्ट पर “यादों के मौसम” का “तुझसे बिछुड़कर जिंदा है, जान बहुत शर्मिंदा है” ये गीत सुनवाया था, तब श्री पंकज सुबीर जी ने “जब हिज्र की शब पानी बरसे, जब आग का दरिया बहने लगे..” की फ़रमाईश की तो आज सुनिये यह गाना –
क्या आपको कभी किसी ऑटो या टेक्सीवाले ने मना किया है, हमें तो रोज ही ऑटो और टेक्सीवाले मना करते हैं, और हम मन मसोस कर रह जाते हैं, क्योंकि इनके खिलाफ़ कोई भी कार्यवाही नहीं की जाती है।
पर आज जब मुंबई मिरर पढ़ा तो लगा कि हम यात्री भी कुछ कर सकते हैं, अगर हम ही इनकी ऑटो और टेक्सियों में बैठने से मना कर दें तो ……
जी हाँ १२ अगस्त को मुंबई में सभी यात्रियों से अपील की गई है कि ऑटो और टेक्सियों का उपयोग न करें, जिससे इनको भी यात्रियों की ताकत का पता चले।
इस अभियान के लिये मीटरजाम नाम का अंतर्जाल भी बनाया गया है। जिससे यात्रियों में जागरुकता जगायी जा सके।
अभी तक लगभग ६०० लोगों ने अपने को पंजीकृत करवा कर अभियान को समर्थन दिया है। और फ़ेसबुक पर लगभग ८४४ लोगों ने समर्थन दिया है।
इस अभियान को जयदेव रुपानी, रचना बरार और अभिषेक कृष्णन चला रहे हैं।
कभी कभी सिगरेट से नफ़रत होती थी, कि ये कहीं अंदर तक नुकसान कर रही है, पर तन्हाई का एक अकेला दोस्त केवल और केवल सिगरेट ही थी, कहीं अगर २ मिनिट भी इंतजार करना होता तो फ़ट से एक सिगरेट सुलगा लेते और कसैला धुआँ मुँह में लेकर अंदर अंतड़ियों तक ले जाते, पता नहीं अंदर अंतड़ियों की क्या दशा होती होगी, जब फ़क से इतना सारा धुआँ इतनी रफ़्तार से उनमें जाता होगा।
कई बार तो गुस्सा भी आता कि क्यों में इस सड़ी सी चीज का गुलाम हूँ जो कि सफ़ेद कागज में लिपटी हुई मौत है, जिसमें तंबाखू और पता नहीं क्या कैमिकल मिला होगा, पर बस केवल अपनी जिद और अपना मन की करने के लिये पिये जा रहा था मैं तो, कोई मजा नहीं, कोई कसैलापन नहीं, सब साधारण सा हो रहा था, पर सिगरेट पीते देखकर शायद दुनिया को लगता होगा कि मैं कोई असाधारण कार्य कर रहा हूँ, मुझे कभी नहीं लगा !!
जो लोग आज भी सिगरेट पीते हैं, मैं उन्हें देखता हूँ तो ऐसा लगता है कि अभी तक ये अपनी कमजोरी से जीत नहीं पाये हैं, सुबह चाय के साथ तलब, फ़िर ऑफ़िस पहुँचते ही चाय के साथ तलब, फ़िर थोड़ा काम किया न किया कोई सिगरेटिया मिल गया तो उसका साथ निभाने की तलब, बस इस तरह सिगरेटियों को बुरा न लग जाये इसके लिये सिगरेट पीते जाना और अपने जीवन के नित्यकर्म में शामिल कर लेना, और धीरे धीरे अपनी कुंठा को दबाना।
सिगरेट पीना केवल उत्कंठा से जनित होती है, जो कि किसी भी कारण से हो सकती है, गम को दबाने का बहाना देना या खुशी को जाहिर करने का या फ़िर दोस्तों या लड़कियों के सामने झांकीबाजी जमाने का, बहुत सारे कारण हो सकते हैं, जब अकेले सिगरेट पीते हैं तो ४ कश लगाने के बाद सिगरेट जल्दी खत्म होने का इंतजार और फ़िल्टर तक आने के पहले ही सिगरेट को अपने पैरों तले रौंद कर चल देते हैं।
कई सिगरेटिये देखे हैं, जो सिगरेट पैर से नहीं बुझाते, बोलते हैं कि पवित्र अग्नि है, वो सिगरेट के ठूँठ को दीवार से रगड़ कर बुझा देते हैं, कुछ नाली में डालकर चल देते हैं, तो कुछ ऐसे ही जलती हुई सिगरेट के ठूँठे को फ़ेंककर चल देते हैं।
सिगरेट पीने वाले अपने होठों की भी बहुत परवाह करते हैं कि फ़िल्टर तक आने के पहले ही फ़ेंक देते हैं, इस कार्य में कोई लापरवाही नहीं बरतते, नहीं तो फ़िल्टर तक याने कि ठूँठ तक सिगरेट पीने से होठ काले हो जाते हैं, कईयों के देखे हैं हमने तो। आखिर १०० डिग्री का तापमान होता है।
अगर कोई जरुरी कार्य कर रहा होता है और बीच में कोई मित्र फ़ोन करकर बोल दे कि चलो एक सिगरेट साथ में पी लें तो वह सब जरुरी कार्य छोड़कर चल देता है संगति देने, ऐसे सिगरेटिये दोस्तों की दोस्ती भी बहुत पक्की होती है जैसे बिल्कुल लंगोटिया यार, या दाँतकाटी रोटी।
आज सुबह घूमने के दौरान कुछ पुरानी यादें ताजा हो गईं, घूमते हुए एक वृद्ध सज्जन के पास से निकले तो उनके जेब में रखे मोबाईल से गाना बज रहा था “मधुबन में राधिका नाचे रे, गिरधर की मुरलिया बाजे रे…”, हमें अपने घर की याद आ गई, क्योंकि हमारे पापा और मम्मी जी को भी यह गाना बहुत पसंद है, और मुझे भी, शास्त्रीय संगीत पर आधारित (मेरे ज्ञान के अनुसार) गाना लाजबाब है।
कोहिनूर (1960) फ़िल्म के इस गाने का लुत्फ़ उठाईये –