Category Archives: अनुभव

घर का खाना [Home Food]

    घर के खाने का महत्व केवल वही जान सकता है जो घर के बाहर रहता हो, उसके लिये तो घर का खाना अमृत के समान है। और जो घर में रहता है उसके लिये तो घर का खाना “अपने घर की मुर्गी” जैसा होता है, और बाहर का खाना अमृत के समान होता है।

    हम ५-६ दोस्त गेस्ट हाऊस में रहते थे, जिसमें से २ पट्ना के, ३ कोलकाता के और एक हम थे उज्जैन से। पर सभी एक दूसरे को बहुत अच्छे से जानते थे।

    जो पटना वाले मित्र थे उनके लोकल मुंबई में अच्छी दोस्ती थी और कुछ शादीशुदा मित्र भी रहते थे, तो वे मित्र बहुत भाग्यवान थे, और घर के खाने का लुत्फ़ उठाते रहते थे। कभी कभी दूसरे मित्र को भी साथ ले जाते थे।

    एक दिन बड़ी जबरदस्त रोचक घटना हुई कि पहले मित्र बहुत देर से आये तो दूसरे ने पूछा कि आज किधर थे, तो पहले मित्र बोले कि फ़लाने मित्र के यहाँ थाना गया था और “भाईसाब्ब. .. भाभीजी ने क्या जबरदस्त आलू के पराठें बनाये थे, मैं ५-६ पराठें खा गया और साथ में घर का अचार.. अह्हा”, दूसरे का पारा सुनते सुनते ही सातवें आसमान पर पहुँच गया था, फ़िर वो शुरु हुआ, उसके हाथ में गिलास था पहले तो गुस्से में वह फ़ेंककर पहले को मारा और जोर से बोला “अबे, एक तो बिना बताये गये थे, दूसरा हियाँ जला रहे हो कि घर का खाना खाकर आ रहे हो, और वो भी आलू के पराठें, आज हम तुमका छोड़े नाहीं, ससुरा का समझत हो के घर का खाना केवल तुहार ही पसंद हो” और बहुत घमासान हुआ।

तो इस तरह की झड़पें अक्सर दोस्तों में देखने को मिलती रहती हैं।

[हमें पटना की भाषा नहीं आती है, पर कोशिश की है, अगर कोई सुधार हो तो बताईयेगा]

क्या फ़िर से इस भारत को आजाद करवाना होगा ? (Freedom of India… ?)

    वैसे मैं फ़िल्म वगैराह देखने में अपना समय नष्ट करना उचित नहीं समझता हूँ परंतु “खेलें हम जी जान से” की इतनी चर्चा सुनी थी, कि फ़टाफ़ट से टोरन्ट से डाऊनलोड किया और देखने लगे। ये फ़िल्म भी हम कल रात को ३ दिन में पूरी कर पाये हैं, एक साथ इतना समय निकालना और इतना ध्यान से देखना शायद अपने बस की बात नहीं है।

    फ़िल्म इतनी अच्छी लगी कि शायद ही इसके पहले स्वतंत्रता की पृष्ठभूमि पर इस अंदाज में फ़िल्मांकन किया होगा। यह फ़िल्म बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती है, हमें आजादी दिलाने वाले नौजवानों ने अपना खून बहाया है (पानी या पसीना नहीं)।

आजादी     हम इस आजादी का नाजायज लाभ उठा रहे हैं, क्या इसी आजादी के लिये क्रांतिकारियों ने अपनी शहादत दी थी, अगर उन्हें पता होता कि आजादी के बाद ये सब होगा तो शायद ही उनके मन में भारत माता के आत्मसम्मान को जागृत करने की बात आती। शहीदों को नमन जिन्होंने हम भारतवासियों को इतनी गुंडागर्दी, भ्रष्टाचारी और भी न जाने क्या क्या वाली सरकार दी, दिल रो रहा है यह सब लिखते हुए, क्या फ़िर से इस भारत को आजाद करवाना होगा ?

    क्या भारत माता का आत्मसम्मान खो गया है, क्या हम क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों की शहादत का बदला इतने बड़े बड़े कांड़ों को झेलकर और करके चुका रहे हैं।

    क्यों न वापिस से ऐसी ही एक क्रांति का जन्म हो जिसमें इन कांडों को करने वाले हरेक शख्स को खत्म कर दिया जाये और फ़िर से भारत माता के सम्मान को वापिस लाया जाये। अगर वाकई हमें अपना देश बचाना है तो ऐसी ही किसी क्रांति की जरुरत है, सजा तो इनको देनी ही होगी। क्योंकि अब ये लोग इतने बेशरम हो गये हैं कि ये न कलम की तलवार से डरते हैं और न ही भारत माता के सपूतों से ।

    बताईये क्या करना चाहिये ….. क्या क्रांति की बात गलत है… फ़िर से हमें भारतमाता के आत्मसम्मान को पाने के लिये क्रांति की अलख जगानी होगी।

वन्दे मातरम !! जय हिन्द !!

जिंदगी, चिंतन का चक्र, गहन चिंतन और मौलिक विचारधारा (Life.. some thoughts)

जिंदगी     बात तो बहुत पुरानी है परंतु चिंतन का चक्र चलता ही रहता है, अभी जुलाई में भविष्य की रुपरेखा के बारे में फ़िर से प्रस्तावना बनाया और गहन चिंतन किया तो लगा कि अभी तो अपने जिंदगी में बहुत कुछ पाना है मुकाम देखने हैं। जिंदगी आखिर मुकाम पाने का ही दूसरा नाम है, बस चलते ही जाओ, कमाते जाओ, काम करते जाओ, परिवार के साथ जब वक्त निकालने का समय आता है तो लेपटॉप खोल कर बैठ जाओ और जब काया साथ छोड़ दे तो उसी परिवार से उम्मीद करो कि वे अब आपका ख्याल करें, कितने स्वार्थी हैं ना !

    खैर ये सब बहुत माथापच्ची है जिंदगी की, अगर गहन चिंतन में उतर गये तो बस हो गया काम तमाम। जिंदगी का उद्देश्य क्या है उसमें हमें क्या पाना है, क्या खोना है, खैर खोना तो कोई  भी नहीं चाहता और सारे रिश्ते स्वार्थों के दम पर और दंभों की दुनिया में खड़े किये जाते हैं। कोई खून का रिश्ता मजबूरी में निभाना पड़ता है और कोई अनजाने रिश्ते या खून के रिश्ते खुशी खुशी निभाता है, यह भी बहुत गहन चिंतन है। समाज में कैसे जीवन जीना और हरेक समाज वर्ग की अपनी जीवन शैली होती है। जीवन शैली में बदलने का स्कोप बहुत होता है हम एक दूसरे को देखकर अपनी दिनचर्या, अपने जीवन जीने के तरीके में भी प्रभावित होते हैं। यहाँ तक कि बोलचाल और हावभाव में भी प्रभावित होते हैं। चाहे अनचाहे हम बहुत सारी चीजें दूसरों की ले लेते हैं, वह भी स्वार्थवश “ऐसा अच्छा लगता है”। पता नहीं समाज में कितने लोग अक्ल लगाते होंगे।

    सभी जीवन को अपने अपने नजरिये से देखते हैं, किसी के लिये यह बहता दरिया है तो किसी के लिये मौज का समुंदर तो किसी के लिये धार्मिक आस्था का केंद्रबिंदु, सबकी सोच जिंदगी के बारे में अलग अलग होती है। दिनचर्या बहुत ही निजी विषयवस्तु है परंतु अधिकतर देखने मॆं आता है कि उस पर किसी ओर (सोच या विचारधारा) का अतिक्रमण होता जा रहा है। हमारी अपनी मौलिक विचारधारा जिंदगी जीने की शायद खत्म ही हो गई है। हरेक चीज में बनावटपन है, क्या इससे जीवन जीने के लिये जरुरी चीजों को हम सम्मिलित कर पाते हैं।

बैकस्पेस     पता नहीं क्या हो रहा है जिंदगी लिखते हुए जिंदगए लिखने में आ रहा है, शायद कीबोर्ड पर भी हाथ बहकने लगे हैं। तो बारबार बैकस्पेस से जिंदगी को ठीक कर रहा हूँ काश कि ऐसा कोई बैकस्पेस जिंदगी में होता तो सारी चीजें ठीक हो गई होतीं।

बेचारा मर्द… कब आयेगा हैप्पी मैन्स डे..(Happy Men’s Day)

हमारे एक मित्र ने एक मैसेज दिया वही हिन्दी में लिख रहा हूँ।

बेचारा मर्द..

अगर औरत पर हाथ उठाये तो जालिम

औरत से पिट जाये तो बुजदिल

औरत को किसी के साथ देखकर लड़ाई करे तो ईर्श्यालू (Jealous)

चुप रहे तो बैगैरत

घर से बाहर रहे तो आवारा

घर में रहे तो नकारा

बच्चों को डाटे तो जालिम

ना डांटे तो लापरवाह

औरत को नौकरी से रोके तो शक्की मिजाज

ना रोके तो बीबी की कमाई खानेवाला

माँ की माने तो माँ का चमचा

बीबी की सुने तो जोरू का गुलाम

ना जाने कब आयेगा ?

“HAPPY MEN’S DAY”

१ रुपये की ओवर बिलिंग याने कि बेस्ट को कितना फ़ायदा ? (The profit of BEST by 1 Rupee over billing)

    आज किसी काम से बाहर गया था, तो बस नंबर २०४ से देना बैंक, कांदिवली से डीमार्ट कांदिवली तक का हमने टिकिट लिया, मास्टर को भी टिकिट कितने का है पता नहीं था, उसने अपना चार्ट देखा और ७ रुपये का टिकिट पकड़ा दिया। हमने भी छुट्टे ७ रुपये दे दिये।
    जगह खाली हुई तो हम सीट पर ठस लिये, फ़िर मास्टर पीछे से चिल्लाते हुए आया किसने टिकिट नहीं लिया है, हमारे आगे की सीट वाला १० का नोट दिखाते हुए बोला, हमें एक टिकिट दीजिये कांदिवली स्टेशन से राजन पाड़ा, मास्टर ने ३ रुपये वापिस दिये तो वह व्यक्ति बोला कि ६ रुपये लगते हैं, मास्टर ने फ़िर से अपने चार्ट में देखा और चुपचाप १ रुपया वापिस कर दिया और ६ रुपये का टिकिट दे दिया। जबकि उस व्यक्ति की यात्रा हमसे ज्यादा बस स्टॉपों की थी, पर हम फ़िर भी चुपचाप रहे कि छोड़ो १ रुपये में क्या होता है, फ़ालतू चिकचिक होगी और दिमाग का भाजीपाला होएंगा।
    हम तो उस व्यक्ति को जागरुक उपभोक्ता ही कहेंगे कि उसने अपना १ रुपया बचाया और चूँकि हमें इस रुट का पता ही नहीं था, इसलिये उसने हमसे १ रुपया ज्यादा ले लिया, पर बेस्ट की बसों में ऐसी कोई व्यवस्था भी नहीं कि आप अपना किराया जान सकें, जैसे कि रेल्वे स्टेशन पर पूरा चार्ट लगा होता है, यात्री किराये की राशि देख सकता है।
    भले ही वह १ रुपया उस मास्टर की जेब में नहीं जा रहा हो, परंतु बेस्ट की जेब में तो जा ही रहा था। ऐसा कई बार होता है जब नया मास्टर नये रुट की बस में चलता है, परंतु इस सबमें यात्री की क्या गलती है। अगर मास्टर नया है तो पहले उसे प्रशिक्षण देना चाहिये तभी बस के नये रुट में भेजना चाहिये, नहीं तो ऐसे ही नये मास्टर लोगों की जेब से १ रुपया ज्यादा निकालते रहेंगे और बेस्ट को फ़ायदा होता रहेगा।

मुंबई का सफ़र २३/११/२०१० भाग – ४ समाप्त (Mumbai Travel 23/11/2010 – Part – 4)

भाग – १, भाग – २, भाग – ३

     काम निपटाने के बाद वापिस फ़ुटपाथों से होते हुए चर्चगेट स्टेशन की ओर जाने लगे, तो फ़ुटपाथों पर पटरी लगाकर बहुत से लोग बैठे हुए थे, सब अलग अलग तरह की चीजें बेच रहे थे, चीजें वहीं होती जिसे देखकर मन ललचा जाये या जिसकी जरुरत पड़ती रहती हो। और दाम भी इतना कम कि व्यक्ति सोच भी न पाये हाँ मोलभाव तो हर जगह होता है, उसमें महारत होना चाहिये। हम भी चाईनीज खिलौने वाले के पास रुके, बेटेलाल बहुत दिनों से कार की जिद कर रहे थे, कि एक कार और चाहिये, जी हाँ एक और कार क्योंकि एक रिमोट कंट्रोल कार (फ़रारी) पहले ही दिला चुके हैं, वहाँ एक टैंक के रुप वाली कार अच्छी लगी, नैनो भी थी, पर टैंक ज्यादा अच्छा लगा, वह अपने आप चारों तरफ़ अलटता पलटता भी था, दो बैटरी से चलता था, हमें बोला ८० रुपये, हमने कहा सही दाम लगा लो हमें लेना है, भाव नहीं पूछना है, वैसे हम भाव कम ही करते हैं, सामने वाला आदमी अपने आप ही ठीक दाम लगा ले तो भाव करने की जरुरत ही महसूस नहीं होती है। बस उसने हमें बोला कि आखिरी दाम ७० रुपये होगा, तो हम चुपचाप आगे निकल लिये, चर्चगेट स्टेशन के पास पहुँचे तो वहाँ खिलौने वाला एक और दिखा उससे पूछा कि कितना लोगे इस टैंक का वह हमें बोला ६० हम बोले कि ६० में दो सैल भी डालकर दे दो। उसने बिना ना नुकुर करे चुपचाप सैल डाले, गाड़ी चैक की और वापिस डब्बे में गाड़ी पैक करके हाथ में धर दी। हमने रकम चुकाई और चले लोकल पकड़ने के लिये।

     स्टेशन पर पहुँचे तो देखा कि ऑटोमेटिक टिकिट वेन्डिंग मशीन बंद पड़ी है, तो टिकिट खिड़की की और १० रुपये लेकर बढ़ लिये, एक बोरिवली का टिकिट लिया और १ रुपया वापिस जेब में रखकर मुड़े ही थे कि देखा कि सामने की तरफ़ दो टिकिट मशीनें लगी हुई थीं, हम रेल्वे प्रशासन को कोसते हुए लोकल की तरफ़ बड़ चले।

चर्चगेट     चारों प्लेटफ़ॉर्म पर बोरिवली की लोकल के बोर्ड लगे थे, दो बोर्ड पर स्लो थी और दो पर फ़ास्ट, हमने ४ नंबर प्लेटफ़ार्म वाली लोकल पकड़ी क्योंकि उस समय ६.४२ हो रहे थे और वह ६.५२ की फ़ास्ट लोकल थी, तो बैठने की जगह आराम से मिल जाती, और हम आराम से बैठ भी गये, पहले कूपे में ही, क्योंकि हमें कांदिवली उतरना था और वहाँ पुल पहले कूपे के पास में ही आता है। भूख भी लग रही थी, सोचा कि कोई भेलपुरी वाला आता होगा तो ले लेंगे, परंतु किस्मत कि कोई भेलपुरी वाला नहीं आया, और हम वहीं बैठे हुए सफ़र शुरु होने का इंतजार करने लगे। जैसे जैसे लोकल के जाने का समय नजदीक आता जा रहा था, वैसे ही भीड़ का दबाब बड़ने लगा।

चर्चगेट स्टेशन     बाहर मतलब प्लेटफ़ॉर्म पर और अंदर लोकल में भी लगातार २६/११ के मद्देनजर सतर्कता बरतने की सलाह दी जा रही थी, अगर कोई भी संदिग्ध वस्तु दिखे तो फ़ौरन वर्दी में गश्त कर रहे पुलिस अधिकारियों को जानकारी दें। इस तरह से आतंक के विरुद्ध सघन अभियान चलाया जा रहा था।

    हम फ़िर अपना कानकव्वा (हैंड्सफ़्री) मोबाईल में लगाकर एफ़.एम. चैनल सुनने लगे, साथ ही कुछ फ़ोन करने थे, जो करे पर लोकल में होने की वजह से आवाज साफ़ नहीं थी, आवाज कट रही थी, और काल ड्राप हो रही थी, हमने अपने मित्र को बोला कि बाद में काल करते हैं, हालांकि वह काल अभी तक नहीं कर पाये हैं, केवल आलस्य के कारण। लोकल ट्रेन में फ़ोन की आवाज इसलिये साफ़ नहीं आती है, क्योंकि हाई वोल्टेज वायर ट्रेन के पास होते हैं।

    तकरीबन ४५ मिनिट में हम कांदिवली पहुँच गये, फ़िर पुल पारकर बस स्थानक की ओर बड़ चले, वहाँ फ़िर लाईन लगी हुई थी, जाते ही २ मिनिट में बस आ गई, मुंबई में सबसे अच्छी बात है कि लोग अनुशासन से रहते हैं, और जो इसका पालन नहीं करता है, उसे सिखा दिया जाता है, और यह अनुशासन हर शहर के लिये जरुरी होता है। बस का टिकिट लिया ७ रुपये का और दूरी होगी मुश्किल से ३-४ किमी., कैसी विसंगती है कि लोकल में ९ रुपये में हम ३५ किमी. आ गये और बस में ७ रुपये में ३-४ किमी., फ़िर भी बेस्ट बोलती है कि किराया और बढ़ाना चाहिये। आखिरकार दिनभर की भागदौड़ के बाद घर पहुँच गये लगभग रात के ९.३० बजे।

कौन से मूवर्स पैकर्स की सेवायें ली जायें, मुझे अब मुंबई से १२०० किमी दूर जाना है। (Movers n packers services)

   मुझे अगले महीने के मध्य में मुंबई से १२०० कि.मी. दूर अपना समान स्थानांतरण करना है, और इतने सारे मूवर्स एन्ड पैकर्स से पूछा और गूगल के जरिये खोज भी की, तो और भी सांसत में आ गये।

    हमने तकरीबन ५ मूवर्स एन्ड पैकर्स से बात की और कोटेशन लिया पर सबकी शिकायतें हैं, अब समझ में नहीं आ रहा कि क्या करें और किस की सेवा का उपयोग करें।

अभी तक जिनको बुलाया है वे इस प्रकार हैं –

1. Safe Movers & Packers

2. Sahara Movers & Packers

3. Agarwal Movers & Packers, Hyderabad

4. Agarwal Movers & Packers Pvt. Ltd., (Delhi)

सबसे सस्ता पहला वाला है और सबसे महँगा आखिरी चौथा वाला है।

    और किस तरह से समान को स्थानांतरित किया जा सकता है, यह भी बताईयेगा। बस जरा जल्दी ….।

मुंबई का सफ़र २३/११/२०१० भाग – ३ (Mumbai Travel 23/11/2010 – Part – 3)

भाग – १, भाग – २

    लोकल आखिरकार चर्चगेट स्टेशन पर पहुँच ही गयी, पर लोकल से उतरना भी आसान नहीं है, क्योंकि मैं चर्चगेट पहुँचा था लगभग शाम के ५.४० बजे और शाम ५.०० बजे से रात ९-९.३० बजे तक वहाँ से बोरिवली या विरार के लिये आने वाले लोगों की भीड़ लगी रहती है, और जैसे ही लोकल रुकती है, वैसे ही सीट के लिये लोग लोकल में टूट पड़ते हैं, घमासान मच जाता है, उतरने वाले यात्री चुपचाप दुबके हुए खड़े होते हैं, जब भीड़ का वेग कम हो जाता है तब उतरते हैं, अगर कोई नया व्यक्ति मुंबई में आया होता है और उसे यह सब पता नहीं होता है तो या तो कोई बता देता है और वह चुपचाप वैसा ही करता है नहीं तो बेचारे का मुँह ही टूटता है, और लोगों की गाली अलग खाता है।

    चर्चगेट स्टेशन पर कोई गेट नहीं है बस स्टॆशन का नाम चर्चगेट है, हम बाहर निकल रहे थे, और भीड़ अपने पूरे वेग से लोकल पकड़ने की और प्लेटफ़ॉर्म की और बड़ रही थी, हमें भीड़ को चीरते हुए आगे बड़ना पड़ रहा था। फ़िर उल्टे हाथ की ओर का सबवे पकड़कर सीधे अहिल्याबाई होलकर बस स्थानक तक पहुँचे, इसी सबवे में सड़क की एक लड़ाई का शूट हुआ था, जिसमें संजय दत्त ४-५ गुंडों को मारते हैं।

    सबसे पहले हमने ५ रुपये का छोटा ग्लास गन्ने का रस पिया, लोग कहते हैं कि यह हाईजीनिक नहीं है, परंतु अगर मन हो तो वह कर ही लेना चाहिये, फ़िर बाद में जो होगा वो देखेंगे, परंतु अगर कुछ होना होता तो शायद बहुत सारे लोगों को हो गया होता। फ़िर अपने नोकिया ई ६३ पर गूगल मैप्स खोला और डी.एन.रोड जहाँ जाना था, रास्ता देखा और चल पड़े, वैसे तो फ़ोर्ट का पूरा एरिया पैदल कई बार नापा है, परंतु इस बार कई दिनों बाद जाना हुआ था, तो कहीं गलत रास्ते पर न पहुँच जायें इसलिये गूगल मैप की सहायता ले ही ली।

    बीच में २-३ सिग्नल भी थे जहाँ पर सिगनल लाल बत्ती होने तक लगातार वाहन अपनी पूरी रफ़्तार से चौराहे पार करते रहते हैं, और लाल बत्ती होते ही गजब की रफ़्तार से ब्रेक भी लगा देते हैं। यह देखना भी किसी रोमांच से कम नहीं होता है, बीच में ही फ़ैशन स्ट्रीट भी पड़ती है, जहाँ कम बजट में अच्छी चीजें मिल जाती हैं, मोल भाव करना ही होता है, बस आपको मोलभाव करने में महारत होनी चाहिये। फ़िर पहुँचे हुतात्मा चौक, जिसे शायद हार्निमेन सर्किल और फ़्लोरा फ़ाऊँटेन भी कहा जाता है, जहाँ चारों तरफ़ पुरानी इमारते दिखेंगी परंतु उसमें कार्यालय सारे अंतर्राष्ट्रीय बैंक या कंपनी के होंगे, बहुत सारी भारतीय कंपनियों के भी कार्यालय यहाँ हैं।

डबल डेकर बस     वैसे जितने खुले फ़ुटपाथ मुंबई के इस क्षैत्र में हैं उतने शायद ही कहीं और होंगे। यह फ़ुटपाथों का स्वर्ग है, यहाँ पैदल चलने का अपना अलग ही मजा है, पुरानी इमारतें देखते जाओ, चमकती सड़कों पर डबल डेकर बसें और पुरानी फ़िएट टैक्सी इसका सुखद अहसास बड़ा देती है। डी.एन. रोड पर पहुँचकर जहाँ हमें जाना था, वह इमारत देखते ही याद आ गई, और फ़िर हम अपना काम निपटाने चल दिये।

जारी…

IFFI गोवा में बीयर २५ रुपये की और चाय ५८ रुपये की वाह !

    आज सुबह अखबार के एक कोने में खबर थी कि A glass of beer is cheaper than a cup of tea at IFFI in Goa | अब बताईये चाय ५८ रुपये की और ठंडी बीयर का गिलास २५ रुपये में, क्या जमाना आ गया है।

बीयर गिलास भरचाय      आयोजक कहते हैं कि अगर चाय पीने वालों को चाय महँगी लग रही है तो वे सड़क पार कर स्थानीय ढाबे पर चाय पी सकते हैं। अब भई जो बीयर के शौकीन होंगे तो वे भला क्यों इतनी महँगी चाय पियेंगे। उससे अच्छा है कि दो गिलास ठंडी बीयर पियें और फ़िल्म फ़ेस्टिवल आयोजन का मजा लें।

    क्यों अविनाश जी सही कह रहे हैं न हम, अब बाकी तो आप ही बतायेंगे कि कौन से स्टॉल पर ज्यादा भीड़ थी, चाय के या बीयर के।

एक और चिट्ठाकार चिट्ठाजगत में, आईये उत्साहित कीजिये (Bubbles)

    हमारे मित्र राहुल खरे जो कि विगत ४-५ वर्षों से थाईलैंड में निवास कर रहे हैं, और हमारे बहुत पुराने मित्र हैं। उनका हिन्दी प्रेम हमसे छिपा नहीं था, एक बार ऐसे ही चैटिंग करते हुए हमने हिन्दी में लिखना शुरु कर दिया, तो बहुत ही आश्चर्यचकित हुए कि आप सीधे चैट बॉक्स में कैसे हिन्दी लिख रहे हैं, हमने उन्हें बाराह के बारे में बताया। बस फ़िर क्या था उन्होंने एकदम से बाराह को अपने संगणक पर संस्थापित किया और हिन्दी में चैटियाने लगे, फ़िर भी उन्हें कुछ जगह समस्या आ रही थी, तो थोड़ी हमने मदद की और बाकी तो राहुल भाई संगणक विशेषज्ञ हैं, उन्होंने खुद ही खोज बीनकर सब कुछ सीख लिया।
    उनका चिट्ठा अथक परिश्रम का ही फ़ल है, वे अब बराबर से हिन्दी में टाईपिंग कर पा रहे हैं, और अपना चिट्ठा बनाकर आज चिट्ठाजगत में शामिल हुए हैं।
    राहुल भाई ने अपने चिट्ठे का नाम रखा है बबल्स (Bubbeles), जहाँ वे अब अपने मन की बातें लिखेंगे, आईये राहुल को उत्साहित कर अपने चिट्ठाजगत परिवार में शामिल करें। राहुल आपको बहुत बहुत शुभकामनाएँ।