मेरी ९ वीं वैवाहिक वर्षगांठ

कल हमारे विवाह को ९ वर्ष पूर्ण हो गये, अब तो ९ वर्ष मतलब बहुत बड़ा अंक लगने लगा है, ऐसा लगता है कि बुढ़ाने की ओर तेजी से अग्रसर हैं।

कैसे ये ९ वर्ष बीत गये, पता ही नहीं चला। ऐसा लगता है कि जिंदगी का बीता हर पल बस अभी तो बीता है, और अगर संख्या देखी जाये तो ९ हो गई ।

हालांकि वैवाहिक वर्षगांठ हमने शायद चौथी बार साथ में मनाई है, बाकी पाँच बार अकेले अकेले 🙁

कल छत पर चाँद देख रहा था, चाँद पूरा था क्योंकि कल पूर्णिमा थी और इतना सुंदर चाँद बहुत दिनों बाद देख रहा था, समझ में नहीं आ रहा था कि कौन सा चाँद ज्यादा सुन्दर है, मेरा या सबका 🙂

कटाक्ष तो वैवाहिक जीवन का आम हिस्सा है, जैसे कि अब हम ये संवाद बड़ी ही आसानी से बोल सकते हैं,

“तुम्हें ९ साल से झेल रहा हूँ”

“अब तो आदत हो जानी चाहिये ९ साल से देख रही हो”

वैवाहिक वर्षगांठ पर परिजनों और प्रेमी मित्रों से बात कर दिल गुलजार हो गया।

उम्मीद है कि आगे की वर्षगांठें भी ऐसे ही आनंद से निकलेंगी और प्रेम अमर रहेगा।

आज आप इतने क्यों गोरे लग रहे हो.. फ़ेयर & लवली ? (Colour Complex)

    कल ऐसे ही एक हमारे सहकर्मी ने दोपहर में भोजन के पहले हमसे पूछ डाला कि आज आप कुछ ज्यादा ही गोरे लग रहे हो, आज क्या किया है। हमने मजाक में कहा कि फ़ेयर एन्ड लवली लगाई है। तो वह मुझसे पूछने लगा कि क्या वाकई फ़ेयर एन्ड लवली लगाने से गोरे हो जाते हैं, तो मुझे हँसी छूट गई, अरे भई अगर क्रीम लगाने से ही गोरे हो जाते तो सारी दुनिया गोरी ही होती।

    बेचारे अफ़्रीका वाले कालिये भी कॉम्पलेक्स खाते होंगे वो भी गोरे हो जाते। स्लमडॉग मिलिनियर में दिखाया गया एक सीन अक्सर याद आता है, जब एक काला लड़का फ़ेयर एन्ड लवली क्रीम लगाता है और गोरा नहीं होता तो वह क्रीम उसी पोस्टर पर फ़ेंकता है। जैसे भगवान श्रीकृष्ण कहते थे “राधा क्यों गोरी, मैं क्यूँ काला”।

    मैंने अपने सहकर्मी से कहा कि तुम अगर गोरे हो भी जाओगे तो उतने अच्छे नहीं लगोगे जितने इस साँवले रंग में लगते हो, रंग से कुछ नहीं होता और साँवले रंग और काले रंग वाले गोरे रंग की काया वालों से ज्यादा अच्छे लगते हैं। रंग से कुछ नहीं होता व्यक्तित्व अच्छा लगना चाहिये। व्यक्तित्व अच्छा होता है, गठीले शरीर से, सौम्य छबि से, खुशी से, आचरण से। आकर्षक व्यक्तित्व वाले व्यक्ति का रंग कैसा भी हो, उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। अधिकतर आकर्षक व्यक्तित्व केवल साँवले रंग वाले लोगों में ही मिलता है, गोरे रंग वालों में नहीं।

    खैर जो दुख उनको होता होगा वह गोरे रंग वाले समझ नहीं सकते क्योंकि वे उस रंग के नहीं हैं। पर मेरा तो मानना यही है कि रंग कैसा भी हो आपको आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी होना चाहिये, कुछ गहरे रंग वाले मेरे मित्र भी हैं, पर वे इतने आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी हैं और मुझे लगता है कि अगर इनका रंग गोरा होता तो शायद इनका व्यक्तित्व इतना आकर्षक नहीं होता।

स्वर्ग में किसको जाने को मिलेगा ब्राह्मण, डॉक्टर या आईटी (IT) पेशेवर को… [Who will get entry in Swarg..]

स्वर्ग के द्वार पर तीन लोग खड़े थे।

भगवान

सिर्फ़ एक ही अंदर जा सकता है।पहला

मैं ब्राह्मण हूँ, सारी उम्र आपकी सेवा की है। स्वर्ग पर मेरा हक है।दूसरा

मैं डॉक्टर हूँ, सारी उम्र लोगों की सेवा की है। स्वर्ग पर मेरा हक है।तीसरा

मैंने आईटी (IT) में नौकरी की है|

भगवान

बस.. आगे कुछ मत बोल.. रुलायेगा क्या पगले ? अंदर आजातेरे फ़ोर्वर्डेड मेल्स, फ़ोलोअप्स, बेंच पर २ साल, नाईटशिफ़्टस, प्रोजेक्ट मैनेजर से पंगा, सीटीसी (CTC) से ज्यादा डिडक्शन्स, पिकअप ड्रॉप का लफ़ड़ा, लड़की ना मिलने की फ़्रस्ट्रेशन, क्लाईंट मीटिंग्स, डिलिवरी डेट्स, वीकेंड्स में काम, कम उम्र में बालों का झड़नासफ़ेद होना, मोटापे का प्रोब्लम, मेरे को सेन्टी कर दिया यार। आजा जल्दी अंदर आजा।

[एक मित्र का चैट पर मैसेज था, आईटी वालों का दर्द समझाने के लिये अच्छा मैसेज है]

हिन्दी का दर्द और कवि शमशेर बहादुर सिंह की शती

    आजकल बिगबोस जैसे रियलिटी कार्यक्रमों और घटिया सीरियलों के बीच कहीं भी हिन्दी साहित्य की वार्ताएँ सुनाई ही नहीं देती हैं, निजी चैनल तो बस केवल घटिया मसाला ही बेचने में लगे हैं। कोई भी चैनल हिन्दी साहित्य पर वार्ताएँ नहीं देता।

    हिन्दी साहित्य वार्ता हमें मिली लोकसभा चैनल पर, कार्यक्रम का नाम है “साहित्य संसार”,  कल वार्ता थी, प्रसिद्ध कवि शमशेर बहादुर सिंह की शती पर, वैसे तो २०११ बहुत से कवियों की शती के साथ आया है, जैसे कि एक और नाम मुझे याद है “अज्ञेय”। शमशेर कवि के रुप में प्रसिद्ध हैं, परंतु उन्होंने गद्य भी खूब लिखा था।

     कार्यक्रम में पहले दिल्ली में हुई शमशेर की शती पर हुआ कार्यक्रम की झलकियाँ दिखाईं, जिसमें डाईस पर केवल दो ही माईक लगे दिखे एक दूरदर्शन का और दूसरा लोकसभा टीवी का, और अगर यही कार्यक्रम किसी फ़िल्म स्टार का होता तो निजी चैनलों के माईकों की भीड़ में  बेचारे ये दो माईक कहीं घूम ही जाते।

    सबसे पहले हमने सुना अशोक बाजपेयी को और फ़िर ओर भी साहित्यकार आये कवि शमशेर की चर्चा करने, कवि व्योमेश शुक्ल इत्यादि।

    स्टूडियो में चर्चा के लिये आये थे आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल जो कि यूपीएससी के सदस्य भी हैं, उन्होंने वार्ता में बताया कि बचपन में उन्होंने कवि शमशेर की एलिस इन वन्डरलेंड की अनुवादित कृति पढ़ी थी, और अनुवादित कृति मूल कृति से कहीं ज्यादा मार्मिक थी।

    कल उनकी चर्चा में बहुत से साहित्यकारों के नाम बहुत दिनों बाद सुने और दिनभर की थकान क्षण भर में चली गई। पर हिन्दी का दर्द अब भी दिल में है।

प्रेम दिवस पर दो कविताएँ अपनी प्रेमिका के लिये… मेरी कविता… विवेक रस्तोगी

प्रेम दिवस याने कि प्रेम को दिखाने का दिन, प्रेम के अहसास करने का दिन, और मैं अपनी प्रेमिका के लिये याने के अपनी पत्नी को दो कविताएँ समर्पित कर रहा हूँ, सच्चे दिल से लिखी है, अपनी पीड़ा लिखी है… कृप्या और यह न कहे कि यही तो हम भी कहना चाह रहे थे क्योंकि ये मेरी सिर्फ़ मेरी भावनाएँ हैं… वैसे मुझे लगता है कि यह कविता हर पति अपनी पत्नी को समर्पित करेगा ।
ख्वाईशें प्रेम दिवस की

ओह ख्वाईशें प्रेम दिवस की

तुम्हें कोई यादगार तोहफ़ा दूँ

पहले तोहफ़ा देने के लिये बैचेन रहता था

पर जेब खाली होती थी

अब जेब भरी होती है

तो तोहफ़ा समझ में नहीं आता

इसलिये मैंने खुद को ही

तुम्हें तोहफ़े में अपने आप को सौंप दिया है

उम्मीद है कि अब तो..

तुम्हें तोहफ़े की कोई उम्मीद मुझसे न..

रहती होगी…

और अगर हो तो…

दफ़न कर लो उसे क्योंकि अब मैं तुम्हारा हूँ

तोहफ़े तो गैर दिया करते हैं

जिन्हें अपना बनाने की ख्वाईश होती है

अब तो मैं तुम्हारा अपना हूँ

ये सब बहाने और बातें

केवल इसलिये हैं

क्योंकि इस प्रेमदिवस पर

फ़िर मुझे कोई तोहफ़ा नहीं मिला

मुझे यकीन है कि अब तक तो

तुम मुझे समझ गयी होगी

आखिर हमारा प्रेम अब जवान होने लगा है

शिकायत हो तो कह देना

मैं कॉलेज की नई किताब की तरह तुमसे

चिपक जाऊँगा।

हमें भी चाहिये ऑफ़

एक दिन घरवाली बोली

तुम करते हो ऐसा क्या काम

सात में दो दिन तुमको

मिलता है आराम,

यहाँ हम ३६५ दिन

लगे पड़े रहते हैं

अब हम भी दो दिन का

लेंगे ऑफ़,

हमने कहा दो दिन का ऑफ़

मतलब हमारा मंथली बजट साफ़,

मान जाओ

तुम्हें हमारे प्रेम की कसम,

रोज ऐसे ही ब्लैकमेल करके

खाना खा रहे हैं

जीना मुश्किल फ़िर भी

जिये जा रहे हैं।

कुछ पल मूँगफ़ली के दाने, भेलपुरी और बस का सफ़र, मुंबई और बैंगलोर

    ऑफ़िस से पैदल ही बाहर निकल पड़ा था, आज अकेला ही था, कोई साथ न था, या तो पहले निकल गये थे या फ़िर रुके हुए थे, मैं ही थोड़ा समय के बीच से निकल गया था। पता नहीं इन कांक्रीट के जंगलों में सोचता हुआ चला जा रहा था। आज तो वो मूँगफ़ली वाला ठेला भी नहीं था, जिससे अक्सर मैं पाँच रुपये के मूँगफ़ली के दाने बोले तो टाईमपास लेता था, पाँच रुपये में ४-५ कुप्पी, उसका भी अपना नापने का अलग ही पैमाना है, बिल्कुल फ़ुल बोतल के ढ्क्कन के साईज की कुप्पी है उसकी। अपनी पुरानी आदत जो पिछले ५-६ साल से मुंबई में लग गयी है, चलते हुए ही खा लेना।

    यहाँ तो सब ऐसे घूर घूर कर देखते हैं, कि जैसे चलते चलते खाकर गुनाह कर रहे हों, या फ़िर जैसे मैं उनका अनुशासन तोड़ रहा हूँ। पर अपन भी बिना किसी की परवाह किये अपने नमकीन वाले मूँगफ़ली के दाने टूँगते हुए अपने बस स्टॉप की ओर बड़ते जाते हैं।

     अब मूँगफ़ली वाला नहीं था और भूख भी लग रही थी थोड़ी कुनमुनी सी, जिसमें केवल टूँगने के लिये कुछ चाहिये होता है, वहीं बस स्टॉप के पास के भेलपुरी वाले को देखा था, देखा था क्या रोज ही देखते हैं, सोचा कि चलो आज इसको भी निपटा लिया जाये।

    १५-२० मिनिट चलने के बाद पहुँच लिये उसके पास, टमाटर काट रहा था, वो भी धीरे धीरे, उसको देखकर ही लगगया कि ये व्यक्ति यहीं का है, अगर मुंबई का भेलपुरी वाला होता तो पूछिये ही मत उनकी प्याज, आलू और टमाटर काटने की रफ़्तार देखते ही बनती है, वह भी चाकू से नहीं, एक पत्ती जैसी चीज होती है जिस पर उनका हाथ बैठ चुका होता है।

    सोचा कि चलो काटने दो, अब इसको क्या बोलें। सब समान भेलपुरी का एक स्टील के भगौने में चमचे से मिलाया और कागज की पुंगी बनाकर उसमें दे दिया और साथ ही एक प्लास्टिक का चम्मच, हमने कहा कि भई अपने को तो पपड़ी चाहिये, और पपड़ी लेकर चल पड़े बस स्टॉप की ओर।

    हालांकि भेलपुरी मुंबई की ही फ़ेमस है, परंतु अब तो हर जगह होड़ लगी है, एक दूसरे के पकवान बनाने की, जबकि मुंबई और बैंगलोर में जमीन आसमान का फ़र्क है, यहाँ मिनिटों में लेट होने पर कुछ नहीं होता, पर वहाँ मुंबई मिनिट मिनिट का हिसाब रखती है।

    वहाँ बस स्टॉप पर खड़े होकर बस का इंतजार भी कर रहे थे और साथ में भेलपुरी खाते भी जा रहे थे, तो लोग फ़िर घूर घूर कर देखना शुरु कर दिये जैसे कि मैं कोई एलियन हूँ। बस आई और हम भेलपुरी खाते हुए बस में चढ़ लिये, कंडक्टर टिकट देने आया तो उसके मनोभावों से लग रहा था कि अभी बोलेगा कि बस में भेलपुरी खाना मना है, परंतु वह चुपचाप टिकट देकर और अनखने से निकल लिया, अब बारी आई आसपास वालों की, तो शाम का समय रहता है, सबको हल्की भूख तो लगती ही है, मुंह में पानी भी आ रहा होगा पर करें क्या मांग तो सकते नहीं ना…! 😉  हम चटकार लेकर भेलपुरी खतम किये और वो कागज की पुंगी बेग के साईड जेब में डाली और बोतल निकाल कर पानी पीकर एक अच्छी सी डकार ली।

हालांकि सबके चेहरे अतृप्त लग रहे थे, पर मैं पूर्ण तृप्त था।

हाय, कैसी है तू

“हाय, कैसी है तू”

“मैं भी बढ़िया हूँ, और बता क्या चल रहा है”

“क्या पूना में पड़ी हुई है, आजा तू बैंगलोर शिफ़्ट हो जा”

“यहाँ पर भी अच्छा जॉब मिल जायेगा, वेदर बहुत अच्छा है”

“अरे यार क्या सिटी बस में घर जा रही है, कितनी खड़ खड़ की आवाजें आ रही हैं”

“मैं तो एसी वोल्वो बस में हूँ पहले घर के पास ही ऑफ़िस था अब दूर है, पहले १० मिनिट लगते थे, अब डेढ़ घंटा लगता है”

“अरे क्या कर रही है तू, ड्राईवर को क्यों डाँट रही है, बेचारा रो पड़ेगा, छोड़ दे उसको”

“अरे मुझे पूरा यकीन है कि ड्राईवर रो पड़ेगा, आगे से बेचारा तेरे को ड्रॉप करने कभी नहीं आयेगा”

“याद है जैसे वो वेटर को तूने रुलाया था, बेचारे के आँखों में आँसू भी आ गये थे”

“अरे यार मैं तेरी कुछ मदद कर सकता हूँ, यहाँ पास के फ़्लेट में एक मराठी लड़का रहता है, उससे तेरे लिये बात करता हूँ, और जो मेट्रीमोनी साईट के पैसे बच जायें उससे मुझे पार्टी दे देना”

“लड़का अच्छा है, तू तेरा पोर्ट्फ़ोलियो भेज दे”

“अरे नहीं बाबा तू भेज ना !, फ़िर उसका भी मँगा लेंगे”

“अरे हाँ बाबा रे वो पूना भी शिफ़्ट हो जायेगा, बात कर लेना और क्या”

“अरे पगली, पहले पूना शिफ़्ट करने को बोलकर शादी कर लेगा और बाद में नहीं होगा तो तू कर क्या लेगी”

“बाद में बैंगलोर में आना पड़ेगा, उससे अच्छा है कि अभी आजा”

“तू जिधर रहेगी, वहीं पास में मैं भी फ़्लेट ले लूँगा”

“तेरा पूरा ध्यान रखूँगा, डोन्टवरी”

“तुझे बोर नहीं होने दूँगा”

“हाँ यार पिछले साढ़े पाँच साल से बहुत ऐश में रहा हूँ, अब ऑफ़िस शिफ़्ट हो गया है तो ऐसी घटिया जगह रहने जा रहा हूँ, कि पूछ मत”

“बस ऑफ़िस के पास है, इतना ही नहीं तो इतने पुराने मकान में तो कभी रहने ना जाऊँ”

“अच्छा चल अब मेरा स्टॉप आ रहा है, कल बात होती है, और बेचारे ड्राईवर को डाँटना मत”

“बॉय टेक केयर”

विचार कैसे आते हैं… मेरी कविता … विवेक रस्तोगी

अनुभूतियाँ कैसी होती हैं

विचार कैसे आते हैं

कभी दिमाग से तो कभी दिल से

विचार जो कि दिमाग को स्पंदित करते हैं

बुद्धि को प्रफ़ुल्लित करते हैं

गहनता से

अंतरतम में ओढ़े रहता है।विचार जो कभी मनोनुकूल होते हैं

कभी प्रतिकूल होते हैं

कभी जीवन बनाते हैं

कभी जीवन ध्वस्त करते हैं

कभी महल बनाते हैं

कभी खण्डहर बनाते हैं

कभी शोक होता है

कभी उत्सव होता है

बस सब विचार होते हैं

..

जवानी के दिनों में पॉपकार्न

    कुछ दिन पहले समान लेने हॉपयर सिटी गये थे (हर पाँचवें दिन जाना ही पड़ता है), तो  हमारी पॉपकार्न की विशेषत: ढूँढ़ थी क्योंकि बाहर के पॉपकार्न हमें पसंद नहीं, और घर में बनाने के लिये मकई के दाने नहीं मिले, तो सोचा कि चलो वो कूकर वाले पॉपकार्न ले लिये जायें, पता चला कि अब कूकर वाले कम, और माइक्रोवेव वाले पॉपकार्न ज्यादा चलते हैं, हमें बहुत आश्चर्य हुआ कि ये माइक्रोवेव वाले पॉपकार्न कैसे होते हैं।

    kettle corn वैसे माइक्रोवेव भी हमने यहाँ बैंगलुरु में आकर मजबूरी में लिया है (यह कहानी फ़िर कभी)। अब दस रुपये में और क्या भगवान चाहिये ? दस रुपये में आज की महँगाई में अच्छे बटर वाले पॉपकार्न। बस पोलिथीन फ़ाड़ी (जैसे फ़टा पोस्टर निकला हीरो), और एक सफ़ेद रंग का लिफ़ाफ़ा निकला, जिसमें पॉपकार्न थे एक तरफ़ से पीले रंग का कुछ कागज सा चिपका था और उसमें लिखा था कि यह माइक्रोवेव में नीचे की तरफ़ रखें, और माइक्रो पर करके २ मिनिट रखें बस आपके पॉपकार्न तैयार, वह लिफ़ाफ़ा पूरी तरह से हवा से फ़ूल चुका था। फ़िर उस लिफ़ाफ़े को फ़ाड़कर पॉपकार्न खाये तो अहा! भाईसाब्ब.. मजा आ गया।

    फ़िर सोचा कि जिसने इतनी आरएनडी (R&D) करी होगी अगले ने क्या दिमाग पाया होगा कि उसने कितनी सुविधाजनक चीज हम आलसियों के लिये बनाई है, कि बस पोलिथीन खोलो और दो मिनिट में माइक्रोवेव में रखने पर ही चरने के लिये पॉपकार्न तैयार।

    अभी तक याद है कि अपनी जवानी के दिनों में जब हम कार्तिक मेले में जाते थे तो २ रुपये में बहुत सारे पॉपकार्न मिलते थे, और हम कवि सम्मेलन सुनते समय २ रुपये वाले ५-६ पैकेट साथ में ही लेकर बैठते थे, कि शायद किसी कवि को हमारे पॉपकार्न ही पसंद आ जाये और हमें स्टेज पर बुला ले, पर कभी ऐसा हुआ नहीं ! 🙁

    खैर शुरु हो जाओ आलसियों और पॉपकार्न के दीवानों केवल २ मिनिट में अपनी हसरतें पूरी करें और यूट्यूब पर कवि सम्मेलन सुनते हुए पॉपकार्न खायें।

फ़्री में फ़िल्में कैसे डाऊनलोड करें (How to download films ..)

अभी कुछ दिनों से कुछ मित्रों और सहयोगियों ने Download Films फ़िल्म डाऊनलोड संबंधित कुछ सवाल पूछे –

Download Films

– फ़्री में फ़िल्में कैसे डाऊनलोड करें
– टोरंट से फ़िल्म कैसे डाऊनलोड करें
– फ़िल्म कितनी देर में डाऊनलोड होती है
– फ़िल्में कौन अपलोड करता है
और भी बहुत कुछ …. तो मैंने सोचा कि चलो इस पर ही लिख देते हैं।

वित्तगुरु वित्तीय जानकारियाँ हिन्दी भाषा में

    फ़िल्म डाऊनलोड करने के लिये मैं isohunt.com का उपयोग करता हूँ, वैसे यहाँ केवल फ़िल्म ही नहीं बहुत सारी चीजें जैसे किताबें, ऑडियो, टीवी शो, गेम्स, फ़ोटो, एनिमेशन, कॉमिक्स, एप्लिकशन्स और भी बहुत सारी चीजें उपलब्ध हैं। साधारणतया: यहाँ फ़्री और सभी तरह के क्रेक्ड वर्शन्स उपलब्ध होते हैं। जिससे आपको लायसेंस न खरीदना पड़े, हाँ यह सही नहीं है, परंतु अगर फ़्री में अच्छी चीज मिल रही हो तो क्या फ़र्क पड़ता है। डाऊनलोड करने के पहले देख लें कि फ़्री है तो ठीक और अगर क्रेक्ड वर्शन है और अगर आप पायरेटेड सॉफ़्टवेयर नहीं उपयोग करते हैं, तो डाऊनलोड न करें।
    डाऊनलोड करने के लिये टोरंट एपलिकेशन डाऊनलोड कर संस्थापित करना होगी, जो कि यहीं इसी साईट पर फ़्री में उपलब्ध है। या आप इसे फ़ाईलहिप्पो से भी डाऊनलोड कर सकते हैं।
    एक बार टोरंट एपलिकेशन संस्थापित हो जाये, फ़िर आप कुछ भी डाऊनलोड कर सकते हैं जो कि इस साईट पर उपलब्ध है, बस आपको अपना कीवर्ड सर्च में डालना होगा, और सर्च करना होगा, फ़िर एक नया पेज खुलेगा, तो वहाँ एक तालिका बनी आ जायेगी। उसमें कैटेगरी, ऐज, टोरंट टेग नाम, साईज, सीडर्स और लीचर्स होंगे। कैटेगरी में अगर फ़िल्म डाऊनलोड करना हो तो Video/Movies होना चाहिये, इसका प्रिंट अच्छा होगा। टीवी शो ढूँढ़ना हो तो टेलिविजन में ढूँढिये। ऐज (उम्र) वह  फ़ाईल कितने दिन पहले अपलोड की गई थी। साईज फ़ाईल का साईज बताता है, इसके बाद कितने सीडर्स और लीचर्स है।
    अब टोरंट नाम पर क्लिक करके चुन लें तो एक नया पेज खुलेगा, वहाँ पर डाऊनलोड का बटन दिखायी देगा और बड़े फ़ोंट में Download .torrent लिखा होगा, इस पर क्ल्कि करेंगे तो एक छोटी सी फ़ाईल डाऊनलोड होगी जिसका एक्सटेंशन .torrent होगा। अब इस .torrent फ़ाईल को डबल क्लिक करेंगे तो टोरंट प्रोग्राम में खुल जायेगी और डाऊनलोड होने लगेगी। सेटिंग्स में जाकर डाऊनलोड फ़ोल्डर जरुर दे दें नहीं तो साधारणतया: यह My Downloads में आ जाती है।
    ध्यान रखने की बात – यह डाऊनलोड और अपलोड डाटा ज्यादा मात्रा में करता है, अमूमन जो साईज है, इसलिये पहले अपने ब्रॉडबेंड प्लॉन को देख लें, जितनी ज्यादा ब्रॉडबेन्ड की रफ़्तार होगी उतनी ही रफ़्तार से फ़िल्म डाऊनलोड होगी।
750 mb की फ़ाईल डाऊनलोड मॆं लगने वाला समय, यह कम और ज्यादा भी हो सकता है।
128 kbps – 8-12 घंटे
1 mbps – 40 min. – 1 घंटा