आज के मशीनी युग में हम सभी लोग पूरी तरह से मशीनों पर निर्भर हो चुके हैं, सोचिये अगर बिजली ही न हो तो क्या ये मशीनें हमारा साथ देंगी। या फ़िर वह मशीन ही बंद हो गई हो जिस पर हम निर्भर हों।
बात है कल कि सुबह ६.२५ की मेरी उड़ान थी चैन्नई के लिये, मैंने मोबाईल में दो अलार्म लगाये एक ३.५० का और एक ४.०० बजे, मेरी चेतन्ती भी थी कि मुझे जल्दी उठना है, इसलिये बारबार में उठकर समय देख रहा था, सुबह ३ बजे एक बार आँख खुली फ़िर सो गया कि अभी तो एक घंटा है। फ़िर अलार्म नहीं बजा पर मानसिक चेतना ने मुझे उठाया कि देखो समय क्या हुआ है, जिस मोबाईल में अलार्म लगाया था वह तो सुप्ताअवस्था में पढ़ा था याने कि बंद था, फ़िर दूसरे मोबाईल में समय देखा तो सुबह के ४.१३ हो रहे थे। हम फ़टाफ़ट उठे और तैयार हो गये पर फ़िर भी अपने निर्धारित समय से १० मिनिट देरी से सारे कार्यक्रम निपट गये, और बिल्कुल ऐन समय पर हवाईअड्डे भी पहुँच गये, सब ठीक हुआ।
परंतु अगर मानसिक चेतना सजग नहीं करती तो ? सारे कार्यक्रम धरे के धरे रह जाते अगर मोबाईल मशीन के ऊपर पूरी तरह से निर्भर होते। वैसे भी अगर कोई कार्यक्रम पूर्वनिश्चित हो और दिमाग में हो तो शायद हमारे मानस में भी एक अलार्म अपने आप लग जाता है परंतु कई बार यह विफ़ल भी हो जाता है। विफ़ल शायद तभी होता होगा कि हमारा मानस पूरी तरह से सुप्तावस्था में चला जाता होगा और चेतना का अलार्म मानस में दस्तक नहीं दे पाता होगा।



