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वोदाफ़ोन का गड़बड़ बिल (Wrong Mobile Bill of Vodafone, Data Usage Charges)

क्या आपने कभी अपने मोबाईल का बिल बारीकी से देखा है अगर नहीं तो देखिये क्योंकि भले ही सारी कंपनियाँ दावे कर रही हों, परंतु सभी कहीं न कहीं गड़बड़ी करके कमाई कर रहे हैं।
जब से बैंगलोर आया हूँ, तब से तो मोबाईल कंपनियों से परेशान हो चुका हूँ, पहले टाटा डोकोमो लिया फ़िर एयरटेल और अब वोदाफ़ोन, सभी वादे करते हैं, कि बिल में कोई त्रुटी नहीं होगी, और मैं सभी के बिल में त्रुटियाँ पकड़ चुका हूँ। ये लोग सीधे मानते भी नहीं, पहले तो आपको गड़बड़ाने की कोशिश करेंगे फ़िर अगर आप नहीं मानते हैं तो फ़िर अपनी गलतियों को मानते हैं।
कल ऐसे ही मैं अपने वोदाफ़ोन का बिल देख रहा था कि तो डाटा चार्जेस में 18.30 रूपये थे, अब हमने अपने डाटा के उपयोग देखे और हिसाब किया तो पता चला कि बिल गलत है। आप भी देखें –
मेरा डाटा प्लान 99 रूपये में 2 जीबी डाटा फ़्री
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ये हैं मेरे द्वारा उपयोग किया गया डाटा
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अब हमने अपने सीखे हुए ज्ञान को परखा जो के इस प्रकार है,
1 byte = 8 bit
1 kb = 1024 byte
1 mb = 1024 kb
1 gb = 1024 mb
1 tb = 1024 gb
यहाँ हमने पाया कि हमने तो 150 mb डाटा का भी उपयोग नहीं किया है, फ़िर भी शुल्क लगा दिया गया है। सोचा चलो अपनी गणित में कुछ गड़बड़ी है, वोदाफ़ोन से पूछते हैं कि उनकी गणित कैसे होती है। कस्टमर (कष्टमर) केयर को फ़ोन लगाया, और उनसे हमने कहा कि क्या आप हमें समझायेंगे कि ये डाटा प्लॉन कैसे कैलकुलेट किया गया है, और ये शुल्क क्यों लगाये गये हैं। कस्टमर केयर पर ऐसे लोगों को बैठाया जाता है जिन्हें कुछ आता नहीं है और उन्हें अपने उत्पाद और प्लॉन पर पूरा भरोसा होता है, पहले तो वे माने नहीं कि बिल गलत है, जब हम डाटा कैलकुलशन उनको समझाने लगे तो फ़ौरन गलती मान ली और कहा हम आपका यह शुल्क वापस कर रहे हैं। आपको इसकी शिकायत का नंबर एस.एम.एस. से मिल जायेगा, कल दोपहर को फ़ोन किया था अभी तक उनके शिकायत नंबर का इंतजार कर रहे हैं, लगता है कि उन्होंने हमारी शिकायत दर्ज ही नहीं की है और दीगर यह है कि कस्टमर केयर पर बात करना फ़्री नहीं है उसके भी शुल्क लेती है वोदाफ़ोन
आप भी देखिये कहीं बिल में गड़बड़ी तो नहीं है, ये मोबाईल कंपनियों का कोई भरोसा नहीं है, आजकल लगभग सभी लोग इंटरनेट का उपयोग मोबाईल से करते हैं परंतु कितने लोग उसके शुल्क की गणना कर पाते हैं, शायद १ या २ प्रतिशत।

नियम का पालन और पहरेदार

नियम एक ऐसी चीज है जो हर व्यक्ति को पसंद होती है, बस उसकी परिभाषा सबकी अपनी अलग होती है। सब अपनी पसंद से नियम को अपने अनुकूल बना लेते हैं और दूसरों पर थोपने की कोशिश करते हैं। सरकार इन्हीं नियम को कानून का रूप देती है और नियम पालने के लिये पहरेदार भी बैठा देती है।

सरकार की देखा देखी हरेक जगह नियम बनाये गये और उन पर पहरेदार भी लगा दिये गये परंतु कभी आम आदमी से उन नियम के बारे में पूछने की जहमत नहीं उठाई गई, क्या वाकई आम आदमी उन नियमों का पालन करना चाहता है या नहीं ।

नियम तोड़कर भागने की प्रवृत्ति ज्यादा देखने में आती है, कोई भी आदमी नियम तोड़कर खुद पहरेदार के पास नहीं जायेगा, बल्कि पहरेदार को उस नियम तोड़कर  भागने वाले व्यक्ति को ढूँढ़ना होगा, अगर सभी नियम का पालन करने लगे तो पहरेदार की आवश्यकता ही खत्म हो जायेगी।

हो सकता है जो आपका या मेरा मन नियम मानता हो परंतु कानून उस नियम को बुरा मानता हो तो अधिकतर कानून के नियम मानना चाहिये और जो नियम बुरे लगते हों, कोशिश करना चाहिये उन नियमों को मानने की नहीं तो उन कानूनों को तोड़कर पहरेदारों से बचना चाहिये।

बचना भी एक कला है, कुछ लोग इतने माहिर होते हैं कि नियम भी तोड़ते हैं और ऊपर से दादागिरी भी करते हैं, उल्टा चोर कोतवाल को डांटे, परंतु जब तक अनुभव ना हो, इन चीजों को आजमाना नहीं चाहिये।

खैर यह बात और है कि कुछ लोग नियम तोड़ने में ही अपनी हेकड़ी समझते हैं, और नियम तोड़ना अपनी शान याने कि कानून को अपने हाथ में लेना। तो ऐसे लोग मानसिक रूप से विकृत होते हैं, और कुछ लोग होते हैं जो समय और परिस्थितियों के अनुसार नियम का पालन करते हैं, अगर अन्य लोग हैं तो नियम का पालन किया जायेगा नहीं तो नियम उनके लिये कोई मायने नहीं रखता। तो ऐसे लोग अवसरवादी कहलाते हैं और कभी खुदा न खास्ता किसी पहरेदार ने पकड़ भी लिया तो इनकी घिग्गी बँध जाती है, मिल गई इज्जत मिट्टी में।

नियम बनते ही लोग नियम को तोड़ने के रास्ते ढूँढ़ लेते हैं और नियम को कानूनन तरीके से तोड़ते हैं। हमारे यहाँ कुछ लोग हैं जो कि खुद को नियम के ऊपर समझते हैं और पहरेदार उनके लिये नियम को शिथिल कर देते हैं, यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। नियम सबके लिये एक होना चाहिये और पहरेदारों को इसके प्रति सतर्क रहना चाहिये।

पहरेदार चाहे कितनी कोशिश कर लें, नियम तो तब तक टूटते रहेंगे जब तक कि नियम का पालन करने वाले नियम को ना मानें, तो पहरेदार और नियम पालने वालों को संस्कारित होना होगा। किसी एक के सुधरने से बात नहीं बनेगी।

नियम तोड़ने पर सजा का कड़ा प्रावधान होता है और नियम लागू करने वालों को यह सुनिश्चित करना चाहिये कि वे बिना किसी दबाब के नियम को सख्ती से लागू करें, फ़िर वह राजा हो या रंक।

हड़ताल क्यों है ? (Strike..!)

कल कार्यालय में सुना कि “कल भारत बंद है” जिज्ञासा हुई कि भारत क्यों बंद है और कौन कर रहा है, कुछ ट्रेड यूनियनों का यह शौक रहा है, सो कही शौक के चलते तो यह हड़ताल नहीं कर दी, सो कल शाम को पान की दुकान पर भी पूछा “भई कल ये हड़ताल क्यों है ?” तो पानवाले ने भी मना कर दिया और कहा “हमें तो आपसे पता चल रहा है कि कल हड़ताल है”, पहले तो पानवाले से हमें पता चल जाता था कि हड़ताल क्यों है और कौन कौन भाग ले रहा है, यहाँ तक कि कब, कहाँ कितने बजे प्रदर्शन है सब कुछ। इसका मतलब कि पानवाले भी आजकल ज्यादा खबर नहीं रखते।
हमें तो आज तक यह समझ में नहीं आया कि हड़ताल से मिलता क्या है, शायद ज्यादातर लोगों को पता नहीं होगा कि सरकारी कर्मचारी अगर हड़ताल पर रहता है तो उसे उस दिन की तन्ख्वाह नहीं मिलती है, हड़ताली कर्मचारियों को एक दिन की तन्ख्वाह का घाटा उठाना पड़ता है। सबसे मजे की बात तो यह है कि कई हड़तालियों को पता ही नहीं होता कि वे हड़ताल किसलिये कर रहे हैं, और हड़ताल का मुद्दा क्या है।
आज सुबह अखबार में पढ़ा तो केवल एक लाईन पढ़ने को मिली कि सरकार की कथित श्रमिक विरोधी नीतियों के विरूद्ध हड़ताल है, अब पिछले कुछ वर्षों से तो सरकार की नीतियों में कोई बदलाव नहीं है, हमें तो नहीं दिखा अगर किसी को दिखा तो बताये कि सरकार ने कौन सी श्रमिक विरोधी नीतियों को बढ़ावा दिया है या नई नीति बनाई है। हमने तो यही देखा है कि श्रमिक काम से ज्यादा पैसा चाहते हैं और न मिलने पर सरकार के विरूद्ध हड़ताल करने में कोई कसर नहीं छोड़ते, हड़ताल का मुद्दा तो हवा हो जाता है।
कुछ कर्मचारी जो कि वाकई बेहद दुखी होते हैं, जिन्हें वाकई सरकार की नीतियों से परेशानी हो रही होती है, हड़ताल केवल उनका हथियार होना चाहिये, उन थोड़े से कर्मचारियों की आड़ में सारी ट्रेड यूनियनों का हड़ताल में उतरना किसी भी राष्ट्र के हित में नहीं है।
आज कार्यालय आते समय एक रैली से सामना हुआ, जो कि कम्यूनिस्ट पार्टी के झंडे लेकर चल रहे थे, वहीं लाल बत्ती हुई थी, हमने एक व्यक्ति जो कि रैली में शामिल था, से पूछ लिया कि
“रैली क्यों निकाल रहे हो”
जवाब मिला “हड़ताल है, और हड़ताल के समर्थन में रैली निकाल रहे हैं।”
हमने पूछा “हड़ताल !, बैंगलोर में है क्या ?”
जवाब मिला “नहीं आज भारत बंद है !”
हमने पूछा “हड़ताल क्यों है?”
फ़िर कोई जवाब नहीं मिला, हमारे प्रश्न पूछते ही वह झट से सरक लिया और वापिस रैली में शामिल हो चला।
तो इससे यह तो पता चल गया कि हर हड़ताली को यह पता नहीं होता कि हड़ताल क्यों है और न ही आम जनता को पता है कि हड़ताल क्यों है, अगर हड़ताल अच्छे मुद्दों के साथ है तो मुद्दे जनता में क्यों नहीं प्रचारित किये जाते, ताकि जनता भी साथ आये। जनता को मुद्दे ना बताने का मतलब और अखबारों में विस्तार से हड़ताल का कारण न बताना हमारी समझ से परे है।

रिलायंस डिजिटल – विज्ञापन में लुभावने ऑफ़र और दुकान में ऑफ़र में फ़ेरबदल, जनता के साथ धोखाधड़ी Reliance Digital – Differ offer then Ad in Newspaper in Store

शूक्रवार के टाइम्स ऑफ़ इंडिया का विज्ञापन में लुभावने ऑफ़र को रविवार को देखा, तो रविवार को ही तत्काल टीवी लेने का मन बनाया। ऑफ़र में लिखा था किसी भी सीटीवी के बदले इतनी छूट दी जायेगी, जिसमें कोई स्टार वगैरह नहीं था, और टीवी का ब्रांड भी नहीं लिखा था, तो हमने सोचा कि चलो पास वाले रिलायंस डिजिटल स्टोर पर जाकर पता लगा लिया जाये, पर उससे पहले हमने सोचा कि चलो पहले फ़ोन पर पता कर लेते हैं, तो शायद ज्यादा पता चल जाये और हमने पास वाले स्टोर पर फ़ोन लगाया तो पता लगा कि स्टोर तो १० बजे खुलता है परंतु सेक्शन के स्टॉफ़ ११ बजे तक आते हैं (तो ऐसा लगा कि रिलायंस भी अपने लोगों का कितना ध्यान रखती है, या फ़िर लोग रिलायंस की सुनते नहीं हैं, खैर जो भी है!)।

हमने कमनहल्ली के स्टोर पर फ़ोन लगाया तो किसी ने फ़ोन ही नहीं उठाया तब तो पक्का यकीन हो गया कि रिलायंस अपने लोगों का बहुत ध्यान रखती है, यह फ़ोन लगभग हमने सुबह १०.२५ पर लगाया था, फ़िर हमने ठान ली कि बैंगलोर के हर स्टोर पर फ़ोन लगाकर पता करते हैं, जिससे प्राथमिक जानकारी जुटाई जा सके और  तीसरे स्टोर कोरमंगला पर फ़ोन लगाया, यहाँ फ़ोन लगाकर खुशी हुई, जिस गर्मजोशी से यहाँ बात की गई और उत्पाद के बारे में भी प्राथमिक जानकारी प्रदान की गई, लगा कि रिलायंस में अच्छे कर्मचारी भी हैं। (वैसे यह सत्य है कि हरेक कंपनी में कुछ बहुत अच्छे कर्मचारी होते हैं, जो कंपनी का नाम बड़ाते हैं।)

reliance digital offer on LED TV हम वही पास वाले फ़िनिक्स माल के रिलायंस स्टोर गये और LED TV उत्पाद का पूरा निरिक्षण किया, वह LED TV 32 इंच का था और रिलायंस डिजिटल का खुद का ब्रांड था, (रिलायंस के खुद के LED TV Reconnect and ORZ कंपनियों के होते हैं), जिस पर क्रमश: २ एवं १ वर्ष की पूर्ण गारण्टी दी जा रही थी, हमने टीवी पसंद कर लिया और फ़िर खरीदने की बात आई तो जब हमने बताया कि हम इस ऑफ़र के तहत यह LED TV खरीदना चाहते हैं, तो हमें कहा गया कि आप ५ मिनिट का समय दें आपको सारी जानकारी जुटा देते हैं, उन १० मिनिटों में हमने iPhone 4S का निरिक्षण किया।

वह कर्मचारी फ़िर हमारे पास आया और बोला कि ’सर’ यह कंपनी की दूसरी टीम जो कि पुराने टीवी खरीदती है, वह आपके घर पर आकर टीवी देखेगी, हमने कहा कि ठीक है आज दोपहर तक यह भी करवा दो तो शाम को हम टीवी ले लेते हैं, घर पहुँचे दूसरी टीम का फ़ोन आया कि आपका टीवी २१ इंच का है और यह ऑफ़र केवल २९ इंच सीटीवी के लिये है, हमने कहा कि विज्ञापन में तो रिलायंस डिजिटल ने ऐसा कुछ लिखा नहीं है और अगर कभी भी इस तरह की शर्त होती है तो स्टॉर(*) लगाकर जरूर छोटे अक्षरों में लिख दिया जाता है, अगर कुछ लिखा नहीं है इसका मतलब कि आपको कोई भी सीटीवी स्वीकार्य है। परंतु वह कर्मचारी बोला कि ’सर’ यही ऑफ़र है, हमने कर्मचारी की मजबूरी समझते हुए कहा कि हमें अब LED TV लेने में अब कोई रूचि नही है, धन्यवाद।

हमें टीवी अगले दो वर्ष के लिये लेना था तो सोचा कि १९,९०० में 32 इंच LED TV under exchange offer with working CTV में बुरा नहीं है। परंतु रिलायंस डिजिटल विज्ञापने में कुछ और लिखती है और स्टोर पर कुछ और होता है जो कि जनता के साथ खुली धोखाधड़ी है। हम तो अपने पैसे की पूरी कीमत वसूलना जानते हैं, इसलिये अब तय किया गया कि अभी यही टीवी थोड़े दिन और देखी जाये।

आठ साल बाद फ़िल्म देखने का असर

वर्षों बाद सिनेमा हॉल में जाना बिल्कुल नया अनुभव लगा, ऐसा लगा कि शायद फ़िल्म देखने सिनेमा पहली बार गये हैं। सिनेमा हॉल बदल गये हैं, सिनेमा हॉल की जगह बदल गई है यहाँ तक की फ़िल्मों में भी बहुत कुछ बदल गया है।

मुझे याद है बचपन से जैसे हर बच्चे को सिनेमा हॉल में जाना एक भिन्न प्रकार का अनुभव होता है और जो आकर्षण सिनेमा हॉल में होता है फ़िल्मों के लिये वह अद्भुत होता है, जो अनुभव मैंने शायद पहली बार किया था, वही अनुभव आज शायद मेरे बेटे ने किया होगा।

मुझे अपने शहरों के सिनेमा हॉल अभी,  तक याद हैं, जिनमें में अपने बाल, किशोरावस्था में गया था। पहले साईकिल से जाते थे और साईकिल स्टैंड पर १ रूपये स्टैंड का किराया होता था फ़िर टिकट के लिये लाईन में लगते थे और हमेशा १५ मिनिट पहले टॉकीज जाते थे जिससे वहाँ लगे उस फ़िल्म के सारे पोस्टर और आने वाली फ़िल्मों के पोस्टर इत्मिनान से देख सकें। उन पोस्टरों में पता नहीं क्या होता था पर जो आकर्षण उन पोस्टरों में शायद मेरे लिये था, वह शायद सब के लिये होता था, तभी तो टॉकीज के अंदर लॉबी में भी पोस्टर देखने की इतनी भीड़ होती थी।

टॉकीज जाकर फ़िल्म देखना मित्र समूह में विशेष बात मानी जाती थी, और अपनी कॉलर ऊपर करके उस फ़िल्म के डॉयलाग बोलना हेकड़ी ! वह जमाना ही कुछ और था अब जमाना बदल गया है।

जब छात्र थे तब कोशिश रहती थी कि सबसे आगे की सीट पर बैठें, और कम कीमत में फ़िल्म देखकर पैसे बचाकर अगली फ़िल्म भी देख लें। फ़िर जैसे जैसे बड़े हुए हमारी सीट टॉकीज में पीछे खिसकती गई, पहले फ़र्स्ट फ़िर स्टॉल, फ़िर स्पेशल स्टॉल फ़िर पहली मंजिल पर बालकनी और उसके पीछे बॉक्स कई बार दोस्तों के साथ फ़ैमिली बॉक्स का भी लुत्फ़ उठाया जिसमें सोफ़े हुआ करते थे

कुछ टॉकीज बेहद प्रसिद्ध थे और उस समय तो टॉकीजों में भी अच्छे से अच्छे होने की प्रतियोगिता चलती थी, म.प्र. का सबसे बड़ा टॉकीज होने का गौरव, पहला डॉल्बी साऊँड होने का गौरव या फ़िर म.प्र. में सुविधा के हिसाब से सबसे अच्छा टॉकीज होने का गौरव।

उस जमाने में हमारे शहर में लगभग १० टॉकीज थे, आज पता नहीं कितने हैं, कुछ टॉकीज तोड़कर तो उसमें आधुनिक बाजार बना दिये गये हैं। कुछ टॉकीज ऐसे थे जिनमें जाना हम अपनी शान के खिलाफ़ समझते थे और कुछ टॉकीज ऐसे थे जहाँ केवल अश्लील याने कि एड्ल्ट फ़िल्में ही चला करती थीं, जहाँ जाना मतलब कि अपनी इज्जत की ऐसी तैसी करना। आज भी याद है एक टॉकीज है “मोहन” जिसमें केवल “एडल्ट” फ़िल्में ही लगती थीं, उसमें लगी “जाँबाज” और हम मित्र मंडली के साथ देखने गये और फ़िल्म के बाद बाहर निकले तो दोस्तों के कुछ रिश्तेदारों ने “मोहन” से निकलते देख लिया और जो हंगामा हुआ, वो तो भला हो कि “एडल्ट” नहीं थी, कुछ टॉकीज ऐसे होते थे कि जिसमें जाना और वापिस घर आना रूतबे का का सबब हुआ करता था।

नये दौर का सिनेमा, चाय पकौड़े और समोसे से पॉपकार्न के टोकरे, शीतपेय का जमाना आ गया है। सब बदल गया है, देखने वाले भी बदल गये हैं और दिखने वाले भी।

आखिरी फ़िल्म जयपुर में प्रसिद्ध टॉकीज “राज मंदिर” में “खाकी” देखी थी और कल लगभग ८ वर्ष बाद “अग्निपथ” सिनेमेक्स में देखी।

न्यू ईयर का हंगामा और फ़लाना ढ़िमकाना ब्रांड व्हिस्की

न्य़ू ईयर का हंगामा बरप रहा था, वह कोई बहुत बड़ी सिटी तो नहीं परंतु हाँ उसके लिये तो शायद बहुत बड़ी थी क्योंकि शायद उसके सपने भी उतने बड़े ही थे या यों कह लो कि उसके सपने बहुत छोटे थे। रात घिर रही थी, हर जगह न्यू ईयर का शोर मच रहा था। वह भी अपने एक दोस्त के साथ पौवा लगाकर घर लौट रहा था, सोचा कि अब और कोई दोस्त तो है नहीं इस शहर में, घर पर जाकर सोकर ही न्यू ईयर मना लिया  जाये ।
फ़िर भी आस में एक चौराहे पर खड़े होकर गुमटी दिखते ही कश लगाने की एक गहरी इच्छा मन में आ गई, कि शायद कोई होस्टल में रहने वाला कोई उसका दोस्त नयू ईयर की पार्टी में ले चले, परंतु किस्मत इतनी जोरदार नहीं थी, तभी उसके साथ पढ़ने वाला जो कि अब आजकल इसी शहर में था मिल गया, और वह किराये के मकान में रहता था। न्यू ईयर की पार्टी के लिये समान खरीदने जा रहा था जैसे कि व्हिस्की, रम जौर मुर्गा।
बस उसके लिये क्या था बोला कि चलो आज न्यू ईयर पर व्हिस्की मारेंगे और मुर्गा सूतेंगे। ठेके पर व्हिस्की लेने पहुँचे तो पता चला कि फ़लाना ब्रांड नहीं है और केवल एक ढ़िमकाना ब्रांड है जो कि उसके गले से उतरता नहीं था, पर दोस्त बोला कि चल आज ये ही सही। पूरा खंबा और पीने वाले दो लोग, धीरे धीरे गटकाते हुए न्यू ईयर की चीयर्स होती रही।
पीने के बाद उसे थोड़ा तबियत नासाज लग रही थी और सोचा कि इधर ही कै कर ली जाये परंतु फ़िर सोचा कि ये साले क्या सोचेंगे कि पीने के बाद हजम भी नहीं हुई और मुँह से निकाल कर चल दिया। छोड़ो  जैसे तैसे सारा इल्जाम उस ढ़िमकाने ब्रांड पर लगाया, कितना गन्दा ब्रांड है और आज के बाद कभी इस ब्रांड की व्हिस्की नहीं पीने का और इसीलिये इस ब्रांड को पीता नहीं था। कितनी भी कम पियो चढ़ती तो जरूर है, जब सरूर सिर पर होता है तो सब कुछ नाचने लगता है। सोच समझकर बोलना और सोच समझकर सुनना, कहीं गलत बोल न दिया जाये और कहीं गलत सुन ना लिया जाये
खैर उसको क्या उसका तो न्यू ईयर हो गया था, एक नई सीख के साथ कि ढ़िमकाने ब्रांड की व्हिस्की नहीं पीनी चाहिये।
नव वर्ष की शुभकामनाएँ ।

कितनी अच्छी ठंड होती थी पहले…

    पता नहीं दिल कब मानेगा कि हाँ अब शरीर को ठंड लगती है, देखने से पता चलता है हाथ और पैर के बाल ठंड के मारे एक दम सीधे खड़े हैं जैसे किसी जंगल में किसी ने कोई तरकीब से बाँस के पेड़ उगा दिये हों। पहले जब ठंड पड़ती थी तो ऊन की वो ५-६ किलो की रजाई में घुसने का मजा ही कुछ और था परंतु याद आया वो तो बचपन था, जैसे जैसे किशोर हुए वो गोदड़ी गायब हुई और राजस्थानी रजाई आ गई, जब पहली बार राजस्थानी रजाई देखी थी तो ऐसा लगा था कि ये मारवाड़ी मजाक कर रहा है भला कभी इतनी पतली रजाई में ठंड भागती है क्या ? फ़िर भी हम ४ रजाई ले आये सबके लिये एक एक….

    राजस्थानी रजाई का ही कसूर है उसने हमें सिखाया कि ठंड खत्म हो रही है, नहीं तो इसके पहले तो कंबल भी ओढ़ लेते थे और उसके रोएँ की चुभन इतनी अच्छी लगती थी क्योंकि अगर वह हटा देते तो ठंड लगती, चुपचाप कभी ट्रेन में कभी रेल्वे स्टेशन पर तो कभी बस स्टैंड में वह कंबल ओढ़े हाथ में चाय की कुल्हड़ से चाय पीते हुए और हाथ जो कंबल के बाहर होते थे वो हिमालय की हवाओं से ठंडे होते थे, उन हाथों को गर्म करने के लिये कभी अलाव के ऊपर रखते तो कभी कंबल के अंदर करके रगड़ से ठंडा करने की कोशिश करते । फ़िर हाथों के लिये कार्तिक मेले से दस्ताने लिये थे, परंतु वे रेग्जीन के दस्ताने हाथ और ठंडे करते थे तो माँ ने ऊन का दस्ताना बुन दिया था, जिसे कभी उतारने की इच्छा ही नहीं होती थी।

    किशोरावस्था से जवानी तक आते आते स्वेटर और पुलोवरों का फ़ैशन खत्म हो चला था, अब जर्किनों का फ़ैशन था, स्वेटर में तो छन छान कर ठंडी हवा भी लगती थी परंतु जर्किन में बाहरी ठंडी हवा का कोई नामो निशां नहीं था। कभी भेड़ की फ़र वाली जर्किन कभी दोहरी तरफ़ वाली जर्किन, एक जर्किन खरीदो और दो जर्किनों के मजे लो। कभी पापा की जर्किन पहन लो कभी भाई की, कितनी अच्छी ठंड होती थी पहले पूरे परिवार को एक साथ अपना सामना करना सिखाती थी, और सबका साईज एक हो जाता था।  माँ ने इतने सारे हॉफ़ स्वेटर बनाये थे खासकर कुछ स्वेटर तो मेरे मनपसंदीदा थे जिनपर की गई डिजाईन तो माँ ने अपने आप की थी परंतु वे डिजाईन मन को ऐसे भाये कि उन्हें कभी जुदा नहीं कर पाया।

    आज न वो स्वेटर पास हैं, न ही वो जर्किन, जर्किन तो हैं परंतु अकेले पहनना पड़ती है, न पापा हैं यहाँ ना भाई है यहाँ कि मेरी जर्किन में गर्मी बड़ जाये और न वो माँ का बुना हुआ हॉफ़ स्वेटर मेरे पास है, परंतु हाँ उन सबकी गर्मी मेरे पास है, तभी तो मैं आज भी कहता हूँ और नहीं मानता हूँ कि मुझे ठंड लग रही है…..

इतना तो साफ़ है सरकार नौकरशाहों की फ़िक्रमंद है..

लोकपाल के ड्राफ़्ट के सामने आते ही तरह तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आने लगी हैं, अन्ना एवं टीम वापस अनशन पर जाने के लिये तैयार हो गये हैं, सबने कमर कस ली है। सरकार ने भी अपनी कमर कस ली है और संदेश दिया है कि नौकरशाहों की उन्हें बहुत चिंता है, कैसे उनकी कमाई पर हाथ साफ़ कर दें, कैसे उनकी होने वाली कमाई को रोक दें, इसलिये प्रधानमंत्री द्वारा किये गये वादे भी भुला दिये गये।

प्रधानमंत्री के तीन वादे जो चिठ्ठी लिखकर अन्ना को किये गये थे, अब कांग्रेस की सरकार ने उस चिठ्ठी का मजाक बना दिया है, सरकार का मंत्री जो मुँह में आता है उलूल जुलूल बके जा रहा है और हो वही रहा है जो अंधेर नगरी का चौपट राजा चाह रहा है। देखते हैं कि देश में कब तक यह अंधेरगर्दी चलती है।

सरकार ने छोटे बाबुओं को लोकपाल से दूर रखकर उन्हें संदेश दिया है कि आप कमाई करते रहो और जैसे सालों से ऊपर हफ़्ता, महीना देते रहे हो, देते रहो। छोटे बाबु साहब आप लोग चिंता मत करो, आपके लिये तो हम देश की जनता से भी टकरा जायेंगे, भुलक्कड़ जनता है वोट डालकर सब भूल जाती है और जो वोट नोट में बिकते हैं नोट से खरीद लेते हैं, क्योंकि उन्हें अपने वोट की कीमत पता है और पढ़े लिखे गँवार लोग जिन्हें अपने वोट की कीमत बहुत अच्छे से पता है, बिना नोट के वोट दे देते हैं।

तो छोटे बाबू साहब लोग आप तो इन पढ़े लिखे गँवार और असली गँवारों से नोट बटोरते रहो और मजे करते रहो, चिंता मत करो कानून भी सरकार ही बनाती है और सरकार ही मिटाती है। छोटे बाबू साहबों के होंसले इतने मस्त है कि आम जनता पस्त है। अब तो खुलेआम कहते हैं तुम्हारे अन्ना ने क्या कर लिया ? हमारे ऊपर कोई लगाम नहीं लगा सकता क्योंकि हमारे आका जो ऊपर बैठे हैं, उन्हें हमारी बहुत चिंता है।

पर जैसे कि एक खबर कल अखबार में पढ़ी थी एक सँपेरे ने अपने साँप तहसील कार्यालय में छोड़ दिये क्योंकि उससे छोटे बाबू साहब लोग ’कुछ’ लेना चाहते थे, तो सँपेरे ने उनके कार्यालय में दस साँप छोड़ दिये। मतलब कि संदेश साफ़ है कि अगर आपको नहीं देना है तो सँपेरे से दोस्ती गांठ लो, सारे छोटे बाबू लोग टेबल पर चढ़े नजर आयेंगे।

छोटे बाबू साहब लोग आप समझ जाओ जब आप लोग टेबल पर चढ़ेगे तो सरकार कितनी बार आपको इन साँप जैसे जीवों से बचाने आयेगी, शायद इन बाबुओं को पता नहीं होगा कि साँप टेबल पर भी चढ़ जाते हैं। अब छोटे बाबू साहब लोग अगर सब अपने अपने हथियार लेकर आ जायें तो टेबल से तो आपका बचाव नहीं होगा . . . .

हैलो… हिन्दी आता है क्या ? (Hello ! Do you know Hindi ?)

    ऑफ़िस से आते समय थोड़ा पहले ही घर के लिये उतरना पड़ा तो सिग्नल पर एक आदमी टकराया और बोला “हैलो… हिन्दी आता है क्या?” हमने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और चुपचाप चल दिये कि जैसे अपने को नहीं किसी और को बोला हो।

     कई बार ऐसे व्यक्ति मिले हैं, जो कि उत्तर भारतीय लोगों को निशाना बनाते हैं और उनसे मदद के नाम पर ठगी करते हैं, इसलिये अब तो हम बिल्कुल मदद नहीं करते हैं, हाँ इसमें अगर कोई जरूरतमंद होता है तो भी उसकी जानबूझकर मदद नहीं कर पाते हैं।

    ये वाक्ये केवल बैंगलोर में ही नहीं भारत में लगभग सभी जगह होते हैं। अगर बात करने रूक जाओ तो उसकी आँखों मॆं विशेष चमक आ जाती है और पता नहीं कहाँ से उसका परिवार भी प्रकट हो जाता है जिसमें अमूमन उसकी पत्नी और एक याद दो बच्चे होते हैं, जो कि फ़टॆहाल होते हैं। और फ़िर शुरू होता है खेल रूपये ऐंठने का । कहा जाता है हम दूर दराज से आये हैं और यहाँ काम नहीं मिल पाया है और अब खाने के भी पैसे नहीं है, खाने के ही पैसे दे दीजिये, घर वापस जाना है कैसे जायें समझ नहीं आ रहा । इस सबसे ही माजरा समझ में आ जाता है कि इन लोगों ने लोगों के हृदय को झकझोर कर रूपये ऐंठने का धंधा बना रखा है ।

    क्योंकि जहाँ तक मैं सोचता हूँ आज भी दूर दराज के गाँव का कोई भी व्यक्ति शहर कुछ करने आयेगा तो पहली बात तो वह अकेला आयेगा ना कि अपने परिवार के साथ, और अगर वह कुछ करना चाहता है तो बड़े शहरों में इतना काम होता है कि कोई न कोई काम मिल ही जाता है, और अगर कोई काम न करना चाहे तो वह अलग बात है।

    गाँव का व्यक्ति कभी भी अपने स्वाभिमान से डिगेगा नहीं, कि उसे भीख माँगनी पड़ जाये, वह भूखे रह लेगा या वापिस बिना टिकट जैसे तैसे अपने गाँव वापिस चले जायेगा, किंतु शायद ही वह अपने स्वाभिमान से समझौता करेगा, हो सकता है कि कुछ लोगों की परिस्थितियाँ अलग हों। किंतु इतने सारे लोगों की परिस्थितियाँ तो एक जैसी नहीं हो सकतीं।

लिव-इन रिलेशनशिप मतलब बराबर का खर्चा

आजकल लिव-इन रिलेशनशिप का फ़ंडा कुछ ज्यादा ही जोर पकड़ता जा रहा है, अभी हाल ही में एक परिचित से बात हो रही थी, तो उसने बताया कि उसके साथ काम करने वाली एक लड़की से उसकी बात हो रही थी।
उस लड़की ने बताया कि वह पिछले दो साल से लिव-इन रिलेशन में रह रही है और साथ ही होस्टल का किराया भी भरती है, जब भी लड़की के घरवाले बैंगलोर मिलने को आते हैं, वह होस्टल चली जाती है और उनके वापिस जाते ही वह वापिस उस फ़्लैट में शिफ़्ट हो जाती है। तो उसने पूछा कि शादी क्यों नहीं कर लेते हो जब दो वर्षों से लिव-इन में रह रहे हो, उसका जबाब था कि जब जिंदगी बिना टेन्शन के चल रही है और अभी शादी की जरूरत भी महसूस नहीं हो रही तो शादी क्यों कर ली जाये।
फ़िर उससे पूछा कि खर्चा कैसे करते हो, तो वह बोली कि तुम दोस्त लोग कैसे फ़्लैट शेयर करके रहते हो और खर्चा बांटते हो बस वैसे ही हम अपना खर्चा बांटते हैं, हरेक खर्च में हम दोनों बराबर के हिस्सेदार होते हैं, शादी नहीं होने के बाबजूद शादीशुदा जिंदगी का लुत्फ़ उठाते हैं, घर के हर काम में भागीदारी करते हैं।
लड़का और लड़की दोनों उत्तर भारत के रहने वाले हैं, और दोनों ही संस्कारी परिवार से हैं। परंतु आजकल के खुलेपन में शायद अपनी मर्यादाओं को भुल गये लगते हैं, उनकी सोचने की दिशा बदल गई है।
हम तो यह सोचते हैं कि अगर लिव-इन में रहना जरूरी है तो घर वालों से पर्दा क्यों, जो भी करो खुलेआम करो । किसी से डरने की जरूरत ही क्या है ?