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सुबह 6 बजे से सिर पर हथौड़ा

जीवन में कठिनाइयां तो आती ही रहती हैं इसलिए उनका इतना टेंशन लेना नहीं चाहिए। आजकल एक नई कठिनाई आ गई है, जो कि पड़ोस में बना रहे मकान से है।

जो पड़ोस में मकान बन रहा है वह दूसरी सोसाइटी में है और मजदूर लोग सुबह 6:00 बजे से ही काम करने लग जाते हैं, जो कि शाम को 7:00 बजे तक चलता है, जबकि बेंगलुरु में नियम के अनुसार मकान कंस्ट्रक्शन का काम सुबह 8:00 बजे से शाम के 7:00 बजे तक ही हो सकता है यह सोसायटी का भी नियम है। यह कॉलोनी है तो मजदूर लोग यही झोपड़ी बनाकर रहते हैं, जबकि जो हाई राइज बिल्डिंग होती हैं, वहां पर मजदूर लोगों को बाहर से एंट्री करना पड़ती है, इसलिए ये लोग सुबह 6:00 से ही काम करने लगते हैं।

हमने अपनी सोसाइटी में मैनेजमेंट कमेटी को कहा कि आप उन पड़ोस की मैनेजमेंट कमेटी से बात करें और उन्हें बताएं की सुबह 6:00 बजे से काम करने से नींद पूरी नहीं होती है सुबह 6:00 बजे से ही मजदूर लोग कभी हथौड़ी मारते हैं कभी पानी देते हैं कभी ईंट पटकते हैं तो कभी और कोई उपक्रम करते हैं, जिससे नींद खुल तो जाती है पर सिर में दर्द हो जाता है।

एक दिन गुस्से में आकर मैं छत पर जाकर उन पर चिल्ला भी आया, पर उसका भी कोई असर नहीं हुआ। ऐसा लगता है कि केवल मुझे ही समस्या है मेरे पड़ोस में और तीन मकान है जिनके यहां भी उतनी ही आवाज आती होंगी जितनी मेरे यहां। पता नहीं क्यों वे लोग शिकायत नहीं करते और ना ही उस सोसायटी के अन्य पड़ोसी शिकायत करते हैं

जबकि यहां सोसाइटी में अधिकतर लोग अमेरिका यूरोप रहकर आए हुए हैं और संभ्रांत हैं परंतु भारत में आकर सब ठेठ भारतीय हो जाते हैं और दूसरे का बिल्कुल ध्यान नहीं रखते। यही काम अगर वे अमेरिका या यूरोप में कर लें तो एकदम से पुलिस को लोग बुला लेंगे और काम बंद हो जाएगा। परंतु यहां तो पुलिस को बुलाना भी किसी सर दर्द से काम नहीं। पुलिस की आम जनता में जो छवि यही है कि पुलिस पैसे के बिना काम नहीं करती और हम नौकरी पेशा लोग नौकरी करेंगे या फिर थाने के चक्कर लगाएंगे।

मैं लगभग रोज सुबह ही 6 बजे जैसे ही काम शुरू होता है, वैसे ही उसे सोसायटी के सिक्योरिटी को फोन लगाता हूँ, रोज आते जाते हुए उन्हें कहता भी हूँ, परंतु वे लोग भी लगता है कि रोकने में अक्षम हैं, ऐसा लगता है कि उनको भी यह बात बहुत छोटी लगती है।

जिनके मकान बन रहा है वे तो यहां रहते नहीं है तो हो सकता है उन्हें परेशानी समझ में ना आ रही हो और आ भी रही हो, तो वे तो यही चाहेंगे कि काम तेजी से चलता रहे, जिससे कम वक्त में मकान बनाकर तैयार हो जाए।

फिर कभी सोचता हूं कि जब किसी को कोई फर्क ही नहीं पड़ता तो मैं भी क्यों इतना बेसब्र हो रहा हूं यह केवल मेरी ही समस्या नहीं बल्कि मेरे पेरेंट्स जो कि अब 77 साल के हैं उनकी भी है, परंतु कोई सुनने वाला नहीं है।

लिखने का मकसद केवल इतना है कि सारे कार्य केवल सरकार और कानून के सहारे नहीं होते, कुछ कार्यों को खुद के अनुशासन और नियमों को पालने से भी समस्या का निराकरण किया जा सकता है। पर ऐसा हो नहीं रहा।

भारत ने Alibaba.com के साथ Export Partnership क्यों की?


China Tech Ban के बाद यह फैसला कितना महत्वपूर्ण है?

भारत सरकार ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम उठाते हुए भारतीय MSMEs और स्टार्टअप्स के निर्यात (Export) को बढ़ावा देने के उद्देश्य से वैश्विक B2B ई-commerce प्लेटफ़ॉर्म Alibaba.com के साथ साझेदारी की है। यह पहल Startup India कार्यक्रम के अंतर्गत की गई है, जिसका उद्देश्य भारतीय निर्माताओं और सप्लायर्स को अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक डिजिटल माध्यम से पहुँच प्रदान करना है।

यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब वर्ष 2020 के बाद भारत ने डेटा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए कई चीनी मोबाइल एप्लिकेशनों पर प्रतिबंध लगाया था। ऐसे परिदृश्य में यह साझेदारी भारत की व्यापार नीति (Trade Policy) में एक व्यावहारिक (Pragmatic) दृष्टिकोण को दर्शाती है, जहाँ डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स का उपयोग घरेलू उद्योगों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ाने के लिए किया जा रहा है।


Partnership का उद्देश्य क्या है?

भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) देश के कुल निर्यात में लगभग 45% योगदान करते हैं। हालांकि, इन कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अंतरराष्ट्रीय खरीदारों तक सीधी पहुँच की होती है।

Alibaba.com एक वैश्विक B2B मार्केटप्लेस है जो:

  • 200 से अधिक देशों में सक्रिय है
  • लाखों अंतरराष्ट्रीय खरीदारों को सप्लायर नेटवर्क से जोड़ता है
  • Digital storefront के माध्यम से छोटे निर्माताओं को Global Visibility देता है
  • Cross-border trade enablement tools जैसे logistics support, payments और buyer discovery प्रदान करता है

इस प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से भारतीय MSMEs अब:

  • Africa
  • Middle East
  • Europe
  • Latin America
    जैसे उभरते हुए निर्यात बाज़ारों में अपने उत्पादों को सीधे सूचीबद्ध (List) कर सकते हैं।

Export Ecosystem पर संभावित प्रभाव

भारत सरकार की यह पहल “Make in India” और “Digital India” जैसी नीतियों के साथ संरेखित (Aligned) है। MSMEs के लिए Digital Export Enablement से निम्नलिखित लाभ होने की संभावना है:

1. Market Access Expansion

छोटे भारतीय निर्माता अब बिना किसी स्थानीय distributor के सीधे विदेशी खरीदारों से संपर्क कर सकेंगे।

2. Cost Efficiency

Traditional export channels जैसे trade fairs या overseas agents की तुलना में डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स कम लागत में global reach प्रदान करते हैं।

3. Forex Earnings Growth

निर्यात बढ़ने से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) में वृद्धि हो सकती है।

4. Supply Chain Integration

Indian manufacturers को global supply chains में integrate होने का अवसर मिलेगा।


Strategic Policy Perspective

यह साझेदारी इस बात का संकेत है कि भारत सरकार डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स और तकनीकी बुनियादी ढांचे (Technology Infrastructure) को केवल उपभोक्ता सेवाओं तक सीमित न रखकर उन्हें व्यापार संवर्धन (Trade Promotion) के साधन के रूप में उपयोग करना चाहती है।

जहाँ एक ओर डेटा सुरक्षा और डिजिटल संप्रभुता (Digital Sovereignty) महत्वपूर्ण हैं, वहीं दूसरी ओर वैश्विक व्यापार में प्रतिस्पर्धात्मक बने रहने के लिए अंतरराष्ट्रीय डिजिटल मार्केटप्लेस तक पहुँच भी आवश्यक है।

इस संदर्भ में यह पहल:

  • Export-led growth strategy
  • MSME internationalization
  • Digital trade enablement

जैसे प्रमुख आर्थिक लक्ष्यों को समर्थन प्रदान कर सकती है।


निष्कर्ष

भारत की अर्थव्यवस्था के दीर्घकालिक विकास के लिए निर्यात-आधारित वृद्धि (Export-Driven Growth) अत्यंत महत्वपूर्ण है। Alibaba.com जैसे वैश्विक B2B प्लेटफ़ॉर्म के साथ सहयोग भारतीय MSMEs को डिजिटल माध्यम से वैश्विक बाज़ारों तक पहुँच प्रदान कर सकता है, जिससे देश की व्यापारिक प्रतिस्पर्धा क्षमता और विदेशी मुद्रा आय में वृद्धि संभव है।

यदि इस पहल को प्रभावी रूप से लागू किया जाता है, तो यह भारतीय निर्माताओं के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भागीदारी का एक महत्वपूर्ण अवसर सिद्ध हो सकती है।


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2026 में कोई एक बड़ी वित्तीय संस्थान डूबेगी

2026 में कोई एक बड़ी वित्तीय संस्थान डूबेगी और उसे rbi तारेगी।

यह सब होगा पर्सनल लोन के कारण, लोग लाइफ स्टाईल मेंटेन करने के लिये भी लोन ले रहे हैं, और महंगाई लगभग 10% की दर से बढ़ रही है, तो महंगाई 6 साल में डबल हो रही है। जबकि सैलेरी एवरेज लगभग 5% प्रतिवर्ष बढ़ रही है, तो मुख्यतः हो यह रहा है कि सैलेरी आपकी श्रिंक ही रही है, जबकि खर्चे लगातार बढ़ रहे हैं।

और 2026-27 में रुपया डॉलर के मुकाबले में शतक मारने वाला है, तो महंगाई और बढ़ेगी। और इसके लिये लोग पर्सनल लोन ज्यादा ले रहे हैं और लेंगे। और वे डिफ़ॉल्ट होना शुरू हो चुके हैं, रुझान आने लगे हैं।

बड़े शहरों में रहना मुश्किल हो रहा है, और मुश्किल होता जायेगा। डिफ़ॉल्ट के कारण ही कोई बड़ा वित्तीय संस्थान डूबेगा, सरकार या तो इस फरवरी में या इस वर्ष के मध्य तक आयकर में और राहत देगी, यह सरकार की मजबूरी है। वहीं rbi लगभग 1% रेट कट करेगा।

जो भारतीय बाहर जय जयकार करते थे, ट्रंप ने उनको इतना बड़ा डंडा कर दिया है, कि बेचारे अब कुछ बोल नहीं पा रहे हैं, अमेरिका के टैरिफ के बाद अब चीन भी 2026 में भारत के साथ गड़बड़ करेगा, कैसे करेगा यह तो वक्त बतायेगा, क्योंकि जब कोई किसी एक से दबता है, तो दूसरा भी आकर बजाता ही है। इसका मुख्य कारण केवल एक है कि हमारी राजनैतिक इच्छाशक्ति बहुत कमजोर है।

हमारे यहाँ से धनाढ्य लोग दुबई सिंगापुर जा रहे हैं और उनको पता है कि इन भारतीयों को क्या चाहिये, इनका पैसा सुरक्षित रहना चाहिये, और अच्छी लाईफ स्टाइल चाहिये। भारत का युवावर्ग जो अब तक बहुत बड़ी शक्ति था, अब वही AI के आने के बाद किसी काम का नहीं रहेगा, वही लायबिलिटी होगा।

सहमत या असहमत होने की जरूरत नहीं, क्योंकि जो होगा, उसका गवाह वक्त होगा। बाकी कभी ओर लिख देंगे।

पुश्तैनी दौलत बनाम IIT-IIM की डिग्री: एक कड़वा सच? 🤯

​हाल ही में मेरी आँखों के सामने एक ऐसी घटना हुई जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया।
​दो लोग थे: दोनों दोस्त थे और दारू पीने के बाद बात कर रहे थे –

1️⃣ पहला (23 साल): जिसके पास मजबूत पारिवारिक बैकग्राउंड है (विरासत में मिली जमीन + म्यूचुअल फंड्स), कुल नेटवर्थ ₹15-18 करोड़ और खुद की कमाई ₹13-15 लाख सालाना।

2️⃣ दूसरा (24 साल): एक IIT-IIM ग्रेजुएट, जिसकी खुद की मेहनत की कमाई (पैकेज) ₹45 लाख सालाना है।

​बातों-बातों में जब बहस बढ़ी, तो अमीर बैकग्राउंड वाले लड़के ने IIT ग्रेजुएट से एक बात कही:
“तू जितना भी घिस ले, इतना पैसा तू कभी कमा ही नहीं पाएगा।”

​अगर हम अहंकार को साइड में रख दें, तो क्या वह वाकई कैलकुलेशन के रूप से सही था? मुझे महसूस हुआ कि टॉप एजुकेशन और हाई सैलरी पाने वालों के लिए भी ‘वेल-इन्वेस्टेड जनरेशनल वेल्थ’ (Well-invested Generational Wealth) को पछाड़ना कितना मुश्किल है, जब तक कि वो कोई बहुत बड़ा स्टार्टअप या बिजनेस न खड़ा कर दें।

​₹45 लाख का पैकेज बहुत शानदार है, लेकिन ₹15 करोड़ की संपत्ति का ‘कंपाउंडिंग’ (Compounding) अलग ही लेवल पर खेलता है।

👉 ₹45 लाख कमाने वाले को टैक्स और खर्चे काटने के बाद ₹15 करोड़ जमा करने में शायद 20-25 साल लग जाएंगे।

👉 वहीं ₹15 करोड़ की दौलत वाला अगर कुछ न भी करे, तो भी सिर्फ ब्याज/रिटर्न से ही सालाना करोड़ों कमा सकता है।

अगर हम भावनाओं को किनारे रखकर सिर्फ गणित (Maths) देखें, तो वह लड़का शायद सही था।

​एक मोटा-मोटा हिसाब लगाया:

​👉 IIT-IIM वाला लड़का: ₹45 लाख का पैकेज। टैक्स कटने और मेट्रो सिटी में एक अच्छी लाइफस्टाइल जीने के बाद, वह साल में मुश्किल से ₹15-20 लाख बचा पाएगा।

​👉 पुश्तैनी दौलत वाला लड़का: उसके पास ₹15 करोड़ का बेस है। अगर वह इसे किसी सुरक्षित जगह पर भी इन्वेस्ट करे और उसे सिर्फ 8% का सालाना रिटर्न मिले, तो वह बिना कोई काम किए साल का ₹1.2 करोड़ (हर महीने ₹10 लाख) कमा रहा है।

​फर्क साफ़ है: एक अपनी मेहनत से साल के 20 लाख बचा रहा है, और दूसरा अपनी दौलत के ब्याज से ही साल के 1 करोड़ 20 लाख कमा रहा है।

​यही कंपाउंडिंग की असली ताकत है, जो सैलरी क्लास को कभी जीतने नहीं देती।

​भारत में यह हम मिडिल क्लास वालों के लिए एक चुभने वाली हकीकत है।


​#GenerationalWealth #IITIIM #RealityCheck #MoneyMindset #India #WealthGap

पता नहीं पर क्यों मुझे हर नियम मानने हैं।

कई बार मैं खुद ही खुद बेवकूफ लगने लगता हूँ, पता नहीं पर क्यों मुझे हर नियम मानने हैं।

पहला किस्सा –

अभी 2 दिन पहले एक सिग्नल पर क्रॉसिंग में था, ग्रीन से ऑरेंज हो गई थी, तो हमने धीमी कर ली, और रेड भी हो गई तो ब्रेक मार दिये, पर भाईसाहब पीछे वाला गाड़ी में ठुकते बचा ओर अगल बगल वाले तो निकल चुके थे, जो साइड में खड़े थे, वे मुझे घूर घूरकर देख रहे थे।

दूसरा किस्सा –

मैं मंदिर जब भी जाता हूँ, तो जो नियम लिखे रहते हैं, पालन करता हूँ, वहाँ लिखा है कि मोबाईल फोन से फोटो वीडियो बनाना प्रतिबंधित है, पर देखता हूँ, लोग फिर भी मानते नहीं। ऐसे ही सुबह महाकाल का किसी का वीडियो देख रहा था, यो वहाँ पर भी मोबाईल फोन प्रतिबंध का बड़ा सा बोर्ड लगा है, पर सभी उपयोग कर रहे हैं। अब उनको क्या ही पुण्य मिलेंगे, जब वे सामने देखते हुए भी ऐसे कृत्य कर रहे हैं।

तीसरा किस्सा –
हमारे लेआउट में वाहन की गति सीमा 20 या 10 है, हम उस पर ही चलाते हैं, पर कई लोग खाली रोड देखकर 50 पर चलाते हैं, गति सीमा का सम्मान करना चाहिये क्योंकि बच्चे अचानक ही कहीं से छोटी साइकिल या पैदल, दौड़ते हुए आ जाते हैं, लेआउट को सुरक्षित बनाना भी हमारी अपनी जिम्मेदारी है।

चौथा किस्सा –
बेटेलाल कल दोस्त से मिलने शाम को माराथहल्ली गये, पहली बार बाईक से खुद अकेले इतनी दूर गये थे, दूर मतलब 6 km के आसपास, उनको अपना हेलमेट दिया, हेलमेट लगाने के पहले सर पर कैप पहनने को दी, बताया इससे हेलमेट में बालों की स्मेल नहीं जाती और हाइजीनिक दृष्टि से भी अच्छी होती है, रात को वे कहीं आगे दोस्त के साथ चले गये थे, पिलियन राइडर के लिये एक एक्स्ट्रा हेलमेट लेकर गये थे, तो मुझसे कॉल करके पूछा कि सर्विस रोड पर रॉंग साइड आ सकते हैं क्या? मैंने समझा कि वे कहाँ हैं और किधर से आने की बात कर रहे हैं, तो बोला जो गूगल मैप बता रहा है, वैसे ही आओ, वे बोले 4 km घूमकर बता रहा है, हमने कहा तो घूमकर आओ, पर इससे तुम सुरक्षित रहोगे, और फालतू के किसी ऐसे कार्य को क्यों करना, जो गलत है और दूसरों को तकलीफ देता है, हमें सहयोग देना चाहिये।

बातें छोटी छोटी हैं, पर काम की हैं, ये सब भारतीयों को सीखनी ही चाहिये।

NVIDIA की कहानी

NVIDIA दुनिया की पहली 4 ट्रिलियन डॉलर की कंपनी बन गई है! जी हाँ, यह वही कंपनी है जिसकी शुरुआत 1993 में एक छोटे से गेमिंग ग्राफिक्स स्टार्टअप के तौर पर हुई थी, और आज यह ऐपल, गूगल और मेटा जैसे दिग्गजों को पीछे छोड़ चुकी है। इस सफलता के पीछे हैं इसके को-फाउंडर और सीईओ जेन्सन हुआंग, जिनकी यात्रा किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है।

ये वो दो तस्वीरें हैं—एक पुरानी, जिसमें वे एक साधारण इंजीनियर की तरह काम करते दिख रहे हैं, और दूसरी हाल की, जिसमें वे आत्मविश्वास से भरे स्टेज पर खड़े हैं, उनके हाथ पर NVIDIA का टैटू गर्व से नजर आ रहा है।

1993 में, जेन्सन और उनके दोस्तों ने एक डेनी’s रेस्टोरेंट में मिलकर इस कंपनी की नींव रखी, बिना किसी बड़े कनेक्शन या फंडिंग के। शुरुआत में तो उनका पहला प्रोडक्ट फेल हो गया, और कंपनी 30 दिन के अंदर दिवालिया होने वाली थी। लेकिन जेन्सन ने हार नहीं मानी—उन्होंने आधी टीम को निकालकर जोखिम उठाया और एक नई ग्राफिक्स चिप, RIVA 128, पर दांव लगाया। यह दांव चल गया और बाकी इतिहास है!

लेकिन असली खेल तब शुरू हुआ जब जेन्सन ने AI के भविष्य को देखा। उन्होंने CUDA नामक सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म बनाया, जो गेमिंग चिप्स को साइंटिफिक सुपरकंप्यूटर में बदल देता था। शुरुआत में इस पर कोई कमाई नहीं हुई, और निवेशक नाराज थे, लेकिन जेन्सन ने 10 साल तक मेहनत की। आज, अमेजन, गूगल, मेटा और टेस्ला जैसी कंपनियाँ NVIDIA के चिप्स पर निर्भर हैं, क्योंकि हर बड़ी AI सफलता CUDA पर बनी है।

NVIDIA में $1000 का निवेश 2015 में आज $350,000 हो गया है—35,000% की ग्रोथ!

केरल के दो ड्राइवरों ने एम्बुलेंस से 3500 किमी की यात्रा, बेडरिडन नेपाली मरीज को पहुंचाया घर!

केरल के कोट्टायम के दो एम्बुलेंस ड्राइवरों ने 45 साल के नेपाली मरीज गणेश बहादुर और उनके बेटे को उनके गाँव तक पहुंचाने के लिए 3500 किलोमीटर की यात्रा सिर्फ तीन दिन में पूरी की।

गणेश बहादुर, जो कंजीरापल्ली में एक रबर फैक्ट्री में काम करते थे, 24 मई को दिल का दौरा पड़ने के बाद अचानक गिर पड़े। एक निजी अस्पताल में उनकी सर्जरी हुई, लेकिन हालत ऐसी थी कि वे बेडरिडन हो गए। उनकी हालत को देखते हुए, उन्हें उनके नेपाली गाँव वापस ले जाना जरूरी था। लेकिन यह इतना आसान नहीं था। 3500 किलोमीटर की दूरी, अनजान रास्ते, जंगली रास्तों की चुनौतियाँ, पुलिस की परेशानियाँ।

लेकिन इन दो ड्राइवरों ने हिम्मत नहीं हारी। अभय इमरजेंसी सर्विस के तहत, उन्होंने गणेश और उनके बेटे को सुरक्षित उनके घर पहुंचाने का बीड़ा उठाया।

उन्होंने बताया कि वे रास्ते में केवल ईंधन भरवाने, खाने और मरीज को फीड करने के लिये ही रुके, एक ड्राइवर एम्बुलेंस चलाता तो दूसरा आरमा करता।

उन्होंने अपने कटु अनुभव भी बताए कि जब उत्तरप्रदेश में एंट्री करी तो एम्बुलेंस की इमरजेंसी लाईट चालू होने के बावजूद पुलिस ने रोका और उनके नाम पता, पिता का नाम इत्यादि पूछने लगे, तब इन्हें समझ आया कि ये धर्म जानने की कोशिश कर रहे हैं, तो उन्होंने ₹500 की रिश्वत देकर आगे बढ़ने में भलाई समझी, क्योंकि उनके पास समय नहीं था।

ऐसा ही एक और अनुभव उत्तरप्रदेश का ही बताया कि किसी गाड़ी पर उनकी एम्बुलेंस से स्क्रैच आ गया, 5ओ इन्होंने एम्बुलेंस रोककर उसकी गाड़ी के स्क्रैच साफ करके बताया कि कुछ ज्यादा नहीं हैं, पर थोड़ी आगे जाने पर वो अपने कई साथियों के साथ आकर एम्बुलेंस को घेर कर पैसा माँगने लगे, तो इन्होंने एम्बुलेंस की इमरजेंसी लाईट जलाई, जिससे लोकल लोगों को पता चला कि इसमें तो मरीज भी है, तो वे सब वहाँ से भाग गये।

उत्तरप्रदेश ने गजब नाम कमाया है। खैर जब मरीज को घर पहुँचा दिया तो दोनों ड्राइवरों ने बस तैयार होने और खाने का समय लियाँ और वापिस 20 जून को केरल पहुँच गये। इसमें लगभग 2 लाख का खर्चा आया जो कि फेक्ट्री ने वहन किया।

जर्मनी ने माइक्रोसॉफ्ट टीम को किया अनइंस्टॉल

जर्मनी का श्लेसविग-होल्सटीन राज्य ने माइक्रोसॉफ्ट टीम (Microsoft Teams) को अनइंस्टॉल करने का फैसला लिया है! 😮 जी हाँ, ये कोई छोटी बात नहीं है। ये निर्णय डेटा गोपनीयता और साइबर सुरक्षा को लेकर लिया गया है।

जर्मन सरकार का कहना है कि माइक्रोसॉफ्ट का डेटा प्रबंधन यूरोपीय संघ के सख्त गोपनीयता नियमों (GDPR) के अनुरूप नहीं है। 🛡️इस कदम के पीछे वजह है डेटा सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताएँ।

माइक्रोसॉफ्ट टीमें पर निर्भरता के बावजूद, श्लेसविग-होल्सटीन अब ओपन-सोर्स सॉफ्टवेयर की ओर बढ़ रहा है, ताकि स्थानीय नियंत्रण और पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके। 📊 ये कदम न केवल तकनीकी बदलाव है, बल्कि ये दिखाता है कि डेटा गोपनीयता अब कितनी बड़ी प्राथमिकता बन चुकी है।

लेकिन सवाल ये है – क्या ये फैसला अन्य देशों और कंपनियों को भी प्रेरित करेगा? 🤔 भारत में भी हम डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर इतना निर्भर हैं, लेकिन क्या हम अपने डेटा की सुरक्षा को लेकर उतने सजग हैं? माइक्रोसॉफ्ट टीम जैसे टूल्स हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा हैं, पर क्या हमें भी ओपन-सोर्स विकल्पों की ओर देखना चाहिए?

क्या हम भारत के लोग डाटा सिक्योरिटी को लेकर सीरियस भी हैं?

2030 की तूफानी रैली के लिये तैयार हैं आप?

अगर अभी तक आपने अपने निवेश को शेयर बाजार या म्युचुअल फंड्स से दूर रखा है, तो आप आने वाली तूफानी रैली को मिस करने जा रहे हैं, मेरे विश्लेषण के मुताबिक बहुत सी कंपनियों की असली वैल्यू अनलॉक ही नहीं हुई है।

या यूँ कहें कि बैलेंस शीट में बहुत सी चीजें जुड़ने वाली हैं, जो कंपनियों के शेयर में तूफानी रैली लाने वाले हैं। मैं किसी सेक्टर पर बात नहीं कर रहा, यह एक ओवरऑल बड़ा रैला आने वाला है।

तो अभी भी सही समय है, आपको निवेश करने के लिये, जो मैं देख पा रहा हूँ, उसके मुताबिक रियल एस्टेट का बाजार बहुत ज्यादा बूम कर चुका है, अब यहाँ से 20-30% भाव अगले 4-5 साल में अलग अलग कारणों से गिरेंगे।

2030 में nifty50 बहुत ही कंजरवेटिव एप्रोच के साथ मैं 35000 के आसपास देखता हूँ, और खुले दिल से लगभग 48 से 50 हजार के आसपास। अगर जो आज इस गाड़ी में बैठ गया, यकीन मानिये कि पछतायेंगे नहीं।

शेयर कौन से लेना है पूछने की जरूरत नहीं nifty 100 के सारे शेयर निवेश के लायक हैं, शेयर समझ नहीं आता तो top 100 nifty या index फंड्स में निवेश कर सकते हैं। मैं हमेशा small व midcap पर बुलिश रहता हूँ, क्योंकि जो कंपनियां 200 करोड़ की हैं, वे 5 साल में 2000 करोड़ की हो सकती हैं। ऐसे कई उदाहरण पिछले 5 साल के हैं, पकी पकाई मैं नहीं देने वाला, बस बाजार में बिलबोर्ड देखिये, आंखें कान खुले रखिये, सब सामने दिखता है। छुपा हुआ कुछ नहीं।

#sharemarket

भारत के युवा जापानी भाषा सीखकर अपराध कर रहे हैं।

क्या आपने कभी सोचा कि भाषा सीखने की चाहत भी किसी को अपराध की राह पर ले जा सकती है? एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है, जिसमें दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कुछ युवा, जो जापानी भाषा सीख रहे थे, जापान के बुजुर्गों को निशाना बनाकर साइबर ठगी के जाल में फंस गए। यह खबर न सिर्फ हैरान करने वाली है, बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर करती है कि तकनीक का दुरुपयोग कितना खतरनाक हो सकता है।

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने नोएडा और वाराणसी में छापेमारी कर छह लोगों को गिरफ्तार किया है। ये सभी 20-30 साल की उम्र के युवा हैं, जिनमें से ज्यादातर जापानी भाषा सीखने वाले छात्र हैं। इन्होंने जापान के बुजुर्गों को निशाना बनाकर करोड़ों रुपये की ठगी की। यह गिरोह फर्जी टेक सपोर्ट स्कैम चला रहा था, जिसमें वे बुजुर्गों के कंप्यूटर पर फर्जी वायरस अलर्ट और फिशिंग पॉप-अप दिखाते थे। इन पॉप-अप में डरावने संदेश होते थे, जैसे कि “आपका कंप्यूटर वायरस से संक्रमित है” या “तुरंत इस नंबर पर कॉल करें”।जब बुजुर्ग डर के मारे दिए गए नंबर पर कॉल करते, तो ये ठग रिमोट एक्सेस टूल्स की मदद से उनके कंप्यूटर का नियंत्रण ले लेते और उनकी संवेदनशील वित्तीय जानकारी चुराकर ठगी करते। सीबीआई को सूचना मिली थी कि भारत से संचालित एक संगठित साइबर अपराध नेटवर्क जापान के लोगों को निशाना बना रहा है। इस मामले में जापानी अधिकारियों को भी सूचित किया गया है, और उन्होंने भारत सरकार के साथ इस मुद्दे को उठाया है।

इन ठगों को पकड़ने में उनकी टूटी-फूटी जापानी भाषा और कॉल के दौरान हिंदी में होने वाली पृष्ठभूमि की बातचीत ने अहम भूमिका निभाई। जापानी नागरिकों को कॉल करने वालों की भाषा सहज प्रवाह में नहीं थी, जिसने संदेह पैदा किया। इसके अलावा, कॉल करने वाले नंबर भारतीय देश कोड (+91) के साथ आ रहे थे, जिससे यह साफ हो गया कि ये कॉल भारत से किए जा रहे हैं।

सीबीआई ने इन फर्जी पॉप-अप के लिए इस्तेमाल होने वाले मैलिशियस यूआरएल और आईपी पतों का विश्लेषण किया, जो भारत में ही ट्रेस हुए।गिरफ्तार किए गए लोगों में संदीप गखर, गौरव मौर्या, और शुभम जायसवाल जैसे नाम शामिल हैं। संदीप पर फंड प्राप्त करने, गौरव पर पॉप-अप बनाने, और शुभम पर कॉल करने का आरोप है। इसके अलावा, दिल्ली के आरके पुरम के रहने वाले मनमीत सिंह बसरा और छतरपुर एनक्लेव के जितेन हरचंद इस रैकेट के मुख्य संचालक बताए जा रहे हैं। ये लोग स्काइप के जरिए जापानी नागरिकों से संपर्क करते थे और ठगी के लिए लीड जनरेट करते थे।

इस रैकेट का तरीका बेहद सुनियोजित था। ठग माइक्रोसॉफ्ट एज्यूर सर्वर पर होस्ट किए गए मैलिशियस यूआरएल के जरिए फर्जी पॉप-अप बनाते थे। ये पॉप-अप जापानी नागरिकों के कंप्यूटर स्क्रीन पर दिखाए जाते थे, जो ज्यादातर बुजुर्ग थे और तकनीक के मामले में कम जागरूक। इन पॉप-अप में डराने वाले संदेश होते थे, जो लोगों को तुरंत कॉल करने के लिए मजबूर करते। कॉल करने पर ठग रिमोट एक्सेस सॉफ्टवेयर के जरिए कंप्यूटर का नियंत्रण लेते और बैंक खातों से पैसे उड़ा लेते।सीबीआई ने चार विशिष्ट मामलों का जिक्र किया है, जिनमें जापानी नागरिकों को ठगा गया।

उदाहरण के लिए, जापान के ह्योगो प्रांत के रहने वाले 57 वर्षीय सकाई ताकाहारु को एक फर्जी पॉप-अप के जरिए ठगा गया। उनके कंप्यूटर स्क्रीन पर दिखा कि उनका सिस्टम वायरस से संक्रमित है और उन्हें तुरंत एक नंबर पर कॉल करना होगा। इस तरह की ठगी में सोशल इंजीनियरिंग का इस्तेमाल किया गया, जो लोगों को डराकर उनकी जानकारी हासिल करने का एक आम तरीका है।

यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि इसमें शामिल ज्यादातर युवा पहली बार अपराध करने वाले हैं। ये लोग पढ़े-लिखे हैं और जापानी भाषा सीख रहे थे, जो आमतौर पर बेहतर करियर की तलाश में लिया जाता है। लेकिन, आसान पैसा कमाने की लालच ने इन्हें अपराध की दुनिया में धकेल दिया। यह न सिर्फ इन युवाओं के भविष्य के लिए खतरनाक है, बल्कि भारत और जापान के रिश्तों पर भी असर डाल सकता है।साइबर अपराध आज एक वैश्विक समस्या बन चुका है। भारत में पहले मेवात और जामतारा जैसे क्षेत्र साइबर ठगी के लिए कुख्यात थे, लेकिन अब यह समस्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैल रही है। जापान की नेशनल पुलिस एजेंसी और माइक्रोसॉफ्ट कॉर्पोरेशन के साथ मिलकर सीबीआई ने इस रैकेट को तोड़ा, लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या हमारी युवा पीढ़ी को सही दिशा दिखाने में हम कहीं चूक रहे हैं? क्या हम जॉब क्रिएट कर पा रहे हैं।