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टाटा बोल्ट के संग टाटा बोल्ट के एरिना में (Get Set Bolt)

    रविवार की सुबह सुहानी थी, ओस न के बराबर थी, बरबस ही वातावरण आनंदमयी होने लगा था, क्योंकि हम टाटा की नई कार बोल्ट देखने महसूस करने शिप्रा मॉल में प्रवेश कर चुके थे। पहले हमें कारों के बारे में ज्यादा कुछ समझ नहीं आता था, परंतु जब से कार चलाने लगे हैं तब से कारों में कुछ ज्यादा ही रुचि है। कार के गुणों को अच्छे से समझ पाते हैं। लाल रंग की टाटा बोल्ट कार देखकर मन तरंगित हो उठा।
    टाटा बोल्ट कार के रूप और बनावट को देखकर मन ललचा गया, इस कार के बारे में सुना बहुत था, और यह भारत में 20 जनवरी को लोकार्पण है। टाटा बोल्ट के मुख्यत: पाँच चीजें अच्छी लगीं –
शिप्रा मॉल गाजियाबाद में टाटा बोल्ट एरिना में हम टाटा बोल्ट के साथ
  1. टाटा बोल्ट के बनावट की उत्कृष्टता देखते ही बनती है, बाजार में अपने प्रतियोगियों से टक्कर लेने के लिये इसकी साज सज्जा जबरदस्त है। बोनट के आगे की काली ग्रिल कार को सुँदर बनाती हैं। इसके 15 इंच के 8 एलॉय व्हील वाले टायर देखते ही बनते हैं। पीछे ग्लास और दरवाजे के बीच एक विनायल स्टीकर काले रंग का सी पिलर इफेक्ट देता है। 
  2. आंतरिक साज सज्जा बहुत अच्छी है, अंदर बहुत जगह है, और यह एक ऐसी हैचबैक कार है जिसमें 5 लोग आराम से बैठ सकते हैं वह भी बिना फँसे।
  3. गियर देखकर तो मेरा मन लालायित हो उठा था, बिल्कुल स्टिक जैसा गियर और रेवोट्रोन 1.2 लीटर टर्बो इंजिन, रेवोट्रोन 1.2 लीटर इंजिन में 4 सिलेंडर और यह 89 बीएचपी अपने सर्वोत्तम पॉवर पर देता है और 140 एनएम का अधिकतम टॉर्क देता है, यह पाँच रफ्तार गियर वाला इंजिन अधिकतम 17.6 किमी. का माईलेज देता  है।
  4. जबरदस्त 8 स्पीकर वाला हरमन एन्टरटेनमेंट सिस्टम लगा हुआ है, जिसमें नेविगेशन और वीडियो भी देखा जा सकता है, सिस्टम टच स्क्रीन है, ब्लूटूथ इनबिल्ट है केवल अपने फोन को ब्लूटूथ पर पेयर करना है और टाटा बोल्ट मोबाईल में बदल जायेगी, स्टेयरिंग व्हील पर दिये गये आवाज के नियंत्रण से आप हरमन के सारे फंक्शन बोल कर भी पूरे कर सकते हैं, मसलन एफ.एम. रेडियो के स्टेशन बदलना, किसी को कॉल करना इत्यादि।
  5. टाटा बोल्ट को चलाने के तीन मोड हैं, और कार स्टार्ट होने पर अपने आप यह सिटी मोड में चलता है, डेश बोर्ड पर ही हरमन के नीचे इको और स्पोर्ट के बटन दे रखे हैं, इको बटन दबाने से टाटा बोल्ट का इंजिन इको मोड में चलने लगेगा और कम आर.पी.एम. के साथ चलने लगेगी और माईलेज बड़ जायेगा, जैसे ही इसको स्पोर्ट मोड में डालेंगे, टाटा बोल्ट का वही इंजिन शक्तिशाली हो जायेगा और कार चलाने का अनुभव ही बदल जायेगा। 

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विष्णु प्रभाकर की पंखहीन पढ़ते हुए कुछ भाव, मीरापुर, किताबों को शौक और डाकुओं के किस्से

    “पंखहीन” कल से शुरू की, विष्णु प्रभाकर के लिखे गये बचपन के किस्से खत्म ही नहीं होते कभी ये बाबा के किस्से कभी चाचा के तो कभी दादी के किस्से, बीच में डाकुओं के किस्से, और फिर ये सब किस्से बड़े परिवार के मध्य रहने के अनुभव हैं, उनकी लिखी गई भाषा और लिखा गया देशकाल से मैं बहुत अच्छी तरह से सुपरिचित हूँ, इसलिये भी मैं अपने आप को इन सभी किस्से कहानियों के मध्य ही पा रहा हूँ,    और फिर ये किस्से कहानी मीरापुर के हैं, जहाँ मेरी बुआजी ब्याही थीं और अब भी वहीं रहती हैं, क्योंकि विष्णु प्रभाकर जी का पूरा खानदान मीरापुर में ही रहता था, मीरापुर के बारे में बहुत सी बातों को जाना, वहाँ की प्रसिद्ध रामलीला के बारे में पहली बार जाना, रामराज्य, जानसठ के बारे में अधिक जाना, उनकी उत्पत्ति के बारे में जाना।

वहीं मीरापुर को महाभारतकाल से जोड़कर बताया गया है, और यह कौरव राज्य का भाग बताया गया है, मीरापुर के चारों और चार मंदिर और तालाब हैं, उनकी उत्पत्ति के बारे में बताया गया है, कैसे नाम बिगड़ जाते हैं, फिर भले ही वह जगह हो, मंदिर हो या इंसान हो।

उनके खानदान को “हकलों के खानदान” के नाम से जाना जाता था, वे बताते हैं कि उनके खानदान में उनकी पीढ़ी तक पिछली सात पुश्तों से कोई न कोई हकलाता था, तो उनके खानदान का नाम हकलों का खानदान हो गया। प्रभाकरजी ने अपने किताबों से प्रेम होने के बारे में बताया है कि उन्हें यह शौक घर से ही लगा, उनके पिताजी की चावल की दुकान थी और वे अपने ग्राहक से इतने प्रेम से बात करते थे कि ग्राहक कपड़ा, बर्तन सभी चीजें उनकी दुकान से ही खरीदना चाहते, तो वे खुद तो नहीं बेचते थे पर सब चीजों के दुकान पर ही बुलवा देते थे। चावल, तंबाकू के टोकरे के साथ ही एक टोकरा और होता था, वह था किताबों का टोकरा, जिसमें “चंद्रकान्ता”, “चंद्रकान्ता संतति”, “भूतनाथ” और “राधेश्याम की रामायण” जैसी अद्भुत किताबें होती थीं।

प्रभाकर जी कहते हैं कि इन किताबों से ही उन्होंने कल्पना के पंखों पर बैठ कर उड़ना सीखा। वे अपने पिताजी के पढ़ने के शौक के बारे में बताते हैं वह भी रोमांचक है, जब उनकी शादी हुई तो उन्हें पता लगा कि उनकी पत्नी पढ़ी-लिखी हैं, वे तब तक बहीखाते की भाषा ही जानते थे, तुरत पण्डित जी के पास पहुँचकर बोले मुझे सात दिनों में हिन्दी पढ़ानी होगी और उन्होंने हिन्दी सीख ली। फिर उनका निरंतर अध्ययन जारी रहा।

पढ़ने के बाद अपने पिताजी के स्वभाव को विश्लेषण कर प्रभाकरजी लिखते हैं कि इस अध्ययन और पूजापाठ ने उन्हें जहाँ कुछ मूल्य दिये, वहाँ उनके अन्तर के सहज स्नेह-स्रोत को सोख लिया । वे अवहेलना की सीमा तक तटस्थ हो गये।

आज इतना ही, सोचा था कि एक छोटा सा फेसबुक स्टेटस लिखूँगा, पर लिखने बैठा तो पूरी एक पोस्ट ही बन गई, इसी लिखने को ही तो शायद ब्लॉगिंग कहते होंगे ।

जीवन के प्रति नकारात्मक रुख

    थोड़ा बीमार था, और बहुत कुछ आलस भी था, आखिर रोज रोज शेव बनाना कौन चाहता है, उसकी दाढ़ी के बालों के मध्य कहीं कहीं सफेदी उसकी उम्र की चुगली कर रही थी, वह बहुत सारी बातों से अपने आप को कहीं अंधकार में विषाद से घिरा पाता। कहीं भी उसे न प्यार मिलता और न ही कहीं उसके मन की कोई बात होती था, उसे समझ ही नहीं आता कि क्या यह कमी केवल और केवल उसमें ही है या उससे मिलने वाले लोग उसे जानबूझकर विषाद के सागर में ढकेल रहे हैं। वह दिल से बहुत ही मजबूत पर भावनात्मक रूप से उतना ही कमजोर था। उसने जीवन के बहुत उतार चढ़ाव देखे थे और जीवन की कठिन से कठिन चुनौतियों का सामना बड़ी ही जीवटता से किया और सारी कठिनाईयों का बहुत ही अच्छी तरह से सामना किया था।
    आज उसके अंदर एक भावनात्मक आंदोलन चल रहा था, जिसके कारण वह अपना बिल्कुल भी ध्यान नहीं रख पा रहा था, न उसकी बातों में आत्मविश्वास था और न ही उसमें चुनौतियों से निपटने वाली जीवटता देखी जा सकती थी, उसमें जीवन के प्रति नकारात्मक रुख साफ नजर उसकी खिचड़ी दाढ़ी से ही नजर आ जाता था, शायद वह बड़ी हुई दाढ़ी से अपने चेहरे के नकारात्मक भाव छिपाना चाहता था, जिससे उसके पीछे छिपी नकारात्मकता को कोई पढ़ न सके, और उसे अपनी इस परिस्थिती में रहने का भरपूर मौका मिल सके।
    इसी बीच वह नौकरी भी ढ़ूढ़ रहा था जिसमें वह टेलीफोनिक के लगभग 3 राऊँड बहुत ही अच्छे से निपटा चुका था, और साक्षात्कार लेने वाली कंपनी उसकी तकनीकी ज्ञान की कायल हो चुकी थी। अब बारी थी आमने सामने यानि कि फेस टू फेस साक्षात्कार की, जिसके लिये वह बिल्कुल भी तैयार नहीं था, और उसका आत्मविश्वास डिग रहा था। खैर वह दिन भी आ गया और इंटरव्यू पैनल के सामने वह पहुँच गया, जितना कायल वे लोग उसके टेलीफोनिक साक्षात्कार के थे, उसे बढ़ी हुई दाढ़ी में देखकर कंपनी को लगा कि यह कैसे संभव है कि जो इतना अच्छा साक्षात्कार दे वह खिचड़ी दाढ़ी में खुद को अपने भावी नियोक्ता के सामने प्रस्तुत करे, तो शेविंग के न करने के कारण उसका हो चुका चयन कंपनी को रद्द करना पड़ा।
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मेरे नये वर्ष का नया निश्चय मैक्रोमेक्स कैनवास टैब पी-666 के साथ

    वर्षों पहले जब मैं महाविद्यालय में पढ़ता था, तब मेरा कविता, नाटक और कहानियाँ लिखने का शौक था और उस समय मैं कविताओं को तो अपने नोटबुक के बीच वाले पन्ने पर लिखकर उसे फाड़ लिया करता था, उस एक पन्ने को लिखकर मैं जेब में रख लेता था और अपने दोस्तों के बीच कविता प्रस्तुत करता था। नाटक और कहानियों को लिखने के लिये ज्यादा समय और ज्यादा पन्नों की जरूरत हमेशा से महसूस होती थी, और मित्रों को नाटक और कहानियों को सुनाने में समय भी ज्यादा लगता था। उस समय सोचता था कि जिस तेजी से मैं सोचता हूँ, काश कोई ऐसा यंत्र या तकनीकी हो जिससे वह लिखती जाये और मेरे बहते हुए विचार जो कि मेरे मन में किसी अदृश्य डोरी से खिंचकर आते हैं, उनका तनिक भी क्षरण न हो पाये, और सारे विचारों को मैं संग्रहित कर सकूँ।
    थोड़े समय बाद मैं टेपरिकारर्डर में रिकार्ड करने लगा, परंतु कभी बिजली साथ न देती तो कभी कैसेट उलझ जाती और अपना कहा, अपने प्रवाहशील विचारों को, मंथन को पाना दुश्कर कार्य होता था, उन रचनाओं और विचारों को वापस लाने के लिये तरह तरह के खटकर्म भी हमने किये, परंतु देखा इसमें तो पन्ने पर लिखने से ज्यादा ऊर्जा और श्रम लग रहा है, तो वापिस पन्ने पर आ गये। विचारों को प्रवाहमान होना जारी रहा, परंतु उन्हें लिख पाना मेरे लिये उतना ही दुश्कर कार्य होता।
    फिर आया कंप्यूटर का जमाना, जहाँ पर हमने हिन्दी की टायपिंग रफ्तार पर अपनी पकड़ बना ली और कंप्यूटर पर लिखने लगे, परंतु कुछ समस्याएँ यहाँ भी बनी रहतीं, कभी ऑपरेटिंग सिस्टम तो कभी वर्ड प्रोसेसर कर करप्ट हो जाता, फिर हम मोबाईल में अपनी बातों को रिकार्ड करने लगे, परंतु उसे सुनकर लिखने का समय मिलना बहुत मुश्किल होता, आज भी पता नहीं कितने ही विचार मेरे मोबाईल के मैमोरी कार्ड में संचित हैं, जिन्हें मैं आज तक पन्नों पर नहीं उतार पाया।
    इस वर्ष हमने अपने पुराने शौक याने कि अपने प्रवाहमान विचारों को कविता, नाटक और कहानियों में ढ़ालने का दृढ़ निश्चय किया है। अब एन्ड्रॉयड में हिन्दी में भी बोलकर लिखने वाली सुविधा आ गई है, तो हम अब अपने मैक्रोमेक्स कैनवास टैब पी-666 पर बोलेंगे और हमारा यह कैनवास टैब बिना हैंग हुए हमारे पुराने शौक को जीवंत कर देगा, इसमें 3जी सुविधा का फायदा उठाते हुए हम सीधे इन सारी फाईलों को गूगल ड्राईव पर सहेज पायेंगे। इसका तेज प्रोसेसर हमारी सारी बातों को समझकर सीधे हिन्दी में सामने वर्ड प्रोसेसर में लिख देगा, और हम फिर से कविता, नाटक और कहानियों में रम जायेंगे, टैब का फायदा यह है कि हमें अब पन्नों को जेब में नहीं रखना होगा और टैब पर ही बोलकर लिखने से हमारी सारी कृतियाँ सहेजी होंगी, तो इंटरनेट के होने की बाध्यता भी खत्म हो जायेगी, और हम अपनी कविता, नाटक और कहानियों को अपने मित्रों को सीधे टैब से पढ़कर ही सुना सकते हैं, और सीधे अपने ब्लॉग पर पब्लिश भी कर सकते हैं, जिससे कहीं न कहीं हम कार्बन उत्सर्जन को भी कम करने में मदद करेंगे।
 

डर के आगे जीत है (Rise above Fear !)

     जीवन संघर्ष का एक और नाम है, जिसमें हमें हर चीज सीखनी पड़ती है, फिर भले ही वह चाव से हो या मजबूरी में । हाँ एक बात है कि जब हमें कोई चीज नहीं आती तो हमें ऐसे  लगता है कि यह चीज सीखना कितना दुश्कर कार्य है और हमें उस चीज को सीखने में, जीवन में उतारने में अपने अंदर के डर से सामना करना पड़ता है। जो भी अपने अंदर के डर से जीत गया बस वही अपने जीवन में किसी भी कार्य में सफल हो पाया है। ऐसे ही माऊँटेन ड्यू का डर के आगे जीत है स्लोगन याद आ जाता है।

    हमें बैंगलोर में कभी भी कार की जरूरत महसूस नहीं हुई, वहाँ हम बाईक से ही काम चलाते थे, और बैंगलोर के व्यस्त यातायात में हमें ऐसा लगता था कि जो सफर हम बाईक से ऑफिस का 40 मिनिट में करते थे वही सफर कार से 2 घंटे में होता, तो हमने सोचा कि बाईक से ही काम चलाते हैं, पर हाँ कार को चलाते हुए लोगों देखकर उनकी हिम्मत की मन ही मन दाद देता था। सोचता था कि जब मुझे बाईक चलाने में इतना डर लगता है, तो कार चलाने के लिये इनको कितना डर लगता होगा।
    जब मैं इस वर्ष गुड़गाँव आया तो देखा कि मेरा ऑफिस हाईवे पर पड़ता है और बाईक से आना जाना बिल्कुल सुरक्षित नहीं है, तो कार लेना अब हमारी मजबूरी बन गया था, पर हमें चलानी आती नहीं थी और कार की जरूरत बहुत ज्यादा महसूस होने लगी थी । 
 डर के आगे जीत है का तमिल वीडियो
    हमने ड्राईविंग स्कूल से कार चलानी सीखी, पहले दिन हमारे ट्रेनर ने हमें जैसे ही ड्राईविंग सीट पर बैठने को कहा हमारा डर हम पर हावी होने लगा और हाथ काँपने लगे, तो ट्रेनर ने कहा कि आज और कल दो दिन आप केवल स्टेयरिंग व्हील और एक्सीलेटर पर ही चलाओगे, जब गाड़ी पहली बार शुरू की तो डर हम पर हावी हो रहा था, ऐसा लग रहा था कि जब केवल स्टेयरिंग व्हील और एक्सीलेटर सँभालने में ही इतनी मशक्कत है तो गियर बदलना, क्लच और ब्रेक कैसे करेंगे । साथ ही पीछे और बगल से आने वाले वाहनों का भी ध्यान रखना पड़ता है।
  तीसरे दिन से हमें ब्रेक भी सँभालने को दे दिया तो अब हमें स्टेयरिंग व्हील, एक्सीलेटर और ब्रेक तीनों चीजें सँभालना भारी पड़ने लगा, पर फिर भी हिम्मत को बाँधकर रखा और अपने डर को अपने पर हावी नहीं होने दिया। पाँचवे दिन से हमें गियर और क्लच भी सँभालने को दे दिया गया, अब हमें पूरी गाड़ी को अपने नियंत्रण में रखने की जिम्मेदारी थी, और केवल तीसरे गियर तक चलाने की परमीशन थी, हमने भी अपने डर को काबू में रखा और सोचा कि अगर डर गये तो कार कैसे चलायेंगे, 15 दिन हमने कार सीखी और सोलहवें दिन हमने अपनी कार की डिलीवरी ली और पहले ही दिन 40 किमी चलाई, दूसरे दिन ही कार एक जगह मोड़ते समय ठुक गई, पर हमने सोचा कि अभी डर गये तो कभी कार नहीं चला पायेंगे, हमने कार चलाना जारी रखा और सड़क के ऊपर कार चलाने के डर को मात दे दी अब तक हम कार लगभग 5500 किमी चला चुके हैं, जिसमें यमुना एक्सप्रेस हाईवे पर दो बार सफर के मजे भी ले चुके हैं, अधिकतम रफ्तार हमने 130 को छुआ है।
हम तो यही कह सकते हैं कि हिम्मत बाँधकर रखो तभी डर के आगे जीत है ।

मैं भी आम आदमी हूँ

      जी हाँ मैं भी आम आदमी हूँ, जो आम आदमी कहता है वह मुझे सीधे दिल पर लगता है, क्योंकि वे वाकई वही बातें करते हैं जो मुझ जैसे आम आदमी की जरूरत हैं। आजकल हल्ला काट रहे हैं कि केजरीवाल बिजनेस क्लाम में सफर कर दुबई गये, मैं ज्यादा गहराई में न जाते हुए केवल इतना कहना चाहूँगा कि अगर मुझे भी कोई अन्य बिजनेस क्लास का टिकट देगा तो मैं मना नहीं करूँगा, और खुशी खुशी बिजनेस क्लास का सफर तय करूँगा। हालांकि एक बार मैं भी एक बार एयर लाईंस की गलती के कारण बिजनेस क्लास में दुबई से मुँबई तक सफर कर चुका हूँ। पर अगर इकोनोमी में भी मुझे टिकट खरीद कर सफर करना हो तो कम से कम सौ बार सोचना पड़ता है। अगर केजरीवाल के किसी सम्मान के लिय बुलाया गया है तो या तो टिकट उन्होंने दिया है या फिर उनके किसी दोस्त ने स्पांसर किया है, तो इस बात पर हल्ला क्यों ?
    क्या हमारे विपक्षी दलों के नेता जो आरोप प्रत्यारोप भी बिजनेस क्लास में सफर नहीं करते हैं ? या वे यह नहीं देख पा रहे हैं कि आम आदमी कैसे विलास कर सकता है, भले ही वह स्पांसर हो ?
    विपक्षी दल आम आदमी पर पता नहीं कैसे कैसे आरोप लगाते रहते हैं, अभी सुबह ही एक केन्द्रीय सरकार के दल के एक नेता जी को बोलते सुना कि अगर बाहर से चुनाव लड़ने के लिये पैसा आयेगा तो फिर ये लोग बाहर के लोगों के लिये ही कार्य करेंगे ना कि भारत के लोगों के लिये, तो बहुत
ज्यादा पीछे जाने की जरूरत नहीं है, अभी जब लोकसभा के लिये चुनाव हुए थे तब भी भारत की बड़े दलों को बहुत सारा चंदा मिला था, तो वे अपने सोर्स बताने में क्यों कोताही बरत रहे हैं, अगर वे आम आदमी के जैसे वाकई ईमानदार हैं तो वे भी ऐसा करके बताये, जनता ने तो केवल एक अच्छी मछली के नाम पर वोट डाला है, पर अब देश को भुगतना तो पूरे तालाब की गंदी मछलियों को पड़ रहा है। अगर हमारे प्रधानमंत्री जी भारत के बाहर से निवेश ला रहे हैं तो भारतीय सरकार भी तो विदेशी निवेशकों के हितों को ध्यान रखते हुए कार्य करेगी, तो अपनी बातों को छुपाते हुए क्यों दूसरे पर आरोप जड़ा जा रहा है।

बेटी तू कितना भी विलाप कर ले, तुझे मरना ही होगा (नाटक)

माँ और उसकी कोख में पल रही बेटी के मध्य संवाद

 पार्श्व में स्वरघोष के साथ ही बताया जाता है –
( जैसे ही बहु के माँ बनने की सूचना मिली परिवार खुशियों से सारोबार था, परिवार में उत्सव का माहौल था। उनके घर में वर्षों बाद नये सदस्य के परिवार में जुड़ने की सूचना जो मिली थी, परिवार रहता तो आधुनिक माहौल में है, पर उनके विचार रूढ़िवादी हैं, बहु को बहु जैसा ही समझते हैं, जब से बहु घर में आई है तो घर में उनके पति की मम्मी को बहुत ही आराम है, पहले दिन रात घर के काम में खुद तो खटना ही पड़ता था और साथ ही बर्तन साफ करने वाली, पोंछे वाली और कपड़े धोने वाली धोबन सबका ध्यान रखना पड़ता था, अब जब से बेटे की शादी की है, तब से ना खुद काम करने पड़ता है और बर्तन साफ करने वाली, पोंछे वाली और कपड़े धोने वाली धोबन का भी ध्यान नहीं रखना पड़ता है, क्यूंकि बहु तो होती ही घर के काम करने के लिये है, तो अब घर का सारा काम बहु करती है। जैसे सदियों से धरती और सूर्य अपनी धुरी पर घूम रहे हैं वैसे ही औरत घर की धुरी पर घूम रही है, क्या कभी उसके अंतर्मन को किसी ने पढ़ने की कोशिश की, नहीं कम से कम अब तक तो नहीं ।
जब से बेटी के घर में आने की खबर घर वालों को एक अवैधानिक अल्ट्रासाऊंड से मिली है, माँ को कान में केवल एक ही बात सुनाई देती है,  (गूँजती हुई कोरस में आवाज) मार दो, मार दो, मार दो !!! )
मंच के बीचों बीच माँ बैठी है, फोकस लाईट माँ पर आती है..
माँ अपने पेट पर हाथ रखकर अपनी बेटी से संवाद कर रही है..
माँ – बेटी मैं तो तुझे बचाने की पूरी कोशिश कर रही हूँ, परंतु आखिर मैं हूँ तो नारी ही
बेटी – माँ मुझ बचा लो माँ, क्या माँ आप इस धरती की मानस संतानों को समझा नहीं सकतीं कि अगर बेटी ना होगी तो बहु कैसे आयेगी, वंश आगे कैसे बढ़ेगा, ये तो प्रकृति का नियम है, लिंग कोई भी हो पर प्रकृति के प्रति जबाबदेही तो बराबर ही होती है ।
माँ – बेटी मैं तो दुनिया के हर वहशी दरिंदे हत्यारों से तुझको बचाना चाहती हूँ, पर मैं क्या करूँ, आखिर हूँ तो नारी ही, बेबस हूँ, लाचार हूँ, मैंने इस धरती पर अनचाहे ही कितने ही हत्यारों को देखा है, अनमने ढ़ंग से हत्यारे परिवारों के मध्य रही हूँ, इन खौफनाक आँखों को पढ़ते हुए जाने कितने दिन और रातें सहमी सी बिताई हैं, और सबसे काला पक्ष इसका यह है कि इन वीभत्स हत्याओं के पीछे हमेशा ही कोई नारी सर्वोच्च भूमिका निबाह रही होती है। वह एक बार भी अपने खुद को मारने के अहसास को समझ नहीं पाती है।
बेटी – माँ हमने ही तो किसी न किसी भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू के जन्म दिया था, अगर बेटी को ऐसे ही मारा जाता रहा तो इस दुनिया को बता दो कि इनकी किस्मत बदलने वाले की माँ का कत्ल कोख में ही हो गया, हो सकता है कि तुम्हारी कोख से नहीं पर मेरी कोख से भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू जन्म ले लें पर अब वे किसी भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू के आने की प्रतीक्षा न करें, बस वे बेटी को कोख में ही कत्ल करें !!
माँ – बेटी तू लड़की है, अल्ट्रासाऊँड में आ गया है, और तत्क्षण ही मैंने इस परिवार की आँखों में तैरती हुई वह नंगी वहशियानी खून में लिपटी हुई तलवारें देखी थीं, ऐसा लगने लगा है कि मैं अब किसी भी पल माँस के लोथड़ों के मध्य जा सकती हूँ, मैं पल पल केवल यही अहसास कर रही हूँ कि कब साँसें रूकेंगी, कब धड़कन रूकेगी और कब मैं उन नरभक्षियों को शिकार बनूँगी, मैँने पता नहीं कितनी बेटियों को कोख में ही मरते देखा है, ना
आजतक बोल पाई और ना ही अब बोल पाऊँगी।
बेटी – माँ आखिर हूँ तो मैं भी एक संतान ही ना, क्या मुझे वाकई इस रंगीन दुनिया को देखने का, अहसास करने का एक मौका नहीं मिलेगा, क्या आने वाले समय में रक्षाबंधन, भाईदूज जैसे त्यौहार दुनिया के लिये गौण हो जायेंगे । जब लड़की न होगी तो, क्या आने वाले समय में विवाह बंधन होंगे !!
माँ – बेटी तू कितना भी विलाप कर ले, पर यह तो तेरी नियती है, तुझे मरना ही होगा, तुझे मरना ही होगा
कोरस में पार्श्व में आवाज (तुझे मरना ही होगा, तुझे मरना ही होगा)

विचारों पर विचार

    सुबह उठते समय बहुत सारे विचार अपनी पूर्ण ऊर्जा में रहते हैं, और शनै: शनै: उन विचारों के अपने प्रारूप बनने लगते हैं, उन विचारों में कई प्रकट हो जाते हैं, मतलब कि किसी ना किसी से वे विचार वाद-विवाद या किसी अन्य रूप में कह दिये जाते हैं। कुछ विचार जो प्रवाहमान रहते हैं, वे अपने संपूर्ण वेग से हर समय अपनी पूर्ण ऊर्जा से रक्त वाहिनियों में रक्त के कणों में बहते रहते हैं, उनकी रफ़्तार इतनी तेज होती है जो शायद ही नापी जा सकती होगी।
    विचारों की गति के समान शायद ही कोई गति वाला यंत्र विज्ञान बना पाया होगा, जो एक ही पल में कई वर्ष पहले और दूसरे ही पल में कहीं और किसी ओर समयकाल में ले जाता है। विचारों की इस तीव्र गति के कारण ही हम हमेशा विचलित रहते हैं, कुछ विचारों को हम व्यवहारिकता के धरातल पर ले आते हैं, और कुछ विचार शायद ही कभी दुनिया में प्रकट होते हैं, यह शायद हरेक व्यक्ति का अपना एक बहुत ही निजी घेरा होता है, जिसको वह किसी भी अपने, बेहद अपने से भी प्रकट  नहीं करता।
    विचारों की ऊर्जा से मन प्रसन्न भी हो जाता है और इस कारण से जो ऊर्जा शरीर को मिलती है, उसे कई बार अनुभव भी किया जा सकता है, कई बार ऐसे ही बैठे ठाले ही कोई विचार अचानक ही मन में आता है और अचानक ही रक्त संचार धमनियों मॆं रफ़्तार से होने लगता है, जिससे लगता है कि अचानक ही कोई नई ताकत हमारे अंदर आ गई है, शायद इस प्रक्रिया से कुछ हार्मोन्स का अवतरण होता होगा, जिससे मन का अवसाद, मन का फ़ीकापन दूर हो जाता है।
    नकारात्मक ऊर्जा वाले विचार शरीर के अंदर अत्यंत शिथिलता भर देते हैं, जो  भीरूपन जैसा होता है, जिससे हमें छोटी से छोटी बातों से डर लगने लगता है और हरेक घटना के पीछे वही ऊर्जा कार्य करती दिखती है, सही कार्य  भी करने वाले होंगे तो भी उस नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव से हमारा मानस कहीं ना कहीं बिगड़ने लगता है और गलतियाँ करने लगते हैं।
    वहीं सकारात्मक ऊर्जा वाले विचार शरीर के अंदर बेहद उत्साह का संचार करते हैं, अत्यंत शक्तिशाली महसूस करने लगते हैं, कोई बड़ा कार्य भी बौना लगने लगता है। असहजता का अवसान हो जाता है, अगर तबियत खराब होती है तब भी उसका अनुमान नहीं हो पाता है, सकारात्मक ऊर्जा के दौरान अधिकतर हम दुश्कर कार्य अच्छे से कर पाते हैं।
    ऊर्जा कैसी भी हो, अपना मानस पटल हमें बहुत ही पारदर्शी रखना होगा, ध्यान रखना होगा कि नकारात्मक ऊर्जा का जब भी दौर हो, उस समय कैसे सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर सकते हैं, सकारात्मक ऊर्जा लाने के लिये जो अच्छा लगता हो, वह करें, मुझे लगता है सफ़लता जरूर मिलेगी।
    ऐसे ही कुछ विचार प्रस्फ़ुटित होने के लिये इंतजार करते रहते हैं जिन्हें हम मन ही मन परिपक्व बनाते हैं, जिससे जब भी वह विचार हमारे मन की परिधि से निकल कर बाहर आये तो उस विचार से मान सम्मान और ऐश्वर्य की प्राप्ति हो।

अभी तक विचारों को सुबह लिखने की आदत नहीं पड़ी है, क्योंकि अगर सुबह ही विचार लिखने बैठ गये तो फ़िर प्रात: भ्रमण मुश्किल हो जाता है पर सुबह के विचारों को कहीं ना कहीं इतिहास बना लेना चाहिये, मानव मन है जो विचारों को जितना लंबा याद रख सकता है और उतनी ही जल्दी याने कि अगले ही क्षण भूल भी सकता है। ऐसे पता नहीं कितने विचारों की हानि हो चुकी है। जो शायद कहीं ना कहीं जीवन का मार्ग और दशा बदलने का कार्य करते हैं।

“शाहिद” शहादत और सुसाईड (“Shahid” Martyrdom or Suicide)

    आज फ़िल्म “शाहिद” देख रहा था, फ़िल्म बहुत ही अलग विषय पर बनी है, जिसे हम अनछुआ पहलू कह सकते हैं, इन अनछुए पहलुओं में केवल आतंकवाद से ग्रस्त लोग ही नहीं है, और भी बहुत सारे सामाजिक पहलू हैं जो अनछुए हैं, जिनके बारे में हमें आपको और बाहरी विश्व को कुछ पता नहीं है। क्योंकि इन पहलुओं को इतना लुका छिपाकर रखा जाता है कि हम तक कभी कोई खबर इस बारे में पहुँच ही नहीं पाती है।
    “शाहिद” में साफ़ साफ़ बताया गया है जो लोग आपका उपयोग करना चाहते हैं, उनसे दूर रहें, वे लोग केवल और केवल अपने स्वार्थ के लिये आपकी जिंदगी में आते हैं, बेहतर है कि उनसे बहुत दूरी बना ली जाये और मजबूरी हो तो कभी कभार मिलना जुलना रखना चाहिये। जो इंसान दुसरे के अनुभव से सीख लेता है वह शायद बहुत कुछ खोने से बच जाता है।
    फ़िल्म की कहानी बहुत ही सीधी सादी है, जिसमें केवल एक व्यक्ति के इर्दगिर्द यह फ़िल्म घूमती है और उसके परिवार को भी बताया गया है, फ़िल्म की कहानी में किसी भी तरह का कोई ड्रामा नहीं रखा गया है जो कि इसका बहुत ही अच्छा पक्ष है, जैसे कि अपने क्लाईंट से ही प्यार होने पर सीधे उसे शादी के लिये बात कह देना, अपने घर पर कुछ भी ना बताना और जब पता भी चले तो साफ़ साफ़ कह देना, यह साफ़गोई बहुत ही पसंद आई। जिसमें हीरोईन याने कि शाहिद की बीबी का यह संवाद कि “मुझे मेरी लाईफ़ कॉम्लीकेटेड नहीं चाहिये, कोई हर्डल कोई घुमाव फ़िराव नहीं चाहिये, बस स्टेट फ़ार्वर्ड लाईफ़ चलनी चाहिये” जमा।
    बहुत सारे संवाद दिल को छूने वाले हैं और प्रेरक हैं, जैसे शाहिद को उसकी बीबी ने कहा “लोग तो तुमको अतीत में धकेलकर तुम्हें अपने रास्ते से हटाने की कोशिश करेंगे, तुम केवल आगे की और देखो, नई किरण, नई रोशनी तुम्हारा इंतजार कर रही है”।
    जब शाहिद जेल में था तो उनका एक कैदी मित्र उनको पढ़ने में सहायता करता है और कहता है “लहरों के विरूद्ध चलना बहुत आसान नहीं होता परंतु अगर जो लहरों के विरूद्ध चलकर आगे बड़ता है, वह अपनी बुलंदियों को छूता है”, और उसने कहा कि जितना चाहो उतना पढ़ो तुम्हें अपनी मंजिल जरूर मिलेगी।
    किस प्रकार से झूठे केसों में लोगों को फ़ँसाया जाता है, और इतने कमजोर सबूत होने पर भी न्यायपालिका मूक दर्शक बनी देखती रहती है, हमारी न्यायपालिका पर भी बहुत बड़ा प्रहार है। किस प्रकार से धर्म के नाम पर नौजवानों को बरगलाया जाता है उसके लिये फ़िल्म खत्म होने के बाद फ़िल्म को एक्स्टेंडेड पार्ट में दिखाया गया है, वहाँ हमें शहादत और सुसाईड का अंतर पता चलता है।
    फ़िल्म बहुत ही शानदार है, अभिनय दिल छूने वाला है, शायद बहुत दिनों बाद ऐसी कोई फ़िल्म देखी कि लगा इसके लिये वाकई कुछ लिखना चाहिये। फ़िल्म की पूरी टीम को बधाई।

जंग .. मेरी कविता.. (विवेक रस्तोगी)

कठिनाईयाँ तो राह में बहुत हैं,
बस चलता चल,
राह के काँटों को देखकर हिम्मत हार दी,
तो आने वाली कौम से कोई तो
उस राह की कठिनाईयों पर चलेगा,
तो पहले हम ही क्यों नहीं,

आने वाली कौम के लिये
और बड़ी
उसी राह की
आगे वाली कठिनाईयाँ छोड़ें,
नहीं तो
वे इन कठिनाईयों को पार करते समय
सोचेंगे, कितने नकारा लोग थे
जो इन साधारण सी बाधाओं को पार
नहीं कर पाये

जो बाधाएँ आज कठिन लगती हैं
वे आने वाले समय में बहुत सरल हो जाती हैं
बेहतर है कि उनके सरल होने के पहले
उन कठिनाईयों से निपट लिया जाये

दिमाग और हौसलों में जंग न लगने देने का
इससे साधारण और कोई उपाय नहीं।