कल सूर्यग्रहण था और ग्रहण का पहला प्रकोप हमारी शर्ट पर निकला, तो शायद हम बच लिये… “बांके बिहारी लाल की जय”

   कल सदी का सबसे लंबा सूर्य ग्रहण था, शायद वैसे जैसा कि महाभारत में हुआ था क्योंकि दोपहर को ही सन्ध्याकाल जैसी स्थिती निर्मित हो गई थी।

   हम ग्रहण काल में घर से निकले ऑफ़िस जाने के लिये और बड़े इत्मिनान से ऑटो को हाथ देकर रोकने लगे। कई ऑटो रुके पर कोई उस तरफ़ जाने को तैयार ही नहीं था (ये तो रोज की बात है ), एक ऑटोवाले ने सहमति दी तो हम जैसे ही उसमें बैठने लगे पता नहीं कैसे हमारी शर्ट की ऊपरी जेब ऑटो के मीटर में उलझ कर फ़ट गयी, और हम हतप्रभ से अपनी शर्ट को देखने लगे।

   वैसे भी मन तो शंकालू ही होता है सोचा कि चलो ग्रहण की शुरुआत हो चुकी है अपने ऊपर अब बेटा दिनभर के लिये तैयार हो जाओ, पता नहीं दिन कैसा जाने वाला है। फ़िर क्या था ऑटो से उतरे वापिस घर आये और शर्ट बदल कर वापस चल दिये। क्योंकि अपनी तो पहले की हिस्ट्री भी खराब है ग्रहण के दिनों की, हाँ यह पहला सूर्य ग्रहण था और अभी तक जितने भी बड़े बदलाव या नुक्सान हुए थे वो चंद्र ग्रहण से हुए थे। हो सकता है कि हम खुद ही उस समय लापरवाह हो गये हों और हमारी शर्ट फ़ट गयी हो।

   पर हाँ दिनभर काफ़ी अच्छा गया, और तो और जिन कार्यों के न होने की उम्मीद थी वे कार्य भी हो गये। लगता है कि शनि शर्ट पर ही था। 🙂

   यह तो सब जीवन में चलता ही रहता है, और जीवन इन्हीं उतार-चढ़ाव का नाम है, इनके बिना जीवन अधूरा है।

   पर फ़िर भी मन में यह तसल्ली रही कि चलो इस बार ग्रहण से अपन बच लिये, कोई नई समस्या या जिंदगी में नई पेचिदगियाँ नहीं आईं और सब मस्त रहा। सब मुरलीवाले की माया है। इसलिये हम तो हमेशा “बांके बिहारी लाल की जय” कह लेते हैं।

7 thoughts on “कल सूर्यग्रहण था और ग्रहण का पहला प्रकोप हमारी शर्ट पर निकला, तो शायद हम बच लिये… “बांके बिहारी लाल की जय”

  1. ग्रहण का मनुष्‍य पर कोई प्रभाव नहीं पडता है .. आजतक जो भी महसूस किया जाता रहा है .. वह पूर्णिमा और अमावस्‍या का प्रभाव होता है .. कल अमावस्‍या के चंद्रमा के बावजूद गोचर में ग्रहों की स्थिति सामान्‍य से अच्‍छी थी .. यानि बहुत कम लोगों के प्रभावित होने की संभावना थी !!

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अमेरिका में गंगा माता को बीमारी कहा गया फ़ॉक्स न्यूज चैनल द्वारा…. हिन्दू समुदाय का कड़ा विरोध..

कल फ़ॉक्स न्यूज चैनल पर उनके वरिष्ठ एंकर ग्लेन बेक द्वारा गंगा माता का अपमान किया गया। कहा गया कि गंगा जो कि भारत की सबसे लंबी नदी है वह एक बीमारी की तरह है। कम से कम मीडिया को किसी भी तरह की टिप्पणी करने से पहले यह तय कर लेना चाहिये कि इससे किसी की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचे।

हमारे हिन्दूवादी संगठनों ने प्रतिक्रिया दिखाई और इसका विरोध किया पर फ़ॉक्स न्यूज के ग्लेन बेक माफ़ी मांगने को तैयार नहीं हैं, क्यों, क्योंकि उनकी विचारधारा में भारत एक पिछड़ा देश है और पिछड़े देश को अमेरिका जैसे अगड़े देश कुछ भी बोल सकते हैं, उसका ताजा उदाहरण है – कोपेहगन जलवायु परिवर्तन सम्मेलन।

बाबा रामदेव ने तो यहाँ तक कहा कि फ़ॉक्स न्यूज को जब पता नहीं है कि गंगा को हिन्दू समाज माता का दर्जा देता है तो क्यों कुछ भी ऐसा बोला गया। ग्लेन बेक खुद यहाँ कुंभ के दौरान आयें और यहाँ आकर देखें कि हम भारतीय और विश्व के हिन्दुओं के श्रद्धा का केन्द्र है गंगा नदी। और उसमें स्नान कर उन्होंने जो अभद्र टिप्पणी की है गंगा माता पर, और जो पाप किया है, उस पाप को धोना चाहिये।

वाकई गंभीर मुद्दा है ये अमीर देश हमें अभी भी पिछड़ा ही समझता है और हम भी उससे दबकर रहते हैं, क्यों नहीं दबंगता दिखाते, भारत उनके लिये बड़ा बाजार है और नुकसान तो उन्हें भी होगा, हमें ये दिखाना पड़ेगा।

18 thoughts on “अमेरिका में गंगा माता को बीमारी कहा गया फ़ॉक्स न्यूज चैनल द्वारा…. हिन्दू समुदाय का कड़ा विरोध..

  1. बहुत गलत और आपत्तिजनक -मेरी भी घोर आपत्ति दर्ज की जाय !
    सुरसरी सम सब कर हित होई ..को ऐसा कहा गया ..लानत है !

  2. उसके बोलने में गलती हो गई ! ये साले अमरीकी यहाँ हिन्दुस्तान आकर जब जानकारियाँ इकठ्ठा कर रहे होते है तो आधे तो ये शराब के नशे में धुत होते है , अत: पूरी बात ठीक से नहीं सुनते ! पिछली बार जब वह किताब लिखने के सिलसिले में भारत आया था तो मैंने उसे बताया था कि गंगा मैया की गोद में डुबकी लगाने से बीमारियाँ दूर हो जाती है ! मैंने तो अंगरेजी ठीक -ठीक ही बोली थी, हाँ थोडा एक्सेंट का फर्क हो सकता है, अब हम क्या करे जब उस हरामखोर ने ठीक से ही नहीं सुना, समझा और लिख दिया कि गंगा मैया बीमारी है, 🙂

  3. कभी सोचा है, क्यों गरीब देशों से अमेरीका जाने वाले लोगों की नौकरी रिसेशन में अमेरीकियों से कम गई?

  4. विरोध तो दर्ज किया ही जाना चाहिये…

    लेकिन पहले खुद के गिरेबान में झाँककर देखना भी चाहिये…। परसों ही कानपुर से लौटा हूं, और वहाँ गंगा की जो हालत है वह वाकई "बीमारी" जैसी ही है… और यह हालत किसी अमेरिकी द्वारा नहीं बनाई गई है…। यदि वाकई भारत के लोग गंगा जैसी नदियों की पूजा करते होते तो ऐसा नहीं होता। पाखण्ड के पुतले हैं हम सब…। बाकी तो लोग खुद ही समझदार हैं, मेरा मुँह क्यों खुलवाते हो… 🙂

  5. फ़ॉक्स न्यूज को जब पता नहीं है कि गंगा को हिन्दू समाज माता का दर्जा देता है तो क्यों कुछ भी ऐसा बोला गया। ?

    बहुत गलत और आपत्तिजनक -मेरी भी घोर आपत्ति दर्ज की जाय !

  6. विवेक भाई,
    गंगा हमारी आस्था से जुडी है…हम इसे मां की तरह सम्मान देते हैं…लेकिन दूसरे आज इसे बीमारी कह रहे हैं तो इसकी असली वजह क्या है…गंगा को इस कदर प्रदूषित करने के लिए ज़िम्मेदार कौन है…हम ही न…गोमुख से दूध की तरह निकलने वाली गंगा कोलकाता के पास गंगा सागर तक आते आते नाले की तरह
    छिछली हो जाती है…गंगा को ये शक्ल देने वाले कौन है…क्या बस सिर्फ ये कहने
    से काम चल जाएगा…राम तेरी गंगा मैली हो गई, पापियों के पाप धोते-धोते…

    जय हिंद…

  7. ग्लेन बेक के कहने का ढंग गलत था…शब्दों का प्रयोग गलत था…पर उसमे निहित अर्थ भी क्या गलत थे??…आज गंगा का क्या हाल कर रखा है,उसके बेटों ने..क्या यह छुपा है किसी से??…हमें शब्दों की बजाय कर्म की ओर ध्यान देना चाहिए…गंगा को फिर से उतना ही स्वच्छ और पावन बना दें,फिर देखें..यही ग्लेन बेक खुद माफ़ी माफ़ी मांगेंगे और उसके गुण गायेंगे….अपने कर्तव्यों की ओर ध्यान ना दे,सिर्फ शोर मचाने से क्या होगा?

  8. अमेरिका वाले भी ऐसे अंट संट काम किया करते हैं। उनका इलाज किया जाना चाहिए।

    ——–
    छोटी सी गल्ती जो बडे़-बडे़ ब्लॉगर करते हैं।
    क्या अंतरिक्ष में झण्डे गाड़ेगा इसरो का यह मिशन?

  9. मैं सुरेश चिपलूनकर और रश्मि रविजा जी से पूर्णतः सहमत हूँ .
    खैर अमेरिकी मीडिया भी इतना इज्ज़तदार नहीं है की उसके लिए हाय तोबा मचाई जाये .
    जहां तक पचीसों सालों से अमेरिकी मानस को जाना है , फाक्स न्यूज देखनेवालों का स्तर भी वैसा ही है जैसे राज ठाकरे के अनुयायिओं का . ग्लेन की टिप्पणी समझने के लिए ये समझना भी जरूरी है की किनके लिए वे बोलते हैं.और हमें भी समझना चाहिए की जिसे माँ कहते हैं उसे गंदा भी करते हैं .हम पाखंडी ही हैं .

  10. अरे सिर्फ माँ -माँ कहने से क्या होगा …पहले उसकी जो गत हमने बनाई है वो तो हम देख लें.फिर बहार वालों को भी भुगत लेंगे.पाप धोने के बहाने कचरा बहाते हैं उसमें हम ….क्या कभी ये सोचा हमने.?जब अपने कर्तव्यों को ही पूरा नहीं कर सकते ,तो किसी बहार वाले की जुबान क्या पकड़ेंगे.

  11. बुरा तो लगता है कोई विदेशी हमें कुछ भी कहे तो…और आपत्ति दर्ज करना भी ठीक है…
    लेकिन क्या उसने जो कहा वास्तव में गलत कहा???
    एक बार सोचिये ना !!! अगर हम सचमुच गंगा को माँ मानते हैं तो फिर इसी माँ कि गोद में सारा कूड़ा साड़ी गन्दगी क्यूँ उंडेल देते हैं….
    कभी कनाडा में आकर कोई देखे नदियों को कैसे रखते हैं ये लोग…..आप पूरी नदी घूम जाइए आपको कहीं कोई गन्दगी नज़र आ जाए तो आप कहियेगा…
    नदियों कि इज्ज़त और बचाइश कोई इनसे सीखे….
    मान अपमान कि बहस में न पड़ कर सही अर्थों में इसको बचने कि जुगत में हम सबको लग्न चाहिए. देर तो हुई है लेकिन 'जहाँ आँख खुले वहीँ सवेरा समझो'

  12. किसी विदेशी ने बिना भारतीय संस्क्रति की उत्तमता को न समझते हुए और गंगा की महत्ता को विना जाने हुए जो गंगा माँ को बिमारी कहा मै अपना घोर विरोध दर्ज करा रहा हूँ , साथ ही मै भारतीयों से ये आवाहन करता हूँ की येसी स्थिति आई कैसे क्या केवल पवित्र पवित्र और महान महान चिल्लाने से गंगा की पवित्रता और महनता बनी रहेगी सोचनीय प्रश्न है
    सादर
    प्रवीण पथिक
    9971969084

  13. वह तो सिर्फ वह कह रहा है जो देख रहा है। यहां तो गंगामाई के साथ भीषण अत्याचार कर रहे हैं विरोध दर्ज कराने वाले। इनकी क्या दवा है?!

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ४१

परिणतशरच्चन्द्रिकासु – भारतवर्ष में छ: ऋतुओं होती हैं। उसमें शरद का समय अश्विन और कार्तिक मास होता है, जैसा कि स्पष्ट किया गया है कि यक्ष के शाप का अन्त कार्तिक शुक्ल एकादशी को होगा तभी उसका अपनी प्रिया से मिलना सम्भव होगा, तब शरद ऋतु का ढलना स्वाभाविक ही है। क्योंकि कार्तिक की समाप्ति पर शरद़् भी समाप्त हो जाती है इसलिए कवि का कथन कि “ढली हुई शरद़् ऋतु

की चाँदनी वाली रातें” इसमें कोई असंगति नहीं बैठती।


सान्तर्हासम़् – यक्षिणी ने किसी रात सोते समय स्वप्न में यक्ष को किसी अन्य रमणी के साथ रमण करते देखा, तो वह एक दम जाग जाती है और यह देखकर कि उसे वह अपने गले लगाये हुए है तो कुछ लज्जित-सी होती है और अपनी गलती पर मन ही मन हँसी भी आती है।

कितव – जो नायक किसी अन्य में अनुरक्त हो और प्रकृत नायिका में भी बाहरी तौर पर अनुराग दिखलाये और गुप्तरुपेण उसका अप्रिय करे वह शठ कहलाता है। यहाँ यक्षिणी  स्वप्न में यक्ष को किसी अन्य स्त्री के साथ देखकर उसे कितव (शठ) कहकर सम्बोधित करती है।

अभिज्ञानदानात़् – अभीज्ञान कहते हैं पहिचान का चिह्न अथवा निशानी। यक्ष मेघ को अभिज्ञान के रुप में एक ऐसा रहस्य बताता है जो यक्ष और यक्षिणी को ही पता है, उस रहस्य को सुनकर यक्षिणी जान जायेगी कि इस मेघ को यक्ष ने ही भेजा है।

उपचितरसा: प्रेमराशीभवन्ति – वियोग में अभिलाषा के बढ़ जाने पर स्नेह प्रेम के रुप में परिणत हो जाता है। रसरत्नाकार में संयोग की दर्शन, अभिलाषा, राग, स्नेह, प्रेम, रति और श्रृंगार ये सात अवस्थाएँ पृथक पृथक स्पष्ट की हैं –
प्रेक्षा दिदृक्षा रम्येषु तच्चिन्ता त्वभीलाषक:।
रागस्तासड़्गबुद्धि: स्यात्स्नेहस्तत्प्रवणाक्रिया॥
तद्वियोगऽसहं प्रेम, रतिस्तत्सहवर्तनम़्।
श्रृड़्गारस्तत्समं क्रीड़ा संयोग: सप्तधा क्रमात़्॥
अर्थात सुन्दर पदार्थ को देखने की इच्छा को प्रेक्षा, सुन्दर पदार्थ को पाने की चिन्ता को अभिलाष, सुन्दर पदार्थ के साथ संसर्ग की बुद्धि को राग, उसके लिए कार्य करने को स्नेह, उस पदार्थ के साथ होने वाले वियोग को न सहने को प्रेम, अभीष्ट पदार्थ के साथ रहने को रति और उसके साथ क्रीड़ा को श्रृंगार कहते हैं।



कुन्दप्रसवशिथिलम़् – कुन्द पुष्प चमेली के पुष्प को कहते हैं, यह पुष्प शाम को खिलता है और प्रात:काल मुरझा जाता है; अत: महाकवि ने विरह पीड़ित प्राणों को प्रात:कालीन चमेली के पुष्पों के समान कहा है।


ते विद्युता विप्रयोग: मा भूत़् – विद्युत को मेघ की पत्नी बताया गया है। श्लोकार्द्ध में मेघ के प्रति मंगल कामना की गयी है कि वह अपनी प्रिया से क्षण भर के लिए भी वियुक्त न हो। वास्तव में यक्ष ने अपनी प्रिया से वियोग सहा है और वह जानता है कि वियोग कितना कष्टकारक होता है। इस प्रकार मेघदूत मार्मिक मंगल-वाक्य के साथ समाप्त होता है।

2 thoughts on “कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ४१

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – १८

शाड़र्गिण: वर्णचौरे – कृष्ण के धनुष का नाम शाड़र्ग है, इसलिये उसे शाड़र्गी कहते हैं। कृष्ण का वर्ण श्याम है तथा मेघ का वर्ण भी श्याम है; अत: उसे कृष्ण के वर्ण को चुराने

वाला कहा गया है।

गगनतय: – दिव्य सिद्ध गन्धर्व आदि कुछ देव योनियाँ आकाश में विचरण करती है; अत: उनके लिये गगनगति कहा गया है।
कवि ने कल्पना की है कि जब आकाश में विचरण करने वाले मेघ चर्मण्वती के प्रवाह को देखेंगे तो ऐसा प्रतीत होगा कि मानो वह पृथ्वी का मोतियों का हार हो, जिसमें बीच में इन्द्रनील मणि पिरोया गया हो।
कुन्द्पुष्प श्वेत होता है और भ्रमर उसके पीछे मतवाले हो जाते हैं। यदि कोई कुन्द की शाखा को हिला दे तो भ्रमर भी शाखा के पीछे-पीछे दौड़ते हैं। मेघ के दर्शन से दशपुर की स्त्रियों के नेत्र ऐसे लग रहे हैं जैसे श्वेत कुन्द पुष्प के साथ-साथ भ्रमर चल रहा हो।
दशपुर – यह रन्तिदेव की राजधानी थी। इसकी स्थिती के विषय में विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ इसे आधुनिक धौलपुर दशपुर मानते हैं और कुछ आधुनिक मन्दसौर मानते हैं।
ब्रह्मवर्त – मनुस्मृति के अनुसार सरस्वती और दृष्दवती नदियों के बीच स्थित स्थान को ब्रह्मवर्त कहा जाता है।
छायया गाहमान: – यक्ष मेघ को निर्देश देता है कि वह छाया द्वारा ही ब्रह्मवर्त में प्रवेश करे, शरीर से नहीं; क्योंकि पवित्र स्थलों को लाँघना नहीं चाहिये। कहा भी है – “पीठक्षेत्राश्रमादीनि परिवृत्यान्यतो व्रजेत़्”। ब्रह्मवर्त भी पूजनीय प्रदेश है अत: इसी कारण उसे न लाँघने को कहा है।
क्षत्रप्रधनपिशुनम़् – कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध में मारे गये मनुष्यों के रुधिर से वहाँ की भूमि अब भी लाल है। अब भी वहाँ मनुष्यों के कपाल, अस्थि आदि निकल आते हैं। इसलिये इसे युद्ध के चिह्नों से युक्त कहा गया है।

7 thoughts on “कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – १८

  1. विवेक जी
    सादर वन्दे!
    ये जानकर सुखद अनुभूति होती है कि ऐसे प्रयास मनीषियों द्वारा समय समय पर होते हैं जो हमारे वास्तविक ज्ञान को समृद्ध करते हैं, इसके लिए आपको बहुत-बहुत आभार.
    रत्नेश त्रिपाठी

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