सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १६

     अन्धे राजा को इतना वैभव दिया पर देखने की शक्ति छीन ली – यह क्रूर व्यवस्था करनेवाला दैव अन्धा नहीं था क्या ? सौ पुत्र और इस अमित राज्य-वैभव के स्वामी इस राजा को भाग्यवान कहा जाये या .…. क्योंकि यह सब देखने के लिये आँखें नहीं हैं – इसलिये उसे अभागा कहा जाये ? अपने सौ पुत्रों को यह अन्धा पिता कैसे पहचानता होगा ? और सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह थी कि आँखें ने होने पर भी इतने विशाल साम्राज्य पर ये शासन कैसे करते होंगे ? छि:, कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं कि उनका उत्तर ही नहीं दिया जा सकता ।

     बहुत देर चलने के बाद हम एक विशाल लौह-महाद्वार के पास आये। उसके दोनों ओर काले रंग के पाषाणों के प्राचीर दूर तक संकुचित होते चले गये थे। महाद्वार की भव्य कमान पर त्रिकोणी भगवा ध्वज फ़ड़फ़ड़ा रहा था। द्वारपालों ने हमको देखते ही अभिवादन किया। हम झुककर भीतर गये। वह कुरुओं की युद्धशाला थी।

     भीतर चारों ओर बड़े-बड़े कक्ष थे और बीचोंबीच एक योजन घेरे का एक विशाल अखाड़ा था। उसके अनेक खण्ड कर दिये गये थे। एक ओर मल्ली के लिए अखाड़ा था। यहाँ लाल रंग की बारीक मिट्टी गोलाकार फ़ैली हुई थी। उसमें अनेक मल्ल-युवकों की जोड़ियाँ एक-दूसरे पर दाँव-प्रति-दाँव चलाती हुई लड़ रही थीं। उस अखाड़े के मध्य भाग में हष्ट-पुष्ट गौरवर्णी युवक ताल ठोंकता हुआ गोलाकार नाचता दिखाई दिया उसके पास जाने का साहस किसी में नहीं था। हाथ उठाकर वह सारे अखाड़े में थय-थय नाच रहा था।

      “कर्ण उस युवराज भीम को देख ! वह अखाड़े में सबको चुनौती देता हुआ घूम रहा है ।“ उसकी ओर उँगली से संकेत करते हुए पिताजी बोले।

      दूसरी ओर अश्वारोहण के लिए स्थान रिक्त छोड़ दिया गया था। घोड़े पंक्ति में दौड़ सकें, इसलिए उस स्थान में रेखाएँ खींची हुई थीं। दौड़ते समय बार-बार रुकावट डालने के लिये स्थान-स्थान पर खन्दकें खुदी हुई थीं। कुछ खन्दकें पानी से भरी हुई थीं। स्थान-स्थान पर ऊँची दीवारें खड़ी की गयीं थीं। अनेक युवक उन सब रुकावटों को खेल-खेल में पार करके अश्वों को अभ्यास कराते हुए दिखाई दिये।

     पूर्व की ओर खड्गों का अभ्यास करने के लिए एक क्रीड़ा-क्षेत्र बनाया गया था। उसके किनारे पर छड़ें लगी थीं। उस छड़ों पर विविध आकार के कवच और छोटी-बड़ी ढालें टँगी हुई थीं। अनेक योद्धा खड्गों से अभ्यास कर रहे थे। क्रोध से तमतमाते हुए एक-दूसरे पर टूट रहे थे। खड्गों की झनझनाहट गूँज रही थी।

     पश्चिम की ओर चैसे ही आकार का एक गोलाकर क्रीड़ांगण था। उसमॆं कुछ युवक गदाएँ घुमाकर उनका अभ्यास कर रहे थे। गर्जना करते हुए चक्कर काट रहे थे। उस विशाल स्थान पर शूल, तोमर, शतघ्री आदि के लिए छोटे बड़े बहुत से क्रीड़ा-क्षेत्र बनाये गये थे। चारों ओर पाषाण-निर्मित कक्ष अनेक प्रकार के शस्त्रास्तों से ठसाठस भरे हुए थे।

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