उलझनें जिंदगी की …. मेरी कविता …. विवेक रस्तोगी

उलझनें जिंदगी की

बढ़ती ही जा रही हैं

जैसे इनके बिना जीना

दुश्वार हो

उलझनें हों तभी

प्रेम की कीमत

सुलझन की कीमत

पता चलती है

क्यों

इतने बेकाबू हो जाते हैं

कुछ पल

कुछ क्षण अपनी जिंदगी के

कुछ बेहयाई भी

छा जाती है

पर फ़िर भी इम्तिहान

खत्म नहीं होता

कहीं झुरमुट में दूर

कोई शाख पर छुपकर

बैठकर

देख रहा है

पता ही नहीं है

वो उलझन है

या सुलझन है…

12 thoughts on “उलझनें जिंदगी की …. मेरी कविता …. विवेक रस्तोगी

  1. जीवन एक ऊन की उल्झी गुच्छी है, और हम सब इसी उलझन, सुलझन की गांठे खोलते रह जाते हैं

  2. उलझनें हों तभी

    प्रेम की कीमत

    सुलझन की कीमत

    पता चलती है….
    अच्छी रचना.

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