लोग नुकसान वाले शेयर क्यों पकड़े रहते हैं?

शेयर बाज़ार पर ज्ञान की बकवास — भाग 4

लोग नुकसान वाले शेयर क्यों पकड़े रहते हैं?

रात का समय था। बाहर हल्की बारिश हो रही थी। खिड़की के शीशों पर पानी की बूंदें गिर रही थीं और ड्राइंग रूम में हल्की पीली रोशनी जल रही थी। टीवी म्यूट पर था, लेकिन नीचे ब्रेकिंग न्यूज लगातार दिख रही थी —
“मार्केट में भारी उतार-चढ़ाव।”

बेटेलाल सामने सोफे पर बैठे मोबाइल में अपना पोर्टफोलियो देख रहे थे। चेहरे पर वही भाव थे जो रिज़ल्ट खराब आने के बाद छात्र के होते हैं।

“डैडी…” उन्होंने धीरे से कहा,
“एक बात समझ नहीं आती।”

मैंने ब्लैक कॉफी का कप नीचे रखा और कहा —
“पूछो बेटेलाल।”

“जब किसी शेयर में नुकसान हो रहा होता है… तब लोग उसे बेचते क्यों नहीं?”

मैं हल्का सा मुस्कुराया।

“और जब मुनाफा होता है… तब जल्दी बेच क्यों देते हैं?”

बेटेलाल तुरंत बोले —
“हाँ! यही तो मैं भी करता हूँ!”

मैं हँस पड़ा।

“यही तो पूरी दुनिया करती है बेटेलाल। शेयर बाज़ार में सबसे मुश्किल चीज़ शेयर चुनना नहीं है… खुद को संभालना है।”

कुछ पल कमरे में हल्की खामोशी रही। बाहर बारिश थोड़ी तेज हो गई थी।

मैंने धीरे से कहा —

“देखो, इंसान का दिमाग नुकसान सहना पसंद नहीं करता। अगर किसी शेयर में 50% नुकसान हो जाए, तो आदमी उसे बेचने से डरता है।”

“डरता क्यों है?”।

“क्योंकि जैसे ही वह शेयर बेचेगा… नुकसान सच बन जाएगा। यानि कि रियल में हो जायेगा”

बेटेलाल थोड़ा आगे झुक गये।

मैंने समझाना जारी रखा —

“जब तक शेयर अकाउंट में पड़ा है, आदमी खुद को दिलासा देता रहता है —
‘एक दिन वापस ऊपर जाएगा।’
‘अभी नहीं बेचते।’
‘थोड़ा और इंतजार करते हैं।’”

बेटेलाल मुस्कुराने लगे।

“डैडी… ये तो बिल्कुल मेरे जैसा है।”

मैंने कहा —

“लगभग हर निवेशक ऐसा करता है। इसे कहते हैं — उम्मीद का जाल, दिमागी फितूर।”

बाहर कहीं से कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आ रही थी।

मैंने आगे कहा —

“अब दूसरी तरफ देखो। अगर किसी शेयर में 20% मुनाफा हो जाए, तो आदमी जल्दी बेच देता है।”

“क्यों?”

“क्योंकि उसे डर लगता है कि कहीं मुनाफा वापस न चला जाए।”

बेटेलाल ने सिर हिलाया।

“मतलब नुकसान वाले शेयर पकड़कर रखते हैं… और अच्छे शेयर जल्दी बेच देते हैं?”

“बिल्कुल।”

मैंने टेबल पर रखा एक छोटा गमला उठाया।

“मान लो तुमने दो पौधे लगाए। एक सूख रहा है और दूसरा तेजी से बढ़ रहा है। अब अगर तुम बढ़ते हुए पौधे को काट दो और सूखे पौधे को रोज़ पानी देते रहो… तो बगीचा कैसा बनेगा?”

बेटेलाल हँस पड़े – “बेकार।”

“बस वही लोग अपने पोर्टफोलियो में करते हैं।”

कमरे में हल्की कॉफी की खुशबू फैल चुकी थी।

मैंने कहा —

“शेयर बाज़ार में लोग अक्सर अपनी गलती स्वीकार नहीं करना चाहते। उन्हें लगता है कि अगर शेयर बेच दिया तो मानो हार मान ली।”

“तो क्या नुकसान वाला शेयर तुरंत बेच देना चाहिए?”

मैंने कहा —

“हर बार नहीं। पहले ये समझो कि शेयर नीचे क्यों गया है।”

“मतलब?”

“अगर कंपनी अच्छी है, बिज़नेस मजबूत है और सिर्फ बाजार के डर से शेयर गिरा है… तो गिरावट मौका भी हो सकती है।”

“और अगर कंपनी ही खराब हो?”

“तो फिर सिर्फ उम्मीद के भरोसे बैठे रहना खतरनाक है।”

बेटेलाल अब बहुत ध्यान से सुन रहे थे।

टीवी पर किसी एक्सपर्ट का चेहरा दिख रहा था जो बिना रुके बोलता जा रहा था। आवाज़ म्यूट थी लेकिन हाथ बहुत तेज़ चल रहे थे।

मैंने हँसते हुए कहा —

“आजकल टीवी वाले ऐसे सलाह देते हैं जैसे उन्हें भविष्य दिखाई देता हो।”

बेटेलाल भी हँस पड़े।

फिर अचानक उन्होंने पूछा —

“डैडी, क्या आपने भी कभी ऐसा किया है?”

मैं कुछ सेकंड चुप रहा।

बारिश की बूंदें अब और साफ सुनाई दे रही थीं।

फिर मैंने धीरे से कहा —

“बहुत बार।”

बेटेलाल ने आश्चर्य से पूछा —

“सच?”

मैंने सिर हिलाया।

“शुरुआत में मैंने भी खराब शेयर सिर्फ इसलिए पकड़े रखे क्योंकि मुझे लगता था कि मैं गलत नहीं हो सकता।”

“फिर?” 

“फिर बाजार ने सिखाया कि बाजार से बड़ा अहंकार किसी का नहीं चलता। बाजार सुप्रीम है, उससे बढ़कर कोई नहीं, इसलिए बाजार का सम्मान करना सीखो” 

कुछ देर दोनों चुप रहे।

मैंने आगे कहा —

“याद रखना बेटेलाल…
निवेश में पैसा कमाने से पहले गलती स्वीकार करना सीखना पड़ता है।”

बेटेलाल धीरे-धीरे बात समझ रहे थे।

उन्होंने पूछा —

“तो अच्छे निवेशक क्या करते हैं?”

मैंने कहा —

“वे भावनाओं से ज्यादा तथ्यों को देखते हैं।”

“मतलब?”

“अगर कंपनी की कहानी बदल गई… बिज़नेस कमजोर हो गया… या मैनेजमेंट खराब निकला… तो अच्छे निवेशक बाहर निकल जाते हैं।”

“और अगर कंपनी मजबूत हो?”

“तो वे गिरावट में भी धैर्य रखते हैं।”

बाहर बारिश अब रुकने लगी थी। पड़ोस में से किसी घर से आरती की आवाज़ आने लगी।

मैंने धीरे से कहा —

“शेयर बाज़ार में सबसे महंगी चीज़ जानकारी नहीं है बेटेलाल…”

“फिर क्या है?”

मैं मुस्कुराया।

“धैर्य।”

कमरे में अब एक अजीब सी शांति थी।

बेटेलाल मोबाइल की स्क्रीन बंद करके मेरी तरफ देखने लगे।

शायद पहली बार उन्हें समझ आ रहा था कि शेयर बाज़ार सिर्फ पैसे का खेल नहीं… इंसानी व्यवहार का आईना भी है।

फिर उन्होंने पूछा —

“डैडी… अगली बार क्या सीखेंगे?”

मैंने ब्लैक कॉफी का आखिरी घूंट लिया और मुस्कुराकर कहा — “अगले भाग में समझेंगे — लोग गिरते बाजार में घबराते क्यों हैं, और बड़े निवेशक उसी समय खरीदारी क्यों शुरू करते हैं।”

क्रमश:

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