All posts by Vivek Rastogi

About Vivek Rastogi

मैं २००६ से हिन्दी ब्लॉगिंग कर रहा हूँ, और वित्त प्रबंधन मेरा प्रिय विषय है। मेरा एक यूट्यूब चैनल भी है जिसे आप https://youtube.com/financialbakwas देख सकते हैं।

टर्म इंश्योरेन्स क्या होता है.. भाग १ (What is Term Insurance…) Part 1

   जीवन बीमा का प्राथमिक उद्देश्य बीमा धारक की मौत के बाद परिवार को वित्तिय सुरक्षा प्रदान करना है। यह आपकी मदद करता है यह सुनिश्चित करने के लिये कि आपके परिवार और प्रियजनों के पास पर्याप्त पैसे हों जिससे आपकी अनुपस्थिती में भी उनकी जरुरतें पूरी होती रहें।

   टर्म योजना जीवन बीमा का शुद्ध रुप है, हम दूसरे शब्दों में कह सकते हैं यह एक शुद्ध जीवन बीमा है जो कि जोखिम को कवर करता है जिसमें बीमा धारक कम प्रीमियम अदा करता है और उसे मिलता है एक बड़ी राशि का बीमा। टर्म योजना (Term Insurance) जीवन बीमा के अन्य योजनाओं से सबसे सस्ता है। यह बीमाधारक के लिये बड़ी राशि को खुद के बीमे के लिए अपेक्षाकृत कम प्रीमियम होने से उसकी मदद करता है। बीमा अपने निवेश करने का स्थान नहीं है, बीमा का मुख्य उद्देश्य, आपकी अनुपस्थिती में आपके परिवार के लिये वित्तीय सहायता प्रदान करना है।  बहुत कम प्रीमियम पर टर्म बीमा (Term Insurance) का मुख्य कार्य आपके जीवन के जोखिम को कवर प्रदान करना है, जिससे आप अपनी बचत के एक बड़े हिस्से को अच्छे बचत उत्पादों में निवेश कर सकते हैं। अगर कोई व्यक्ति अपने निवेशों की वापसी के प्रति बहुत ही  संवेदनशील है, या अपने हर निवेश में वह लाभ देखता है, तो यह टर्म बीमा (Term Insurance) उनके लिये उपयुक्त नहीं है। अधिकांश टर्म बीमा (Term Insurance) कोई भी लाभ निवेश पर नहीं देते हैं अगर बीमा धारक को कुछ भी नहीं होता है। और कुछ टर्म बीमा (Term Insurance) हैं जो भी आपने प्रीमियम अदा किये हैं और अगर आपको कुछ नहीं होता है तो वे ये प्रीमियम आपको वापिस कर देते हैं।

   कम लागत के ढ़ांचे के कारण टर्म बीमा (Term Insurance) सभी तरह के बीमे में सबसे सस्ता है। टर्म बीमा के प्रीमियम में केवल प्रशासन खर्च और मोर्टेलिटी चार्जेस होते हैं। इसकी प्रीमियम राशि में कोई भी बचत नहीं होती है जो कि बीमा धारक से वसूल की जा रही है। इसी कारण से, बीमा की अवधि के बाद अगर बीमाधारक जीवित रहता है तो उसे कुछ रिटर्न नहीं मिलता है। और प्रीमियम राशि जो कि इस प्लान के अंतर्गत आती है वह written off कर दिया जाता है,अगर बीमा अवधि में कोई बीमा क्लेम करने की स्थिती नहीं आती है। अगर बीमा क्लेम करने की स्थिती आती है तो वह नॉमिनी को बीमा राशि मिलेगी। और अगर आप बीमा को निवेश के साधन से देखते हैं तो एन्डोमेन्ट या यूलिप प्लान लेना चाहिये। लेकिन इनमें शुल्क बहुत ज्यादा होता है, क्योंकि इन योजनाओं में मोर्टेलिटि एवं प्रशासनिक चार्जेस के अलावा एलोकेशन चार्जेस, निधि प्रबंधन प्रभार (Fund Management Charges) इत्यादि होते हैं।

भगवान और गूगल – रिश्ते इंटरनेट युग में (God & Google – Relationships in Internet Age)..

बहुत दिनों बाद मुझे कल मुंबई लोकल से सफ़र करने का सुअवसर मिला, मौका था एक सेमिनार में जाने का “God & Google – Relationships in Internet Age”, जो इस्कॉन चौपाटी राधा गोपीनाथ मंदिर में था और वक्ता थे इडाहो (idaho, USA) से आये  राधिका रमण प्रभु याने कि डॉ. रवि गुप्ता। वो पूरी दुनिया में सबसे युवा भारतीय विद्वान हैं जिन्होंने मात्र २१ वर्ष की उम्र में डॉक्टरेट पूरा किया, हैं, जिन्हें मानव मनोविज्ञान और व्यवहार का बहुत गहरा ज्ञान है।

सेमिनार में भगवान और गूगल में अंतर बताया गया क्योंकि आज दोनों ही सर्वव्यापी हैं, जैसे भगवान सब जगह है वैसे ही गूगल भी सभी जगह है, परंतु फ़िर भी गूगल भगवान क्यों नहीं है और इस इंटरनेट युग में अपने सामाजिक संबंधों को कैसे मजबूत बनायें, कैसे अपनी भावनाओं को व्यक्त करें।

image1

अगर आपको भी इस सेमिनार का आडियो सुनना है तो यहाँ चटका लगाईये।

गंभीर बीमारियों का बीमा भी उतना ही जरुरी है जितना कि जीवन बीमा (Critical Illness Insurance is equal imprtant as Life…)

टर्म इंश्योरेन्स और मेडिक्लेम इंश्योरेन्स का जितना महत्व है उतना ही महत्व है क्रिटिकल इलनेस इंश्योरेन्स का याने कि गंभीर बीमारियों के लिये बीमा।

हमारी मानसिकता है कि हम केवल अपनी गाढ़ी कमाई खर्च ही कर रहे हैं पर हमें उसका कोई प्रतिफ़ल या रिटर्न नहीं मिल रहा है, तो मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि पहले इन बातों का मनन करें और फ़िर इस बारे में सोचें। जितना आपका आपके परिवार से भावनात्मक लगाव है कि कोई भी किसी भी परेशानी में हो तो आपको बहुत तकलीफ़ होती है, वैसे ही इस बारे में भी सोचना चाहिये। यह बहुत ही चिंतन और मनन का विषय है।

अब अगर टर्म इंश्योरेन्स और मेडिक्लेम इंश्योरेन्स ले लिया पर अगर कोई गंभीर बीमारी हो गई तो क्या, इस पर मेडिक्लेम से आपको इलाज पर होने वाला खर्च तो मिल जायेगा पर अगर गंभीर बीमारी को ठीक होने में ज्यादा समय लग जाता है तो जो घर के नियमित खर्च हैं वो कैसे चलायेंगे, नियोक्ता तो तन्ख्वाह नहीं देने वाला, सरकारी का तो पता नहीं पर प्राईवेट में तो बिल्कुल नहीं देने वाला। तब क्या करेंगे, सोचिये सोचिये…?

घबरा गये, अरे घबराने की कोई बात नहीं है, इसीलिए तो क्रिटिकल इलनेस प्लान बनाया गया है, जो कि ९ से लेकर १४ गंभीर बीमारियों के होने पर आपको आर्थिक रुप से सुरक्षित करता है। जो कि निम्न हैं –

कैंसर
पैरालिसिस
कोरोनरी आरट्री बाइपास सर्जी
मेजर आर्गन ट्रांसप्लांट
प्राइमरी पलमोनरी आरटेरियल हाइपरटेंशन
फस्ट हार्ट अटैक
स्ट्रोक
किडनी फेलियर
अरोटा ग्राफ्ट सर्जी

और भी बीमारियाँ हैं जिससे आप आर्थिक रुप से सुरक्षित हो सकते हैं, पर ये हर बीमा कंपनी के पालिसी पर निर्भर करता है।

यह क्रिटिकल इलनेस पालिसी जीवन बीमा कंपनियों के साथ साथ कुछ साधारण बीमा करने वाली कंपनियों के पास भी उपलब्ध हैं जैसे कि बजाज एलायंज और आईसीआईसीआई लोम्बार्ड।

केवल क्रिटिकल इलनेस पालिसी लेने पर बीमा १,३ और ५ वर्ष के लिये उपलब्ध होता है, जिसका प्रीमियम सुरक्षा की तुलना में बेहद कम होता है, अगर ३५ वर्ष की उम्र के व्यक्ति के लिये देखा जाये तो लगभग ६ लाख की बीमा राशि के लिये एकमुश्त प्रीमियम होता है १३-१४ हजार रुपये, पाँच साल की सुरक्षा के लिये।

यह क्रिटिकल इलनेस प्लान आप टर्म इंश्योरेन्स के साथ भी ले सकते हैं।

सोचिये और बताईये आप क्या सोचते हैं –

हेल्थ इंश्योरेन्स (मेडिक्लेम) लेकर खुद को आर्थिक रुप से सुरक्षित करें… [Secure yourself financially, by Family Mediclaim..]

कल की पोस्ट नववर्ष में परिवार को सुरक्षित करें और परिवार को तोहफ़ा दें आज ही, जल्दी सोचिये और अमल करें [Secure your family, Think fast ….] में मैंने केवल टर्म इंश्योरेन्स की ही बात की थी, परिवार को सुरक्षित करने के लिए और भी इंश्योरेन्स की जरुरत होती है, जैसे कि हेल्थ और गंभीर बीमारियों के लिये।

अगर आप ऑफ़िस से आ रहे हैं और किसी दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं या फ़िर कोई बीमारी हो गई जैसे कि पीलिया या कोई और बीमारी जिससे आपको अस्पताल में रहना पड़े, तो मानसिक दबाब के साथ साथ आप आर्थिक दबाब में भी आ जायेंगे, क्योंकि आजकल अस्पताल में जाना मतलब बहुत अधिक मात्रा में धन खर्च होना, क्योंकि आजकल इलाज का खर्च बहुत अधिक हो गया है और अस्पताल भी पाँच सितारा जैसे महंगे हो गये हैं, अगर सामन्य बीमारी है तो कम से कम दो हजार रोजाना और ज्यादा की तो कोई सीमा ही नहीं है।

कब धन को पंख लग जाते हैं अस्पताल में जाते ही पता ही नहीं चलता है। सबसे पहले ये सोचिये क्या आप इस आकस्मिक आपदा खर्च को वहन कर पायेंगे, अगर आप इसका इंश्योरेन्स करवा लेते हैं तो कोई घबराने वाली बात ही नहीं है। थोड़ी प्रीमियम में आप बड़ी राशि का इंश्योरेन्स करवा सकते हैं, जिससे आप आर्थिक रुप से दीवालिया होने से बच सकते हैं। कि अपनी तो सारी बचत एक बीमारी में ही चली गई, सोचिये सोचिये !!

आप अपना खुद का और परिवार का दोनों का हेल्थ इंश्योरेन्स करवा सकते हैं, अगर आपका हेल्थ इंश्योरेन्स आपका नियोक्ता करवा रहा है तब तो आपके लिये कोई चिंता की कोई बात नहीं है, परंतु परिवार का क्या ?

बीमारी कोई दस्तक देकर तो नहीं आती और न ही आकस्मिक राशि के साथ कोई तैयार रहता है, इसके लिये बहुत जरुरी है हेल्थ इंश्योरेन्स। जितना भी खर्चा होगा अस्पताल में ले जाने के पहले, अस्पताल में, अस्पताल से घर जाने के बाद होने वाला इलाज का खर्च, दवाईयों का खर्च सब कुछ हेल्थ इंश्योरेन्स  (मेडिक्लेम) में सम्मिलित होता है।

सामयिक परिवार (फ़ैमिली फ़्लोटर) हेल्थ इंश्योरेन्स लेने से यह फ़ायदा होता है कि पूरी या कुछ बीमित राशि का उपयोग परिवार का किसी भी व्यक्ति के लिये किया जा सकता है।

सोचिये सोचिये और जल्दी से ले लीजिए मेडिक्लेम इंश्योरेन्स । अरे नहीं इसकी प्रीमियम भरने के बाद आप सुरक्षित हैं पर आपको यह रकम वापिस नहीं मिलेगी बस हाँ आप उस बीमित राशि से वर्षभर के लिये सुरक्षित रहेंगे।

नववर्ष में परिवार को सुरक्षित करें और परिवार को तोहफ़ा दें आज ही, जल्दी सोचिये और अमल करें [Secure your family, Think fast ….]

नववर्ष में परिवार को सुरक्षित करें अगर आप ने अभी तक अपने परिवार को सुरक्षित करने की नहीं सोची है तो अब तत्परता से सोचिये और नये साल का तोहफ़ा दीजिये।

परिवार को सुरक्षित कैसे करेंगे इंश्योरेन्स से, जी हाँ आपने बिल्कुल सही पढ़ा है इंश्योरेन्स से। केवल इतना सोचिये अगर कल आप अपने परिवार के साथ न रह पायें तो परिवार कैसे अपना गुजारा करेगा, नहीं ९९% लोगों ने कभी इस बारे में नहीं सोचा है, केवल १% लोगों ने ही इस बारे में सोचा है। जी हाँ बिल्कुल कटु सत्य है यह, जबाब आपको अपने आप से या आसपास के लोगों से पूछ्कर ही पता चल जायेगा कि आप कितने जागरुक हैं अपने परिवार की सुरक्षा के लिये।

अब बहुत से लोग बोलेंगे कि हमने इंश्योरेन्स करवा रखा है तो अब हम इस बारे में बात करते हैं, अगर आपने LIC का इंश्योरेन्स करवा रखा है तो आपके परिवार को कितनी सुरक्षा मिल रही है, अरे देखिये भई पाँच लाख या उससे भी कम या थोड़ी सी ज्यादा, क्यों ?

क्योंकि हम भारतीय जब भी जहाँ भी पैसे लगाते हैं तो यह सोचते हैं कि इससे कितना पैसा वापिस मिलेगा, पर हम मौत जैसे कटु सत्य के बारे में नहीं सोचते हैं, क्योंकि जाने क्यों हम मौत के बारे में सोचना या बात करना पसंद नहीं करते हैं, हम अपने आप को भगवान समझने लगते हैं, कि मैं कोई इतनी जल्दी थोड़े ही मरने वाला हूँ, मेरा प्रश्न है अगर मर गये तो ?

इसके बाद आप अपने परिवार को किस स्थिती में पाते हैं, सोचिये अरे सोचिये, सोचा ?

घबरा गये न कि कुल जमा पूँजी, और इंश्योरेन्स के केवल इतने ही पैसे मिल पायेंगे, जी हाँ, केवल इतने ही कि कुछ २-३ साल का खर्च ही चल पायेगा, पर उसके बाद क्या ?

बच्चों की फ़ीस कौन भरेगा, किराना कौन लायेगा, और ऊपर से ये महँगाई जो कि कम होने का नाम ही नहीं ले रही है। अगर आपके पास कोई सपोर्ट नहीं है जैसे कि घरवाली घर संभालती हो, तो एकदम उसे भी तो मार्केट में एकदम नौकरी नहीं मिलेगी और अगर मिलेगी भी तो कितनी तन्ख्वाह की उम्मीद करेंगे। सोचिये सोचिये ?

जी हाँ, इस नववर्ष के अवसर पर अपने परिवार को अपना इंश्योरेन्स करवाकर उनका भविष्य सुरक्षित कर नववर्ष का तोहफ़ा दीजिये। अरे नहीं मैं कोई बीमा एजेन्ट नहीं हूँ, मैं तो केवल बता रहा हूँ । 🙂

आपकी वार्षिक सैलेरी से कम से कम दस गुना आपका टर्म इंश्योरेन्स होना चाहिये, अगर ५ लाख सालाना सैलेरी है तो कम से कम ५० लाख का इंश्योरेन्स होना चाहिये, कि आपके परिवार के साथ न रहने की स्थिती में कम से कम परिवार ठीक प्रकार से अपना जीवन यापन कर पाये।

ओहो, अब आप भी बोल रहे होंगे कि प्रीमियम तो बतायी ही नहीं ५० लाख की २५ वर्ष की अवधि के  लिये और ३५ वर्ष की उम्र के व्यक्ति के लिये प्रीमियम बनती है सलाना लगभग १५,००० और अभी एगोन रेलीगेयर ने एक नया प्लान बाजार में उतारा है जो कि केवल ओनलाईन ही उपलब्ध है, आई टर्म । जिसकी प्रीमियम लगभग ८५०० रुपये है।

अब भी सोच रहे हैं अरे अपने बीमा एजेन्ट को बुलाईये और उसके झांसे में न आयें कि ulip प्लान ले लें या कोई और जिसमें पैसा वापिस मिले, बोलिये कि मुझे केवल टर्म इश्योरेन्स ही चाहिये, मुझे पैसा वापिस नहीं चाहिये, परिवार को सुरक्षित करिये।

कोई सवाल हो तो टिप्पणी कीजिये, जबाब देने की कोशिश करुँगा।

हिन्दी समाचार पत्र “नवभारत टाईम्स” की आंग्लभाषा के प्रति प्रेम की बानगी देखिये कि पूरा एक पेज ही आंग्लभाषा में शुरु कर दिया…

    आज सुबह हिन्दी समाचार पत्र “नवभारत टाईम्स” जब अपने फ़्लेट का दरवाजा खोल कर उठाया तो कुछ अलग लगा। साईड में एक विज्ञापन टाईप का बक्सा मुँह चिढ़ा रहा था, जिसका शीर्षक था – trendz2day. और क्या लिखा था आप भी पढ़िये –

“बदलते जमाने के साथ निखरती जिंदगी में सबसे खुशगवार महक है नई-नई सुविधाओं से लैस गैजेट्स, टेक्नोलॉजी और ट्रेंड्स की उतनी ही तेजी से बदलती दुनिया। इसी दुनिया की विविधताभरी दिलचस्प झलक अब आपको हम लगातार दिखाते रहेंगे, अपनी नई पहल trendz 2 day के जरिये । चूंकि इस दुनिया की सुविधाजनक भाषा इंग्लिश ही है, इसलिए इस हिस्से का किस्सा भी इंग्लिश में – खास आपके लिए।”

    अब भला इन टाईम्स ग्रुप वालों को कौन समझाये कि भले ही आंग्लभाषा दुनिया की सुविधाजन भाषा है तो क्या हम भी उसे ही अपना लें अपनी मातृभाषा छोड़कर। अगर हिन्दी का समाचार पत्र है तो सभी चीजें केवल हिन्दी भाषियों के लिये ही होनी चाहिये, यहाँ सुविधा का ध्यान नहीं रखना चाहिये। जिसे इस तरह की चीजें पढ़ने का शौक होगा उसके लिये इस प्रकार का बहुत सारी सामग्री मौजूद है “दुनिया की सुविधाजनक भाषा में”। हाँ अगर टाईम्स यही पेज हिन्दी में शुरु करता तो एक सार्थक पहल होती कि हिन्दी भाषियों के लिये “दुनिया की सुविधाजनक भाषा” की सामग्री वह हिन्दी भाषा में उपलब्ध करवाता। शायद इसमें उसे बहुत मेहनत लगती और जो आदमी बेकार बैठे थे उनसे काम नहीं ले पाते और नये आदमियों को काम के लिये लेना नहीं पड़ा हो। पता नहीं क्या सोच है इसके पीछे।

    हिन्दी समाचार पत्र प्रेमियों के लिये तो यह एक तमाचे से कम नहीं है, और मैं इसका विरोध करता हूँ।

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ४२ [चम्पानगरी जाते हुए प्रकृति का सुन्दर चित्रण… ]

    दूसरे दिन ही मैं और शोण दोनों हस्तिनापुर से चल दिये। यात्रा बहुत लम्बी थी इसलिए हमने श्वेत घोड़े लिये। हम दोनों को ही अब अश्वारोहण का अच्छा अभ्यास हो गया था। मुझे तो सब प्राणियों मॆं अश्व बहुत ही अच्छा लगता था। वह कभी नीचे नहीं बैठता है । सोते समय भी वह खड़े-खड़े ही एक पैर के खुर को मोड़कर नींद ले लेता है। अश्वों के सभी स्वाभाव का मैंने बड़ा सूक्ष्म निरीक्षण किया था। कितना ही उच्छश्रंखल क्यों न हो, उसको वश में कैसे किया जाता है, यह मैं अब अच्छी तरह जान गया था। और फ़िर वह हमारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आता हुआ व्यवसाय था। प्रत्येक को अपने व्यवसाय में प्रवीण होना ही चाहिए – संजय काका ने सारथी के रुप में यह जो उपदेश दिया था, उसको मैं कैसे भूल सकता था।

    हम लोग हस्तिनापुर की सीमा से बाहर निकले। वसन्त ऋतु के दिन थे वे। चारों ओर भिन्न-भिन्न रंगों के फ़ूल सुशोभित थे। बावा के वृक्ष छोटे-छोटे पीले फ़ूलों से लदे हुए थे। खैर के वृक्ष हलके लाल फ़ूलों से भरे हुए थे। अंजनी के वृक्षों पर नील कुसुम सुशोभित हो रहे थे। उन समस्त वृक्षों पर प्रकृति-देवता की इतनी कृपादृष्टि देखकर पलाश शायद अत्यधिक क्रुद्ध हो उठा था। उसका सम्पूर्ण शरीर रक्तवर्णी लाल सुमनों से आच्छादित था। यही कारण था कि सभी वृक्षों में वह अकेला ही अत्यधिक आकर्षक दिख रहा था।

    उन समस्त पुष्पों की एक सम्मिश्रित सुगन्ध वातावरण में तैर रही थी। श्येन, क्रौंच, भारद्वाज, कोकिल, कपोत आदि भिन्न-भिन्न प्रकार के पक्षियों के सम्मेलन का तो यह समय था ही। अपने-अपने गीत वे पंचम स्वर में गा रहे थे। वसन्त ! वसन्त का अर्थ है – प्रकृति-देवता की स्वच्छन्द रंगपंचमी ! वसन्त अर्थात एक-दूसरे का हाथ पकड़े खड़े हुए सप्तस्वरों के खिलाड़ियों का कबड्डी-संघ ! वसन्त है – काल के बाड़े में अटका हुआ निसर्ग देवता के अतलसी वस्त्र का एक सुन्दर धागा। अथवा वर्षाऋतु में चंचल वर्षा ने अपनी निरन्तर गिरती धाराओं की उँगलियों से वर्षाऋतु को जो गुदगुदी की थी, उससे हँसी आने के कारण इधर-उधर पैर पटकते समय नीचे गिरा हुआ उसके पैर का सुन्दर नूपुर ! छि:, किसी तरह भी उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। वसन्त तो बस वसन्त ही है!

    निसर्ग देवता के मनोहर रुपों को देखते हुए हम अपनी यात्रा कर रहे थे। रात होने पर समीप ही किसी नगर में ठहर जाते थे। इसी प्रकार आठ दिन बीत गये। अनेक नदियाँ और पर्वत पार कर हम नौवें दिन प्रयाग पहुँचे। प्रयाग ! यहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती इन तीन नदियों का संगम था। यहाँ से चम्पानगरी अब केवल पचीस योजन दूर रह गयी थी।

अपने ग्राहक को पहचानो, एक मजेदार घटना कोका कोला के साथ (Know your customer….)

कोका कोला का एक सेल्समैन अपने मिडिल ईस्ट के काम निराश होकर लौट रहा था।

एक मित्र ने उससे पूछा, “तुम अरब में कोका कोला बेचने में क्यों सफ़ल नहीं हुए ?”

सेल्समैन ने अपने मित्र को समझाया

“जब मैं मिडिल ईस्ट में आया तो मुझे विश्वास था कि मैं अच्छी सेल्स कर पाऊँगा क्योंकि कोका कोला वहाँ कोई जानता ही नहीं था, लेकिन एक समस्या थी कि मैं अरबी भाषा नहीं जानता था। तो मैंने तीन पोस्टरों के माध्यम से अपने संदेश को लोगों तक पहुँचाने की योजना बनाई..”

 image001 image002 image003

पहला पोस्टर : एक आदमी रेगिस्तान की गर्म रेत में थक कर बेहोशी की हालत में पड़ा हुआ है।

दूसरा पोस्टर : अब वह आदमी हमारा कोका कोला पेय पी रहा है।

तीसरा पोस्टर : कोका कोला पीने के बाद अब उसमें ताजगी आ गई है।

और इन तीनों पोस्टरों को जगह जगह चिपका दिया गया।

मित्र बोला, “फ़िर तो तुम्हारा काम बन गया होगा !!”

“क्या खाक काम बन गया था”, सेल्समैन बोला “मुझे यह नहीं पता था कि अरब लोग उलटी और से पढ़ते हैं (Right to Left)”

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ४१ [कर्ण के गुरु और चम्पानगरी जाने की उत्कण्ठा… ]

   बहुत दिन हो गये थे। मैं जब से हस्तिनापुर आया था, तब से केवल एक बार ही चम्पानगरी गया था। वह भी उस समय जब गुरुदेव द्रोण ने अपने शिष्यों की परीक्षा ली थी। उसके बाद पाँच वर्ष बीत गये थे। इच्छा होने पर भी इन पाँच वर्षों में मैं एक भी बार चम्पानगरी को नहीं जा पाया था। क्योंकि यहाँ मैं एक विद्यार्थी के रुप में आया था।

    सौभाग्य से मुझको अपने गुरु बहुत अच्छे मिले थे। जिनको गुरुओं का गुरु कहा जाता है, ऐसे ही थे वे। साक्षात सूर्यदेव मेरे गुरु थे। हस्तिनापुर के अखाड़े में पत्थर के चबूतरे पर खड़े होकर मन ही मन निश्चय कर मैंने उनका शिष्यत्व अंगीकार किया था। उन्होंने भी अबतक मेरे साथ अपने प्रिय शिष्य का सा व्यवहार किया था। छह वर्षों के इस कालखण्ड में उन्होंने कितने दुर्लभ रहस्य मुझको बताये थे, वे किस भाषा में बताते थे, यह तो मैं कह नहीं सकता। परन्तु उन्होंने मुझसे जो कुछ कहा था, वह मैंने तुरन्त ही ग्रहण कर लिया था। क्या नहीं सिखाया था उन्होंने मुझको ! बाणों के दुष्कर प्रक्षेप, द्वन्द्व के कठिन हाथ; घोड़ा, हाथी और ऊँटों की उच्छ्श्रंखल प्रवृत्तियों को वश करने की कलाएँ। सब बातें उन्होंने मेरे कानों में कही थीं। चुपचाप ! मौन-भाषा में।

    प्रतिदिन प्रात: अपनी कोमल किरणों से असंख्य कलियों के मुँदे पलक खोलते हुए वे मुझसे कहते थे, “कर्ण, तुझको भी ऐसा ही बनना चाहिए। अपना सर्वस्व मुक्त-हस्त से जो कोई माँगे उसको देकर अपने सम्पर्क में आने वाले सभी लोगों का जीवन तुमको ऐसे ही खिलाना चाहिए।“

    कितने श्रेष्ठ थे मेरे गुरु ! संसार के किसी गुरु ने अपने शिष्य को इतनी छोटी-छोटी बातों से इतना उदात्त उपदेश कभी क्या दिया है ? अब एक बार चम्पानगरी में जाकर उन गुरु के चरण गंगा के स्वच्छ जल से अवश्य धोने चाहिए। अब मैं गंगामाता नहीं कहता हूँ, गंगा कहता हूँ। क्योंकि शैशवावस्था की श्रद्धा व्यावहारिकता के पाषाण से भोंथरी हो गयी थी। माँ एक ही होती है। जो जन्म देती है और पालन-पोषण करती है वह। नदी तो नदी है। वह माता कैसे हो सकती है ? मेरी माता एक ही थी – राधामाता ! उससे मिले भी बहुत दिन हो गये थे। वह अब मुझको देखेगी तो क्या सोचेगी, मुझको पूरा विश्वास था कि मेरे जाने पर वह सबसे पहले मुझसे यही पूछेगी, “कितना लट गया है रे वसु तू ? और तू गंगा के पानी में तो नहीं गया न कभी ?” क्योंकि पुत्र कितना भी बड़ा क्यों न हो जाये, माता की दृष्टि में वह सदैव बालक ही रहता है। माता ही विश्व में एकमात्र ऐसा व्यक्ति है, जिसके प्रेम को व्यवहार की तुला का बिलकुल ज्ञान ही नहीं होता। वह जानती है अपने पुत्र पर केवल वास्तविक प्रेम करना।

    मैंने शोण को बुलाकर कहा, “शोण ! यात्रा की तैयारी करो। कल चम्पानगरी चलना है।“ उसका चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा। शाल वृक्ष की तरह लम्बे-तड़ंगे होकर अनेक वर्षों के बाद, पहली बार हम चम्पानगरी की ओर जा रहे थे। अपनी जन्मभूमि की ओर ।