All posts by Vivek Rastogi

About Vivek Rastogi

मैं २००६ से हिन्दी ब्लॉगिंग कर रहा हूँ, और वित्त प्रबंधन मेरा प्रिय विषय है। मेरा एक यूट्यूब चैनल भी है जिसे आप https://youtube.com/financialbakwas देख सकते हैं।

राष्ट्रीयकृत बैंकों का हाल

हर बैंक में अधिकतर एक ही सूचना चस्पा होती है प्रिंटर खराब है, पासबुक में एन्ट्री अनिश्चितकाल के लिये बंद है, या अभी बंद है, डिमांड ड्राफ्ट हो, नकदी जमा या नकदी आहरण सभी में लेटलतीफी है, उनके सूचना बोर्ड पर लिखा होता है जो समय कि किस सुविधा के लिये कितना समय बैंक ने ही सुनिश्चित करा है, परंतु वह तो कुछ मायने ही नहीं रखता, इसलिये बैंकों में कुछ ऐसी व्यवस्था होनी चाहिये कि ग्राहक को सुविधा मिले न कि परेशानी हो और अगर कार्य की समय सीमा सुनिश्चित की गई है तो उसका बैंक प्रबंधन को कड़ाई से पालन करवाया जाना चाहिये, नहीं तो ग्राहक से सेवाशुल्क नहीं लिया जाना चाहिये, ये सब केवल राष्ट्रीयकृत बैंकों में ही होता है, प्रायवेट बैंकों में नहीं वो तो ग्राहक को उसी समय में सेवा दे रहे हैं, अर्थात इसका मतलब यह है कि सरकारी तंत्र का असर यहाँ भी है, भगवान जाने ये सब कब ठीक होगा, पर बुरा है राष्ट्रीयकृत बैंकों का हाल …

हमारी रेल संस्कृति

हमारे देश भारत में रेल का महत्व सर्वविदित है, नीचे दर्जे के अफसर से लेकर मंत्रियों संतरियों तक पद की मारामारी होती है अपने प्रभाव के लिये नहीं, उनका उद्देश्य तो सिर्फ धन कमाना है फिर भले ही वह रेलवे पुलिस का अदना सा सिपाही हो या टिकिट चेकर, कलेक्टर हो या फिर कोई बाबू हो या ऊपर ……… कहने की जरुरत नहीं आप खुद ही समझ जाइये आज भी मध्यमवर्गीय समाज इतना सक्षम नहीं हुआ है कि वातानुकुलित कोच में यात्रा कर सके वह तो सामान्य शयनयान में ही यात्रा करता है, फिर भले ही लालूजी ने “गरीब रथ” चला दिये हों, पर फिर भी मध्यमवर्गीय समाज की सोच वही रहेगी, वह भी सोचेगा क्यों आदत बिगाडें भले ही आप आरक्षण करवा लें परंतु आज भी कुछ मार्गों पर दुर्भाग्यपूर्ण स्थिती है कि कोई और ही आपकी सीट पर कब्जा किये मिलेगा, बेचारे टी.सी. का चेहरा देखकर ऐसा लगेगा कि यह तो उसके लिये भी चुनौती है उसके पास अधिकार तो कहने मात्र के लिये हैं टी.सी. की मेहनत और कर्त्तव्यता किसी को नहीं दिखती बस सभी लोग उसकी कमाई को देखते हैं तो अरे भैया कुछ पाने के लिये कुछ खोना तो पडता ही है भ्रष्टाचार व कार्य में अनियमितता तो सरकारी तंत्र का पर्याय बन गई है, और हमारी रेल भी तो सरकारी है रेल विभाग में भ्रष्टाचार के सामान्य दैनिक उदाहरण जो कि लगभग सभी के साथ बीतते हैं …
१. R.P.F. के सिपाही ने एक व्यक्ति को पटरी पार करने के जुर्म में पकडा और कहा मजिस्ट्रेट सजा सुनायेंगे, पर ये क्या सिपाही थाने पहुँचा तो अकेला, क्योंकि वह व्यक्ति तो इनकी जेब गर्म करके जा चुका था
२. रेल विभाग की खानपान सेवा चाय लीजिये ५ रु., खाना ३५ रु., चिप्स १२ रु., कोल्डड्रिंक २२ रु., की और टैरिफ कार्ड मंगाओ तो पता चलता है कि पेंट्री मैनेजर आता है और कहता है साब बच्चे से गलती हो गई क्योंकि सभी में २‍ या ३ रु. तक ज्यादा ले रहे हैं अच्छी कमाई करते हैं ये खानपान वाले भी
३. शादी का सीजन है और आरक्षण उपलब्ध नहीं है, वैसे तो आफ सीजन में भी नहीं मिलता, अगर हम आरक्षण खिडकी पर पूछेंगे तो जबाब मिलेगा वेटिंग है और वहीं खडे एजेन्ट से कहेंगे तो वह नजरों में आपको तोलकर आपकी कीमत बता देगा जो कि १०० से ८०० रु. तक होती है पर ३०० रुपये शायद सबका फिक्स रेट है और आपको आरक्षित सीट का टिकट मिल जायेगा भगवान जाने रेल विभाग ने कैसा साफ्टवेयर बनवाया है कि उसमें भी सेटिंग है
४. रेल का जनरल टिकट ले लिया और फिर पहुँच गये सीधे रेल पर तो आरक्षण के लिये मिलिये टी.सी. महोदय से, वो कहेंगे सीजन चल रहा है, सेवा पानी करना पड़ेगी और बेचारे वेटिंग वाले वेट करते रह जाते हैं अगला आदमी सेवापानी करके सीट पर काबिज हो जाता है
यह तो महज कुछ ही उदाहरण हैं, हमारी रेल अगर समय पर आ जाये तो गजब हो जाये, आती है हमेशा लेट और अब तो आदर हो गई है, और तो और खुद रेल विभाग को नहीं पता होता कि कितनी लेट है २० मिनिट कहते हैं आती है २घंटे में
हे भगवान मैं थक गया लिखते लिखते पर रेल की महिमा ऐसी है कि खत्म ही नहीं होती, यही तो है हमारी रेल संस्कृति …….

जय हो बांके बिहारी की

अभी मेरा अवकाश चल रहा है तो हम घूम फिर आए मथुरा, वृंदावन और भी बहुत सी जगह…. वृंदावन में कृष्णजी की ९ प्रगट मूर्तियाँ हैं और महत्वपूर्ण मंदिर है बांके बिहारीजी का जिस दिन मैं गया था उस दिन बहुत ही आकर्षक फूलों का बंगला बनाया गया था, वहाँ से तो वापस आने की इच्छा ही नहीं होती, क्योंकि ठाकुरजी की मूर्ति है ही इतनी प्यारी कहते हैं जो आये वृंदावनधाम उसके हो जाएं पूरे काम वृंदावन में हर मंदिर में ताली बजाकर हँसते हैं इससे हमेशा जीवन में खुशी रहती है वृंदावन में मन को शांति मिलती है तो आत्मा को संतुष्टि कहते हैं आज भी कृष्णजी वहाँ पर वास करते हैं बाकी है अभी ……

अनुगूँज १८ :-: मेरे जीवन में धर्म का महत्व

पहली कोशिश कर रहा हूँ आप सभी महारथियों के बीच में धर्म एक बहुत बड़ा विषय है पर आज सभी लोग अपने अपने स्वार्थानुसार परिभाषित करते हैं मेरे लिये तो धर्म ऐसा है जैसे कि मेरी श्वास शायद बिना धर्म के जीवन नहीं होता मेरे धर्म की मेरी परिभाषा यही है

भैया गूगल माइक्रोसाफ्ट का सर्च इंजन कब से हो गया ?

आज (12.04.2006) दैनिक भास्कर में http://www.bhaskar.com/defaults/ editorial_newshindi2.php न्यूज ट्रेक में प्रशांत दीक्षित जी जो कि पूर्व एअर कमोडोर हैं का आलेख पढ़ा, गूगल की तस्वीरों से सुरक्षा को कितना खतरा ? आलेख अच्छा लिखने का प्रयत्न किया गया है किंतु इसमें सबसे बड़ी भूल शुरुआत में ही की गई है कि गूगल को माइक्रोसाफ्ट का सर्च इंजन बताया गया है भैया गलती सुधार लो नहीं तो गूगल वाले भैया मिसाईल छोड़ देंगे

४ ही तो दबा रहा हूँ

एक दिन फोन आया कि विवेक भाई आपके साफ्टवेयर में एक अकाउँट की इनक्वायरी करनी है पर कुछ समस्या आ रही है, हमने कहा तो हम जैसा बताते हैं वैसा आप करते जाइये, हम बताते गये वो करते गये बस एक जगह अटक गये, हम कह रहे थे कि ४ दबाओ (Press 4) और वो कहते हाँ दबा दिया पर कुछ हो नहीं रहा जब १५ ‍- २० मिनिट हो गये तो हमने पूछा कि सर एक बात बताओ ये बारबार मुझे फोन पर बटन दबाने की आवाज आ रही है ये कैसे आ रही है क्या कोई रिडायल कर रहा है, वो बड़ी मासूमियत से बोले आप ही तो कह रहे हैं कि ४ दबाओ ………………….. ::>>

जरा बाहर आकर अंदर जाइये

बहुत दिनों के बाद लिख रहा हूँ अब अपना पुराना टूटा मतलब छूटा हुआ ब्लाग पूरा करता हूँ
जरा बाहर आकर अंदर जाइये
हमारे पास फोन आया कि कुछ समस्या हो गई है हमारे सोफ्टवेयर में तो सामान्यत:हम कहते हैं कि कृपया बाहर आकर अंदर जाइये इसका मतलब होता है कि लाँग आउट होकर लोगिन करें यही समाधान हमने दे दिया पर हमारे वो ग्यानवान यूजर कर ही नहीं पा रहे, हम भी परेशान कि बाहर आकर अंदर नहीं जा पा रहे हैं क्या बात है, तब हमारे सब्र का बाँध टूटा ओर हम खुद ही पहँच गये व कहा अब हमारे सामने जरा बाहर आकर अंदर जाइये तो भाई लोगों मेरे को चक्कर आने लगे क्योंकि वो साहब मेन गेट के शटर से बाहर जाकर अंदर आये और बोले देखो अब भी नहीं हो रहा है !!!!

नये और अशिक्षित कम्पयूटर उपयोगकर्ताओं के कारनामे

नये और अशिक्षित (so called trained computer operateor) कम्पयूटर उपयोगकर्ता क्या कारनामे करते हैं, उन्हें क्या कहो और वो क्या करते हैं । उसकी कुछ बानगियाँ आपके सामने प्रस्तुत करता हूँ पर उससे पहले उन उपयोगकर्ताओं से उनके गुप्त रहस्यों को उजागर करने की माफी चाहता हूँ, कृपया बुरा नहीं माने और माने तो भी क्या …. ये तो मेरा Hindi Blog है मैं तो लिखूँगा ।

ये की तो कीबोर्ड पर मिलती ही नहीं है।
एक महाशय का फोन आया कि विवेक भाई एक की तो कीबोर्ड पर मिलती ही नहीं है कम से कम दसियों बार कीबोर्ड देख चुका हूँ और आपका साफ्टवेयर आदेश कर रहा है कि वही की दबानी है, मैंने उनसे पूछा सर बताओ तो सही कि कौन सी की दबाने का आदेश आपको मेरा साफ्टवेयर दे रहा है, तब वो महाशय बोले “प्रेस एनी की टू कन्टीनयू” “Press any key to continue”।

माऊस का उपयोग
एक नये क्लाईंट ने हमारा साफ्टवेयर उपयोग करना शुरु किया हमारी टीम ने पूरे स्टाफ को साफ्टवेयर उपयोग करने संबंधित जानकारी दी और उसके बाद केवल फोन पर तकनीकी सहयोग देते हैं एक बार हमारे पास फोन आया कि फाईल सेव हो गई है अब उसे देखेंगे कैसे, तो हमने उनसे कहा कि सर् “माई कम्प्यूटर” ( My Computer) पर माऊस ले जाकर डबल क्लिक करें, वो बोले ठीक है फिर
उसके बाद, हमने कहा पहले क्लिक तो कीजिये और बताइये स्क्रीन पर क्या दिख रहा है तो वो बोले कि बस एक मिनिट …… और हम उनके एक मिनिट का इंतजार करने लगे जब पाँच मिनिट से ऊपर हो गये तो हमने पूछा क्या हुआ, तो जबाब आया ये “माई कम्प्यूटर” ( My Computer) कहाँ मिलेगा, हमने कहा सामने डेस्कटाप पर उल्टे हाथ की तरफ मिलेगा तो वे बोले ह‍ मिल गया हमने कहा अब डबल क्लिक करें वे बोले ठीक हैं फिर १ मिनिट २ मिनिट … ६ मिनिट हो गये तो फिर हमने पूछा अब क्या हुआ, उनका जबाब आया “कुछ हो नहीं रहा है” हमने कहा ऐसा तो हो ही नहीं सकता वो बोले नहीं नहीं वाकई में कुछ नहीं हो रहा है। फिर हमने पूछा आपने क्या करा बोले जैसा आपने कहा “माई कम्प्यूटर” ( My Computer) पर माऊस ले जाकर डबल क्लिक करें” तो हम परेशान कि ऐसा कैसे हो सकता है मैने पूछा माऊस कहाँ रखा है वो बोले स्क्रीन पर डेस्कटाप पर “माई कम्प्यूटर” ( My Computer) के ऊपर रख कर क्लिक कर रहा हूँ।…… हा हा हा हा हा हा ….

नया चिठ्ठाकार

जय महाकाल बाबा हिन्दी के जालस्थानों पर जा जाकर चिठ्ठाकारों के चिठ्ठे पढ़ पढ़कर मेरा सोया हुआ साहित्यिक कीड़ा जागृत हो गया और मैंने सोचा कि चलो अपनी लेख और कविताएँ कोई कोई अखबार कभी कभी ही छापता था अब अपना जालस्थान ब्लागर डॉट कॉम की कृपा से बना लिया है तो अब कुछ न कुछ लिखकर खुद ही छापा जा सकता है। हनुमान जी की कृपा से तख्ती भी जालस्थान से उठा लिया है, उठा लिया है मतलब चोरी नहीं की हनुमान जी ने कहा वत्स इसका एक संस्करण तुम भी रख सकते हो तो हमने हनुमान जी के आदेश का पालन कर महाकाल बाबा का आशीर्वाद लिया और शुरु होने जा रहे हैं। वैसे तो चिठ्ठाकारी जगत में हम बिल्कुल नये प्राणी हैं पर अगर आप सभी चिठ्ठाकारों का सहयोग रहा तो हम हमारी चिठ्ठाकारी कला को उत्कृष्ट कर सकेंगे।

छाप

दो दोस्त एक रेगिस्तान से गुजर रहे थे। बीच रास्ते में उनके बीच बहस छिड़ गई और पहले दोस्त ने दूसरे को थप्पड़ लगा दिया। जिसे थप्पड़ पड़ा उसने बिना कुछ कहे रेत पर लिखा, आज मेरे सबसे अच्छे दोस्त ने मुझे थप्पड़ मारा। ऐसा लिखकर वे दोनों साथ चल दिए। रास्ते में नदी आई, दूसरा दोस्त उसमें नहाने के लिए उतरा और डूबने लगा। पहले दोस्त ने तुरंत नदी में कूद कर उसकी जान बचा ली। इस बार उस दोस्त ने पत्थर पर लिखा, आज मेरे सबसे अच्छे दोस्त ने मेरी जान बचाई। पहले ने उससे रेत और पत्थर पर लिखने का कारण पूछा तो उसने जवाब दिया, जब कोई तकलीफ पहुँचाए तो उसे रेत पर लिखना चाहिए, ताकि क्षमा की हवा उसे मिटा सके लेकिन यदि कोई अच्छा करे तो उसे पत्थर पर लिखना चाहिए, जिससे कोई भी उस छाप को मिटा न सके।
दुख भुलाना और सुख को याद रखना, खुद अपने हाथ में है।