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शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद

(२) लक्षणा

आचार्य मम्मट ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘काव्य-प्रकाश’ में लक्षणा की व्याख्या इस प्रकार की है –

’मुख्यार्थबाधेतद्योगे रूढ़ितोऽथ प्रयोजनात ।

अन्योर्थो लक्ष्यते यत्सा लक्षणारोपिता क्रिया॥’

अर्थ यह हुआ – मुख्यार्थ में बाधा होने पर रूढि या प्रयोजन के आधार पर अभिधेयार्थ से सम्बन्धित अन्य अर्थ को व्यक्त करने वाली शक्ति लक्षणा शक्ति कहलाती है। एक और प्रसिद्ध विद्वान ने लक्षणा के लक्षण में यही बात कही है –

‘मुख्यार्थबाधे तद्युक्तो ययाऽन्योऽर्थ: प्रतीयते।

रूढ़े प्रयोजनाद्वासौ लक्षणा शक्तिरर्पिता॥’

अर्थात – मुख्यार्थ मे ंबाधा होने पर रूढ़ि या प्रयोजन को लेकर जिस शक्ति द्वारा मुख्यार्थ से सम्बन्धित अन्य अर्थ का बोध हो उसे लक्षणा शक्ति कह सकते हैं। प्रसिद्ध आचार्य का कथन है कि लक्षणा में वक्ता के तात्पर्य को ही प्रधानता दी जाती है। लक्षणा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों ने तीन प्रमुख कारण बताये हैं –

(१) मुख्यार्थ में बाधा,

(२) मुख्यार्थ में कुछ-न-कुछ सम्बन्ध और

(३) रूढ़ि या प्रयोजन द्वारा अन्य अर्थ का बोध

(१) जब शब्दों के वाच्यार्थ से वांछित अर्थ की उपलब्धि न हो तो मुख्यार्थ में बाधा मानी जायेगी। उदाहरणार्थ – यदि कहा जाये कि ‘घनश्याम गधा है’ तो इसमें पशु रूप गधा के मुख्यार्थ में बाधा है, क्योंकि घनश्याम गधे के समान चार पैर वाली आकृति वाला नहीं है।

(२) मुख्यार्थ में बाधा होने पर जो अन्य अर्थ लगाया जाता है उसका मुख्यार्थ से थोड़ा-बहुत सम्बन्ध अवश्य होता है। जैसे – घनश्याम यद्यपि गधे के समान आकृति वाला नहीं है, लेकिन एक बात में सम्बन्ध अवश्य है कि उसकी मूर्खता गधे से समानता रखती है अत: इस मुख्यार्थ में किंचित सम्बन्ध अवश्य है।

(३) ‘गधा’ मूर्खता के लिये रूढ़ हो गया है, इसलिए ‘मूर्खता’ प्रयोजन के लिए ‘गधा’ शब्द का प्रयोग किया जाता है।

लक्षणा के भेद – आचार्यों ने लक्षणा के अनेक भेद माने हैं। लक्षणा के प्रमुख भेद निम्न प्रकार हैं –

लक्षणा

(१) रूढ़ि –

गौणी

शुद्धा

(२) प्रयोजनवती

गौणी

          सारोपा

          साध्यवसाना

शुद्धा

           लक्षण लक्षणा ( जहत स्वार्था)

                    सारोपा

                    साध्यवसाना

           उपादान लक्षणा (अजहत स्वार्था)

                     सरोपा

                    साध्यवसाना

पहले के भाग यहाँ पढ़ सकते हैं –

“रस अलंकार पिंगल [रस, अलंकार, छन्द काव्यदोष एवं शब्द शक्ति का सम्यक विवेचन]”

काव्य में शब्द शक्ति का महत्व – रस अलंकार पिंगल

शब्द शक्ति क्या है ? रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 1 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा– 2 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 3 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (३) व्यंजना – 1 – रस अलंकार पिंगल

शब्द शक्ति क्या है ? रस अलंकार पिंगल

शब्द शक्ति क्या है ? – बहुत पहले ही सुप्रसिद्ध आचार्य भामह ने ‘शब्दार्थों काव्यम’ कहकर काव्य में शब्द और अर्थ की महत्ता तथा उनके परस्पर सम्बन्ध में प्रकाश डाला था। वास्तव में शब्द और अर्थ भिन्न-भिन्न नहीं हैं। श्रेष्ठ काव्य में शब्द और अर्थ की सत्ता अभिन्न रहती है। महाकवि तुलसीदास ने शब्द और अर्थ की इसी अभीन्नता पर निम्न पंक्तियों में बड़ा सुन्दर संकेत किया है –

‘गिरा अर्थ जल-बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न ।’

वास्तव में शब्द और अर्थ मिलकर ही काव्य की सृष्टि करते हैं। दोनों में परस्पर बहुत दृढ़ सम्बन्ध है और इस सम्बन्ध को जिस शक्ति द्वारा जाना जा सकते हैं, उसे ही ‘शब्द-शक्ति’ कहते हैं। चूंकि काव्य में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ से ही काव्य बोधगम्य होता है, अत: शब्द के अर्थ को समझने में सहायक-शक्ति ही ‘शब्द-शक्ति’ कहलाती है।

शब्द-शक्ति के भेद – शब्द-शक्ति के तीन भेद माने जाते हैं –

(१) शक्ति, (२) लक्षणा और (३) व्यंजना ।

एक अन्य विद्वान ने भी शब्द-शक्ति के तीन भेद – (१) अभिधा, (२) लक्षणा और (३) व्यंजना – माने हैं। प्राय: सभी आचार्य शब्द-शक्ति के उपर्युक्त तीन भेद ही मानते हैं।

(१) अभिधा

अभिधा शक्ति द्वारा शब्दों के मुख्यार्थ अथवा अप्रत्यक्ष संकेतिक अर्थ का बोध होता है। एक विद्वान अभिधा की व्याख्या इस प्रकार करते हैं –

‘संक्तितार्थस्य वोधनार्दाग्रमाभिधा ।’

अर्थात साक्षात सांकेतिक अर्थ की बोध शक्ति को ‘अभिधा’ कहा जाता है। साक्षात सांकेतिक अर्थ से तात्पर्य सामान्यत: लोक में प्रसिद्ध कोशसम्मत अर्थ से है। लोग अथवा कोश में एक शब्द के एक से अधिक अर्थ भी प्रचलित होते हैं, उन सबको वाच्यार्थ (अभिधा-युक्त) कहा जाता है। एक से अधिक अर्थ वाले शब्द का कौन-सा अर्थ लिया जायेगा, यह प्रसंग पर निर्भर करता है। जैसे –

‘कनक कनक ते सौगुनी, मादकता अधिकाय।

वा खाये बौराय जग या पाये बौराय ॥’

इन पंक्तियों में ‘कनक’ (धतुरा), कनक (सोना), मादकता (नशा आदि) सभी शब्दों का कोश-सम्मत एवं लोक में प्रचलित अर्थ लिया जाता है, इसीलिए यहाँ पर अभिधा शक्ति मानी जायेगी। अभिधा शक्ति से युक्त बाधक शब्द के तीन भेद आचार्य नागेश आदि विद्वानों ने माने हैं –

(१) रूढ़ि शब्द,

(२) यौगिक शब्द और

(३) योगारूढ़ि शब्द ।

१ – रूढ़ियुक्त शब्द वे हैं जिनसे पूरे शब्द से केवल एक अर्थ का बोध होता हो। इनके अवयव नहीं किये जा सकते, वे व्युत्पत्ति रहित और अभेद्य होते हैं। जैसे पैर, घोड़ा आदि ।

२ – यौगिक शब्दों का प्रकृति और अवयवों की सहायता से अर्थ का बोध होता है। जैसे – ‘भूपति’ शब्द में ‘भू’ और ‘पति’ दो अवयव हैं, ‘भू’ अर्थात पृथ्वी और ‘पति’ अर्थात स्वामी यानि कि पृथ्वी का स्वामी ‘राजा’ अर्थ हुआ। इसी प्रकार हिमकर, जलधर आदि शब्द बने हुए हैं।

३ – योगारूढ़ि शब्दों में यौगिक शब्द के समान अवयवों के समुदाय से अर्थ का बोध होता है लेकिन ये शब्द यौगिक होते हुए भी रूढ़ि शब्दों की भांति एक विशेष अर्थ के लिए प्रसिद्ध हो जाते हैं। जैसे – ‘गिरिधर’ ‘गिरि’ और ‘धर’ दो अवयवों के मिश्रण से बना यौगिक शब्द है। लेकिन इसको प्रत्येक गिरि धारण करने वाले के लिये प्रयोग न करके केवल भगवान श्रीकृष्ण के अर्थ में ही प्रयुक्त किया जाता है और श्रीकृष्ण के अर्थ में ही यह शब्द रूढ़ हो गया है। पंकज, वारिज आदि शब्द इसके उदाहरण हैं।

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“रस अलंकार पिंगल [रस, अलंकार, छन्द काव्यदोष एवं शब्द शक्ति का सम्यक विवेचन]”

काव्य में शब्द शक्ति का महत्व – रस अलंकार पिंगल

शब्द शक्ति क्या है ? रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 1 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा– 2 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 3 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (३) व्यंजना – 1 – रस अलंकार पिंगल

काव्य में शब्द शक्ति का महत्व – रस अलंकार पिंगल

काव्य में शब्द शक्ति का महत्व –

काव्य में कवि अपने भावों की अभिव्यक्ति करता है और भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम “भाषा” होती है। अत: काव्य में भाषा का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। पाश्चात्य साहित्यशास्त्री एफ़. आर. लेबिस ने भाषा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए एक स्थान पर लिखा है –

‘Literature is not merely in a language but of a language.’

अर्थात काव्य भाषा में नहीं होता अपितु भाषा का ही होता है। भारतीय साहित्यशास्त्रियों ने इसलिये भाषा को काव्य का शरीर माना है, अर्थात जिस प्रकार आत्मा बिना शरीर के अस्तित्वहीन है, उसी प्रकार बिना भाषा के काव्य का रसानन्द नहीं हो सकता । इसलिए एक पाश्चात्य विद्वान ने अपनी काव्य की परिभाषा में सुन्दर शब्दों के सुव्यवस्थित रूप को ही काव्य मान लिया है –

‘Poetry is the best words in the best order’.

कवि भावों के प्रकाशन के लिए कुछ शब्दों का चयन करता है और उसके शब्द-चयन का आधार यही रहता है कि वह ऐसे शब्दों का चयन करे जो उसके भावों को पूर्णतया पाठक के समक्ष व्यक्त कर दे और उसके लिए उसे शब्दों में निहित अर्थ के मर्म से अभिज्ञ होना आवश्यक है। एक ही अर्थ वाले कई शब्द भाषा में होते हैं और एक ही शब्द के कई अर्थ भी प्रचलित होते हैं अत: किस शब्द को अभीष्ट अर्थ की अभिव्यक्ति के लिये प्रयुक्त किया जाये, ताकि पाठक उस अर्थ को ग्रहण कर पूर्णतया भावमग्न हो जाये – यह कवि की कुशल प्रतिभा पर निर्भर करता है और इसके लिये कवि को शब्द की शक्तियों से पूर्णतया परिचित होना आवश्यक है। शब्दों के अर्थ से ही काव्य बोधगम्य होता है तथा शब्द और अर्थ के सम्बन्ध को ही शब्द-शक्ति कहा जाता है।

अत: बिना शब्द-शक्ति की जानकारी के न तो कवि ही अपने भावों को अच्छी तरह व्यक्त कर सकता है और न ही पाठक पूर्ण रूप से काव्यानन्द ग्रहण कर सकता है। प्रसिद्ध भारतीय काव्य-शास्त्री का कथन है – शब्द के द्वारा अर्थ-बोध तभी होता है, जब हम ‘वृत्ति’ ज्ञान से पूर्ण रूप से अवगत होते हैं, अत: अमुक शब्द का अमुक स्थान पर क्या अर्थ है – यह ‘शब्द-वृत्ति’ का जानकार ही समझ सकता है। यहाँ पर विद्वान ने ‘शक्ति’ शब्द के स्थान पर यहाँ ‘वृत्ति’ शब्द का प्रयोग किया गया है जो उसका समानार्थी है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि शब्द शक्ति के अध्ययन के बिना काव्य का अध्ययन अपूर्ण है, अत: साहित्य के अध्येता के लिये शब्द शक्ति की जानकारी आवश्यक है ।

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“रस अलंकार पिंगल [रस, अलंकार, छन्द काव्यदोष एवं शब्द शक्ति का सम्यक विवेचन]”

काव्य में शब्द शक्ति का महत्व – रस अलंकार पिंगल

शब्द शक्ति क्या है ? रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 1 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा– 2 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 3 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (३) व्यंजना – 1 – रस अलंकार पिंगल

“रस अलंकार पिंगल [रस, अलंकार, छन्द काव्यदोष एवं शब्द शक्ति का सम्यक विवेचन]”

इस बार के सफ़र में हम अपने साथ आदत के मुताबिक फ़िर कुछ किताबें लेकर चले, इस बार सबसे पहली पुस्तक पढ़नी शुरू की है “रस अलंकार पिंगल [रस, अलंकार, छन्द काव्यदोष एवं शब्द शक्ति का सम्यक विवेचन]” और लेखक हैं डॉ. शम्भुनाथ पाण्डेय।
हमने सोचा कि हिन्दी साहित्य की बारीकियों को पढ़े हुए वाकई बहुत दिन हो गये हैं, यह किताब मैंने वर्षों पहले पढ़ी थी, अपने महाविद्यालयीन पाठ्यक्रम को अच्छे से समझने के लिये, फ़िर इसके नये नये संवर्धित संस्करण आते रहे, और कुछ वर्षों पहले इसका हमने १७ वां संस्करण लिया था, इस बार फ़िर सोचा कि अपने हिन्दी के ज्ञान को थोड़ा समृद्ध कर लिया जाये।
काम में व्यस्तता अभी जेद्दाह में कुछ ज्यादा ही है, इसी कारण ब्लॉग, फ़ेसबुक और ट्विटर से दूर ही हैं, क्योंकि समय ही नहीं है, सामाजिक नेटवर्क से जुड़ने के लिये।
इस पुस्तक की भूमिका में शम्भुनाथ जी लिखते हैं, यह लघु प्रयास है, रस-अलंकार तथा पिंगल का अध्ययन शास्त्रीय विषय है; अस्तु इस बात का दावा कोई नहीं कर सकता कि विवेचन सर्वांगपूर्ण विवादों-परि तथा अन्तिम ओगा। प्रस्तुत पुस्तक में शास्त्रीय पारिभाषिक शब्दावली के स्थान पर सरल, बोधगम्य भाषा का प्रयोग किया गया है जिससे विद्यार्थियों को विषय क्लिष्ट तथा नीरस न प्रतीत हो और थोड़े ही परिश्रम में समझ में आ जाये।
अति अपार जे सरित वर, जो नृप सेतु कराहि।
चढ़ि पिपीलिका हू परम लघु, बिनु श्रम पारहि जाहि॥
आगे अभी कुछ दिन हिन्दी के ऊपर ही लिखने का विचार है जो कि इसी किताब से उदघृत होगा।
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“रस अलंकार पिंगल [रस, अलंकार, छन्द काव्यदोष एवं शब्द शक्ति का सम्यक विवेचन]”

काव्य में शब्द शक्ति का महत्व – रस अलंकार पिंगल

शब्द शक्ति क्या है ? रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 1 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा– 2 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 3 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (३) व्यंजना – 1 – रस अलंकार पिंगल

छुट्टियों के बाद का अकेलापन (Feeling alone after vacations..)

छुट्टियाँ खत्म हो गईं, घर से आ गये, वहाँ ज्यादातर वक्त परिवार के साथ बीता कुछ ही दोस्तों से मिल पाये, कुछ दोस्तों की बड़ी बड़ी शिकायतें भी मिलीं, परंतु प्राथमिकता तो हमें खुद ही निश्चित करनी होती है, और परिवार ही प्राथमिक होता है।
घर पर माता पिता के साथ रहना अपने आप में उम्र के इस ढ़लान पर एक अलग ही तरह का अनुभव है, अब परिवार का महत्व इतनी दूर रहने के कारण   और उम्र बड़ने के कारण पता लगने लगा है।
जब घर पर थे तो बस परिवार के बीच रहकर परिवार में ही बातचीत, हँसी ठिठोली हुआ करती थी, कैसे इतना सारा समय निकल गया पता ही नहीं चला। मैं लगभग ३-४ किताबें ले गया था पढ़ने के लिये परंतु वे सारी किताबें बिना खुले ही वापिस आ गईं।
अकेलापन
परिवार में रहने से जख्मों पर घाव भर जाते हैं और एक असीम सुख प्राप्ति का अनुभव होता है। परिवार में सदस्य भले ही बुजुर्ग हो या नवागत सबसे अच्छे तरह से मिले और उनके साथ बैठकर बातचीत हुई।
हमें नौकरी के चक्कर में घर से दूर रहना पड़ता है, इससे उपजा मानसिक एकाकीपन परिवार में ही भरा जा सकता है। परिवार मतलब पूर्ण परिवार, केवल एकल परिवार नहीं।
अब घर परिवार से वापिस आ गये हैं, छुट्टियाँ खत्म हो चुकी हैं, वापिस अपने रोजमर्रा की जिंदगी में वापसी हो चुकी है, यहाँ आकर अब अजीब तरह का अकेलापन लगने लगा है। ऐसा लगता है कि हर चीज खाने दौड़ रही है, किसी से ज्यादा बात करने की इच्छा नहीं होती, खैर यह तो मानवीय प्रवृत्ति है। पर इस बार वाकई ये अकेलापन दुश्कर है।
मन अभी भी सुप्तावस्था में है अब चेतनता को जगाया जा रहा है ।

नियम का पालन और पहरेदार

नियम एक ऐसी चीज है जो हर व्यक्ति को पसंद होती है, बस उसकी परिभाषा सबकी अपनी अलग होती है। सब अपनी पसंद से नियम को अपने अनुकूल बना लेते हैं और दूसरों पर थोपने की कोशिश करते हैं। सरकार इन्हीं नियम को कानून का रूप देती है और नियम पालने के लिये पहरेदार भी बैठा देती है।

सरकार की देखा देखी हरेक जगह नियम बनाये गये और उन पर पहरेदार भी लगा दिये गये परंतु कभी आम आदमी से उन नियम के बारे में पूछने की जहमत नहीं उठाई गई, क्या वाकई आम आदमी उन नियमों का पालन करना चाहता है या नहीं ।

नियम तोड़कर भागने की प्रवृत्ति ज्यादा देखने में आती है, कोई भी आदमी नियम तोड़कर खुद पहरेदार के पास नहीं जायेगा, बल्कि पहरेदार को उस नियम तोड़कर  भागने वाले व्यक्ति को ढूँढ़ना होगा, अगर सभी नियम का पालन करने लगे तो पहरेदार की आवश्यकता ही खत्म हो जायेगी।

हो सकता है जो आपका या मेरा मन नियम मानता हो परंतु कानून उस नियम को बुरा मानता हो तो अधिकतर कानून के नियम मानना चाहिये और जो नियम बुरे लगते हों, कोशिश करना चाहिये उन नियमों को मानने की नहीं तो उन कानूनों को तोड़कर पहरेदारों से बचना चाहिये।

बचना भी एक कला है, कुछ लोग इतने माहिर होते हैं कि नियम भी तोड़ते हैं और ऊपर से दादागिरी भी करते हैं, उल्टा चोर कोतवाल को डांटे, परंतु जब तक अनुभव ना हो, इन चीजों को आजमाना नहीं चाहिये।

खैर यह बात और है कि कुछ लोग नियम तोड़ने में ही अपनी हेकड़ी समझते हैं, और नियम तोड़ना अपनी शान याने कि कानून को अपने हाथ में लेना। तो ऐसे लोग मानसिक रूप से विकृत होते हैं, और कुछ लोग होते हैं जो समय और परिस्थितियों के अनुसार नियम का पालन करते हैं, अगर अन्य लोग हैं तो नियम का पालन किया जायेगा नहीं तो नियम उनके लिये कोई मायने नहीं रखता। तो ऐसे लोग अवसरवादी कहलाते हैं और कभी खुदा न खास्ता किसी पहरेदार ने पकड़ भी लिया तो इनकी घिग्गी बँध जाती है, मिल गई इज्जत मिट्टी में।

नियम बनते ही लोग नियम को तोड़ने के रास्ते ढूँढ़ लेते हैं और नियम को कानूनन तरीके से तोड़ते हैं। हमारे यहाँ कुछ लोग हैं जो कि खुद को नियम के ऊपर समझते हैं और पहरेदार उनके लिये नियम को शिथिल कर देते हैं, यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। नियम सबके लिये एक होना चाहिये और पहरेदारों को इसके प्रति सतर्क रहना चाहिये।

पहरेदार चाहे कितनी कोशिश कर लें, नियम तो तब तक टूटते रहेंगे जब तक कि नियम का पालन करने वाले नियम को ना मानें, तो पहरेदार और नियम पालने वालों को संस्कारित होना होगा। किसी एक के सुधरने से बात नहीं बनेगी।

नियम तोड़ने पर सजा का कड़ा प्रावधान होता है और नियम लागू करने वालों को यह सुनिश्चित करना चाहिये कि वे बिना किसी दबाब के नियम को सख्ती से लागू करें, फ़िर वह राजा हो या रंक।

दादी माँ की तिरुवातिरा त्यौहार की (तमिल) कहानी

आज रविवार को ऑफ़िस के लिये निकले तो अपने नियत समय पर ही निकले परंतु ट्राफ़िक ना होने की वजह से थोड़ा जल्दी ऑफ़िस पहुँच लिये। ऑफ़िस पहुँचे तो ऐसे ही बात हो रही थी कि एक टीममेट जो कि तमिलनाडु से है बोले कि आज तो तिरुवातिरा त्यौहार है। हमने कम से कम ३-४ बार पूछा तब जाकर नाम समझ में आया। साधारणतया: हर बार यही होता है क्योंकि उनका उच्चारण और हमारा उच्चारण बहुत ही अलग होता है।
अब हमने पूछा कि तिरुवातिरा त्यौहार क्या होता है, तो हमारे टीम के सदस्य ने कहा मेरी दादी ने इसके बारे में कहानी सुनाई थी वह सुनाती हूँ, हम भी ध्यान से सुनने लगे।
एक बार एक राज्य था जो कि कावेरी नदी के किनारे था और वहाँ बाढ़ आ गई, तो उस राज्य के राजा ने अपनी प्रजा को आदेश दिया कि सभी घरों से कम से कम एक व्यक्ति नदी के किनारे रेत को इस तरह से लगाया जाये कि बाढ़ का पानी राज्य में ना आने पाये। और जो राजा का आदेश नहीं मानेगा वह दंड का भागी होगा। सभी घरों से एक एक व्यक्ति इस काम में लग गये। उसी राज्य में एक बुढ़िया रहती थी जो कि मिठाई बनाकर बेचकर अपना गुजारा करती थी और उसका कोई बेटा भी नहीं था, वह सोच में पड़ गई कि क्या किया जाये। मेरे बस में रेत को नदी के किनारे लगाना है नहीं और मेरे घर में कोई भी नहीं है, शाम को मुझे दंड मिलना निश्चित है।
तभी बुढ़िया ने अपने आराध्य देव शिवजी का ध्यान किया और उनकी पूजा करने लगी और साथ ही साथ दंड की भी चिंता कर रही थी, तो शिवजी एक गड़रिये के भेष बनाकर बुढ़िया माँ के सामने प्रकट हुए और कहा कि बुढ़िया माँ मैं तुम्हारा काम कर सकता हूँ पर उसके बदले में मुझे क्या मिलेगा, तो बुढ़िया ने कहा कि मेरे पास तो रूपये पैसे नहीं हैं, मेरे पास तो केवल मिठाईयाँ हैं, मेरे काम के एवज में ये मिठाई ले सकते हो। शिवजी तैयार हो गये और मिठाई खाने में मस्त हो गये। शिवजी मिठाई खाने में मगन हो गये और काम को भूल गये, बुढ़िया को चिंता होने लगी। शाम को जब राजा राज्य के भ्रमण पर निकला तो देखा कि बुढ़िया को दी गई जगह पर रेत नहीं लगाई गई है, तो राजा ने पूछा कि यह कौन है जिसने अपना कार्य पूरा नहीं किया है, तो बुढ़िया बोली कि ये मेरी जगह है और इस चरवाहे ने तय किया था कि मिठाई के बदले में यह मेरा काम करेगा परंतु यह केवल मिठाई खाता रहा और काम नहीं किया।
चरवाहा अभी भी मिठाई खाने में मगन था, राजा ने चरवाहे से पूछा कि तुमने बुढ़िया माँ का काम क्यों नहीं किया और बुढ़िया माँ को धोखा दिया तुम्हें तो सजा मिलनी चाहिये। राजा ने जोर से बेंत से चरवाहे के पीठ पर मारा तो इतनी जोर से लगा कि जैसे बस खून ही निकलने वाला हो, और वहाँ खड़ी प्रजा भी उसी तरह कराहने लगी, सारी प्रजा को भी उतनी ही तेज पीड़ा हुई, राजा ने बेंत फ़ेंकी और चरवाहे से पूछा कि आप कौन हैं और यहाँ क्या करने आये हैं, चरवाहे ने अपना असली शिव रूप सामने लाया और संपूर्ण राज्य को आशीर्वाद दिया कि आज के बाद इस राज्य में कावेरी नदी की बाढ़ से राज्य परेशान नहीं होगा, और आज का दिन तिरुवातिरा के नाम से मनाया जायेगा और आज के दिन जिन मिठाईयों का सेवन मैंने किया है, वही मिठाईयाँ बनाई जायेंगी।
दादी माँ की कहानी सुनकर इतना मजा आया कि मैंने सोचा कि लिख दी जाये। खैर दादी माँ की कहानी होती ही मजेदार हैं। ऐसा लगता है कि सब सामने ही घट रहा है।

आज की पीढ़ी और अविष्कार…

अविष्कार मानव इतिहास में जिज्ञासा से उत्पन्न होने वाली एक महत्वपूर्ण बात है। मानव ने जब अविष्कार करना शुरू किया तब उसे जरूरत थी, आज हमारे पास इतने संसाधन मौजूद हैं परंतु अब उनको बेहतर करने की जरूरत है। अभी भी नई नई चीजों खोजी जा रही हैं।
जब पहिया खोजा गया होगा तो वह अपने आप में एक क्रांतिपूर्वक अविष्कार था, आज पहिये के बल पर ही दुनिया चल रही है अगर पहिया ना होता तो सब रुका हुआ होता, और ऐसा सोचना ही दुष्कर प्रतीत होता है।
ऐसे ही जब संगणक को बनाया गया तो बनाने वालों ने कभी सोचा नहीं था कि यह एक क्रांतिकारी बदलाव लायेगा और लगभग हर उपक्रम में इसका उपयोग होगा, तब यह भी नहीं सोचा गया था कि y2k की समस्या भी आयेगी।
आजकल किसी नौजवान से बात की जाये तो वह केवल नौकरी करना चाहता है कोई अविष्कार नहीं क्योंकि नौकरी एक सहज और सरल उपाय है जीविका का, परंतु  शोध कार्य उतना ही दुष्कर। कुछ नये विचारों को असली जामा पहनाना ही अविष्कार है। ऐसा नहीं है कि दुनिया में सभी चीजें आ चुकी हैं, हो सकता है कि चीजें अभी जिस प्रक्रिया से अभी चल रही हैं वे धीमी हों, अगर उस प्रक्रिया को और सुगम बना दिया जाये तो शायद वह चीज और भी ज्यादा लोकप्रिय हो जाये।
अभी के कुछ उदाहरण देखिये जो कि प्रक्रिया के सरलीकरण के उदाहरण हैं, यह अविष्कार अंतर्जाल के संदर्भ में हैं, जैसे गूगल, फ़ेसबुक इत्यादि।
क्या गूगल के पहले अंतर्जाल पर ढूँढ़ने के लिये खोज के साधन उपलब्ध नहीं google थे, जी बिल्कुल थे, परंतु वे इतने तकनीकी भरे थे और जो आम आदमी देखना चाहता था वह परिणाम उसे दिखाई नहीं देता था। गूगल ने एक साधारण सा पृष्ठ दिया जो कि एकदम ब्राऊजर पर आ जाता था, केवल डायल अप पर भी खुल जाता था, जबकि डायल अप की रफ़्तार उन दिनों लगभग ४० केबीपीएस. होती थी, जो कि ठीक मानी जाती थी और १२८ केबीपीएस तो सबसे बेहतरीन रफ़्तार होती थी। गूगल ने सर्च इंजिन के क्षैत्र में क्रांतिकारी बदलाव किया और lycos, AltaVista, Yahoo, Ask Jeeves, MSN Search, AOL इत्यादि को बहुत पीछे छोड़ दिया।
ऐसे ही दूसरा उदाहरण है फ़ेसबुक, फ़ेसबुक के आने के पहले क्या अंतर्जाल में facebook सोशल नेटवर्किंग वेबसाईट्स नहीं थीं ? थीं बिल्कुल थीं, परंतु उनका उपयोग करना इतना आसान नहीं था और उन सोशल नेटवर्किंग वेबसाईट्स में फ़ेसबुक जितनी सुविधा नहीं थीं। Hi5, Orkut जैसे अपने प्रतियोगियों को बहुत पीछे धकेल दिया और आज फ़ेसबुक का कोई प्रतिद्वन्दी नहीं है। क्योंकि फ़ेसबुक के निर्माताओं ने इसे बहुत ही सरल रूप दिया और आज जिसे देखो वो मोबाईल पर भी फ़ेसबुक का उपयोग कर रहा है।
आज की पीढ़ी को इस और खास ध्यान देने की जरूरत है कि नये अविष्कार भी किये जा सकते हैं, यहाँ केवल मैंने अंतर्जाल से संबंधित ही बातें करी हैं परंतु यह हरेक क्षैत्र में लागू होता है, या तो नई चीजें खोजी जाये या फ़िर जो चीजें चल रही हैं, उन्हें परिष्कृत किया जाये। तभी हमारा भविष्य युवा है।

एफ़डीआई का हल्ले के बहाने महँगाई और रूपये के अवमूल्यन पर भी चिंतन, हलकान है जनता.. [FDI, Inflation and Depreciation of Rupee… my views]

जहाँ देखो वहीं विदेशी खुदरा दुकानों का हल्ला मचा हुआ है और जनता महँगाई के मारे हलकान हुई जा रही है। महँगाई सर चढ़कर बोल रही है।

किसान को सब्जी का क्या भाव मिलता है और दुकानें किस भाव में बेचती हैं यह एक शोध का विषय है। और अगर शोध किया जाये तो शायद दुनिया चकित रह जायेगी कि किसान को टमाटर का ३ रू. किलो मिलता है और जनता दुकानदार को ४० रू. किलो दे रही है, तो बाकी का बीच का ३७ रू. ये बड़े खुदरा दुकानों के मालिक खा रहे हैं।

जब मुंबई में थे तो वहाँ कोई भी सब्जी कम से कम ४० रू. किलो मिलती थी और अधिकतर तो १६० रू. किलो तक भाव होते थे। पता नहीं कहाँ से महँगाई आई, और यही सब्जी चैन्नई या बैंगलोर में देखें तो अधिकतम ४० रू. किलो सब्जी मिल रही है। टमाटर मुंबई में आज भी ४० रू. किलो हैं और यहाँ बैंगलोर में १६ रू. किलो मिल रहे हैं।

खैर नेता लोग चिल्ला रहे हैं कि विदेशी खुदरा दुकानें आ गईं तो हम आग लगा देंगे, खुलने नहीं देंगे, परंतु क्यों नहीं खुलने देंगे ये नहीं बता रहे हैं, जब रिलायंस रिटेल खुल रहा था तब भी लोगों ने बहुत तोड़ फ़ोड़ की थी, अब हालत यह है कि वही तोड़ फ़ोड़ करने वाले लोग रिलायंस रिटेल से समान खरीद रहे हैं।

थोड़े दिनों बाद विरोधी स्वर विदेशी खुदरा दुकानों के फ़ीता काटते नजर आयेंगे। जनता को समझाइये कि विदेशी खुदरा दुकानों से क्या नुक्सान होगा। आज अखबार में पढ़ा कि जयपुर में कैनोफ़र ने जयपुर के सभी थोक अंडा व्यापारियों से करार कर लिया है, अब सभी खुदरा व्यापारियों को अंडे मिलना बंद हो जायेगा। पहली बात तो यह उन थोक व्यापारियों की गलती है जिन्होंने ये करार किये हैं और वैसे भी भारत है जहाँ हर चीज का जुगाड़ होता है, जब सरकार जुगाड़ से चल सकती है तो ये व्यापार क्या चीज है। खैर आगे क्या होगा यह तो ये करार कार्यांन्वयन होने के बाद ही पता चलेगा। हमारे खुदरा व्यापारी कोई ना कोई तोड़ निकाल ही लेंगे।

ऐसा नहीं है कि मैं विदेशी खुदरा दुकानों का समर्थक हूँ परंतु हाँ यह अर्थव्यवस्था के लिये ठीक होगा और रूपये के अवमूल्यन होने से कुछ हद तक रोकेगा। परंतु रूपये का अवमूल्यन रोकने के लिये क्या इस तरह के हथकंडे अपनाना उचित है ? कतई नहीं !

परंतु नेता जनता को कितना बेवकूफ़ बनायेंगे, अगर इन नेताओं ने घोटाले नहीं किये होते, भ्रष्टाचार पर लगाम कसी होती और भारत के विकास में उस रूपये का योगदान किया होता तो शायद रूपये के मूल्य का अवमूल्यन नहीं होता उल्टा डॉलर कमजोर होता, परंतु सरकार विदेशी लोगों को बाजार में भी तरह तरह के साधन उपलब्ध करवाती है कि ये लोग आसानी से भाग लेते हैं, और जनता ठगी से देखती रह जाती है।

जरूरत है सरकार में नेताओं में विकास की इच्छाशक्ति की कमी की, अगर इन नेताओं में यह इच्छाशक्ति आ जाये तो हम विकास के पथ पर अग्रसर होंगे। लोग कहते हैं कि दस वर्ष में हम नंबर वन बना देंगे, पिछले पाँच वर्ष में भारत को कौन से नंबर पर लाये हैं, ये तो सब जानते हैं।

बात रही [बेचारे] खुदरा दुकानदारों की तो वे बेचारे तो रोजमर्रा कि चीजों को बेचकर अपना घर चला लेंगे। जैसे अगर आपको ब्रेड लेने जाना हो तो आप विदेशी खुदरा दुकानों में तो नहीं जायेंगे ना, बस ऐसे ही बहुत सारी चीजें हैं जो कि आप बिना पार्किंग में अपनी गाड़ी लगाये लेना चाहेंगे या घर से गाड़ी नहीं निकालकर पास के दुकान से लेंगे। तो सरकार को यह समझ लेना चाहिये कि १० लाख से ज्यादा जनता वाले शहर बहुत समझदार हैं।

मुंबई में जहाँ हम रहते थे वहाँ भी आसपास बहुत मॉल थे, परंतु लगभग सभी लोग एक किराने वाले से ही समान लेते थे, वजह वह कीमत में सीधी छूट देता था और उसकी स्कीमें भी आकर्षक होती थीं। फ़िर घर पहुँच सेवा, आप जाकर बोल दीजिये और घर पर समान पहुँच जायेगा। अगर आपकी घर से निकलने की इच्छा नहीं है तो केवल फ़ोन लगा दीजिये और समान घर पर होगा। उस किराना व्यवसायी का स्वभाव बहुत अच्छा था और मृदु भाषी है। यह सब बातें कहाँ देशी और कहाँ विदेशी खुदरा दुकानों पर मिलेंगी।

क्यों बच्चे आज भावनात्मक नहीं हैं ? क्या इसीलिये आत्महत्या के आंकड़े बढ़ रहे हैं ? (Why Childs are not emotional ? why suicidal cases are increasing ?)

शिक्षा में बदलाव बेहद तेजी से हो रहे हैं और शिक्षक और छात्र के संबंध भी उतनी ही तेजी से बदलते जा रहे हैं। कल के अखबार की मुख्य खबर थी यहाँ बैंगलोर में इंजीनियरिंग महाविद्यालय के छात्र ने होस्टल के कमरे में पंखे से फ़ांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। खबर लगते ही हजारों के झुंड में छात्र इकठ्ठे हो गये और महाविद्यालय प्रशासन के खिलाफ़ नारेबाजी करने लगे। पुलिस बुलाई गई, परंतु छात्रों ने पुलिस को भी खदेड़ दिया और महाविद्यालय की इमारत को भी नुक्सान पहुँचाया। बाद में महाविद्यालय के मालिक का बयान आया कि वह छात्र कमजोर दिल का था और लगातार पिछले तीन वर्षों से उस छात्र का प्रदर्शन बहुत कमजोर था।

विषादग्रसित यह खब्रर पढ़ने के लिये नहीं लिखी हैं मैंने, सही बताऊँ तो मैंने कल अखबार ही नहीं पढ़ा था पर कल रात्रि  भोजन पर भाई से चर्चा हो रही थी तब इस और ध्यान गया और आज सुबह कल का अखबार पढ़ पाया । मन अजीब हो उठा और लगा क्या महाविद्यालय प्रशासन ने कभी उस छात्र के मन में क्या चल रहा है, यह जानने की कोशिश की। महाविद्यालय प्रशासन महज छात्र के घर एक पत्र भेजकर अपनी जिम्मेदारी से तो नहीं बच सकता ।

आज छात्र बहुत ही संवेदनशील परिस्थितियों से गुजर रहे हैं, क्योंकि वे अब भावुक नहीं रहे, अब छात्रों से भावनाओं के बल पर कोई भी कार्य करवाना असंभव है। उसके पीछे बहुत सारे कारण जिम्मेदार हैं, परवरिश के बेहतर माहौल में कमी, शिक्षकों से अच्छा समन्वयन न होना । ऐसे बहुत सारे कारण हैं। क्योंकि आजकल बच्चों को इंटरनेट पर सब मिल जाता है तो कई बच्चे तो दोस्त भी नहीं बनाते हैं और इंटरनेट पर ही अपना समय बिताते पाये जाते हैं।

अब मेरे मन में जो सवाल उठ रहे हैं कि क्या महाविद्यालय का छात्र पर अच्छे प्रदर्शन के लिये दबाब बनाना उचित था, और अगर दबाब बनाया गया तो उसे क्या उचित मार्गदर्शन दिया गया । छात्र के घर पर पत्र भेजने से छात्र की मानसिक हालात को समझा जा सकता है। हरेक छात्र के माता-पिता यही सोचते हैं कि बेटा अच्छा पढ़ रहा है परंतु अगर महाविद्यालय से इस प्रकार का पत्र मिले तो वे यकीनन ही अपने बेटे पर क्रुद्ध होंगे, और उसे परिस्थिती से बचने के लिये उस छात्र ने आत्महत्या कर ली हो ? छात्र तो पहले से ही विषादग्रसित था, उसको मनोवैज्ञानिक तरीके से संभालना चाहिये था। परंतु ऐसा ना हुआ, अब उन माता-पिता पर क्या गुजर रही होगी जिन्होंने अपना जवान बेटा इसलिये खो दिया क्योंकि वह पढ़ाई में कमजोर था, नहीं ? वह पढ़ाई में कमजोर होने के कारण विषादग्रसित हो चला था।

पढ़ाई में कमजोर होना कोई बुरी बात तो नहीं, पढ़ाई ही तो सबकुछ नहीं है, उससे बढ़कर होता है जीवन जीने का हौसला और उस विषादित परिस्थिती से निकालने में सहायक परिवेश और परवरिश। कमजोर पढ़ाई वाले पता नहीं कितनी आगे निकल गये हैं और पढ़ाई वाले कहीं पीछे रह गये हैं।

मुख्य सवाल जो मेरे मन में है और उसका उत्तर खोजने की कोशिश जारी है मनन जारी है, क्यों बच्चे आज भावनात्मक नहीं हैं ? और उनके आधुनिक परिवेश में उन्हें कैसी परवरिश देनी चाहिये ?