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शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा– 2 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद –

(2) शुद्धा प्रयोजनवती लक्षणा – जहाँ गुण सादृश्य के अतिरिक्त अन्य किसी सादृश्य से लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाये, वहाँ शुद्धा प्रयोजनवती लक्षणा होती है। सादृश्य सम्बन्ध निम्न प्रकार से हो सकते हैं –

(१) सामीप्य सम्बन्ध – ‘अरूण’ शब्द का मुख्यार्थ ‘सूर्य का सारथी’ है किन्तु ‘अरूण’ का लक्ष्यार्थ ‘सूर्य’ ही ग्रहण किया जाता है। सामीप्य सम्बन्ध के कारण ही यह लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाता है, क्योंकि सूर्य अरूण (सूर के सारथी) के समीप रहता है।

(२) आधार-आधेय सम्बन्ध – ‘फ़ुटबाल के मैच में भारत इंग्लैण्ड से जीत गया’ – इस कथन में आधार-आधेय सम्बन्ध से ही अर्थ ग्रहण किया जायेगा अर्थात भारत के खिलाडी इंग्लैण्ड के खिलाड़ियों से जीत गये।

(३) कारण-कार्य-सम्बन्ध – ‘नियमित भोजन स्वास्थ्य है’ – इस कथन में कारण-कार्य-सम्बन्ध है, क्योंकि भोजन ही स्वास्थ्य (कार्य) का कारण है।

(४) अंगागिभाव सम्बन्ध – इसके अनुसार अंग से अंगी का लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाता है। उदाहरणार्थ किसी मनुष्य के हाथ की उँगली दब जाने पर यदि वह व्यक्ति कहे – ‘मेरा हाथ दब रहा है’ तो इसमें हाथ का लक्ष्यार्थ हाथ की उँगली होगा।

(५) तात्कर्म्य सम्बन्ध – कर्म-सादृश्य के आधार पर लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाता है । जैसे –

‘एरे मतिमंद चन्द आवत न तोहि लाज,

ह्वैके द्विजराज काज करत कसाई के।’

यहाँ चन्द्रमा को कसाई इसलिए कथित किया गया है कि वह भी विरहणियों को कसाई के समान कर्म करने वाला प्रतीत होता है।

(६) तादर्थ्य सम्बन्ध – ‘रमेश ब्रजेश के गुरूदेव हैं’  – इस पंक्ति में रमेश को देवता के समान पूज्य बताना ही लक्ष्यार्थ है।

शुद्धा प्रयोजनवती लक्षणा के भी दो भेद हैं – (१) लक्षण-लक्षणा या जहतस्वार्था और (२) उपादान लक्षणा या अजह्त्स्वार्था, इनके भी दो-दो भेद हैं – सारोपा और साध्यवसाना।

(१) लक्षण-लक्षणा या जहतस्वार्था – जहाँ मुख्यार्थ अथवा वाच्यार्थ का लगभग बिल्कुल त्याग कर दिया जाता है, वहाँ लक्षण-लक्षणा या जहतस्वार्था लक्षणा होती है। उदाहरण – ‘पेट में चूहे कूद रहे हैं’ यह वाक्य अपना अभीष्ट अर्थ रखता है लेकिन इसके मुख्यार्थ या वाच्यार्थ में पूर्ण रूप से बाधा मालूम पड़ती है, क्योंकि पेट में चूहों का कूदना सर्वथा असम्भव है। इसमें चूहे कूदना का वाच्यार्थ बिल्कुल त्याग दिया जाता है और लक्ष्यार्थ ‘तेज भूख लगी है’ ग्रहण किया जाता है।

(अ) सारोपा शुद्धा लक्षण-लक्षणा – जब आरोप के विषय और आरोप्यमाण में अभेद हो; जैसे –

आज भुजड्गों से बैठे हैं वे कंचन के घड़े दबाये – इस काव्य में आरोप का विषय (पूँजीपति) और आरोप्यमाण (भुजड़्ग) में अभेद कथित किया गया है।

(ब) साध्यवसाना शुद्ध लक्षण-लक्षणा – आरोप के कथित न होने पर यह लक्षणा होती है। जैसे –

‘दिल का टुकड़ा कहाँ गया’

उक्त वाक्य में आरोप का विषय लुप्त है और केवल आरोप्यमाण (दिल के टुकड़े) का ही कथन है। ‘दिल का टुकड़ा’ अपना मुख्यार्थ बिल्कुल छोड़ देता है और ‘पुत्र’ लक्ष्यार्थ को बिल्कुल तिरस्कृत करके लगाया जाता है।

पहले के भाग यहाँ पढ़ सकते हैं –

“रस अलंकार पिंगल [रस, अलंकार, छन्द काव्यदोष एवं शब्द शक्ति का सम्यक विवेचन]”

काव्य में शब्द शक्ति का महत्व – रस अलंकार पिंगल

शब्द शक्ति क्या है ? रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 1 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा– 2 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 3 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (३) व्यंजना – 1 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 1 – रस अलंकार पिंगल

(१) रूढ़ि लक्षणा – जहाँ किसी शब्द के मुख्यार्थ को छोड़कर उससे सम्बन्धित अन्य अर्थ परस्पर अथवा रूढ़ि द्वारा निश्चित होता है। जैसे – ‘बम्बई फ़ैशनिबल है’, इस पंक्ति में बम्बई नगर अभीष्ट या लक्ष्यार्थ नहीं है, अपितु ‘बम्बई नगर के निवासी’ इसका लक्ष्यार्थ है। बम्बई नगर के निवासियों के लिए ‘बम्बई’ कहना रूढ़ हो गया है। रूढ़ि लक्षणा के भी दो भेद – (अ) गौणी और (ब) शुद्धा – किये गए हैं ।

(अ) गौणी रूढ़ि लक्षणा – परम्परानुसार गुणबोधक लक्ष्यार्थ ग्रहण करने से गौणी रूढ़ि लक्षणा होती है।

(ब) शुद्धा रूढ़ि लक्षणा – परम्परा अथवा रूढ़ि के आधार पर जब वाच्यार्थ से सम्बन्धित लक्ष्यार्थ भी ग्रहण किया जाता है, तब वहाँ शुद्धा रूढ़ि लक्षणा मानी जायेगी।

(२) प्रयोजनवती लक्षणा – मुख्यार्थ में बाधा होने पर किसी विशेष प्रयोजन से लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाता है, वहाँ प्रयोजनवती लक्षणा होती है। प्रयोजनवती लक्षणा के दो प्रमुख भेद हैं –

१ – गौणी और

२ – शुद्धा

(१) गौणी प्रयोजनवती लक्षणा – जहाँ उपमा और उपमेय में गुण की समानता के कारण लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाये, वहां गौणी प्रयोजनवती लक्षणा होती है, यथा –

‘चन्द्र-मुख को देखकर मन हो गया प्रफ़ुल्ल’

चन्द्रमा और मुख परस्पर भिन्न है अत: यहाँ मुख्यार्थ में बाधा है लेकिन दोनों के गुण में पर्याप्त सादृश्य है। जिस प्रकार चन्द्रमा को देखकर मन प्रफ़ुल्लित हो जाता है, उसी प्रकार मुख को देखकर मन प्रफ़ुल्लता से भर उठता है, अत: इस गुण सादृश्य के कारण यह लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाता है। गौणी प्रयोजनवती लक्षणा के भी दो भेद – (अ) सारोपा और (ब) साध्यवसाना किये गये हैं।

(अ) सारोपा  गौणी प्रयोजनवती लक्षणा – जहाँ उपमान और उपमेय दोनों का आरोप हो वहाँ सारोपा गौणी प्रयोजनवती लक्षणा होती है। ‘चन्द्र-मुख को देखकर मन हो गया प्रफ़ुल्ल’ इसका उदाहरण है, क्योंकि इसमें चन्द्र (उपमान) और मुख (उपमेय) दोनों का आरोप है।

(ब) साध्यवसाना  गौणी प्रयोजनवती लक्षणा – जहाँ केवल उपमान ( आरोप्यमाण) का वर्णन हो और उपमेय (आरोप का विषय) लुप्त हो वहाँ साध्यवसाना गौणि प्रयोजनवती लक्षणा होती है। उदाहरणार्थ –

‘बाँधा था बिधु को किसने’

यहाँ उपमेय ‘मुख’ का कथन नहीं है केवल आरोप्यमाण ‘विधु’ (उपमान) का कथन है।

पहले के भाग यहाँ पढ़ सकते हैं –

“रस अलंकार पिंगल [रस, अलंकार, छन्द काव्यदोष एवं शब्द शक्ति का सम्यक विवेचन]”

काव्य में शब्द शक्ति का महत्व – रस अलंकार पिंगल

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शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – रस अलंकार पिंगल

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शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद

(२) लक्षणा

आचार्य मम्मट ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘काव्य-प्रकाश’ में लक्षणा की व्याख्या इस प्रकार की है –

’मुख्यार्थबाधेतद्योगे रूढ़ितोऽथ प्रयोजनात ।

अन्योर्थो लक्ष्यते यत्सा लक्षणारोपिता क्रिया॥’

अर्थ यह हुआ – मुख्यार्थ में बाधा होने पर रूढि या प्रयोजन के आधार पर अभिधेयार्थ से सम्बन्धित अन्य अर्थ को व्यक्त करने वाली शक्ति लक्षणा शक्ति कहलाती है। एक और प्रसिद्ध विद्वान ने लक्षणा के लक्षण में यही बात कही है –

‘मुख्यार्थबाधे तद्युक्तो ययाऽन्योऽर्थ: प्रतीयते।

रूढ़े प्रयोजनाद्वासौ लक्षणा शक्तिरर्पिता॥’

अर्थात – मुख्यार्थ मे ंबाधा होने पर रूढ़ि या प्रयोजन को लेकर जिस शक्ति द्वारा मुख्यार्थ से सम्बन्धित अन्य अर्थ का बोध हो उसे लक्षणा शक्ति कह सकते हैं। प्रसिद्ध आचार्य का कथन है कि लक्षणा में वक्ता के तात्पर्य को ही प्रधानता दी जाती है। लक्षणा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों ने तीन प्रमुख कारण बताये हैं –

(१) मुख्यार्थ में बाधा,

(२) मुख्यार्थ में कुछ-न-कुछ सम्बन्ध और

(३) रूढ़ि या प्रयोजन द्वारा अन्य अर्थ का बोध

(१) जब शब्दों के वाच्यार्थ से वांछित अर्थ की उपलब्धि न हो तो मुख्यार्थ में बाधा मानी जायेगी। उदाहरणार्थ – यदि कहा जाये कि ‘घनश्याम गधा है’ तो इसमें पशु रूप गधा के मुख्यार्थ में बाधा है, क्योंकि घनश्याम गधे के समान चार पैर वाली आकृति वाला नहीं है।

(२) मुख्यार्थ में बाधा होने पर जो अन्य अर्थ लगाया जाता है उसका मुख्यार्थ से थोड़ा-बहुत सम्बन्ध अवश्य होता है। जैसे – घनश्याम यद्यपि गधे के समान आकृति वाला नहीं है, लेकिन एक बात में सम्बन्ध अवश्य है कि उसकी मूर्खता गधे से समानता रखती है अत: इस मुख्यार्थ में किंचित सम्बन्ध अवश्य है।

(३) ‘गधा’ मूर्खता के लिये रूढ़ हो गया है, इसलिए ‘मूर्खता’ प्रयोजन के लिए ‘गधा’ शब्द का प्रयोग किया जाता है।

लक्षणा के भेद – आचार्यों ने लक्षणा के अनेक भेद माने हैं। लक्षणा के प्रमुख भेद निम्न प्रकार हैं –

लक्षणा

(१) रूढ़ि –

गौणी

शुद्धा

(२) प्रयोजनवती

गौणी

          सारोपा

          साध्यवसाना

शुद्धा

           लक्षण लक्षणा ( जहत स्वार्था)

                    सारोपा

                    साध्यवसाना

           उपादान लक्षणा (अजहत स्वार्था)

                     सरोपा

                    साध्यवसाना

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“रस अलंकार पिंगल [रस, अलंकार, छन्द काव्यदोष एवं शब्द शक्ति का सम्यक विवेचन]”

काव्य में शब्द शक्ति का महत्व – रस अलंकार पिंगल

शब्द शक्ति क्या है ? रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 1 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा– 2 – रस अलंकार पिंगल

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शब्द-शक्ति के भेद (३) व्यंजना – 1 – रस अलंकार पिंगल

शब्द शक्ति क्या है ? रस अलंकार पिंगल

शब्द शक्ति क्या है ? – बहुत पहले ही सुप्रसिद्ध आचार्य भामह ने ‘शब्दार्थों काव्यम’ कहकर काव्य में शब्द और अर्थ की महत्ता तथा उनके परस्पर सम्बन्ध में प्रकाश डाला था। वास्तव में शब्द और अर्थ भिन्न-भिन्न नहीं हैं। श्रेष्ठ काव्य में शब्द और अर्थ की सत्ता अभिन्न रहती है। महाकवि तुलसीदास ने शब्द और अर्थ की इसी अभीन्नता पर निम्न पंक्तियों में बड़ा सुन्दर संकेत किया है –

‘गिरा अर्थ जल-बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न ।’

वास्तव में शब्द और अर्थ मिलकर ही काव्य की सृष्टि करते हैं। दोनों में परस्पर बहुत दृढ़ सम्बन्ध है और इस सम्बन्ध को जिस शक्ति द्वारा जाना जा सकते हैं, उसे ही ‘शब्द-शक्ति’ कहते हैं। चूंकि काव्य में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ से ही काव्य बोधगम्य होता है, अत: शब्द के अर्थ को समझने में सहायक-शक्ति ही ‘शब्द-शक्ति’ कहलाती है।

शब्द-शक्ति के भेद – शब्द-शक्ति के तीन भेद माने जाते हैं –

(१) शक्ति, (२) लक्षणा और (३) व्यंजना ।

एक अन्य विद्वान ने भी शब्द-शक्ति के तीन भेद – (१) अभिधा, (२) लक्षणा और (३) व्यंजना – माने हैं। प्राय: सभी आचार्य शब्द-शक्ति के उपर्युक्त तीन भेद ही मानते हैं।

(१) अभिधा

अभिधा शक्ति द्वारा शब्दों के मुख्यार्थ अथवा अप्रत्यक्ष संकेतिक अर्थ का बोध होता है। एक विद्वान अभिधा की व्याख्या इस प्रकार करते हैं –

‘संक्तितार्थस्य वोधनार्दाग्रमाभिधा ।’

अर्थात साक्षात सांकेतिक अर्थ की बोध शक्ति को ‘अभिधा’ कहा जाता है। साक्षात सांकेतिक अर्थ से तात्पर्य सामान्यत: लोक में प्रसिद्ध कोशसम्मत अर्थ से है। लोग अथवा कोश में एक शब्द के एक से अधिक अर्थ भी प्रचलित होते हैं, उन सबको वाच्यार्थ (अभिधा-युक्त) कहा जाता है। एक से अधिक अर्थ वाले शब्द का कौन-सा अर्थ लिया जायेगा, यह प्रसंग पर निर्भर करता है। जैसे –

‘कनक कनक ते सौगुनी, मादकता अधिकाय।

वा खाये बौराय जग या पाये बौराय ॥’

इन पंक्तियों में ‘कनक’ (धतुरा), कनक (सोना), मादकता (नशा आदि) सभी शब्दों का कोश-सम्मत एवं लोक में प्रचलित अर्थ लिया जाता है, इसीलिए यहाँ पर अभिधा शक्ति मानी जायेगी। अभिधा शक्ति से युक्त बाधक शब्द के तीन भेद आचार्य नागेश आदि विद्वानों ने माने हैं –

(१) रूढ़ि शब्द,

(२) यौगिक शब्द और

(३) योगारूढ़ि शब्द ।

१ – रूढ़ियुक्त शब्द वे हैं जिनसे पूरे शब्द से केवल एक अर्थ का बोध होता हो। इनके अवयव नहीं किये जा सकते, वे व्युत्पत्ति रहित और अभेद्य होते हैं। जैसे पैर, घोड़ा आदि ।

२ – यौगिक शब्दों का प्रकृति और अवयवों की सहायता से अर्थ का बोध होता है। जैसे – ‘भूपति’ शब्द में ‘भू’ और ‘पति’ दो अवयव हैं, ‘भू’ अर्थात पृथ्वी और ‘पति’ अर्थात स्वामी यानि कि पृथ्वी का स्वामी ‘राजा’ अर्थ हुआ। इसी प्रकार हिमकर, जलधर आदि शब्द बने हुए हैं।

३ – योगारूढ़ि शब्दों में यौगिक शब्द के समान अवयवों के समुदाय से अर्थ का बोध होता है लेकिन ये शब्द यौगिक होते हुए भी रूढ़ि शब्दों की भांति एक विशेष अर्थ के लिए प्रसिद्ध हो जाते हैं। जैसे – ‘गिरिधर’ ‘गिरि’ और ‘धर’ दो अवयवों के मिश्रण से बना यौगिक शब्द है। लेकिन इसको प्रत्येक गिरि धारण करने वाले के लिये प्रयोग न करके केवल भगवान श्रीकृष्ण के अर्थ में ही प्रयुक्त किया जाता है और श्रीकृष्ण के अर्थ में ही यह शब्द रूढ़ हो गया है। पंकज, वारिज आदि शब्द इसके उदाहरण हैं।

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“रस अलंकार पिंगल [रस, अलंकार, छन्द काव्यदोष एवं शब्द शक्ति का सम्यक विवेचन]”

काव्य में शब्द शक्ति का महत्व – रस अलंकार पिंगल

शब्द शक्ति क्या है ? रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 1 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा– 2 – रस अलंकार पिंगल

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काव्य में शब्द शक्ति का महत्व – रस अलंकार पिंगल

काव्य में शब्द शक्ति का महत्व –

काव्य में कवि अपने भावों की अभिव्यक्ति करता है और भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम “भाषा” होती है। अत: काव्य में भाषा का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। पाश्चात्य साहित्यशास्त्री एफ़. आर. लेबिस ने भाषा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए एक स्थान पर लिखा है –

‘Literature is not merely in a language but of a language.’

अर्थात काव्य भाषा में नहीं होता अपितु भाषा का ही होता है। भारतीय साहित्यशास्त्रियों ने इसलिये भाषा को काव्य का शरीर माना है, अर्थात जिस प्रकार आत्मा बिना शरीर के अस्तित्वहीन है, उसी प्रकार बिना भाषा के काव्य का रसानन्द नहीं हो सकता । इसलिए एक पाश्चात्य विद्वान ने अपनी काव्य की परिभाषा में सुन्दर शब्दों के सुव्यवस्थित रूप को ही काव्य मान लिया है –

‘Poetry is the best words in the best order’.

कवि भावों के प्रकाशन के लिए कुछ शब्दों का चयन करता है और उसके शब्द-चयन का आधार यही रहता है कि वह ऐसे शब्दों का चयन करे जो उसके भावों को पूर्णतया पाठक के समक्ष व्यक्त कर दे और उसके लिए उसे शब्दों में निहित अर्थ के मर्म से अभिज्ञ होना आवश्यक है। एक ही अर्थ वाले कई शब्द भाषा में होते हैं और एक ही शब्द के कई अर्थ भी प्रचलित होते हैं अत: किस शब्द को अभीष्ट अर्थ की अभिव्यक्ति के लिये प्रयुक्त किया जाये, ताकि पाठक उस अर्थ को ग्रहण कर पूर्णतया भावमग्न हो जाये – यह कवि की कुशल प्रतिभा पर निर्भर करता है और इसके लिये कवि को शब्द की शक्तियों से पूर्णतया परिचित होना आवश्यक है। शब्दों के अर्थ से ही काव्य बोधगम्य होता है तथा शब्द और अर्थ के सम्बन्ध को ही शब्द-शक्ति कहा जाता है।

अत: बिना शब्द-शक्ति की जानकारी के न तो कवि ही अपने भावों को अच्छी तरह व्यक्त कर सकता है और न ही पाठक पूर्ण रूप से काव्यानन्द ग्रहण कर सकता है। प्रसिद्ध भारतीय काव्य-शास्त्री का कथन है – शब्द के द्वारा अर्थ-बोध तभी होता है, जब हम ‘वृत्ति’ ज्ञान से पूर्ण रूप से अवगत होते हैं, अत: अमुक शब्द का अमुक स्थान पर क्या अर्थ है – यह ‘शब्द-वृत्ति’ का जानकार ही समझ सकता है। यहाँ पर विद्वान ने ‘शक्ति’ शब्द के स्थान पर यहाँ ‘वृत्ति’ शब्द का प्रयोग किया गया है जो उसका समानार्थी है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि शब्द शक्ति के अध्ययन के बिना काव्य का अध्ययन अपूर्ण है, अत: साहित्य के अध्येता के लिये शब्द शक्ति की जानकारी आवश्यक है ।

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“रस अलंकार पिंगल [रस, अलंकार, छन्द काव्यदोष एवं शब्द शक्ति का सम्यक विवेचन]”

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शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – रस अलंकार पिंगल

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शब्द-शक्ति के भेद (३) व्यंजना – 1 – रस अलंकार पिंगल

“रस अलंकार पिंगल [रस, अलंकार, छन्द काव्यदोष एवं शब्द शक्ति का सम्यक विवेचन]”

इस बार के सफ़र में हम अपने साथ आदत के मुताबिक फ़िर कुछ किताबें लेकर चले, इस बार सबसे पहली पुस्तक पढ़नी शुरू की है “रस अलंकार पिंगल [रस, अलंकार, छन्द काव्यदोष एवं शब्द शक्ति का सम्यक विवेचन]” और लेखक हैं डॉ. शम्भुनाथ पाण्डेय।
हमने सोचा कि हिन्दी साहित्य की बारीकियों को पढ़े हुए वाकई बहुत दिन हो गये हैं, यह किताब मैंने वर्षों पहले पढ़ी थी, अपने महाविद्यालयीन पाठ्यक्रम को अच्छे से समझने के लिये, फ़िर इसके नये नये संवर्धित संस्करण आते रहे, और कुछ वर्षों पहले इसका हमने १७ वां संस्करण लिया था, इस बार फ़िर सोचा कि अपने हिन्दी के ज्ञान को थोड़ा समृद्ध कर लिया जाये।
काम में व्यस्तता अभी जेद्दाह में कुछ ज्यादा ही है, इसी कारण ब्लॉग, फ़ेसबुक और ट्विटर से दूर ही हैं, क्योंकि समय ही नहीं है, सामाजिक नेटवर्क से जुड़ने के लिये।
इस पुस्तक की भूमिका में शम्भुनाथ जी लिखते हैं, यह लघु प्रयास है, रस-अलंकार तथा पिंगल का अध्ययन शास्त्रीय विषय है; अस्तु इस बात का दावा कोई नहीं कर सकता कि विवेचन सर्वांगपूर्ण विवादों-परि तथा अन्तिम ओगा। प्रस्तुत पुस्तक में शास्त्रीय पारिभाषिक शब्दावली के स्थान पर सरल, बोधगम्य भाषा का प्रयोग किया गया है जिससे विद्यार्थियों को विषय क्लिष्ट तथा नीरस न प्रतीत हो और थोड़े ही परिश्रम में समझ में आ जाये।
अति अपार जे सरित वर, जो नृप सेतु कराहि।
चढ़ि पिपीलिका हू परम लघु, बिनु श्रम पारहि जाहि॥
आगे अभी कुछ दिन हिन्दी के ऊपर ही लिखने का विचार है जो कि इसी किताब से उदघृत होगा।
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“रस अलंकार पिंगल [रस, अलंकार, छन्द काव्यदोष एवं शब्द शक्ति का सम्यक विवेचन]”

काव्य में शब्द शक्ति का महत्व – रस अलंकार पिंगल

शब्द शक्ति क्या है ? रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 1 – रस अलंकार पिंगल

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शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 3 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (३) व्यंजना – 1 – रस अलंकार पिंगल

छुट्टियों के बाद का अकेलापन (Feeling alone after vacations..)

छुट्टियाँ खत्म हो गईं, घर से आ गये, वहाँ ज्यादातर वक्त परिवार के साथ बीता कुछ ही दोस्तों से मिल पाये, कुछ दोस्तों की बड़ी बड़ी शिकायतें भी मिलीं, परंतु प्राथमिकता तो हमें खुद ही निश्चित करनी होती है, और परिवार ही प्राथमिक होता है।
घर पर माता पिता के साथ रहना अपने आप में उम्र के इस ढ़लान पर एक अलग ही तरह का अनुभव है, अब परिवार का महत्व इतनी दूर रहने के कारण   और उम्र बड़ने के कारण पता लगने लगा है।
जब घर पर थे तो बस परिवार के बीच रहकर परिवार में ही बातचीत, हँसी ठिठोली हुआ करती थी, कैसे इतना सारा समय निकल गया पता ही नहीं चला। मैं लगभग ३-४ किताबें ले गया था पढ़ने के लिये परंतु वे सारी किताबें बिना खुले ही वापिस आ गईं।
अकेलापन
परिवार में रहने से जख्मों पर घाव भर जाते हैं और एक असीम सुख प्राप्ति का अनुभव होता है। परिवार में सदस्य भले ही बुजुर्ग हो या नवागत सबसे अच्छे तरह से मिले और उनके साथ बैठकर बातचीत हुई।
हमें नौकरी के चक्कर में घर से दूर रहना पड़ता है, इससे उपजा मानसिक एकाकीपन परिवार में ही भरा जा सकता है। परिवार मतलब पूर्ण परिवार, केवल एकल परिवार नहीं।
अब घर परिवार से वापिस आ गये हैं, छुट्टियाँ खत्म हो चुकी हैं, वापिस अपने रोजमर्रा की जिंदगी में वापसी हो चुकी है, यहाँ आकर अब अजीब तरह का अकेलापन लगने लगा है। ऐसा लगता है कि हर चीज खाने दौड़ रही है, किसी से ज्यादा बात करने की इच्छा नहीं होती, खैर यह तो मानवीय प्रवृत्ति है। पर इस बार वाकई ये अकेलापन दुश्कर है।
मन अभी भी सुप्तावस्था में है अब चेतनता को जगाया जा रहा है ।

नियम का पालन और पहरेदार

नियम एक ऐसी चीज है जो हर व्यक्ति को पसंद होती है, बस उसकी परिभाषा सबकी अपनी अलग होती है। सब अपनी पसंद से नियम को अपने अनुकूल बना लेते हैं और दूसरों पर थोपने की कोशिश करते हैं। सरकार इन्हीं नियम को कानून का रूप देती है और नियम पालने के लिये पहरेदार भी बैठा देती है।

सरकार की देखा देखी हरेक जगह नियम बनाये गये और उन पर पहरेदार भी लगा दिये गये परंतु कभी आम आदमी से उन नियम के बारे में पूछने की जहमत नहीं उठाई गई, क्या वाकई आम आदमी उन नियमों का पालन करना चाहता है या नहीं ।

नियम तोड़कर भागने की प्रवृत्ति ज्यादा देखने में आती है, कोई भी आदमी नियम तोड़कर खुद पहरेदार के पास नहीं जायेगा, बल्कि पहरेदार को उस नियम तोड़कर  भागने वाले व्यक्ति को ढूँढ़ना होगा, अगर सभी नियम का पालन करने लगे तो पहरेदार की आवश्यकता ही खत्म हो जायेगी।

हो सकता है जो आपका या मेरा मन नियम मानता हो परंतु कानून उस नियम को बुरा मानता हो तो अधिकतर कानून के नियम मानना चाहिये और जो नियम बुरे लगते हों, कोशिश करना चाहिये उन नियमों को मानने की नहीं तो उन कानूनों को तोड़कर पहरेदारों से बचना चाहिये।

बचना भी एक कला है, कुछ लोग इतने माहिर होते हैं कि नियम भी तोड़ते हैं और ऊपर से दादागिरी भी करते हैं, उल्टा चोर कोतवाल को डांटे, परंतु जब तक अनुभव ना हो, इन चीजों को आजमाना नहीं चाहिये।

खैर यह बात और है कि कुछ लोग नियम तोड़ने में ही अपनी हेकड़ी समझते हैं, और नियम तोड़ना अपनी शान याने कि कानून को अपने हाथ में लेना। तो ऐसे लोग मानसिक रूप से विकृत होते हैं, और कुछ लोग होते हैं जो समय और परिस्थितियों के अनुसार नियम का पालन करते हैं, अगर अन्य लोग हैं तो नियम का पालन किया जायेगा नहीं तो नियम उनके लिये कोई मायने नहीं रखता। तो ऐसे लोग अवसरवादी कहलाते हैं और कभी खुदा न खास्ता किसी पहरेदार ने पकड़ भी लिया तो इनकी घिग्गी बँध जाती है, मिल गई इज्जत मिट्टी में।

नियम बनते ही लोग नियम को तोड़ने के रास्ते ढूँढ़ लेते हैं और नियम को कानूनन तरीके से तोड़ते हैं। हमारे यहाँ कुछ लोग हैं जो कि खुद को नियम के ऊपर समझते हैं और पहरेदार उनके लिये नियम को शिथिल कर देते हैं, यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। नियम सबके लिये एक होना चाहिये और पहरेदारों को इसके प्रति सतर्क रहना चाहिये।

पहरेदार चाहे कितनी कोशिश कर लें, नियम तो तब तक टूटते रहेंगे जब तक कि नियम का पालन करने वाले नियम को ना मानें, तो पहरेदार और नियम पालने वालों को संस्कारित होना होगा। किसी एक के सुधरने से बात नहीं बनेगी।

नियम तोड़ने पर सजा का कड़ा प्रावधान होता है और नियम लागू करने वालों को यह सुनिश्चित करना चाहिये कि वे बिना किसी दबाब के नियम को सख्ती से लागू करें, फ़िर वह राजा हो या रंक।

दादी माँ की तिरुवातिरा त्यौहार की (तमिल) कहानी

आज रविवार को ऑफ़िस के लिये निकले तो अपने नियत समय पर ही निकले परंतु ट्राफ़िक ना होने की वजह से थोड़ा जल्दी ऑफ़िस पहुँच लिये। ऑफ़िस पहुँचे तो ऐसे ही बात हो रही थी कि एक टीममेट जो कि तमिलनाडु से है बोले कि आज तो तिरुवातिरा त्यौहार है। हमने कम से कम ३-४ बार पूछा तब जाकर नाम समझ में आया। साधारणतया: हर बार यही होता है क्योंकि उनका उच्चारण और हमारा उच्चारण बहुत ही अलग होता है।
अब हमने पूछा कि तिरुवातिरा त्यौहार क्या होता है, तो हमारे टीम के सदस्य ने कहा मेरी दादी ने इसके बारे में कहानी सुनाई थी वह सुनाती हूँ, हम भी ध्यान से सुनने लगे।
एक बार एक राज्य था जो कि कावेरी नदी के किनारे था और वहाँ बाढ़ आ गई, तो उस राज्य के राजा ने अपनी प्रजा को आदेश दिया कि सभी घरों से कम से कम एक व्यक्ति नदी के किनारे रेत को इस तरह से लगाया जाये कि बाढ़ का पानी राज्य में ना आने पाये। और जो राजा का आदेश नहीं मानेगा वह दंड का भागी होगा। सभी घरों से एक एक व्यक्ति इस काम में लग गये। उसी राज्य में एक बुढ़िया रहती थी जो कि मिठाई बनाकर बेचकर अपना गुजारा करती थी और उसका कोई बेटा भी नहीं था, वह सोच में पड़ गई कि क्या किया जाये। मेरे बस में रेत को नदी के किनारे लगाना है नहीं और मेरे घर में कोई भी नहीं है, शाम को मुझे दंड मिलना निश्चित है।
तभी बुढ़िया ने अपने आराध्य देव शिवजी का ध्यान किया और उनकी पूजा करने लगी और साथ ही साथ दंड की भी चिंता कर रही थी, तो शिवजी एक गड़रिये के भेष बनाकर बुढ़िया माँ के सामने प्रकट हुए और कहा कि बुढ़िया माँ मैं तुम्हारा काम कर सकता हूँ पर उसके बदले में मुझे क्या मिलेगा, तो बुढ़िया ने कहा कि मेरे पास तो रूपये पैसे नहीं हैं, मेरे पास तो केवल मिठाईयाँ हैं, मेरे काम के एवज में ये मिठाई ले सकते हो। शिवजी तैयार हो गये और मिठाई खाने में मस्त हो गये। शिवजी मिठाई खाने में मगन हो गये और काम को भूल गये, बुढ़िया को चिंता होने लगी। शाम को जब राजा राज्य के भ्रमण पर निकला तो देखा कि बुढ़िया को दी गई जगह पर रेत नहीं लगाई गई है, तो राजा ने पूछा कि यह कौन है जिसने अपना कार्य पूरा नहीं किया है, तो बुढ़िया बोली कि ये मेरी जगह है और इस चरवाहे ने तय किया था कि मिठाई के बदले में यह मेरा काम करेगा परंतु यह केवल मिठाई खाता रहा और काम नहीं किया।
चरवाहा अभी भी मिठाई खाने में मगन था, राजा ने चरवाहे से पूछा कि तुमने बुढ़िया माँ का काम क्यों नहीं किया और बुढ़िया माँ को धोखा दिया तुम्हें तो सजा मिलनी चाहिये। राजा ने जोर से बेंत से चरवाहे के पीठ पर मारा तो इतनी जोर से लगा कि जैसे बस खून ही निकलने वाला हो, और वहाँ खड़ी प्रजा भी उसी तरह कराहने लगी, सारी प्रजा को भी उतनी ही तेज पीड़ा हुई, राजा ने बेंत फ़ेंकी और चरवाहे से पूछा कि आप कौन हैं और यहाँ क्या करने आये हैं, चरवाहे ने अपना असली शिव रूप सामने लाया और संपूर्ण राज्य को आशीर्वाद दिया कि आज के बाद इस राज्य में कावेरी नदी की बाढ़ से राज्य परेशान नहीं होगा, और आज का दिन तिरुवातिरा के नाम से मनाया जायेगा और आज के दिन जिन मिठाईयों का सेवन मैंने किया है, वही मिठाईयाँ बनाई जायेंगी।
दादी माँ की कहानी सुनकर इतना मजा आया कि मैंने सोचा कि लिख दी जाये। खैर दादी माँ की कहानी होती ही मजेदार हैं। ऐसा लगता है कि सब सामने ही घट रहा है।

आज की पीढ़ी और अविष्कार…

अविष्कार मानव इतिहास में जिज्ञासा से उत्पन्न होने वाली एक महत्वपूर्ण बात है। मानव ने जब अविष्कार करना शुरू किया तब उसे जरूरत थी, आज हमारे पास इतने संसाधन मौजूद हैं परंतु अब उनको बेहतर करने की जरूरत है। अभी भी नई नई चीजों खोजी जा रही हैं।
जब पहिया खोजा गया होगा तो वह अपने आप में एक क्रांतिपूर्वक अविष्कार था, आज पहिये के बल पर ही दुनिया चल रही है अगर पहिया ना होता तो सब रुका हुआ होता, और ऐसा सोचना ही दुष्कर प्रतीत होता है।
ऐसे ही जब संगणक को बनाया गया तो बनाने वालों ने कभी सोचा नहीं था कि यह एक क्रांतिकारी बदलाव लायेगा और लगभग हर उपक्रम में इसका उपयोग होगा, तब यह भी नहीं सोचा गया था कि y2k की समस्या भी आयेगी।
आजकल किसी नौजवान से बात की जाये तो वह केवल नौकरी करना चाहता है कोई अविष्कार नहीं क्योंकि नौकरी एक सहज और सरल उपाय है जीविका का, परंतु  शोध कार्य उतना ही दुष्कर। कुछ नये विचारों को असली जामा पहनाना ही अविष्कार है। ऐसा नहीं है कि दुनिया में सभी चीजें आ चुकी हैं, हो सकता है कि चीजें अभी जिस प्रक्रिया से अभी चल रही हैं वे धीमी हों, अगर उस प्रक्रिया को और सुगम बना दिया जाये तो शायद वह चीज और भी ज्यादा लोकप्रिय हो जाये।
अभी के कुछ उदाहरण देखिये जो कि प्रक्रिया के सरलीकरण के उदाहरण हैं, यह अविष्कार अंतर्जाल के संदर्भ में हैं, जैसे गूगल, फ़ेसबुक इत्यादि।
क्या गूगल के पहले अंतर्जाल पर ढूँढ़ने के लिये खोज के साधन उपलब्ध नहीं google थे, जी बिल्कुल थे, परंतु वे इतने तकनीकी भरे थे और जो आम आदमी देखना चाहता था वह परिणाम उसे दिखाई नहीं देता था। गूगल ने एक साधारण सा पृष्ठ दिया जो कि एकदम ब्राऊजर पर आ जाता था, केवल डायल अप पर भी खुल जाता था, जबकि डायल अप की रफ़्तार उन दिनों लगभग ४० केबीपीएस. होती थी, जो कि ठीक मानी जाती थी और १२८ केबीपीएस तो सबसे बेहतरीन रफ़्तार होती थी। गूगल ने सर्च इंजिन के क्षैत्र में क्रांतिकारी बदलाव किया और lycos, AltaVista, Yahoo, Ask Jeeves, MSN Search, AOL इत्यादि को बहुत पीछे छोड़ दिया।
ऐसे ही दूसरा उदाहरण है फ़ेसबुक, फ़ेसबुक के आने के पहले क्या अंतर्जाल में facebook सोशल नेटवर्किंग वेबसाईट्स नहीं थीं ? थीं बिल्कुल थीं, परंतु उनका उपयोग करना इतना आसान नहीं था और उन सोशल नेटवर्किंग वेबसाईट्स में फ़ेसबुक जितनी सुविधा नहीं थीं। Hi5, Orkut जैसे अपने प्रतियोगियों को बहुत पीछे धकेल दिया और आज फ़ेसबुक का कोई प्रतिद्वन्दी नहीं है। क्योंकि फ़ेसबुक के निर्माताओं ने इसे बहुत ही सरल रूप दिया और आज जिसे देखो वो मोबाईल पर भी फ़ेसबुक का उपयोग कर रहा है।
आज की पीढ़ी को इस और खास ध्यान देने की जरूरत है कि नये अविष्कार भी किये जा सकते हैं, यहाँ केवल मैंने अंतर्जाल से संबंधित ही बातें करी हैं परंतु यह हरेक क्षैत्र में लागू होता है, या तो नई चीजें खोजी जाये या फ़िर जो चीजें चल रही हैं, उन्हें परिष्कृत किया जाये। तभी हमारा भविष्य युवा है।