Category Archives: अध्ययन

एफ़डीआई का हल्ले के बहाने महँगाई और रूपये के अवमूल्यन पर भी चिंतन, हलकान है जनता.. [FDI, Inflation and Depreciation of Rupee… my views]

जहाँ देखो वहीं विदेशी खुदरा दुकानों का हल्ला मचा हुआ है और जनता महँगाई के मारे हलकान हुई जा रही है। महँगाई सर चढ़कर बोल रही है।

किसान को सब्जी का क्या भाव मिलता है और दुकानें किस भाव में बेचती हैं यह एक शोध का विषय है। और अगर शोध किया जाये तो शायद दुनिया चकित रह जायेगी कि किसान को टमाटर का ३ रू. किलो मिलता है और जनता दुकानदार को ४० रू. किलो दे रही है, तो बाकी का बीच का ३७ रू. ये बड़े खुदरा दुकानों के मालिक खा रहे हैं।

जब मुंबई में थे तो वहाँ कोई भी सब्जी कम से कम ४० रू. किलो मिलती थी और अधिकतर तो १६० रू. किलो तक भाव होते थे। पता नहीं कहाँ से महँगाई आई, और यही सब्जी चैन्नई या बैंगलोर में देखें तो अधिकतम ४० रू. किलो सब्जी मिल रही है। टमाटर मुंबई में आज भी ४० रू. किलो हैं और यहाँ बैंगलोर में १६ रू. किलो मिल रहे हैं।

खैर नेता लोग चिल्ला रहे हैं कि विदेशी खुदरा दुकानें आ गईं तो हम आग लगा देंगे, खुलने नहीं देंगे, परंतु क्यों नहीं खुलने देंगे ये नहीं बता रहे हैं, जब रिलायंस रिटेल खुल रहा था तब भी लोगों ने बहुत तोड़ फ़ोड़ की थी, अब हालत यह है कि वही तोड़ फ़ोड़ करने वाले लोग रिलायंस रिटेल से समान खरीद रहे हैं।

थोड़े दिनों बाद विरोधी स्वर विदेशी खुदरा दुकानों के फ़ीता काटते नजर आयेंगे। जनता को समझाइये कि विदेशी खुदरा दुकानों से क्या नुक्सान होगा। आज अखबार में पढ़ा कि जयपुर में कैनोफ़र ने जयपुर के सभी थोक अंडा व्यापारियों से करार कर लिया है, अब सभी खुदरा व्यापारियों को अंडे मिलना बंद हो जायेगा। पहली बात तो यह उन थोक व्यापारियों की गलती है जिन्होंने ये करार किये हैं और वैसे भी भारत है जहाँ हर चीज का जुगाड़ होता है, जब सरकार जुगाड़ से चल सकती है तो ये व्यापार क्या चीज है। खैर आगे क्या होगा यह तो ये करार कार्यांन्वयन होने के बाद ही पता चलेगा। हमारे खुदरा व्यापारी कोई ना कोई तोड़ निकाल ही लेंगे।

ऐसा नहीं है कि मैं विदेशी खुदरा दुकानों का समर्थक हूँ परंतु हाँ यह अर्थव्यवस्था के लिये ठीक होगा और रूपये के अवमूल्यन होने से कुछ हद तक रोकेगा। परंतु रूपये का अवमूल्यन रोकने के लिये क्या इस तरह के हथकंडे अपनाना उचित है ? कतई नहीं !

परंतु नेता जनता को कितना बेवकूफ़ बनायेंगे, अगर इन नेताओं ने घोटाले नहीं किये होते, भ्रष्टाचार पर लगाम कसी होती और भारत के विकास में उस रूपये का योगदान किया होता तो शायद रूपये के मूल्य का अवमूल्यन नहीं होता उल्टा डॉलर कमजोर होता, परंतु सरकार विदेशी लोगों को बाजार में भी तरह तरह के साधन उपलब्ध करवाती है कि ये लोग आसानी से भाग लेते हैं, और जनता ठगी से देखती रह जाती है।

जरूरत है सरकार में नेताओं में विकास की इच्छाशक्ति की कमी की, अगर इन नेताओं में यह इच्छाशक्ति आ जाये तो हम विकास के पथ पर अग्रसर होंगे। लोग कहते हैं कि दस वर्ष में हम नंबर वन बना देंगे, पिछले पाँच वर्ष में भारत को कौन से नंबर पर लाये हैं, ये तो सब जानते हैं।

बात रही [बेचारे] खुदरा दुकानदारों की तो वे बेचारे तो रोजमर्रा कि चीजों को बेचकर अपना घर चला लेंगे। जैसे अगर आपको ब्रेड लेने जाना हो तो आप विदेशी खुदरा दुकानों में तो नहीं जायेंगे ना, बस ऐसे ही बहुत सारी चीजें हैं जो कि आप बिना पार्किंग में अपनी गाड़ी लगाये लेना चाहेंगे या घर से गाड़ी नहीं निकालकर पास के दुकान से लेंगे। तो सरकार को यह समझ लेना चाहिये कि १० लाख से ज्यादा जनता वाले शहर बहुत समझदार हैं।

मुंबई में जहाँ हम रहते थे वहाँ भी आसपास बहुत मॉल थे, परंतु लगभग सभी लोग एक किराने वाले से ही समान लेते थे, वजह वह कीमत में सीधी छूट देता था और उसकी स्कीमें भी आकर्षक होती थीं। फ़िर घर पहुँच सेवा, आप जाकर बोल दीजिये और घर पर समान पहुँच जायेगा। अगर आपकी घर से निकलने की इच्छा नहीं है तो केवल फ़ोन लगा दीजिये और समान घर पर होगा। उस किराना व्यवसायी का स्वभाव बहुत अच्छा था और मृदु भाषी है। यह सब बातें कहाँ देशी और कहाँ विदेशी खुदरा दुकानों पर मिलेंगी।

क्यों बच्चे आज भावनात्मक नहीं हैं ? क्या इसीलिये आत्महत्या के आंकड़े बढ़ रहे हैं ? (Why Childs are not emotional ? why suicidal cases are increasing ?)

शिक्षा में बदलाव बेहद तेजी से हो रहे हैं और शिक्षक और छात्र के संबंध भी उतनी ही तेजी से बदलते जा रहे हैं। कल के अखबार की मुख्य खबर थी यहाँ बैंगलोर में इंजीनियरिंग महाविद्यालय के छात्र ने होस्टल के कमरे में पंखे से फ़ांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। खबर लगते ही हजारों के झुंड में छात्र इकठ्ठे हो गये और महाविद्यालय प्रशासन के खिलाफ़ नारेबाजी करने लगे। पुलिस बुलाई गई, परंतु छात्रों ने पुलिस को भी खदेड़ दिया और महाविद्यालय की इमारत को भी नुक्सान पहुँचाया। बाद में महाविद्यालय के मालिक का बयान आया कि वह छात्र कमजोर दिल का था और लगातार पिछले तीन वर्षों से उस छात्र का प्रदर्शन बहुत कमजोर था।

विषादग्रसित यह खब्रर पढ़ने के लिये नहीं लिखी हैं मैंने, सही बताऊँ तो मैंने कल अखबार ही नहीं पढ़ा था पर कल रात्रि  भोजन पर भाई से चर्चा हो रही थी तब इस और ध्यान गया और आज सुबह कल का अखबार पढ़ पाया । मन अजीब हो उठा और लगा क्या महाविद्यालय प्रशासन ने कभी उस छात्र के मन में क्या चल रहा है, यह जानने की कोशिश की। महाविद्यालय प्रशासन महज छात्र के घर एक पत्र भेजकर अपनी जिम्मेदारी से तो नहीं बच सकता ।

आज छात्र बहुत ही संवेदनशील परिस्थितियों से गुजर रहे हैं, क्योंकि वे अब भावुक नहीं रहे, अब छात्रों से भावनाओं के बल पर कोई भी कार्य करवाना असंभव है। उसके पीछे बहुत सारे कारण जिम्मेदार हैं, परवरिश के बेहतर माहौल में कमी, शिक्षकों से अच्छा समन्वयन न होना । ऐसे बहुत सारे कारण हैं। क्योंकि आजकल बच्चों को इंटरनेट पर सब मिल जाता है तो कई बच्चे तो दोस्त भी नहीं बनाते हैं और इंटरनेट पर ही अपना समय बिताते पाये जाते हैं।

अब मेरे मन में जो सवाल उठ रहे हैं कि क्या महाविद्यालय का छात्र पर अच्छे प्रदर्शन के लिये दबाब बनाना उचित था, और अगर दबाब बनाया गया तो उसे क्या उचित मार्गदर्शन दिया गया । छात्र के घर पर पत्र भेजने से छात्र की मानसिक हालात को समझा जा सकता है। हरेक छात्र के माता-पिता यही सोचते हैं कि बेटा अच्छा पढ़ रहा है परंतु अगर महाविद्यालय से इस प्रकार का पत्र मिले तो वे यकीनन ही अपने बेटे पर क्रुद्ध होंगे, और उसे परिस्थिती से बचने के लिये उस छात्र ने आत्महत्या कर ली हो ? छात्र तो पहले से ही विषादग्रसित था, उसको मनोवैज्ञानिक तरीके से संभालना चाहिये था। परंतु ऐसा ना हुआ, अब उन माता-पिता पर क्या गुजर रही होगी जिन्होंने अपना जवान बेटा इसलिये खो दिया क्योंकि वह पढ़ाई में कमजोर था, नहीं ? वह पढ़ाई में कमजोर होने के कारण विषादग्रसित हो चला था।

पढ़ाई में कमजोर होना कोई बुरी बात तो नहीं, पढ़ाई ही तो सबकुछ नहीं है, उससे बढ़कर होता है जीवन जीने का हौसला और उस विषादित परिस्थिती से निकालने में सहायक परिवेश और परवरिश। कमजोर पढ़ाई वाले पता नहीं कितनी आगे निकल गये हैं और पढ़ाई वाले कहीं पीछे रह गये हैं।

मुख्य सवाल जो मेरे मन में है और उसका उत्तर खोजने की कोशिश जारी है मनन जारी है, क्यों बच्चे आज भावनात्मक नहीं हैं ? और उनके आधुनिक परिवेश में उन्हें कैसी परवरिश देनी चाहिये ?

झारखंड धनबाद का पहला दलित डॉन बन रहा है या यूँ भी कह सकते हैं कि बन चुका है। (First Dalit Don or Robin Hood – Dhulu Mahato)

झारखंड धनबाद का पहला दलित डॉन बन रहा है या यूँ भी कह सकते हैं कि बन चुका है।
परिचय है – धुलु महतो, उम्र ३५ वर्ष बाघमारा से विधायक हैं । धनबाद के कोयला क्षैत्र के उभरते हुए डॉन हैं। और इनकी कहानी भी किसी फ़िल्मी हीरो से कम नहीं है।
dhulu mahato
 [फ़ोटो द वीक पत्रिका के ऑनलाईन एडीशन से लिया गया है]
धुलु महतो का अपनी कमाई को अपने साथ काम करने वालों के साथ साझा करने के कारण वे बहुत लोकप्रिय हैं, कहा जाता है कि लगभग आधी कमाई वे अपने साथ काम करने वालों में बाँटते हैं, और उनकी रोज की कमाई लगभग २० लाख रुपये बताई जाती है, धुलु महतो इस बात को मानने से इंकार करते हैं, और कहते हैं कि भगवान करे मेरी कमाई और बड़ती जाये और २० लाख हो जाये।
इंटर पास करने के बाद भारत कुकिंग कोल लिमिटेड के सिनिधि कोलिरि में सन १९९४ में मजदूरी से काम करना शुरू किया था और जल्दी ही धुलु महतो मजदूरों के लोकप्रिय नेता बन गये, वे मजदुर जो कि रेल्वे वेगनों और ट्रक में कोयले की खदान से कोयला ढ़ोते थे। सन २००० में राबड़ी सरकार के एक मंत्री समरेश सिंह ने उनका प्रभाव देखा और धुलु महतो को चीता फ़ोर्स का प्रमुख बना दिया। यह एक ऐसा ग्रुप था जो कि समरेश सिंह के लिये कोयला खदान क्षैत्र से “टैक्स” याने कि उगाही का काम करता था। और पुलिस जब भी चीता फ़ोर्स के लोगों को रंगदारी लेने के जुर्म में ले जाती तो धुलु महतो पुलिस पर दबाब बनाकर उनको छुड़ा लाता था।
सन २००५ में बाघमारा से धुलु महतो ने झारखंड वनांचल कांग्रेस से विधायक के लिये चुनाव लड़ा और हार का सामना करना पड़ा परंतु धुलु को मिले वोटों की संख्या जो कि २५,००० थी, से सब चकित थे। सन २००९ में ठीक चुनाव के पहले भूतपूर्व मुखयमंत्री बाबूलाल मरांडी की झारखंड विकास मोर्चा में आ गये और वापस से बाघमारा से चुनाव लड़ा और सरकार में मंत्री रहे और लगातार दो बार के विधायक रहे जलेश्वर महतो को लगभग ३०,००० वोटों से हरा दिया। जलेश्वर महतो का तो यह भी कहना है कि धुलु महतो स्थानीय प्रशासन और पुलिस के सहयोग से कोयला कंपनी को लूट कर कंगाल कर रहे हैं।
लेकिन लोग धुलु महतो को वहाँ का रॉबिनहुड कहते हैं, जब वे अपनी टोयोटो फ़ोर्चूनर में कहीं जाते हैं तो एक दर्जन से ज्यादा गाड़ीयाँ उनके आसपास रहती हैं। कहा जाता है कि जब उनकी पत्नी सावित्री देवी धनबाद के मेयर का पर्चा दाखिल करने गईं थीं तो लगभग ३०,००० बाईक सवार उनके समर्थन में उनके साथ गये थे, हालांकि सावित्री देवी का नामांकन ३० वर्ष से कम उम्र होने के कारण रद्द कर दिया गया था। पर इससे धुलु महतो के प्रभाव की झलक देखने को मिलती है।
जानकार बताते हैं कि अगर धुलु महतो का प्रभाव इसी तरह बड़ता रहा तो जल्दी ही सुरेश सिंह जो कि अभी धनबाद का डॉन है, का प्रभुत्व खत्म हो सकता है। धनबाद के ५० खदानों में से २५ खदानों पर धुलु महतो का राज चलता है, यह कहना है भाजपा के नेता कुमार अभिषेक का, उनका तो यह भी कहना है कि धुलु महतो ने एक दर्जन एके-४७ और एके-५७ कोलकाता से खरीदी हैं।
एक भा.कु.को.लि. के अधिकारी का कहना है कि हर माह धुलु महतो अपने विधानसभा क्षैत्र से लगभग २०,००० टन कोयला खदानों से फ़्लोर प्राईज पर लेते हैं, और यह लगभग पिछले दो वर्षों से चल रहा है, धुलु हर टन पर १,२०० रुपये बनाते हैं। धुलु महतो की शिकायत कई बार उच्च पुलिस अधिकारियों से की गई परंतु कोई कार्यवाही नहीं की गई, यह कहना है भाजपा सांसद पी.एन.सिंह का।
पुलिस का कहना है कि धुलु महतो बिल्कुल साफ़ हैं उनका कभी भी किसी भी खून, अपहरण या बलात्कार में हाथ नहीं रहा है। धुलु महतो एक ऐसे डॉन हैं या बन रहे हैं जो कि धनबाद के गरीबों के लिये काम कर रहे हैं और उनकी मदद कर रहे हैं। धुलु महतो भी कहते हैं कि मैं कोई अपराधी नहीं हूँ। मैं एक बहुत ही साधारण इंसान हूँ और मेरा धन बनाने वाली गतिविधियों से कोई सारोकार नहीं है, जबकि मेरे विरोधी कहते हैं कि मैं इन सबमें शामिल हूँ। यहाँ तक कि मेरी डॉन बनने की कोई इच्छा भी नहीं है। परंतु हाँ मैं यह कहता हूँ कि मेरी चीता फ़ोर्स उनको जरूर ठीक करेगी जो कि गरीबों को परेशान करते हैं।
सूत्रों के अनुसार धुलु महतो के बढ़ते प्रभाव ने उनके दुश्मनों को भी एक कर दिया है।
धुलु महतो का धनबाद और आसपास के क्षैत्र में प्रभाव बड़ता ही जा रहा है
[यह लेख द वीक में छपे लेख पर आधारित है, जो कि ३१ अक्टूबर को द वीक पत्रिका में छपा है]

पिटने को तैयार रहें, भारत में अराजकता पैर पसार चुकी है ।

कल पटियाला हाऊस कोर्ट के सामने जो भी हुआ अन्ना के समर्थकों के साथ उससे प्रशासन और भारत सरकार का संदेश साफ़ है कि आम जनता और अन्ना के समर्थक पिटने को तैयार रहें, वे सीधे नहीं पीट सकते हैं तो कुछ गुंडे जिनको सरकार ने शह दी है या फ़िर उनके ही हैं, वे जनता को पीट सकते हैं, और इसका सीधा मतलब है कि भारत में अराजकता पैर पसार चुकी है।

अब जनता या तो पिटने को तैयार रहे या फ़िर प्रशासन और इन गुंडों के खिलाफ़ खुद ही लठ्ठ लेकर तैयार रहे। क्योंकि प्रशासन की जाँच का हश्र तो सभी जानते हैं, जाँच चलती रहेगी और इन गुंडों पर केस चलते रहेंगे।

नाम भी श्रीराम का लिया है, वे श्रीराम जो कि समाज के लिये आदर्श हैं, मर्यादा पुरूषोत्तम हैं, पिता के वचन के लिये वनवास स्वीकार लिया । धिक्कार है ऐसे लोगों पर जो श्रीराम के नाम पर सेना का निर्माण कर रहे हैं और श्रीराम के नाम का गलत उपयोग कर रहे हैं।

पोलिथीन याने कि प्लास्टिक की थैलियाँ हम कितनी उपयोग करते हैं ? और कपड़े के थैले कहाँ गये ?

    आजकल जिधर देखो उधर हर किसी के हाथ में पोलिथीन की थैलियाँ दिखती हैं, कपड़े और जूट के थैले तो हाथों से गायब ही हो गये हैं, अगर कहीं भूले भटके दिख भी गये तो बड़ा आश्चर्य होता है।

    मुझे बहुत अच्छे से याद है कि जब छोटा था तब हमारे घर में कम से कम पाँच छ: थैले हुआ करते थे, जिसमें सब्जी लाने का अलग और किराने लाने का अलग थैला होता था। कपड़े के थैले बाजार में तो मिलते नहीं थे तो मम्मीजी घर पर ही सिलाई मशीन पर सिलती थीं, अगर किसी काम के लिये कोई कपड़ा आया हो और उसमें से कोई कपड़ा बच गया तो उसका थैला सिल जाता था, और थैले भी अलग अलग अनुपात के होते थे, कम सब्जी वाले और ज्यादा सब्जी वाले, इसी तरह कम किराने वाले और ज्यादा किराने वाले।

    आज भी घर पर समान लाने के लिये पापाजी थैले का ही उपयोग करते हैं, प्लास्टिक की थैलियों को तरजीह नहीं देते हैं, परंतु बहुत सारी चीजें बदल गई हैं, पहले जब कपड़े के थैले उपयोग करते थे तो सब्जी को घर पर आकर छांटना पड़ता था और उसमें भी काफ़ी मजा आता था, फ़ली, भिंडी, मटर और मिर्ची तो आपस में गुत्थमगुत्था ही मिलती थीं, शिमला मिर्च, आलू, प्याज और टिंडे एक दूसरे में मिल जाते थे, उनको अलग अलग करना एक रोमांच ही होता था। पर धीरे धीरे प्लास्टिक की थैलियों ने जगह बनाई, अब जब दुकान पर सब्जी खरीदी तो बेचारी सारी सब्जियाँ अपने अपने थैलियों में सिमट कर रह गई हैं, कभी एक दूसरे से गुत्थमगुत्था हो ही नहीं पाती हैं, खैर उस जमाने में फ़्रिज नहीं हुआ करता था तो लगभग रोज ही ताजी सब्जी मिलती थी, परंतु आजकल फ़्रिज आने से इतनी खराब आदत हो चली है कि शनिवार या रविवार को पूरे सप्ताह की सब्जियाँ लाकर फ़्रिज भार लेते हैं, और फ़िर पूरे सप्ताह भर खाते रहते हैं। बस पत्तेदार सब्जियाँ अब भी तभी आती हैं जिस दिन खानी होती हैं।

    अब मॉल में जाते हैं, कोल्डस्टोरेज की निकली हुई ताजी सब्जियाँ लेकर आते हैं, हर सब्जी के लिये अलग छोटी छोटी प्लास्टिक की थैलियाँ मौजूद रहती हैं, आजकल तो सब्जियाँ रेडीमेट पोलिथीन मॆं पैक वजन के साथ दाम लिखी हुई भी मिलती हैं, बस ये थोड़ी महंगी होती हैं ३०-३५% तक। हमने एक बात तो देखी कि बाजार में सब्जियाँ महंगी हैं और मॉल में सब्जियाँ सस्ती हैं, और कई बाहर ठेला लगाने वाले तो इन मॉलों से ही सब्जी खरीदते हैं और ज्यादा दामों पर बाहर बेचते हैं।

    खैर हमने वापिस से कपड़े के थैले का उपयोग करना शुरू किया है, जिसमें दूध, ब्रेड वगैरह लेकर आते हैं, वैसे यह भी मजबूरी में है क्योंकि सरकार ने प्लास्टिक की थैलियों पर रोक लगाई हुई है, जब रोक लगी थी, तब लगभग सभी दुकानों से थैलियाँ गायब हो गई थीं, परंतु थैलियाँ ना होने के वजह से धंधे पर असर होने लगा तो अब रोक के बाबजूद प्लास्टिक की थैलियाँ दुकानदारों को रखना पड़ती हैं।

    पहले कचरे के डिब्बे के लिये अलग से पोलिथीन लानी पड़ती थी, परंतु अब माह भर में मॉल से इतनी खरीदारी हो जाती है कि अलग से कचरे के लिये पोलिथीन खरीदने की जरूरत ही नहीं पड़ती है। एक प्रकार से हम पोलिथीन का सदुपयोग भी कर रहे हैं। पर हाँ अब कपड़े के थैले पर जाना बहुत मुश्किल लगता है।

क्या बच्चों को होस्टल में नहीं डालना चाहिये ? (Should not put children in Hostel ?)

    “बच्चे मन के सच्चे सारे जग के राजदुलारे, ये वो नन्हे फ़ूल हैं जो भगवान को लगते प्यारे”, बच्चों के ऊपर लिखा गया बहुत पुराना गीत याद आ गया । जिसमें उनके मन को भी बताया गया है कि बच्चे मन के सच्चे होते हैं और उनका मन दर्पण की तरह साफ़ होता है कोई कपट नहीं कोई लालच नहीं।

    कल फ़िल्म “हरे कृष्णा हरे राम” देख रहा था तो आखिरी में जैनिस उर्फ़ जसबीर (जीनत अमान) का संवाद देवानंद से दिखाया गया है, जिसमें जैनिस का एक संवाद कि “मुझे घर की जगह होस्टल मिला”। बहुत गहरे तक उतर गया कि आखिर होस्टल क्यूँ ?

    क्या होस्टल में बच्चे ज्यादा पढ़ते हैं या माता पिता यह सोचकर भेज देते हैं कि कम से कम उनकी तरफ़ से पढ़ाई लिखाई करवाने की जिम्मेदारी खत्म, केवल फ़ीस भरी और बोर्डिंग में डाल दिया। होस्टल या बोर्डिंग में डालने की और भी कोई वजह हो सकती है। खैर मुझे तो समझ में नहीं आती केवल इसके कि बच्चे जो बोर्डिंग में रहते हैं, वो बचपन से ही भला बुरा समझने लगते हैं, और जो घर में रहते हैं वे धीरे धीरे जिंदगी के अनुभवों से सीखते हैं।

    बोर्डिंग में रहने वाले बच्चों का जीवन बिल्कुल संयमित होता है, समय पर सारे कार्य करने होते हैं और घर पर रहने वाले बच्चों के लिये आजादी रहती है वे कुछ भी कर सकते हैं, वे दीन दुनिया और सामाजिकता में अपने आप को लबालब पाते हैं, और बोर्डिंग में रहने वाले बच्चों को यह सब तो नहीं मिल पाता पर जो हम उम्र बच्चों का साथ और अपने ही कक्षा के बच्चों से मस्ती करने को मिलती है वो घर वाले बच्चों को नहीं मिल पाती।

    हमारे एक परिचित हैं उन्होंने एक प्रसिद्ध स्कूल में अपने बच्चे को डालने की सोची कि बोर्डिंग भी है और फ़ीस भी बहुत थी, स्कूल भी काफ़ी अच्छा था, परंतु अंतिम समय पर माता पिता अपने दिल के हाथों मजबूर हो गये और बच्चे को बोर्डिंग में नहीं डाला।

    तो क्या बोर्डिंग में डालने वाले माता पिता अपने बच्चों से प्यार नहीं करते ? ऐसा तो कतई नहीं है, और मैं भी इस बात से सहमत नहीं हूँ परंतु ऐसी क्या चीज है जो माता पिता को बोर्डिंग में डालने पर मजबूर करती है ? विश्लेषण की आवश्यकता है ?

अब स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com का क्या होगा ? लालच की पराकाष्ठा कर दी ।

पहली पोस्ट – स्पीक एशिया ऑनलाईन संभावित बड़ा घोटाला तो नहीं (Probable Scam SpeakAsiaOnline.com !!)

    मेरी पहली पोस्ट स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com पर १७ अप्रैल को थी, इससे पहले तो मैंने इस कंपनी के बारे में कुछ सुना भी नहीं था। खैर अब मछली मगरमच्छ हो गई है और अब सब उसका क्रेडिट लेने में लगे हैं।

    जबकि अक्टूबर में मनीलाईफ़ पत्रिका ने इनके व्यवसाय के बारे में आपत्ति जताते हुए लिखा था कि रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया, आर्थिक अन्वेषण ब्यूरो क्या सो रहे हैं ?

    खैर अब तो सबके सामने सच आ ही गया है, १ महीने पहले इस कंपनी के पास ९ लाख लोग थे और १ महीने में ही १० लाख लोगों को जोड़ लिया है। सोचिये अब यह संख्या बढ़कर १९ लाख हो गई है।यह तो लालच और बिना कुछ करे कमाने की हम भारतियों की पराकाष्ठा है।

    कई ऐसे लोगों को देखा जो कि ४-५ हजार की निजी नौकरी कर रहे थे और जैसे तैसे अपना घर चला रहे थे, उन्होंने लाख रुपये स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com में लगाकर ४० हजार कमाने के ख्बाब देखे और अब कंपनी के ऊपर मीडिया और सरकार का दबाब पड़ने लगा है, अगर स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com गायब हो गई तो इन लोगों के लाख रुपये कौन लौटायेगा और सबसे बड़ी बात क्या इनको आसानी से वापिस नौकरी मिल पायेगी। आज यह घोटाला लगभग 1900 करोड़ रुपये का हो चुका है।

    और जो लोग इससे कमा रहे हैं, वे मीडिया और सरकार का विरोध कर रहे हैं, कि स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com एक तो भारत के बेरोजगारों को रोजगार दे रहा है और सभी लोग उसे बंद करवाने के पीछे पड़े हैं, और इन बेरोजगारों और लालची लोगों को क्या यह बात समझ में नहीं आती है,  कि ये मीडिया और सरकार केवल स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com के पीछे ही क्यों पड़े हैं, और किसी कंपनी के पीछे क्यों नहीं। अगर स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com बताये कि उनकी आमदनी का क्या जरिया है, और अपनी बैलेन्स शीट सबके सामने रखे तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा।

    अगर नेट और सर्वे से पैसे कमाना इतना ही आसान होता तो शायद नेट का उपयोग करने वाले लोग करोड़पति अरबपति हो चुके होते।

    अभी कुछ दिन पहले २ लाख लोगों को स्टॉकगुरुइंडिया ५०० करोड़ का चूना लगाकर गायब हो चुकी है, उनका व्यापार भी कुछ इनकी तरह से ही था।

    वैसे भी हिन्दुस्तान टाईम्स सिंगापुर जाकर स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com के ऑफ़िस की पड़ताल आज कर चुका है, और वहाँ कुछ भी नहीं मिला है। और अब आयकर विभाग की भी आँख खुली है (चलो देर से ही सही, जब जागो तब सवेरा)।

संगीत विज्ञान के बारे में …

    संसार मे संगीत विज्ञान की सबसे पहली जानकारी सामवेद में उपलब्ध है। भारत में संगीत, चित्रकला एवं नाट्यकला को दैवी कलाएँ माना जाता है। अनादि-अनंत त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और शिव आद्य संगीतकार थे। शास्त्र-पुराणों में वर्णन है कि शिव ने अपने नटराज या विराट-नर्तक के रूप में ब्रह्माण्ड की सृष्टि, स्थिति और लय की प्रक्रिया के नृत्य में लय के अनंत प्रकारों को जन्म दिया। ब्रह्मा और विष्णु करताल और मृदंग पर ताल पकड़े हुए थे।

    विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती को सभी तार-वाद्यों की जननी वीणा को बजाते हुए दिखाया गया है। हिंदू चित्रकला में विष्णु के एक अवतार कृष्ण को बंसी-बजैया के रूप में चित्रित किया गया है; उस बंसी पर वे माया में भटकती आत्माओं को अपने सच्चे घर को लौट आने का बुलावा देने वाली धुन बजाते रहते हैं।

    राग-रागिनियाँ या सुनिश्चित स्वरक्रम हिन्दू संगीत की आधाराशिलाएँ हैं। छह मूल रागों की १२६ शाखाएँ-उपशाखाएँ हैं जिन्हें रागिनियाँ (पत्नियाँ) और पुत्र कहते हैं। हर राग के कम-से-कम पाँच स्वर होते हैं: एक मुख्य स्वर (वादी या राजा), एक आनुषंगिक स्वर (संवादी या प्रधानमंत्री), दो या अधिक सहायक स्वर (अनुवादी या सेवक), और एक अनमेल स्वर (विवादी या शत्रु)।

    छह रागों में से हर एक राग की दिन के विशिष्ट समय और वर्ष की विशिष्ट ॠतु के साथ प्राकृतिक अनुरूपता है और हर राग का एक अधिष्ठाता देवता है जो उसे विशिष्ट शक्ति और प्रभाव प्रदान करता है। इस प्रकार (१) हिंडोल राग को केवल वसन्त ऋतु में उषाकाल में सुना जाता है, इससे सर्वव्यापक प्रेम का भाव जागता है; (२) दीपक राग को ग्रीष्म ऋतु में सांध्य बेला में गाया जाता है, इससे अनुकम्पा या दया का भाव जागता है; (३) मेघ राग वर्षा ऋतु में मध्याह्न काल के लिये है, इससे साहस जागता है; (४) भैरव राग अगस्त, सितंबर, अक्तूबर महीनों के प्रात:काल में गाया जाता है, इससे शान्ति उत्पन्न होती है; (५) श्री राग शरद ऋतु की गोधुली बेला में गाया जाता है, इससे विशुद्ध प्रेम का भाव मन पर छा जाता है; (६) मालकौंस राग शीत ऋतु की मध्यरात्रि में गाया जाता है; इससे वीरता का संचार होता है।

स्पीक एशिया ऑनलाईन संभावित बड़ा घोटाला तो नहीं (Probable Scam SpeakAsiaOnline.com !!)

कुछ दिनों पहले इंदौर से भाई का फ़ोन आया कि क्या आपने स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com का नाम सुना है, हमने कहा कि नहीं भई बताओ हमें भी क्या है यह ?

speak_logo_black

जैसा हमारा भाई स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com के सेमिनार में सुनकर आया था, वह यह था –

स्पीक एशिया ऑनलाईन  SpeakAsiaOnline.com के बारे में –

  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com कंपनी पिछले ५-६ वर्ष से सर्वे में है।
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com कंपनी पहले मानविक सर्वे करवाती थी।
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com कंपनी मानविक सर्वे से अच्छे परिणाम न आने के कारण ऑनलाईन सर्वे करवाने बाजार में आयी है।
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com मानविक सर्वे में पहले अपने अधिकारी को प्रति सर्वे फ़ॉर्म ५०० रुपये तक देती थी, परंतु आम आदमी अपनी जानकारी नहीं देता था, तो जो कंपनी स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.comको सर्वे के लिये अनुबंधित करती थी, वह बाजार से सही जानकारी नहीं ले पाती थी, क्योंकि अधिकारी अपने मनमर्जी से किसी की भी जानकारी दे देता था।
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com अधिकारी को पहले महीने में ६-८ फ़ॉर्म देती थी जिससे केवल वह अधिकारी कड़ी धूप में कड़ी मेहनत करके ही ४,००० रुपये तक कमा पाता था।
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com ने बाद में फ़ैसला किया कि अब अधिकारियों को फ़ॉर्म देने की जगह अब सीधे उपभोक्ता से जुड़कर सीधे उनसे ही सर्वे करवाया जाये।
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com ने लगभग ११ महीने पहले ऑनलाईने सर्वे की शुरुआत की जिसका अंतर्जाल पता है www.speakasiaonline.com
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com अपना नया सर्वर लगा रही है जो कि फ़ेसबुक और गूगल से भी बड़ा होगा।
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com एक नया टीवी चैनल शूरु करने जा रही है।

स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com के रजिस्ट्रेशन के बारे में –

स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com के विज्ञापन के बारे में –

स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com संभावित घोटाला क्यों हो सकता है –

  •  स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com कंपनी सिंगापुर में व्यापार करने के लिये सिंगापुर सरकार द्वारा क्यों प्रतिबंधित है ?
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com जब से घटित की गई है, तब से ३ बार अपना नाम क्यों बदला ?
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com कंपनी का नाम सर्वे कंपनियों में क्यों नहीं आता है ?
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com के बारे में कुछ लोग कहते हैं कि यह पिछले १५ वर्षों से बाजार में है, पर वेबसाईट पर स्पीक एशिया ऑनलाईन के रजिस्ट्रेशन के बारे में यह क्यों बताया गया है कि यह २००६ में रजिस्टर्ड है ?
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com ने अपने किसी भी ग्राहक के बारे में क्यों जानकारी नहीं दी है जो कि उनके सर्वे का उपयोग करते हैं ?
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com अपने कमाई का जरिया क्यों नहीं बताता है, वह क्यों छिपाकर रखा है ?
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com क्यों अभी तक डॉलर में पैसा दे रही है ?
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com पैनल को देने वाली रकम जो कि कमाई है भारत सरकार को कर क्यों नहीं दे रही है ?
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com सर्वे से क्या पैसे कमाना क्या इतना आसान है ?
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com केवल बुधवार को मात्र एक घंटे काम करने पर कैसे १,००० रुपये पैनल को देती है ?
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com सर्वे जैसी और भी ऑनलाईन सर्वे कंपनियाँ बाजार में क्यों नहीं हैं ?
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com सर्वे कंपनी से अगर वाकई पैसे कमाना इतना आसान है तो केवल एक ही सर्वे कंपनी बाजार में क्यों है ?
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com कह रही है कि उनकी कमाई इस वर्ष में ११५ मिलियन डॉलर से ज्यादा हो जायेगी तो हरेन्द्र कौर (सीईओ) और तारक बाजपेयी (भारत प्रमुख) के नाम शीर्ष प्रमुखों की सूची में कहीं भी क्यों नहीं हैं।
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com का नाम कहीं भी बिजनैस टाइकून्स में क्यों नहीं है, जबकि वैश्विक स्तर पर इतनी तेजी से बड़ती हुई कंपनी है ?
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com का अभी तक भारत में कोई कार्यालय क्यों नहीं है ?
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com के वेबसाईट पर कोई भी वैधानिक दस्तावेज प्रदर्शित क्यों नहीं है ?
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com कंपनी अगर बंद हो जाती है तो भारत में कोई भी अधिकृत व्यक्ति नहीं है क्यों ?
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com कमाई से टीडीएस क्यों नहीं काटती है ?
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com पर सीईओ और एम.डी. के संदेश क्यों नहीं हैं ?
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com क्यों एक जैसे सर्वे प्रति बुधवार दे रही है ?
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com एक जैसे सर्वे देने से क्या इनको वाकई कमाई हो रही है ?
  • स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com एक डॉलर के ५० रुपये कैसे दे रहा है जबकि इसका असली बाजार मूल्य ४६ रुपये के आसपास है ?

स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com के जैसे घोटाले पहले भी भारत में हो चुके हैं –

स्पीक एशिया ऑनलाईन SpeakAsiaOnline.com के बारे में क्या ज्यादा जानकारी के लिये भारत सरकार कुछ कर रही है ? अभी तक लगभग ९ लाख लोगों से ये लोग पैसे ऐंठ चुके हैं और लगातार भोले भाले लोगों को फ़ँसा रहे हैं, क्या साईबर क्राईम पुलिस इस बारे में संज्ञान लेकर इसकी तह तक जाने की कोशिश करेगी ? क्या रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया इतने बड़े फ़ोरेक्स ट्रांजेक्शनों से अनभिज्ञ है ?

आज जब मैंने कंपनी की वेबसाईट पर जाकर डेमो सर्वे करने की कोशिश की तो एरर मैसेज आ गया –

speakasiaonline

अपनी प्रतिक्रिया बतायें – वैसे मुझे तो लगता है कि कंपनी अगस्त २०११ में सब माल असबाब लपेटकर गायब होने वाली है। बाकी तो समय ही बतायेगा कि क्या सही है और क्या गलत !!

आज के परिपेक्ष्य में गोवर्धन पर्वत प्रसंग..

    आज श्रीमदभागवत कथा सुन रहे थे, तो उसमें एक प्रसंग था जब कृष्णजी इन्द्र के प्रकोप की बारिश से बचाने के लिये गोकुलवासियों के लिये गोवर्धन पर्वत को अपनी चींटी ऊँगली याने कि सबसे छोटी ऊँगली से तीन दिनों तक उठा लेते हैं, तो गोकुलवासी भी पर्वत को उठाने में अपने सामर्थ्य अनुसार योगदान करते हैं, कोई अपने हाथों से पर्वत को थामता है तो कोई अपनी लाठी पर्वत के नीचे टिका देता है। इस तरह से तीन दिन बीत जाते हैं, तो गोकुल वासी कृष्णजी से पूछते हैं “लल्ला तुमने तीन दिन तक कैसे गोवर्धन पर्वत को उठा लिया ?” अब कृष्णजी कहते कि मैं भगवान हूँ कुछ भी कर सकता हूँ तो गोकुलवासी मानते नहीं, इसलिये उन्होंने कहा कि “आप सब जब पर्वत के नीचे खड़े थे और सब मेरी तरफ़ देख रहे थे, तो मेरे शरीर को शक्ति मिल रही थी और उस शक्ति को मैंने अपनी चीटी यानी कि छोटी ऊँगली को देकर इस पर्वत को उठा रखा था” तो भोले भाले गोकुल वासी बोले “अरे ! लल्ला तबही हम सोच रहे हैं कि हम सभी को कमजोरी क्यों लग रही है ।”

    अब यह तो हुआ कृष्णजी के जमाने का प्रसंग अब अगर यही आज के जमाने में हुआ होता तो सबसे पहले तो उनको अस्पताल ले जाया जाता और पता लगाया जाता कि “लल्ला” में इतनी ताकत कैसे आई और इतना बड़ा पर्वत उठाने पर भी एक फ़्रेक्चर भी नहीं आया। फ़िर विरोधी पक्ष सदन में हल्ला मचाता कि इतनी मुश्किल से इंद्र देवता ने बारिश की थी और ई लल्ला ने ऊ सब पानी बहा दिया फ़िर सबही चिल्लाते हैं कि पानी की प्रचंड कमी है।

    और जो जबाब कृष्ण जी ने गोकुलवासियों को दिया था वही जबाब आज देते तो सब उनके पीछे पड़ जाते कि ई लल्ला ने किया ही क्या है, हमारी सबकी थोड़ी थोड़ी ताकत का उपयोग करके ई छॊटा सा पराक्रम कर दिया अब इस ताकत के बदले में हम सबको अनुदान दिया जाये और इस लल्ला के विरुद्ध एक जाँच कमेटी बनायी जाये कि इस लल्ला ने कौन कौन से पराक्रम किस किस की ताकत का उपयोग करके किये हैं।

वाकई भगवान श्रीकृष्ण अपना माथा ठोक लेते ….. ।