Category Archives: अनुभव
कितनी अच्छी ठंड होती थी पहले…
पता नहीं दिल कब मानेगा कि हाँ अब शरीर को ठंड लगती है, देखने से पता चलता है हाथ और पैर के बाल ठंड के मारे एक दम सीधे खड़े हैं जैसे किसी जंगल में किसी ने कोई तरकीब से बाँस के पेड़ उगा दिये हों। पहले जब ठंड पड़ती थी तो ऊन की वो ५-६ किलो की रजाई में घुसने का मजा ही कुछ और था परंतु याद आया वो तो बचपन था, जैसे जैसे किशोर हुए वो गोदड़ी गायब हुई और राजस्थानी रजाई आ गई, जब पहली बार राजस्थानी रजाई देखी थी तो ऐसा लगा था कि ये मारवाड़ी मजाक कर रहा है भला कभी इतनी पतली रजाई में ठंड भागती है क्या ? फ़िर भी हम ४ रजाई ले आये सबके लिये एक एक….
राजस्थानी रजाई का ही कसूर है उसने हमें सिखाया कि ठंड खत्म हो रही है, नहीं तो इसके पहले तो कंबल भी ओढ़ लेते थे और उसके रोएँ की चुभन इतनी अच्छी लगती थी क्योंकि अगर वह हटा देते तो ठंड लगती, चुपचाप कभी ट्रेन में कभी रेल्वे स्टेशन पर तो कभी बस स्टैंड में वह कंबल ओढ़े हाथ में चाय की कुल्हड़ से चाय पीते हुए और हाथ जो कंबल के बाहर होते थे वो हिमालय की हवाओं से ठंडे होते थे, उन हाथों को गर्म करने के लिये कभी अलाव के ऊपर रखते तो कभी कंबल के अंदर करके रगड़ से ठंडा करने की कोशिश करते । फ़िर हाथों के लिये कार्तिक मेले से दस्ताने लिये थे, परंतु वे रेग्जीन के दस्ताने हाथ और ठंडे करते थे तो माँ ने ऊन का दस्ताना बुन दिया था, जिसे कभी उतारने की इच्छा ही नहीं होती थी।
किशोरावस्था से जवानी तक आते आते स्वेटर और पुलोवरों का फ़ैशन खत्म हो चला था, अब जर्किनों का फ़ैशन था, स्वेटर में तो छन छान कर ठंडी हवा भी लगती थी परंतु जर्किन में बाहरी ठंडी हवा का कोई नामो निशां नहीं था। कभी भेड़ की फ़र वाली जर्किन कभी दोहरी तरफ़ वाली जर्किन, एक जर्किन खरीदो और दो जर्किनों के मजे लो। कभी पापा की जर्किन पहन लो कभी भाई की, कितनी अच्छी ठंड होती थी पहले पूरे परिवार को एक साथ अपना सामना करना सिखाती थी, और सबका साईज एक हो जाता था। माँ ने इतने सारे हॉफ़ स्वेटर बनाये थे खासकर कुछ स्वेटर तो मेरे मनपसंदीदा थे जिनपर की गई डिजाईन तो माँ ने अपने आप की थी परंतु वे डिजाईन मन को ऐसे भाये कि उन्हें कभी जुदा नहीं कर पाया।
आज न वो स्वेटर पास हैं, न ही वो जर्किन, जर्किन तो हैं परंतु अकेले पहनना पड़ती है, न पापा हैं यहाँ ना भाई है यहाँ कि मेरी जर्किन में गर्मी बड़ जाये और न वो माँ का बुना हुआ हॉफ़ स्वेटर मेरे पास है, परंतु हाँ उन सबकी गर्मी मेरे पास है, तभी तो मैं आज भी कहता हूँ और नहीं मानता हूँ कि मुझे ठंड लग रही है…..
नये प्रकार के वायरस से सावधान (Alert from new type of Virus)
आज की पीढ़ी और अविष्कार…
हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है… एक मेमशाब है साथ में शाब भी है..
एक गँवार आदमी को एक देश का सूचना तकनीकी मंत्री बना दिया गया, जिसे संगणक और अंतर्जाल का मतलब ही पता नहीं था। उस गाँव के संविधान में लिखा था कि सभी को अपनी बातें कहने की पूर्ण स्वतंत्रता है, परंतु उस जैसे और भी गँवार जो कि पेड़ के नीचे लगने वाली पंचायत में बैठते थे। उस पंचायत का मुखिया बनाया गया एक ईमानदार और पढ़े लिखे आदमी को, परंतु पंचायत पर राज उनके पीछे बैठी एक भैनजी और उनके बबुआ चलाते थे।
एक बार एक आदमी विदेश से आया और साथ में अखबार लाया और उसमें उसने पंचायत के सामने वह अखबार रखा कि देखो कि फ़ैबुक और विटेर पर लोग क्या क्या अलाय बलाय लिखते हैं और फ़ोटो अपने तरीके से बनाकर छापते हैं। पहले तो जब पंचायत और लोगों को जब वह अखबार दिखाया गया तो सभी लोग अपनी हँसी मुँह दबाकर छिपाते रहे, परंतु तभी उस पंचायत के सूचना तकनीकी मंत्री जो कि उस गाँव के टेलीफ़ोन के खंबे भी ढंग से गिन नहीं पाते थे, कहने लगे अरे ये तो हम भी अपने ही गाँव में कहीं देखे थे, उस दिन बड़ा अच्छा लग रहा था, उस दिन हम केवल फ़ोटू देखे थे कि मुखिया राजदूत चला रहे हैं और भैन जी उनके पीछे बैठकर फ़टफ़टिया के मजे ले रही हैं, उस दिन हमें लगा था कि वाह मुखिया ने भैनजी के संग क्या फ़ोटू हिंचवाया है।
आज पता चला कि ये तो जनता ने खुदही बनाकर डाल दिया है, असल में तो हमारे मुखिया और भैन जी बहुत ही सीधे हैं, मुखिया ने तो कभी फ़टफ़टिया चलाई ही नहीं है और भैन जी भी कभी फ़टफ़टिया पर बैठी नहीं हैं। खैर मंत्री जी ने तुरत आदेश दिया कि सारे टेलीफ़ोन के खंबे तुड़वा दिये जायें जिससे ना ये इंटर-नेट आयेगा और ना ही लोग ऐसी खुराफ़ात कर पायेंगे। अब बताओ मंत्री जी को कि लोग मोबाईल पर भी नेट का उपयोग करते हैं, बेचारे कुत्तों का एक मात्र सहारा खंबा भी छीन लिया।
अब बाकी तो आप समझदार हैं ही… अब ज्यादा बोलेंगे तो बोलोगे कि बोलता है।
विटर से कुछ विटर विटर –
जैसे वाहनों का चालान बनाया जाता है वैसे ही ब्लॉगों, फ़ेसबुक मैसेज और ट्विट्स का चालान बनाया जायेगा
I have never commented on them 🙂 hamane to kaha Mummy ji, Yuvraj aur mannu 😉
प्राण साहब का मशहूर गाना फ़िल्म कसौटी से –
वैवाहिक संस्था का बदलता स्वरूप… और युवा पीढ़ी..
सामाजिक बंधन कितने जल्दी दम तोड़ते जा रहे हैं, कल तक जो वैवाहिक संस्था में बहुत खुश थे रोज ही उनके ठहाकों की आवाजें आती थीं और आज वैवाहिक संस्था को चलाने वाले वही दो कर्णधार अलग अलग नजर आ रहे थे, एक फ़्लैट की आगे गैलरी में और दूसरा फ़्लैट की पीछे गैलरी में ।
उनका पारिवारिक जीवन बहुत ही अच्छा चल रहा था और उनको देखकर हमेशा लगता था कि परस्पर इनका बंधन मजबूत हो रहा है, परंतु कल पता नहीं क्या हुआ, दोनों के बीच इतनी बड़ी दूरी देखकर मन बेहद दुखी हुआ । दोनों विषादित नजर आ रहे थे, मुझे तो दोनों की हालत देखकर ही इतना बुरा लग रहा था और वे दोनों तो इन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं, कितना विषाद होगा उनके बीच।
पति – पत्नि का संबंध |
कैसा लगता होगा जब उसी साथी को देखने की इच्छा ना हो जो आपका जीवन साथी हो, जिसको प्यार करते हों और साथ जीने मरने की कसमें खायी हों। यह रिश्तों की डोर कितनी पतली और नाजुक है जिस पर आजकल की पीढ़ी सँभल नहीं पा रही है। जितनी तेजी से सामाजिक परिवेश बदल रहा है उतनी तेजी से युवा पीढ़ी में परिपक्वता नहीं बढ़ रही है। केवल कैरियर में अच्छा करना परिपक्वता की निशानी नहीं होता, सामाजिक और पारिवारिक समन्वयन परिपक्वता की निशानी होता है।
पिछले वर्ष से इस वैवाहिक संस्था को मजबूत होता हुआ उनके बीच देख रहा था परंतु आज उसने मुझे झकझोर दिया, महनगरीय संस्कृति में किसी के मामले में बोलना अनुचित होता है, दूसरी भाषा दूसरी संस्कृति भी कई मायने में दूरियाँ बड़ा देती हैं, परंतु आखिर परिस्थितियाँ तो सबकी एक जैसी होती हैं, और विषाद भी, केवल विषाद के कारण अलग अलग होते हैं।
युवा पीढ़ी जिस तेजी से वैवाहिक संस्था को मजबूत बनाती है, एकल परिवार में वह वैवाहिक संस्था छोटी छोटी बातों पर बहुत कमजोर पड़ने लगती है और कई बार इसके अच्छे परिणाम देखने को नहीं मिले हैं, परंतु अगर वही युवा जोड़े में एक भी परिपक्व होता है तो वह वैवाहिक संस्था हमेशा मजबूती से कायम होती है।
आजकल वैवाहिक संस्था में दरार कई जगह देखी है, परंतु उससे ज्यादा मैंने प्यार, मजबूती और रिश्तों में प्रगाढ़ता देखी है। मेरी शुभकामनाएँ हैं युवा पीढ़ी के लिये, वे परिपक्व हों और वैवाहिक संस्था का महत्व समझकर जीवन का अवमूल्यन ना करें।
इतना तो साफ़ है सरकार नौकरशाहों की फ़िक्रमंद है..
लोकपाल के ड्राफ़्ट के सामने आते ही तरह तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आने लगी हैं, अन्ना एवं टीम वापस अनशन पर जाने के लिये तैयार हो गये हैं, सबने कमर कस ली है। सरकार ने भी अपनी कमर कस ली है और संदेश दिया है कि नौकरशाहों की उन्हें बहुत चिंता है, कैसे उनकी कमाई पर हाथ साफ़ कर दें, कैसे उनकी होने वाली कमाई को रोक दें, इसलिये प्रधानमंत्री द्वारा किये गये वादे भी भुला दिये गये।
प्रधानमंत्री के तीन वादे जो चिठ्ठी लिखकर अन्ना को किये गये थे, अब कांग्रेस की सरकार ने उस चिठ्ठी का मजाक बना दिया है, सरकार का मंत्री जो मुँह में आता है उलूल जुलूल बके जा रहा है और हो वही रहा है जो अंधेर नगरी का चौपट राजा चाह रहा है। देखते हैं कि देश में कब तक यह अंधेरगर्दी चलती है।
सरकार ने छोटे बाबुओं को लोकपाल से दूर रखकर उन्हें संदेश दिया है कि आप कमाई करते रहो और जैसे सालों से ऊपर हफ़्ता, महीना देते रहे हो, देते रहो। छोटे बाबु साहब आप लोग चिंता मत करो, आपके लिये तो हम देश की जनता से भी टकरा जायेंगे, भुलक्कड़ जनता है वोट डालकर सब भूल जाती है और जो वोट नोट में बिकते हैं नोट से खरीद लेते हैं, क्योंकि उन्हें अपने वोट की कीमत पता है और पढ़े लिखे गँवार लोग जिन्हें अपने वोट की कीमत बहुत अच्छे से पता है, बिना नोट के वोट दे देते हैं।
तो छोटे बाबू साहब लोग आप तो इन पढ़े लिखे गँवार और असली गँवारों से नोट बटोरते रहो और मजे करते रहो, चिंता मत करो कानून भी सरकार ही बनाती है और सरकार ही मिटाती है। छोटे बाबू साहबों के होंसले इतने मस्त है कि आम जनता पस्त है। अब तो खुलेआम कहते हैं तुम्हारे अन्ना ने क्या कर लिया ? हमारे ऊपर कोई लगाम नहीं लगा सकता क्योंकि हमारे आका जो ऊपर बैठे हैं, उन्हें हमारी बहुत चिंता है।
पर जैसे कि एक खबर कल अखबार में पढ़ी थी एक सँपेरे ने अपने साँप तहसील कार्यालय में छोड़ दिये क्योंकि उससे छोटे बाबू साहब लोग ’कुछ’ लेना चाहते थे, तो सँपेरे ने उनके कार्यालय में दस साँप छोड़ दिये। मतलब कि संदेश साफ़ है कि अगर आपको नहीं देना है तो सँपेरे से दोस्ती गांठ लो, सारे छोटे बाबू लोग टेबल पर चढ़े नजर आयेंगे।
छोटे बाबू साहब लोग आप समझ जाओ जब आप लोग टेबल पर चढ़ेगे तो सरकार कितनी बार आपको इन साँप जैसे जीवों से बचाने आयेगी, शायद इन बाबुओं को पता नहीं होगा कि साँप टेबल पर भी चढ़ जाते हैं। अब छोटे बाबू साहब लोग अगर सब अपने अपने हथियार लेकर आ जायें तो टेबल से तो आपका बचाव नहीं होगा . . . .
एफ़डीआई का हल्ले के बहाने महँगाई और रूपये के अवमूल्यन पर भी चिंतन, हलकान है जनता.. [FDI, Inflation and Depreciation of Rupee… my views]
जहाँ देखो वहीं विदेशी खुदरा दुकानों का हल्ला मचा हुआ है और जनता महँगाई के मारे हलकान हुई जा रही है। महँगाई सर चढ़कर बोल रही है।
किसान को सब्जी का क्या भाव मिलता है और दुकानें किस भाव में बेचती हैं यह एक शोध का विषय है। और अगर शोध किया जाये तो शायद दुनिया चकित रह जायेगी कि किसान को टमाटर का ३ रू. किलो मिलता है और जनता दुकानदार को ४० रू. किलो दे रही है, तो बाकी का बीच का ३७ रू. ये बड़े खुदरा दुकानों के मालिक खा रहे हैं।
जब मुंबई में थे तो वहाँ कोई भी सब्जी कम से कम ४० रू. किलो मिलती थी और अधिकतर तो १६० रू. किलो तक भाव होते थे। पता नहीं कहाँ से महँगाई आई, और यही सब्जी चैन्नई या बैंगलोर में देखें तो अधिकतम ४० रू. किलो सब्जी मिल रही है। टमाटर मुंबई में आज भी ४० रू. किलो हैं और यहाँ बैंगलोर में १६ रू. किलो मिल रहे हैं।
खैर नेता लोग चिल्ला रहे हैं कि विदेशी खुदरा दुकानें आ गईं तो हम आग लगा देंगे, खुलने नहीं देंगे, परंतु क्यों नहीं खुलने देंगे ये नहीं बता रहे हैं, जब रिलायंस रिटेल खुल रहा था तब भी लोगों ने बहुत तोड़ फ़ोड़ की थी, अब हालत यह है कि वही तोड़ फ़ोड़ करने वाले लोग रिलायंस रिटेल से समान खरीद रहे हैं।
थोड़े दिनों बाद विरोधी स्वर विदेशी खुदरा दुकानों के फ़ीता काटते नजर आयेंगे। जनता को समझाइये कि विदेशी खुदरा दुकानों से क्या नुक्सान होगा। आज अखबार में पढ़ा कि जयपुर में कैनोफ़र ने जयपुर के सभी थोक अंडा व्यापारियों से करार कर लिया है, अब सभी खुदरा व्यापारियों को अंडे मिलना बंद हो जायेगा। पहली बात तो यह उन थोक व्यापारियों की गलती है जिन्होंने ये करार किये हैं और वैसे भी भारत है जहाँ हर चीज का जुगाड़ होता है, जब सरकार जुगाड़ से चल सकती है तो ये व्यापार क्या चीज है। खैर आगे क्या होगा यह तो ये करार कार्यांन्वयन होने के बाद ही पता चलेगा। हमारे खुदरा व्यापारी कोई ना कोई तोड़ निकाल ही लेंगे।
ऐसा नहीं है कि मैं विदेशी खुदरा दुकानों का समर्थक हूँ परंतु हाँ यह अर्थव्यवस्था के लिये ठीक होगा और रूपये के अवमूल्यन होने से कुछ हद तक रोकेगा। परंतु रूपये का अवमूल्यन रोकने के लिये क्या इस तरह के हथकंडे अपनाना उचित है ? कतई नहीं !
परंतु नेता जनता को कितना बेवकूफ़ बनायेंगे, अगर इन नेताओं ने घोटाले नहीं किये होते, भ्रष्टाचार पर लगाम कसी होती और भारत के विकास में उस रूपये का योगदान किया होता तो शायद रूपये के मूल्य का अवमूल्यन नहीं होता उल्टा डॉलर कमजोर होता, परंतु सरकार विदेशी लोगों को बाजार में भी तरह तरह के साधन उपलब्ध करवाती है कि ये लोग आसानी से भाग लेते हैं, और जनता ठगी से देखती रह जाती है।
जरूरत है सरकार में नेताओं में विकास की इच्छाशक्ति की कमी की, अगर इन नेताओं में यह इच्छाशक्ति आ जाये तो हम विकास के पथ पर अग्रसर होंगे। लोग कहते हैं कि दस वर्ष में हम नंबर वन बना देंगे, पिछले पाँच वर्ष में भारत को कौन से नंबर पर लाये हैं, ये तो सब जानते हैं।
बात रही [बेचारे] खुदरा दुकानदारों की तो वे बेचारे तो रोजमर्रा कि चीजों को बेचकर अपना घर चला लेंगे। जैसे अगर आपको ब्रेड लेने जाना हो तो आप विदेशी खुदरा दुकानों में तो नहीं जायेंगे ना, बस ऐसे ही बहुत सारी चीजें हैं जो कि आप बिना पार्किंग में अपनी गाड़ी लगाये लेना चाहेंगे या घर से गाड़ी नहीं निकालकर पास के दुकान से लेंगे। तो सरकार को यह समझ लेना चाहिये कि १० लाख से ज्यादा जनता वाले शहर बहुत समझदार हैं।
मुंबई में जहाँ हम रहते थे वहाँ भी आसपास बहुत मॉल थे, परंतु लगभग सभी लोग एक किराने वाले से ही समान लेते थे, वजह वह कीमत में सीधी छूट देता था और उसकी स्कीमें भी आकर्षक होती थीं। फ़िर घर पहुँच सेवा, आप जाकर बोल दीजिये और घर पर समान पहुँच जायेगा। अगर आपकी घर से निकलने की इच्छा नहीं है तो केवल फ़ोन लगा दीजिये और समान घर पर होगा। उस किराना व्यवसायी का स्वभाव बहुत अच्छा था और मृदु भाषी है। यह सब बातें कहाँ देशी और कहाँ विदेशी खुदरा दुकानों पर मिलेंगी।
मल्टी ब्रांड रिटेल पर इतना घमासान क्यों ? (Why protestation against Multi Brand FDI ?)
सरकार ने ५१ फ़ीसदी तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दे दी, इस पर सरकार से विपक्ष और पक्ष के लोग बहुत नाराज हैं। क्या कारण है कि वे नाराज हैं –
१. खुदरा व्यापारियों को नुक्सान होगा ।
२. जो उनके यहाँ काम कर रहे हैं वे लोग बेरोजगार हो जायेंगे।
और भी बहुत से कारण हैं, परंतु उपरोक्त २ कारण ही मुख्य हैं।
जबकि सरकार ने साफ़ साफ़ कहा है कि ये खुदरा विदेशी दुकानें दस लाख से ज्यादा वाली आबादी में ही खुलेंगी।
अब अगर देखा जाये तो दस लाख से ज्यादा आबादी वाली जगहों पर आज बड़ी दुकानों जैसे हॉयपर सिटी, रिलायंस, बिग बाजार इत्यादि का कब्जा है । तो अभी भी तो वहाँ खुदरा व्यापारियों के लिये मुश्किल है। अगर मल्टी ब्रांड विदेशी खुदरा दुकानें आती हैं तो असली प्रतियोगिता तो बड़ी देशी खुदरा दुकानों और विदेशी खुदरा दुकानों के मध्य होगी। छोटे खुदरा व्यापारियों पर तो कोई असर नहीं पड़ने वाला है।
अभी बड़े देशी खुदरा दुकानों पर सभी सामान जरूर मिलता है, परंतु ये दुकानें अच्छी खासी कमाई कर रही हैं, और उपभोक्ताओं को कीमत मॆं कोई राहत नहीं है, उपभोक्ता को तो सामान छपी हुई कीमत पर ही मिलता है। जबकि ये देशी खुदरा दुकानें सामान सीधे कंपनियों से खरीदते हैं तो इनका डिस्ट्रीब्यूटर और डीलर इत्यादि मार्जिन भी बचता है, ट्रांसपोर्टेशन शुल्क में बचत होती है, कर में बचत होती है। जब ये देशी खुदरा दुकानें खुली थीं तब दावा किया गया था कि वस्तुएँ सीधे उपभोक्ता तक पहुंचेंगी और उपभोक्ता को कीमत में भारी फ़ायदा होगा, परंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ। यही दावा अब विदेशी खुदरा दुकानें वालमार्ट, कैश एंड कैरी, केरफ़ोर इत्यादि कर रहे हैं। जब ये विदेशी खुदरा दुकानें आयेंगी तभी पता चलेगा कि उपभोक्ता को कितना फ़ायदा होता है।
बड़े देशी खुदरा दुकानों की बात की जाये तो मालवा (इंदौर, उज्जैन) में पाकीजा का एक तरफ़ा कब्जा है, जबकि वहाँ पर सभी बड़े देशी खुदरा दुकानदार मौजूद हैं। उसका मूल कारण है कि वे उपभोक्ता को सीधे कीमत में लाभ देते हैं, वे बात नहीं करते, उपभोक्ता को फ़ायदा देते हैं। उसका परिणाम यह हुआ कि अधिकतर लोग अब पाकीजा रिटेल से खरीदारी करने लगे हैं और वहाँ है असली समस्या छोटे खुदरा व्यापारियों की, तो अब वे भी उपभोक्ताओं को विभिन्न स्कीमों का प्रलोभन दे रहे हैं। वैसे वाकई बड़े खुदरा व्यापारियों को पाकीजा की उपभोक्ता नीतियों का अध्ययन करना चाहिये, जो उनके लिये बहुत फ़ायदेमंद साबित हो सकता है।
ये तो भविष्य में उपभोक्ता ही तय करेगा कि कौन खुदरा बाजार पर राज करेगा मल्टी ब्रांड विदेशी खुदरा दुकानें या देशी खुदरा दुकानें, यह तो तय है कि जो भी उपभोक्ता को ज्यादा फ़ायदा देगा वही बाजार में सिरमौर होगा।
क्यों बच्चे आज भावनात्मक नहीं हैं ? क्या इसीलिये आत्महत्या के आंकड़े बढ़ रहे हैं ? (Why Childs are not emotional ? why suicidal cases are increasing ?)
शिक्षा में बदलाव बेहद तेजी से हो रहे हैं और शिक्षक और छात्र के संबंध भी उतनी ही तेजी से बदलते जा रहे हैं। कल के अखबार की मुख्य खबर थी यहाँ बैंगलोर में इंजीनियरिंग महाविद्यालय के छात्र ने होस्टल के कमरे में पंखे से फ़ांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। खबर लगते ही हजारों के झुंड में छात्र इकठ्ठे हो गये और महाविद्यालय प्रशासन के खिलाफ़ नारेबाजी करने लगे। पुलिस बुलाई गई, परंतु छात्रों ने पुलिस को भी खदेड़ दिया और महाविद्यालय की इमारत को भी नुक्सान पहुँचाया। बाद में महाविद्यालय के मालिक का बयान आया कि वह छात्र कमजोर दिल का था और लगातार पिछले तीन वर्षों से उस छात्र का प्रदर्शन बहुत कमजोर था।
यह खब्रर पढ़ने के लिये नहीं लिखी हैं मैंने, सही बताऊँ तो मैंने कल अखबार ही नहीं पढ़ा था पर कल रात्रि भोजन पर भाई से चर्चा हो रही थी तब इस और ध्यान गया और आज सुबह कल का अखबार पढ़ पाया । मन अजीब हो उठा और लगा क्या महाविद्यालय प्रशासन ने कभी उस छात्र के मन में क्या चल रहा है, यह जानने की कोशिश की। महाविद्यालय प्रशासन महज छात्र के घर एक पत्र भेजकर अपनी जिम्मेदारी से तो नहीं बच सकता ।
आज छात्र बहुत ही संवेदनशील परिस्थितियों से गुजर रहे हैं, क्योंकि वे अब भावुक नहीं रहे, अब छात्रों से भावनाओं के बल पर कोई भी कार्य करवाना असंभव है। उसके पीछे बहुत सारे कारण जिम्मेदार हैं, परवरिश के बेहतर माहौल में कमी, शिक्षकों से अच्छा समन्वयन न होना । ऐसे बहुत सारे कारण हैं। क्योंकि आजकल बच्चों को इंटरनेट पर सब मिल जाता है तो कई बच्चे तो दोस्त भी नहीं बनाते हैं और इंटरनेट पर ही अपना समय बिताते पाये जाते हैं।
अब मेरे मन में जो सवाल उठ रहे हैं कि क्या महाविद्यालय का छात्र पर अच्छे प्रदर्शन के लिये दबाब बनाना उचित था, और अगर दबाब बनाया गया तो उसे क्या उचित मार्गदर्शन दिया गया । छात्र के घर पर पत्र भेजने से छात्र की मानसिक हालात को समझा जा सकता है। हरेक छात्र के माता-पिता यही सोचते हैं कि बेटा अच्छा पढ़ रहा है परंतु अगर महाविद्यालय से इस प्रकार का पत्र मिले तो वे यकीनन ही अपने बेटे पर क्रुद्ध होंगे, और उसे परिस्थिती से बचने के लिये उस छात्र ने आत्महत्या कर ली हो ? छात्र तो पहले से ही विषादग्रसित था, उसको मनोवैज्ञानिक तरीके से संभालना चाहिये था। परंतु ऐसा ना हुआ, अब उन माता-पिता पर क्या गुजर रही होगी जिन्होंने अपना जवान बेटा इसलिये खो दिया क्योंकि वह पढ़ाई में कमजोर था, नहीं ? वह पढ़ाई में कमजोर होने के कारण विषादग्रसित हो चला था।
पढ़ाई में कमजोर होना कोई बुरी बात तो नहीं, पढ़ाई ही तो सबकुछ नहीं है, उससे बढ़कर होता है जीवन जीने का हौसला और उस विषादित परिस्थिती से निकालने में सहायक परिवेश और परवरिश। कमजोर पढ़ाई वाले पता नहीं कितनी आगे निकल गये हैं और पढ़ाई वाले कहीं पीछे रह गये हैं।
मुख्य सवाल जो मेरे मन में है और उसका उत्तर खोजने की कोशिश जारी है मनन जारी है, क्यों बच्चे आज भावनात्मक नहीं हैं ? और उनके आधुनिक परिवेश में उन्हें कैसी परवरिश देनी चाहिये ?

