Category Archives: अनुभव

अगर हमारे मास्साब को ७,८,१३ के पहाड़े और विज्ञान की मूल बातें न पता हों तो हमारे देश के बच्चों का भविष्य क्या होगा ..!

    खबर है थाणे महाराष्ट्र प्रदेश की (Thane civic teachers flunk surprise test) कि शिक्षा विभाग के सरकारी विद्यालयों में महकमे ने कुछ अध्यापकों से उनके विषय से संबंधित मूल प्रश्न पूछे, जैसे कि ७,८,१३ के पहाड़े और रसायन विज्ञान के मूल सूत्र जो कि वे लगभग पिछले १५-२० वर्षों से बच्चों को पढ़ाते रहे हैं।

    सरकारी महकमा भी सोच रहा होगा कि कैसे नकारा मास्टर लोग हैं हमारे यहाँ के जो नाम डुबाने में लगे हैं। बताईये उन बच्चों का क्या भविष्य होगा जो इन विद्यालयों में इन मास्साब लोगों से पिछले १५-२० वर्षों से पढ़ रहे हैं। चैन की दो वक्त की रोटी मिलने लगे तो क्या मानव को अपने कर्त्तव्य से इतिश्री कर लेना चाहिये।

    इससे अच्छा तो सरकार को विद्यालयों में शिक्षकों को निकालकर नये पढ़े लिखे बेरोजगार नौजवानों को भर्ती कर लेना चाहिये, कम से कम बच्चों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न तो नहीं लगेगा। अगर ऐसे मास्साब लोग हमारे विद्यालय में होंगे तो हमें हमारी तरक्की से वर्षों पीछे ढकेलने से कोई नहीं रोक सकता। इसके लिये केवल वे मास्साब ही जिम्मेदार नहीं हैं, जिम्मेदार हैं प्रशासन से जुड़ा हर वह व्यक्ति जो कि बच्चों की शिक्षा के लिये सरकारी महकमे से जुड़े हैं।

   यह स्थिती केवल इसी जिले की नहीं होगी यह स्थिती देश के हर जिले की होगी, इसकी पूरी पड़ताल करनी चाहिये ।

आखिर क्या करना चाहिये ऐसे मास्साबों का ? और क्या होगा हमारे बच्चों का भविष्य ?

(ऊपर दिये गये लिंक पर क्लिक करके पूरा समाचार पढ़ा जा सकता है।)

कुछ और नये चुटकले (Some more new jokes)

कुछ और नये चुटकले (Some more new jokes)

भीड़ में काफी देर से खड़ा अभिनेता ऑटोग्राफ देते-देते जब थक गया तो उसने एक लड़की की नोटबुक में गधे की फोटो बना कर लड़की की ओर बढ़ा दी।
लडकी (मुस्कुराकर)- मुझे आपका फोटो नहीं, ऑटोग्राफ चाहिए

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रमन की अपनी बीवी से जबर्दस्त लड़ाई हो गई। बीवी ने आव देखा न ताव… कसकर बेलन फेंककर मारा, जो रमन के सिर, हाथ से गुजरते हुए घुटने पर लगा और हड्डी चटक गई।
अस्पताल में प्लास्टर कराने के बाद जब उसे वार्ड में ले जाया गया, तो उसने देखा कि साथ वाले बेड पर जो मरीज लेटा है उसकी दोनों टाँगों पर प्लास्टर चढ़ा है। उसने पड़ोसी मरीज से धीरे से पूछा, ‘भाईसाहब, आपकी क्या दो बीवियाँ है?’

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छुट्टी के दिन तीन बच्चे बातें कर रहे थे।
पहले बच्चे ने कहा : मेरे पापा सबसे तेज दौड़ते हैं। वह तीर चला कर दौड़ते हैं, तो तीर से पहले निशाने तक पहुंच जाते हैं।
दूसरे ने कहा : यह तो कुछ भी नहीं। मेरे पापा राइफल की गोली चलाते हैं और उससे पहले टारगेट तक पहुंच जाते हैं।
तीसरे ने कहा : अरे! तुम दोनों तो जानते ही नहीं कि स्पीड क्या होती है? मेरे पापा सरकारी कर्मचारी हैं। उनकी छुट्टी शाम 6 बजे होती है और वे 4 बजे ही घर पहुंच जाते हैं

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शरारती सार्थक को उसके तीन वकील दोस्तों के साथ पार्क में बैठकर जुआ खेलने के आरोप में गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया गया…
मजिस्ट्रेट ने पहले वकील से बयान देने के लिए कहा, तो वह बोला, “माई लॉर्ड, मैं उस दिन यहां था ही नहीं… मैं लखनऊ जाने वाली ट्रेन में था… सबूत के तौर पर यह देखिए मेरा रेल टिकट…”
दूसरे वकील की बारी आने पर वह बोला, “उस दिन मैं घर पर बुखार में पड़ा था… सबूत के तौर पर यह देखिए, डॉक्टर का सर्टिफिकेट…”
तीसरे वकील का जवाब था, “मैं तो उस वक्त चर्च में बैठा भगवान से बातें कर रहा था… गवाह के तौर पर मैं चर्च के पादरी को साथ लाया हूं…”
अंततः मजिस्ट्रेट ने सार्थक से पूछा, “अब तुम्हें क्या कहना है… क्या तुम भी जुआ नहीं खेल रहे थे…?”
शरारती सार्थक ने कुटिल मुस्कुराहट के साथ तपाक से कहा, “किसके साथ…?

भ्रष्टाचारी रुपी रावण कब हमारे भारत देश से विदा होगा, कब हम इस रावण को जलायेंगे …

पिछली पोस्ट आज भ्रष्टाचार की नदी में नहाकर आये हैं.. आप ने कभी डुबकी लगाई .. से आगे…

    रोज के ६० पंजीयन करवाये जाते हैं इस भूपंजीयन कार्यालय द्वारा और बताया गया कि हर पंजीयन पर लगभग १५०० रुपयों की रिश्वत होती है। और जो दलाल होता है उसकी कमाई रोज की १० हजार से १५ हजार तक होती है, भूपंजीयन (सहदुय्यम अधिकारी) की कुर्सी ५०-६० लाख रुपये में बिकती है क्योंकि हर माह यहाँ लाखों की कमाई होती है, यह १५०० रुपये की रिश्वत तो केवल मकान मालिक और किरायेदार के करारनामे पर है, अगर कोई नये फ़्लेट या पुराने फ़्लेट के लिये जा रहा है तो उसकी रिश्वत की राशि बहुत ज्यादा होती है।

    उस कार्यालय में जाकर इतनी घिन आ रही थी कि कहाँ हम इस भ्रष्टाचार की नदी में आकर सन गये हैं, और नहाकर तरबतर हो चुके हैं। अपने आप पर गुस्सा भी था कि इस भ्रष्टाचार को हम धता भी नहीं बता पा रहे थे, मजबूरी में भ्रष्टाचार का साथ दे रहे थे, पर इस भ्रष्टाचार के बिना हमारा काम बिल्कुल नहीं होता यह तो हमें हमारे दलाल ने पहले ही बता दिया था, “खुद जियो और दूसरे को भी जीने दो” याने कि “खुद खाओ और दूसरे को भी खाने दो”

    क्या सरकार हमारी अंधी है या जो भ्रष्टाचार निरोधक अमले बना रखे हैं वो केवल औपचारिकताएँ पूरी करने के लिये बनाये गये हैं। हमारी कोर्ट भी संज्ञान नहीं लेती हैं, क्या इतनी मिलीभगत है, क्या हमारा पूरा तंत्र ही भ्रष्टाचार में लिप्त है, कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक भ्रष्टाचार के मामले को संज्ञान में लेते हुए कहा था कि सरकार को भ्रष्टाचार को कानूनन लागू कर देना चाहिये और किस काम का कितना पैसा खर्च होगा उसका भाव तय कर देना चाहिये। पर हमारे सरकारी कुंभकर्ण और रावण कभी नहीं जाग सकते।

    अब बताईये जिन लोगों को यहाँ जनता की सेवा के लिये बैठाया गया है वही लोग अपना काम करने की जनता से रिश्वत लेते हैं, और जनता भी दे देती है, क्या करे जनता भी, सब मिलीभगत है।

    भ्रष्टाचारी रुपी रावण कब हमारे भारत देश से विदा होगा, कब हम इस रावण को जलायेंगे, कब रावण को हर वर्ष जलाना छोड़ देंगे, इस रावण को जड़ से ही मिटा देंगे। कब….. बहुत बड़ा यक्ष प्रश्न है… पता नहीं हमारे भारतवासी कब हराम की कमाई छोड़ेंगे… जिस दिन यह संकल्प हर भारतवासी ने ले लिया उस दिन भारत में रामराज्य स्थापित हो जायेगा। दशहरे पर असत्य पर सत्य की विजय के साथ सभी को विजयादशमी की शुभकामनाएँ।

आज भ्रष्टाचार की नदी में नहाकर आये हैं.. आप ने कभी डुबकी लगाई ..

आज हम सुबह अपने मकान के दलाल के साथ पंजीयक कार्यालय गये थे, जहाँ हमारे मकान मालिक भी थे, यहाँ मुंबई में ११ महीने का किराये का करारनामा होता है जो कि पंजीयन कार्यालय से पंजीकृत भी होना चाहिये। यह पूर्णतया: कानूनी कार्यवाही होती है।

जब हम पंजीयक कार्यालय पहुँचे तो वहाँ लिखा था तहसिलदार भूमापन बोरिवली कार्यालय, और भी ४-५ कुछ और नाम लिखे थे, जो कि हमें याद नहीं है, वहीं पास में झंडे को फ़हराने के लिये लोहे का पाईप भी लगा था, वह देखकर मन में आया कि मुंबई महानगरी में सरकारी कार्यालय में इतने सारे भ्रष्टाचारी लोगों के बीच में अपने तिरंगे को फ़हराने का क्या काम, इसलिये इस लोहे के डंडे को यहाँ होना ही नहीं चाहिये। मन में यह बात लिये हम पहले माले पर चल दिये।

जहाँ हमारे मकान के दलाल ने पहले से ही सब “सैटिंग” की हुई थी, हमारा १२ बजे का नंबर लिया हुआ था, हम पहुँचे १२.४५ बजे पर अगले ने फ़िर “सैटिंग” की फ़टाफ़ट और हमारी फ़ाईल नीचे से ऊपर करवाई और बस हम पंजीयन अधिकारी के कार्यालय में पहुँच गये। मुख्य कुर्सी पर एक महिला काबिज थी जो कि बहुत ही महंगी सी साड़ी पहनी हुई बैठी थीं, और चेहरा बिल्कुल रुखा कि कहीं कोई फ़ोकट में काम न करवा ले।

जहाँ बैठने के लिये दो कुर्सियाँ और एक स्टूल था, स्टूल पर पहले मकान मालिक को बैठाया गया और उनके कुछ हस्ताक्षर वगैरह लिये गये फ़िर “वैब कैम” से फ़ोटो खींचे गये और उल्टे हाथ का अंगूठे का स्कैनिंग किया गया। इसके बाद हमारा नंबर आया और यही सब हमारे साथ किया गया, इसी बीच पंजीयन कार्यालय के दलाल द्वारा एक हस्ताक्षर लिया गया। हमने अपने दलाल पर भरोसा करके उसपर हस्ताक्षर कर दिये (इसके अलावा और कोई चारा भी नहीं था)

फ़िर हम उस कक्ष के बाहर आये और वहाँ फ़िर वही दलाल कुछ कागज लाया और हमसे और मकान मालिक से हस्ताक्षर करवाये। हमने अपने अगले ११ महीने के चैक मकान मालिक को सुपुर्द किये और बस अगले ११ महीने के लिये हमारा पंजीयन हो गया, हम केवल १० मिनिट में स्वतंत्र हो गये।

कार्यालय में हमने दो चीजें पढ़ी थीं कि पंजीकरण के लिये नंबर ऑनलाईन किये जा सकते हैं, और ईस्टाम्प। हम हमारे मकान मालिक के साथ बात कर रहे थे कि अगर सभी चीज ऑनलाईन कर दी जाये तभी भ्रष्टाचार का खात्मा संभव है, नहीं तो हम और आप तो कुछ भी नहीं कर सकते इस भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ़।

कार्यालय से बाहर निकलते ही हमने अपने दलाल से प्रश्न किया कि अगर बिना भ्रष्टाचार के पंजीयन करवाना हो तो कितना समय लग जाता है। हमारे दलाल का जबाब था कि “हो ही नहीं सकता।” वहीं पर एक अस्थायी पटिये पर बैठे हुए बंदे ने कहा कि अंकल जी बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। वह भी शायद दलाल ही था। हमने कहा कि वहाँ तो लिखा है कि ऑनलाईन नंबर और ईस्टाम्प सरकार ने शुरु किया है। तो दोनों ठहाके मारकर हँसने लगे और बोले नंबर तो अगले एक महीने का शुरु के दो दिन में ही दर्ज हो जाते हैं, तो हम बोले फ़िर आपको कैसे ऐसे नंबर मिल जाता है, वे बोले पैसे में बहुत ताकत है, और वही ताकत यह सब करवाती है।

जारी…

मुंबई की बस के सफ़र के कुछ क्षण… बेस्ट के ड्राईवर का गुस्सा.. बाबा..

     घर से आज ९.२५ पर निकल पाया तो लगा कि शायद अपनी बस आज छूट जायेगी, सोचा कि अब तो अगली बस ९.५० की ही मिलेगी, परंतु हाईवे पर पहुँचते ही अपनी तो बाँछें खिल गई, क्योंकि जबरदस्त ट्रॉफ़िक था, कोई गाड़ी अच्छे से किसी से टकरा गई थी। और तीन तीन बस ट्रॉफ़िक में फ़ँसी हुई थीं जिसमें सबसे पीछे वाली बस अपनी थी, फ़िर से ड्राईवर से मुस्कराहट का आदान प्रदान हुआ और उन्होंने आगे से ही चढ़ने का इशारा किया परंतु सभ्यता से हम बस के पीछे वाले दरवाजे से चढ़ लिये।

    बस में आज भीड़ कुछ कम थी, और ठीक ठाक तरीके से खड़े होने की जगह मिल गयी थी, पर थोड़ी देर में ही भीड़ का दबाब बड़ने लगा और जाने पहचाने चेहरे नजर आने लगे, अपना मोबाईल निकाला और निम्बज्ज में लॉगिन किया कि ट्विटर पर नया क्या है, गूगल चैट, याहू चैट और स्कायपी पर कितने और कौन कौन ऑनलाईन हैं, कुछ चैटिंग पर काम की बातें भी कर ली गईं, कुछ देर बाद ही हमें एक सीट मिल गई और हम इत्मिनान से मोबाईल पर ही इकोनोमिक्स टाईम्स पढ़ने लगे।

    बस में भीड़ का दबाब बड़ता ही जा रहा था, दो लाईन से तीन लाईन और एक चौथी लाईन आने जाने वालों की लगी थी, बिल्कुल पैक हो चुकी थी बस.. थोड़ी ही देर में स्टॉप आते जाते और बस यात्रियों को उतारकर और लेकर आगे बढ़ती रहती।

    बस एक स्टॉप पर से निकली और सिग्नल पर खड़ी हो गई, तो कुछ दो लोग पीछे से दौड़ते हुए आये और आगे वाले दरवाजे से चढ़ लिये, तो ड्राईवर बहुत नाराज हुआ, और इन दोनों पर चिल्लाने लगा बोला कि पीछे दरवाजे से चढ़ो, तो दो लोगों में से एक तो उतर गया पर एक आदमी उतरने को तैयार ही नहीं था, और वह गाली गलौच पर उतर आया, तब तक बस थोड़ा आगे निकल चुकी थी, तो बस ड्राईवर ने बस उधर ही रोकी और बस का इंजिन बंद कर दिया और बोला कि जब तक ये आदमी नहीं उतरेगा तब तक बस आगे नहीं जायेगी, ऊफ़्फ़ ये तो उस आदमी ने हद्द ही कर दी बोला कि नहीं उतरुँगा, तब बस में से सभी लोग उस आदमी के लिये चिल्लाने लगे और कुछ टपोरियों वाली भाषा में ही शुरु हो गये। कुछ लोग कहने लगे “लेट हो रहा है”, “गर्मी बहुत हो रही है”, तो इतने में एक लड़की का कमेंट आया कि मुंबई में सारी बसें ए.सी. होनी चाहिये, यहाँ इतनी सड़ी गर्मी होती है। आखिरकार वह आदमी उतरा और बस ड्राईवर ने बस इंजिन चालू किया तब जाकर राहत महसूस हुई।

    रोज ही ऐसा कोई न कोई वाकया हो जाता है। कि बस.. लिखना तो बहुत कुछ है पर बस अब ओर नहीं…

बस स्टॉप पर तीन लड़कियों की बातें

बस स्टॉप पर तीन लड़कियाँ बस के इंतजार में बैठी हुई थीं, सप्ताहांत की खुशी तो थी ही तीनों के चेहरे पर, साथ ही चुहलबाजी भी कर रही थीं।

तभी एक मोटर साईकिल स्टॉप के आगे आकर रुकी और वह लड़का किनारे जाकर रुक गया, हेलमेट उतारा और किसी का इंतजार करने लगा, बाईक भी कोई अच्छी सी ही लग रही थी, पर तभी उन तीनों लड़कियों की आवाज चहकने लगी, एक बोली “देख क्या बाईक है”, दूसरी बोली, “अरे नहीं मोडिफ़ाईड बाईक है, आजकल येइच्च फ़ैशन है, ओरिजिनल का जमाना नहीं है, जो पसंद आये लगा डालो”

सोचने लगा कि लड़कियाँ क्या क्या सोचती हैं, जिस बाईक की ओर लड़कों का ध्यान नहीं जाता वह बाईक लड़कियों की बातों का केन्द्र है।

तभी एक लड़की के मोबाईल पर फ़ोन आ गया, अब इधर की तरफ़ जो बातें सुनाई दे रही थीं, वे इस प्रकार थीं –

“किधर है तू”

“क्या बोलता है”

“अच्छा तू आरेला है मेरे कू लेने को”

तब समझ में आया कि लड़के का फ़ोन है।

“किधर मिलूँ, जिधर तू सिगरेट लेता है, पानी पुरी वाले खड़ेले हैं, अरे मैं उधरीच हूँ रे”

“तू आ न”

तभी एक लड़की की बस आ गई, वह तुरंत दौड़कर सड़क पर गई और बस स्टॉप तक आने का इंतजार करने लगी, जेब से कान कौवे (हैंड़्स फ़्री) निकाले और कान में ठूँस लिये, मुंबई की रफ़्तार में इन कानकौवों का बहुत महत्व है, आधी से ज्यादा मुंबई कानकौवे कान में ठूँसे हुए नजर आते हैं, केवल अपनी दुनिया में मस्त और व्यस्त”

फ़िर वो लड़की जिसका फ़ोन आया था, वह भी बॉय करके चल दी सड़क क्रॉस कर सिगरेट के ठिये पर, जहाँ उसका बॉय फ़्रेंड आने वाला है।

तीसरी लड़की वो भी शायद बस का ही इंतजार कर रही थी, परंतु जैसे ही ये दोनों लड़कियाँ गईं, वो वहाँ से उठकर पैदल ही चल दी, दूसरी तरफ़, समझ नहीं आया कि जब बस पकड़ने आये थे तो दो लड़कियाँ पैदल ही क्यों चली गईं।

वहीं ठिठोली करता हुआ एक समूह खड़ा था जिसमें दो लड़के और दो लड़कियाँ थे, लड़कियों के हाथ में सिगरेट थी और बिल्कुल नशा करने के अंदाज में मस्ती से सिगरेट के कश उड़ा रही थी.. हमारी आधुनिक संस्कृति..

आज घर आते आते बहुत सारी बसों पर एगॉन रेलिगेयर के जीवन बीमा वाले उत्पादों के विज्ञापन देखकर खुशी हुई कि चलो ये तो अच्छा काम हो रहा है।

आखिर इतना बड़ा सरकारी तंत्र रेल्वे कब सुधरेगा..

    गुस्सा होना स्वाभाविक है, जब आपको तत्काल कहीं जाना हो और टिकट न मिले, तो तत्काल का सहारा लेते हैं, रेल्वे ने यह सुविधा आईआरसीटीसी के द्वारा भी दे रखी है, परंतु ८ बजे सुबह जैसे ही तत्काल आरक्षण खुलता है वैसे ही इस वेबसाईट की बैंड बज जाती है, सर्विस अन- अवेलेबल का मैसेज इनकी वेबसाईट पर मुँह चिढ़ाने लगता है।

    कई बार तो बैंक से कई बार पैमेन्ट हो जाने के बाद भी टिकट नहीं मिल पाता है क्योंकि पैमेन्ट गेटवे से वापिस साईट पर आने पर ट्राफ़िक ही इतना होता है कि टिकट हो ही नहीं पाता है, वैसे अगर टिकट नहीं हुआ और बैंक से पैसे कट गये तो १-२ दिन में पैसे वापिस आ जाते हैं, परंतु समस्या यह है कि ऑनलाईन टिकट मिलना बहुत ही मुश्किल होता है।

    सुबह ८ बजे से ८.४५ – ९.०० बजे तक तो वेबसाईट पर इतना ट्राफ़िक होता है कि टिकट तभी हो सकता है जब आपकी किस्मत बुलंद हो। वैसे आज किस्मत हमारी भी बुलंद थी जो टिकट हो गया वरना तो हमेशा से खराब है, इसके लिये पहले भी जाने कितनी बार रेल्वे को कोस चुके हैं।

    करीबन २ महीने पहले से एजेन्टों के लिये व्यवस्था शुरु की गई कि वे लोग जिस दिन तत्काल खुलता है उस दिन ९ बजे से टिकट करवा सकेंगे याने कि सुबह ८ से ९ बजे तक केवल आमजनता ही करवा पायेगी, परंतु इनकी इतनी मिलीभगत है कि जब सीजन होता है तब इनके सर्वर ही डाऊन हो जाते हैं, न घर बैठे आप साईट से टिकट कर सकते हैं और न ही टिकट खिड़की से, पर जैसे ही ९ बजते हैं, स्थिती सुधर जाती है, ये सब धांधली नहीं तो और क्या है।

    टिकट खिडकी पर जाकर टिकट करवाना मतलब कि अपने ३-४ घंटे स्वाहा करना। सुबह ४ बजे से लाईन में लगो, तब भी गारंटी नहीं है कि टिकट कन्फ़र्म मिल ही जायेगा, लोग तो रात से ही अपना बिस्तर लेकर टिकट खिड़की पर नंबर के लिये लग जाते हैं, और टिकट खिड़की वाला बाबू अपने मनमर्जी से टिकट करेगा, उसका प्रिंटर बंद है तो परेशानी, उसके पास खुल्ले न हो तो और परेशानी, जब तक कि पहले वाले यात्री को रवाना नहीं करेगा, अगले यात्री की आरक्षण पर्ची नहीं लेगा, और जब तक कि ये सब नाटक होगा, बेचारा अगला यात्री उसको कोसता रहेगा क्योंकि तब तक उसे कन्फ़र्म टिकट नहीं वेटिंग का टिकट मिलेगा।

    क्या इतना बड़ा सरकारी तंत्र रेल्वे अपना आई.टी. इंफ़्रास्ट्रक्चर ठीक नहीं कर सकता है, या उसके जानकारों की कमी है रेल्वे के पास, तो रेल्वे आऊटसोर्स कर ले, कम से कम अच्छी सुविधा तो मिल पायेगी।

मेरी जिंदगी के कुछ लम्हे (एन.सी.सी. के बटालियन केम्प और तैयारियाँ)..My life my experience

एन.सी.सी. मे हर वर्ष बटालियन में केम्प लगता था, जिसमें सेना से संबंधित बहुत सारी जानकारियाँ दी जाती, युद्ध क्षैत्र में कैसे दैनिक व्यवहार किया जाता है, फ़ायरिंग करवाई जाती है।

जब कैम्प में जाने की सूचना मिलती तो बड़े जोर शोर से पूरी तैयारी शुरु हो जाती थी, लोहे की पेटी पर रंगरोगन फ़िर अपना नाम और नंबर लिखकर पेटी तैयार करना। बेल्ट, जूते पर पॉलिश करके चमकाना और पीतल के बेज को चमकाना। पूरी आस्तीन के शर्ट और पैंट, जिससे मलेरिया का खतरा न रहे।

ट्रेन से जाना तय होता था, झाबुआ से मेघनगर तक जाने के लिये बस से जाना होता था, उस समय बस का सामान्य किराया ४ रुपये था पर स्टूडेन्ट कन्सॆशन में हमें केवल १ रुपया ही लगता था, अपनी पेटियाँ और बेडिंग बस के ऊपर खुद ही चढ़वानी होती थीं। मेघनगर पहुँचकर वापिस से बस से अपनी पेटियाँ और बेडिंग लेकर फ़िर रेल्वे स्टेशन की ओर प्रस्थान करते थे। लोग हमें घूर घूर कर देखते थे, क्योंकि हम सभी एन.सी.सी. की वर्दी में होते थे, पर हाँ एन.सी.सी. की वर्दी पहनने के बाद खुद को गौरवान्वित महसूस करते थे।

फ़िर इंतजार होता था, देहरादून ट्रेन का जो कि मेघनगर से १० बजे चलती थी और रतलाम लगभग १२ बजे पहुँचती थी, रेल्वे स्टेशन पर बटालियन के ट्रक हमारा इंतजार कर रहे होते थे, फ़िर ट्रक में लदफ़दकर शहर से ८-१० किमी दूर गंगासागर के पास केम्प लगता था।

और दस दिन का कैम्प खत्म करके वापिस घर की ओर लौट पड़ते थे। गोविन्दा की एक फ़िल्म आई थी “शोला और शबनम” जिसमॆं एन.सी.सी. का जीवन काफ़ी हद तक फ़िल्माया गया था, यह फ़िल्म मेरी मन पसंदीदा फ़िल्मों में से एक है आज भी। फ़िल्म के कुछ दृश्य देखिये जिससे एन.सी.सी. के पुराने दिन आज भी याद हो आते हैं –

मेरी जिंदगी के कुछ लम्हे (एन.सी.सी. की परेड और ड्रिल).. My life my experience

कॉलेज में दाखिला लिया था, और कुछ ही दिनों में पता चला कि एन.सी.सी या एन.एस.एस. में से कुछ एक लेना होता है, शुरु से ही हमें सेना अपनी ओर आकर्षित करती थी, बस तो यही आकर्षण हमें एन.सी.सी. की ओर खींचकर ले गया।

अपना नाम हमने एन.सी.सी (नेशनल कैडेट कोर) में लिखवाया और फ़िर हमारे एन.सी.सी. वाले सर ने एन.सी.सी. रुम में बुलाया कि अपनी एन.सी.सी. की ड्रेस ले जाओ, हम भी पहुँच गये एन.सी.सी. रुम में अपने नाप की ड्रेस लेने के लिये। वहाँ जाकर देखा तो पता चला कि लड़कों की भीड़ टूटी पड़ी है। समझ ही नहीं आ रहा था कि इतनी भीड़ में कैसे अपने नाप के कपड़ों का चुनाव करें।

लोहे की अलमारियों में से नई पैंट और शर्ट रखी हुई थीं, जिन पर साईज भी केवल एस, एम और एल लिखा हुआ था, समझ ही नहीं आ रहा था कि कौन से साईज का कपड़ा अपने को सही आयेगा। फ़िर थोड़ा सा बेशरम बनकर वहीं पर शर्ट और पैंट पहनकर देख ही लिये, फ़िर नई जुराबें और मिलिट्री वाले एंकल शूज, टोपी और कुछ एसेसरीज।

एंकल शूज के नीचे तले में घोड़े की नाल लगवानी थी, जिससे कदमताल अच्छा होता था और जूते घिस भी नहीं पाते थे। जब ये शूज पहनकर चलते थे तो खटखट की अलग ही आवाज होती थी।

कॉलेज के मैदान में सप्ताह में दो बार परेड होती थी, गुरुवार और शुक्रवार शाम ४ बजे से ६ बजे तक। चार बजे पहुँचने के बाद सबसे पहले हाजिरी होती थी, फ़िर एन.सी.सी. गीत (हम सब भारतीय हैं) और फ़िर मैदान के ५-६ चक्कर हवलदार दौड़वाते थे, कसम से ५-६ चक्कर में दम निकल जाता था और फ़िर उसके बाद  ड्रिल या कुछ और ट्रेनिंग।

इंतजार होता था शाम छ: बजे का, जब परेड का समापन होता था तब मिलता था नाश्ता दो समोसे या कचोरी और मिठाई के पीस। कभी वहीं खा लेते थे तो कभी अपने साथ रखकर घर पर लाकर आराम से खाते थे।

एन.सी.सी. की वर्दी पहनने से ऐसा लगता था कि मैं भारत माता का सिपाही हूँ और मेरा जन्म सार्थक हो गया और अपने आप पर गर्व महसूस होता।