सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १९, कुछ अनसुलझे प्रश्न !!
मैं उस भीड़ के बाहर हो आया । चारों ओर अखाड़े को ध्यान से देखने लगा। क्योंकि कल से मुझको यहाँ शिक्षा प्राप्त करनी थी। लेकिन एक ही प्रश्न बार-बार मेरे मन में चक्कर काट रहा था। मैं युवराजों के साथ क्यों नहीं शिक्षा प्राप्त कर सकता ? थोड़ी देर पहले गुरुदेव ने कहा था कि युद्धविद्या केवल क्षत्रियों का कर्तव्य है। क्षत्रिय का अर्थ आखिर क्या है ? मैं क्या क्षत्रिय नहीं हूँ ? और यदि नहीं हूँ तो क्या हो नहीं सकता हूँ ?
अपना नाम शाला में लिखवाकर हम उस भव्य महाद्वार से बाहर आये। मैंने पिताजी से पूछ ही लिया “पिताजी, मैं क्यों नहीं राजकुमारों के साथ शिक्षा प्राप्त कर सकता हूँ ?”
“क्योंकि तुम क्षत्रिय नहीं हो, वत्स !” वो बोले।
“क्षत्रिय ! क्षत्रिय का क्या अर्थ है ?”
“जो राजकुल में जन्म लेता है, वह क्षत्रिय । तुमने एक सूतकुल में जन्म लिया है, वत्स !”
“कुल ! राजकुल में जन्म लेनेवालों के क्या सहस्त्र हाथ होते हैं ? उन्हीं को इतना महत्व क्यों ?”
“यह तुम नहीं समझ पाओगे। कल से नियमित रुप से इस शाला में आया करना । जो-जो शिक्षा दी जाये, वह ग्रहण करना ।“
हम लोग राजप्रसाद लौटे । शोण उसी तरह कक्ष में बैठा हमारी प्रतीक्षा कर रहा था। उसके पास ही अमात्य वृषवर्मा खड़े थे।
“सूतराज क्या हुआ ? तुम्हारे पुत्र का नाम लिख गया न ?” अमात्य ने विश्वास के साथ पूछा।
“हाँ ।“ पिताजी ने इतना ही उत्तर दिया।
“ठीक है । जब किसी वस्तु की आपको आवश्यकता हो, उसकी सूचना बाहर के सेवक को दे दीजियेगा। मैं जाता हूँ अब।“ अमात्य चले गये।
मेरा मन यों ही अभ्यासवश युवराज दुर्योधन और अर्जुन, महाराज धृतराष्ट्र और गुरुदेव द्रोण, विदुर और युधिष्ठिर – इनकी तुलना करने का प्रयत्न करने लगा। लेकिन उनमें से किसी की भी एक-दूसरे से तुलना नहीं हो पा रही थी। सबों का अपना स्वतन्त्र और एकदम भिन्न अस्तित्त्व दिखा। इस संसार में कितने प्रकार और कैसे-कैसे स्वाभाव के लोग हैं, भगवान जानें ! किसकी कल्पना से उनका निर्माण होता है ? किस लिए उनका निर्माण होता है ? इस जगत का वह चतुर कारीगर अन्तत: है कौन ? उसने इतने सारे नमूने किस उद्देश्य से बनाये हैं ? क्योंकि यहाँ एक-जैसा दूसरा दिखाई नहीं देता है, और दिखाई दे भी जाये तो वह उस-जैसा होता नहीं है। छि:, इन प्रश्नों का तर्कसंगत उत्तर शायद कोई कभी नहीं दे पायेगा।
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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १८
“यह मेरा पुत्र कर्ण है ।“ पिता जी ने गुरुवर्य द्रोण से निवेदन किया।
मुझको पूरा विश्वास था कि अब वे मुझसे मेरे कानों के कुण्डलों के सम्बन्ध में कुछ अवश्य पूछेंगे, लेकिन निर्विकार भाव से उन्होंने केवल इतना ही कहा, “तुम्हारा पुत्र, अधिरथ ? फ़िर इसको आज युद्धशाला में कैसे लाये हो ?”
“आपके चरणों में डालने के लिए ।“
“मेरे चरणों में किसलिए ?”
“युवराजों के साथ यदि इसको भी थोड़ी-सी युद्धविद्या की शिक्षा मिल जाये तो …”
“युवराजों के साथ ? अधिरथ, युद्धविद्या केवल क्षत्रियों का कर्तव्य है। तुम चाहो तो अपने पुत्र को युद्धशाला में भरती कर दो, लेकिन वह युवराजों के साथ शिक्षा कैसे पा सकता है ?”
पिताजी का चेहरा क्षण-भर को निस्तेज हो गया। क्या कहें, यह थोड़ी देर तक उनकी समझ में नहीं आया, अन्त में वे जैसे-तैसे बोले, “गुरुदेव की जैसी आज्ञा ।“
गुरुदेव को पुन: अभिवादन कर हम लोग लौटने लगे। मार्ग में युवराज अर्जुन लक्ष्य में से बाण निकालकर लौटता हुआ हमें मिला। मैंने उसको ध्यान से देखा। उसका बर्ण आकाश की तरह नीला था। हनु भाले की नोक की तरह सिकुड़्ती हुई थी। उस्की तेजस्वी आँखें दोनों कनपटियों की ओर संकुचित होती गयी थीं। उसकी नाक ऋजु और तीक्ष्ण थी। मस्तक थाल की तरह भव्य था। भौंहें सुन्दर थीं । उसका पूरा चेहरा ही विलक्षण सुन्दर था। घण्टे की तरह मधुर ध्वनि में उसने पिताजी से पूछा, “क्यों काका, चम्पानगरी से आज ही आये हो क्या ?”
“हाँ । अपने इस पुत्र कर्ण को लेकर आया हूँ।“
अर्जुन ने मेरी ओर देखा। मेरी आँखों की अपेक्षा वह शायद मेरे कानों के कुण्डल को ही अधिक आश्चर्य से देख रहा था । वह मुझसे कुछ पूछने ही जा रहा था कि इतने में ही आकाश से एक कुण्डली-सी हम दोनों के बीच में आकर सर्र से गिरी। आकाश से गिरने के कारण सुन्न होकर वह सर्प थोड़ी देर तक वैसा ही पड़ा रहा और फ़िर जिधर अवसर मिला उधर ही दौड़ने लगा। विद्युत गति से युवराज अर्जुन ने हाथ में लगा बाण धनुष पर चढ़ा लिया और वह द्रुतगति से दौड़ते हुए सर्प पर निशाना लगाने लगा। इतने में ही चबूतरे से कोई चिल्लाया, “अर्जुन ! हाथ नीचे कर !” उस आवाज में अद्भुत शक्ति थी। युवराज अर्जुन ने एकदम हाथ नीचे कर लिया, मानो अग्नि का चटका लग गया हो। तीर की गति से भागता हुआ वह सर्प क्षण-भर में ही अखाड़े के पाषाण-प्राचीर में कहीं अदृश्य हो गया। चबूतरे पर से पुन: आवाज गूँजी, “युवराज, उस तुच्छ सर्प को मारने से पहले अपने भीतर के सर्प को मार डालो। क्रोध का सर्प बड़ा भयानक होता है। दुर्बल पर हाथ मत उठाओ।“
उस चबूतरे पर गुरुदेव द्रोण थे । एक युवक शीघ्रता से अर्जुन के पास आया और अर्जुन की पीठ पर हाथ रखकर उसने अत्यन्त मधुर स्वर में पूछा, “एकदम ही धनुष कैसे उठा लिया, पार्थ ?”
ये थे युवराज युधिष्ठिर ।
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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १७
उस अखाड़े में एक ऊँचा और लम्बा-चौड़ा लक्ष्यभेद करने का चबूतरा था। वह चबूतरा ऐसा था कि उसको कहीं से भी देखो, वह अखाड़े के ठीक बीच में दिखाई देता था। उस चबूतरे पर पुष्पों से सज्जित भिन्न-भिन्न आकारों के धनुष रखे हुए थे। एक ओर बाणों के असंख्य तूणीर रखे हुए थे। सामने की ओर अनेक लक्ष्य रखे हुए थे। उस चबूतरे पर साँवले रंग का एक युवक वीरासन लगाकर दायें पैर के पंजे पर शरीर का जोर दिय हुए बैठा था। हाथ में लगे धनुष की प्रत्यंचा उसने कान तक खींच ली थी। एक आँख बन्द कर दूसरी आँख की पुतली उसने बाण की नोंक की सीध में स्थिर कर रखी थी। उसके पास ही ढीले-ढाले वस्त्र पहने हुए, शुभ्र दाढ़ीवाले, सिर के बालों एकत्र बाँधे हुए एक लम्बे वृद्ध खड़े थे। उनकी मुद्रा नदी की तह की तरह शान्त थी। उस साँवले युवक के प्रत्यंचा पर रखे हाथ को उन्होंने सीधा किया। वे उसको कुछ समझाने लगे। युवक ध्यानपूर्वक उनकी बातें सुन रहा था।
पिताजी ने उस युवक की ओर उँगली से संकेत कर कहा, “वत्स, यही है वह पाण्डुपुत्र धनुर्धर अर्जुन ! और उसको जो सूचनाएँ दे रहे हैं, वे ही हैं पूजनीय गुरुदेव द्रोण !”
धनुर्धर अर्जुन ! भले ही जो हो – लेकिन क्या वह इससे अधिक प्रभावशाली वीरासन नहीं कर सकता है ? – यह विचार मेरे मेन में कौंध गया ।
गुरुदेव द्रो़ण वास्तव में अशोक वृक्ष की तरह भव्य लग रहे थे। उनकी देह पर शुभ्र वस्त्र उनके लम्बे शरीर के अनुरुप ही शोभीत हो रहे थे।
हम अखाड़े के रास्ते चबूतरे की ओर चलने लगे। मुझको ऐसा अनुभव होने लगा जैसे आस-पास की क्रीड़ाक्षेत्रों को देखकर मेरे शरीर की उष्णता यों ही अपने-आप बढ़ने लगी हो। मेरी इच्छाअ हुई कि मैं भी भीतर उतरुँ और चक्कर काटता हुआ तेजी से गदा और खड़्ग के प्रहार प्रतिपक्षी पर करुँ। इन उच्छ्श्रंखल घोड़ों को झुकाकर इअतना पिदाऊँ कि ये मुँह से झाग निकाल पड़ें। हाथी की सूँड पकड़कर उसे नचाऊँ और फ़िर उसको थकाकर अन्त में उसकी पीठ पर चढ़ जाऊँ। चबूतरे पर बैठे उस युवक को उसकी भुजा पकड़कर उठाऊँ और प्रभावशाली वीरासन कैसे लगाया जाता है, यह एक बार अच्छी तरह उसको बता दूँ। कुश्ती के अखाड़े में जंगली भैंसे की तरह यों ही चक्कर काटनेवाले उस उद्द्ण्ड भीम से कुश्ती लड़कर उसका मद भी दूर कर दूँ।
हम धनुर्विद्या के उस ऊँचे चबूतरे के पास आये। ऊपर बैठे हुए युवराज अर्जुन ने एक बाण छोड़ा। सामने दूरस्थित लकड़ी के लक्ष्य में वह सर्र से घुस गया। गुरुवर्य द्रोण ने उसकी पीठ पर एकदम थाप मारी और वे आनन्द से गरज उठे, “साधुवाद अर्जुन ! लेकिन पास जाकर यह देखो कि तुम्हारा वह सूचीपर्ण बाण लक्ष्य में कितना घुसा है ?” युवराज अर्जुन आज्ञाकारी की भाँति उठा और दृढ़ता से पैर रखता हुआ लक्ष्य की दिशा में चला गया। इतने में पिताजी आगे बढ़े । चबूतरे के नीचे ही खड़े रहकर उन्होंने अभिवादन किया। बड़े आदर से झुककर मैंने उनको अभिवादन किया। पिताजी की इच्छा थी कि उन गुरुवर्य की देखरेख में ही मेरा युद्ध-शास्त्र का अध्ययन हो।
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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १६
अन्धे राजा को इतना वैभव दिया पर देखने की शक्ति छीन ली – यह क्रूर व्यवस्था करनेवाला दैव अन्धा नहीं था क्या ? सौ पुत्र और इस अमित राज्य-वैभव के स्वामी इस राजा को भाग्यवान कहा जाये या .…. क्योंकि यह सब देखने के लिये आँखें नहीं हैं – इसलिये उसे अभागा कहा जाये ? अपने सौ पुत्रों को यह अन्धा पिता कैसे पहचानता होगा ? और सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह थी कि आँखें ने होने पर भी इतने विशाल साम्राज्य पर ये शासन कैसे करते होंगे ? छि:, कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं कि उनका उत्तर ही नहीं दिया जा सकता ।
बहुत देर चलने के बाद हम एक विशाल लौह-महाद्वार के पास आये। उसके दोनों ओर काले रंग के पाषाणों के प्राचीर दूर तक संकुचित होते चले गये थे। महाद्वार की भव्य कमान पर त्रिकोणी भगवा ध्वज फ़ड़फ़ड़ा रहा था। द्वारपालों ने हमको देखते ही अभिवादन किया। हम झुककर भीतर गये। वह कुरुओं की युद्धशाला थी।
भीतर चारों ओर बड़े-बड़े कक्ष थे और बीचोंबीच एक योजन घेरे का एक विशाल अखाड़ा था। उसके अनेक खण्ड कर दिये गये थे। एक ओर मल्ली के लिए अखाड़ा था। यहाँ लाल रंग की बारीक मिट्टी गोलाकार फ़ैली हुई थी। उसमें अनेक मल्ल-युवकों की जोड़ियाँ एक-दूसरे पर दाँव-प्रति-दाँव चलाती हुई लड़ रही थीं। उस अखाड़े के मध्य भाग में हष्ट-पुष्ट गौरवर्णी युवक ताल ठोंकता हुआ गोलाकार नाचता दिखाई दिया उसके पास जाने का साहस किसी में नहीं था। हाथ उठाकर वह सारे अखाड़े में थय-थय नाच रहा था।
“कर्ण उस युवराज भीम को देख ! वह अखाड़े में सबको चुनौती देता हुआ घूम रहा है ।“ उसकी ओर उँगली से संकेत करते हुए पिताजी बोले।
दूसरी ओर अश्वारोहण के लिए स्थान रिक्त छोड़ दिया गया था। घोड़े पंक्ति में दौड़ सकें, इसलिए उस स्थान में रेखाएँ खींची हुई थीं। दौड़ते समय बार-बार रुकावट डालने के लिये स्थान-स्थान पर खन्दकें खुदी हुई थीं। कुछ खन्दकें पानी से भरी हुई थीं। स्थान-स्थान पर ऊँची दीवारें खड़ी की गयीं थीं। अनेक युवक उन सब रुकावटों को खेल-खेल में पार करके अश्वों को अभ्यास कराते हुए दिखाई दिये।
पूर्व की ओर खड्गों का अभ्यास करने के लिए एक क्रीड़ा-क्षेत्र बनाया गया था। उसके किनारे पर छड़ें लगी थीं। उस छड़ों पर विविध आकार के कवच और छोटी-बड़ी ढालें टँगी हुई थीं। अनेक योद्धा खड्गों से अभ्यास कर रहे थे। क्रोध से तमतमाते हुए एक-दूसरे पर टूट रहे थे। खड्गों की झनझनाहट गूँज रही थी।
पश्चिम की ओर चैसे ही आकार का एक गोलाकर क्रीड़ांगण था। उसमॆं कुछ युवक गदाएँ घुमाकर उनका अभ्यास कर रहे थे। गर्जना करते हुए चक्कर काट रहे थे। उस विशाल स्थान पर शूल, तोमर, शतघ्री आदि के लिए छोटे बड़े बहुत से क्रीड़ा-क्षेत्र बनाये गये थे। चारों ओर पाषाण-निर्मित कक्ष अनेक प्रकार के शस्त्रास्तों से ठसाठस भरे हुए थे।
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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १५
हम नगर से युद्धशाला की ओर चले। मैंने पिताजी से पूछा, “महाराज की आँखों को क्या हो गया है ?”
“वे अन्धे हैं, वत्स । और इसीलिए उनकी पत्नी राजमाता गान्धारी देवी भी समदु:खी होने के लिए आँखों पर पट्टी बाँधकर रहती हैं, जिससे कि यह संसार दिखाई न दे।“
“राजमाता गान्धारी देवी ?”
“हाँ ! युवराज दुर्योधन की माता। उनके निन्यानबे पुत्र और हैं । युद्धशाला में उन सबको तुम अभी देखोगे ही। महाराज पाण्डु के पुत्र पाण्डव भी तुमको इस समय देखने को मिलेंगे।“
“पाण्डव ?”
“हाँ ! इस राज्य के वास्तविक उत्तराधिकारी करुअवराज महाराज पाण्डु थे लेकिन उनकी अकाल-मृत्यु हो जाने के कारण यह राज्य उनके भाई महाराज धृतराष्ट्र को मिला। उन महाराज पाण्डु के पाँच पुत्र हैं, उन्हीं को नगरजन पाण्डव कहते हैं।“
“इसका अर्थ यह है कि कुरुवंश में कुल एक सौ पाँच युवराज हैं। पाँच पाण्डव और सौ धार्तराष्ट्र।“ मेरे मन में यह उत्सुकता जाग्रत हुई कि इतने युवराज आपस में कैसा व्यवहार करते होंगे !
“और दो महाराज और एक पितामह – पितामह भीष्म ।“ पिताजी बोले ।
“दो महाराज ? कौन-से ?”
“एक महाराज धृतराष्ट्र और दूसरे विदुर ।“
“विदुर महाराज कैसे हुए ? थोड़ी देर पहले तो आपने उनसे गुरुदेव कहा था ?”
“हाँ वत्स, गुरुदेव विदुर महाराज धृतराष्ट्र के भाई हैं, लेकिन उन्होंने राजसंन्यास ग्रहण कर लिया है ।“
“संन्यास ! संन्यास क्या होता है ?”
“संन्यास का अर्थ यह है कि इन्होंने सबका त्याग कर दिया है। यह राज्य, यह राजप्रासाद, यह वैभव- किसी पर भी उन्होंने अपना अधिकार नहीं जताया।“
“फ़िर वे यहाँ क्यों रहते हैं ?”
“अपने अन्धे भाई की राज्य-व्यव्स्था लँगड़ी न हो जाये, इसलिए । उनके प्रत्येक शब्द का यहाँ सम्मान होता है। उसी प्रकार पाण्डवों की माता-राजमाता कुन्तीदेवी का भी मान है।“
“राजमाता कुन्तीदेवी !” मैं कुछ प्रश्न करने जा ही रहा था कि इतने में ही पास के कुंज से एक कोकिल जोर से कुहू-कुहू करता हुआ अशोक के वृक्ष पर से सर्र से उड़ा और हमारे सिर के ऊपर से गुजर गया। मैंने उसकी ओर देखा। मुझको भगदत्त की याद आयी। उसने एक बार कहा था कि, “सप्तस्वरों में तान लेनेवाला कोकिल मादा कौआ के घोंसले में पलता रहता है, क्योंकि उसकी माँ ही उसको जन्म देकर मादा कौआ के घोंसले में रख आती है।“ कितना पागल है भगदत्त ! अरे, कोकिल कहाँ पलता है, यह जानकर क्या करना है ? उचित समय आते ही चतुर्दिक वातावरण को मुग्ध कर देनेवाली उसकी आवाज सुनाई देती है, यही पर्याप्त है ।