सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २५ [युद्धशाला में कर्ण के अस्त्र और बाणों के प्रकार….]

     मेरा युद्धशाला का कार्यक्रम निश्चित हो गया था। एक महीने की भीतर ही मैंने शूल, तोमर, परिघ, प्रास, शतघ्नी, खड्ग, पट्टिश, भुशुण्डि, गदा, चक्र आदि अनेक शस्त्रों का परिचय प्राप्त कर लिया । धनुष की ओर मेरी विशेष रुचि होने के कारण धनुर्विद्या से सम्बन्धित सभी शस्त्रों का मैंने ध्यानपूर्वक अभ्यास किया। केवल बाण ही अनेक प्रकार के थे।

     कर्णी बाण में दो शूलाग्र होते थे। वह जब पेट में घुस जाता था, तब बाहर निकलते समय आँतें भी बाहर निकल आती थीं। नालीक बाण का फ़लक मोटा होता था तथा उसमें टेढ़े दाँते होते थे, इसलिए शरीर में घुसने पर जब वह बाण बाहर निकाला जाता था तब अपने आस-पास की शिराओं को तोड़कर ही वह बाहर निकलता था। लिप्त बाण के अग्रभाग में विषैली वनस्पति का रस लगा होने के कारण वह बड़ा दाहक होता था। बस्तिक बण शरीर में घुस जाता था। लेकिन बाहर खींचने पर उसका केवल द्ण्ड ही हाथ में आता था और समस्त फ़लक ज्यों का त्यों लक्ष्य के शरीर में रह जाता था। सूची बाण का अग्रभाग सूच्याकार और नुकीला होने के कारण अत्यन्त सूक्ष्म लक्ष्य भी उससे अचूक भेदा जा सकता था। विशेष रुप से आँख की पुतलि को इस बाण से अचूक भेदा जा सकता था। जिह्मा बाण जाता तो टेढ़ा-मेढ़ा था, लेकिन लक्ष्य में बिलकुल ठीक घुसता था। इसके अतिरिक्त गवास्थी अर्थात बैल के हाड़ का, गजास्थी अर्थात हाथी के हाड़ का, कपिश अर्थात काले रंग का, पूती अर्थात उग्र गन्धवाला, कंकमुख, सुवर्णपंख, नाराच, अश्वास्थी, आंजलिक, सन्न्तपर्व, सर्पमुखी आदि बाणों के अनेक प्रकार थे। इन सब बाणों को लक्ष्य पर छोड़ने की शिक्षा मैं मनोयोग से ग्रहण करने वाला था।

     अपनी शिष्यावस्था का एक-एक क्षण मुझको इसी कार्य में लगाना था। पहले तीन वस्तुओं पर मेरा प्रेम था। गंगामाता, सूर्यदेव और माता ने – राधामाता ने — अत्यन्त प्रेम से जो दी थी वह चाँदी की पेटिका; परन्तु युद्धशाला में आने के बाद उसमें एक वस्तु और सम्मिलित हो गयी। वह वस्तु थी धनुष और बाण!

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २४ [गुरु द्रोण का अर्जुन पर कर्ण के मन की कशमकश]

       पहले पन्द्रह दिन तक मैं युद्धशाला के शास्त्रों का केवल परिचय प्राप्त करता रहा। क्योंकि मैं कुछ सीखने की स्थिति में ही नहीं था। गुरुवर्य द्रोण के विचित्र व्यवहार के कारण मेरा मन कहीं रम नहीं रहा था। कभी मन में आता कि युवराजों के इस कबाड़खाने में केवल सूतपुत्र के रुप में अपेक्षित होने से तो अच्छा है कि एकदम चम्पानगरी का मार्ग पकड़ लिया जाये। युद्ध-विद्या की शिक्षा लेकर आखिर मुझे क्या करना है ? अब कौन सा महायुद्ध होने वाला है ? और हो भी तो उसमें मेरा उपयोग ही क्या है ? केवल एक सारथी के रुप में न ? तो फ़िर सारथी को इस युद्ध-विद्या की शिक्षा की क्या आवश्यकता है ? उसको तो घोड़ों की परीक्षा करनी चाहिए और उसकी उच्छश्रंखल प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाना सीखना चाहिए। क्या यह काम में चम्पानगरी में रहकर नहीं कर सकता ? दूसरे ही क्षण फ़िर यह विचार आता कि ऐसा करने से कैसे काम चलेगा ? युद्ध-विद्या क्या केवल युद्ध के लिये ही सीखी जाती है ? जिसकी भुजाओं में शक्ति होती है, वह सदैव श्रेष्ठ माना जाता है ? इस युद्धशाला में मैं शक्तिशाली बन सकूँगा ।

     इस युवराज अर्जुन को भी दिखा दूँगा कि संसार में वही अकेला धनुर्धर नहीं है। लेकिन इस बेचारे अर्जुन ने मेरा क्या बिगाड़ा है ! उससे यह स्पर्धा क्यों करुँ ! स्पर्धा सदैव व्यक्ति को अन्धा कर देती है। गुरुवर्य उससे स्नेह करते हैं तो इसमें उसका क्या दोष है ! गुरु प्रेम करें – यह कौन शिष्य नहीं चाहेगा ! और कौन ऐसा गुरु है जो भली-भाँति परीक्षा लिये बिना शिष्य को इतने समीप कर लेगा ! यदि यही बात है, तो गुरुदेव ! मैं भी आपकी कसौटी पर खरा उतरुँगा । केवल एक धनुर्धर होने के कारण ही यदि आप उस अर्जुन को इतना स्नेह करते हैं, तो मैं उससे भी श्रेष्ठ धनुर्धर बनूँगा। परन्तु मैं यदि धनुर्धर हो भी जाऊँ तो उसका क्या उपयोग ! आप तो मुझको कभी अपना शिष्य मानेंगे ही नहीं।

     यदि युवराज अर्जुन गुरुवर्य का इतना लाड़ला था, तो इसका बुरा उसके भाई मान सकते थे, बात मुझको क्यों लगती है ? मेरी और युवराज अर्जुन का ऐसा क्या सम्बन्ध है ? कुछ भी तो नहीं है । मैं एक सूतपुत्र हूँ । वह एक युवराज हैं । उसका मार्ग दूसरा है और मेरा दूसरा । जीवन के मार्ग पर चलने वाले हम दोनों ऐसे यात्री हैं जो एक-दूसरे से एकदम भिन्न हैं। जाओ, युवराज अर्जुन ! खूब बड़े बनो । अजेय धनुर्धर बनो, यदि कभी अवसर आया तो यह सूतपुत्र कर्ण तुम्हारे रथ के घोड़ों को सँभालने के लिये सारथ्य करेगा।

मैंने मन ही मन निश्चय कर लिया कि अर्जुन हो या कोई और हो, मैं किसी के प्रति भी विद्वेष नहीं रखूँगा। यहाँ के सभी युवराजों के और मेरे मार्ग भिन्न-भिन्न हैं। जन्म ने ही उनका निर्धारण कर दिया है। चूँकि मेरी बड़ी इच्छा है, केवल इसीलिए मैं धनुर्विद्या सीखूँगा। मेरी भी इच्छा होती है कि केवल ध्वनि की दिशा में कहीं भी बाण छोडूँ, एक ही समय असंख्य बाण दसों दिशाओं में छोडूँ। गुरु कौन है, इस बात का महत्व ही क्या है ? महत्व की बात तो वास्तव में यह है कि विद्या के प्रति शिष्य में कितनी लगन है ! मैं तन-मन एक कर दूँगा । विद्या के लिए विद्या ग्रहण करुँगा। मैंने पक्का निश्चय कर लिया।

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २३ [कर्ण, कृपाचार्य, दु:शासन…]

    चबूतरे की सीढ़ियाँ उतरने लगे। मेरा मन अब शान्त हो गया था। सामने गुरुदेव द्रोण और युवराज अर्जुन चबूतरे की ओर आ रहे थे। अर्जुन मेरी ओर देखकर हँसा, लेकिन मुझको हँसी नहीं आयी। मुझको ऐसा लगा जैसे उसके हँसने में भी एक प्रकार का व्यंग्य है।

    मुझको पितामह भीष्म की याद आयी। इस अर्जुन के पितामह थे वे। लेकिन दोनों में कहीं समानता नहीं थी। दोनों के स्वभाव और व्यवहार में कितना अन्तर था। जाते-जाते कुछ पूछने के विचार से अर्जुन ने मुझसे पूछा, “यह कौन है ?”

“मेरा छोटा भाई !” मैंने अभिमानपूर्वक कहा।

“यह भी इस शाला में आयेगा क्या ?” गुरुदेव द्रोण ने पूछा।

“जी हाँ ।“ मैंने उत्तर दिया।

“जाओ उस ओर कृप हैं, उनके पथक में सम्मिलित हो जाओ।“

     मैंने कुछ भी न कहा। उनको नमस्कार करने की भी मेरी इच्छा न हुई। जाते-जाते मैंने अर्जुन की ओर मुड़कर देखा। वह तो आश्चर्य से मेरे कानों के कुण्डलों की ओर एकटक देख रहा था।

    हम कृपाचार्य के पथक में आये। कृपाचार्य द्रोणाचार्य जी के साले थे। उनकी देख-रेख में अनेक युवक धनुर्विद्या की शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। क्षण-भर के लिए मेरे मन में यह विचार आया कि ये ढ़ेर सारे राजकुमार क्यों जहाँ-तहाँ अपनी अकड़ दिखा रहे हैं ? उस दुर्योधन का सा रोब एक में भी है क्या ? एक भी ऐसा है क्या, जिसकी चाल दुर्योधन की चाल की तरह शानदार हो ? है कोई ऐसा माई का लाल जिसकी दृष्टि उसकी दृष्टि की तरह भेदक हो ?

    इतने में युवराज दुर्योधन ही सामने से आता हुआ मुझको दिखाई दिया। उसके पास जायेंगे तो निश्चय ही हमारी कुशल-क्षेम पूछेगा – यह सोचकर मैं उसकी ओर चलने लगा। उसके पास भी गया, लेकिन युवराज दुर्योधन नहीं था। उसमें और दुर्योधन में अद्भुत समता थी। उसकी देह पर जो वस्त्र थे उससे यह तो निश्चित था कि वह युवराज था। लेकिन युवराज किनमें से था कौरवों में से या पाण्डवों में से, चूँकि दुर्योधन में और इसमें बड़ी समता है, इसलिए यह कौरवों में से ही होगा, लेकिन कौरवों मे से यह कौन है ? इतने में ही कृपाचार्य ने उसको पुकारा, “दु:शासन !” वह भी जल्दी-जल्दी उनकी ओर चला गया। तो वह दु:शासन था ? अहा, दुर्योधन में और उसमें कितनी समानता थी। एक को छिपाइये और दूसरे को दिखाइए। युवराज दुर्योधन और युवराज दु:शासन। दोनों की चाल में वही शान थी। दोनों की दृष्टि में वही भेदकता थी। कहीं दु:शासन दुर्योधन की प्रतिच्छाया ही तो नहीं था ?

अवसर… मौका… जो पहला मिले छोड़ो मत…

एक जवान आदमी किसान की खूबसूरत लड़की से शादी करना चाहता था, वह किसान के पास शादी की अनुमति लेने गया।

किसान ने उस जवान की ओर देखा और बोला जाओ उस खेत में खड़े हो जाओ। मैं एक एक करके तीन सांडों को छोडूँगा। अगर तुमने एक भी सांड की पूँछ पकड़ ली तो तुम मेरी बेटी से शादी कर सकते हो।

जवान आदमी खेत में जाकर खड़ा हो गया और पहले सांड के आने का इंतजार करने लगा। खलिहान का दरवाजा खोला गया पहला सांड बाहर आया, बहुत ही भीमकाय शरीर वाला उसने पहली बार इतना बड़ा सांड देखा था। उसने सोचा कि अगला सांड इससे बेहतर विकल्प होगा, इसलिए वह एक ओर भाग लिया और वह सांड उसके सामने से निकल गया।

खलिहान का दरवाजा वापिस से खोला गया, देखकर यकीन नहीं हुआ। इतना बड़ा और भयंकर सांड उसने पहली बाद देखा था, उसे देखकर तो वह जड़ हो गया। उसने सोचा कि  अच्छा है कि मेरा  अगले सांड का इंतजार करना ठीक रहेगा और अगला सांड एक बेहतर विकल्प होगा। इसलिए वह एक ओर भाग लिया और वह सांड उसके सामने से निकल गया।

खलिहान का दरवाजा तीसरी बार खोला गया, उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी, यह सबसे कमजोर सांड था, इससे कमजोर सांड उसने आज तक नहीं देखा था। उसने अपने आप से कहा यही तो मेरा सांड है, जिसका मैं इंतजार कर रहा था। वह सांड दौड़ा चला आ रहा था और इस जवान ने अपनी स्थिती ठीक की और सांड की पूँछ पकड़ने के लिये तैयार हो गया, और कूद पड़ा, लेकिन यह क्या उस सांड की तो पूँछ ही नहीं थी।

नैतिक शिक्षा – जीवन अवसरों से भरा पड़ा है, जो भी अवसर पहले मिले उसे ले लो, छोड़ो मत।

परिवर्तन के बिना प्रगति असंभव है, और जो अपना मन नहीं बदल सकते, वे कुछ नहीं बदल सकते।

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २२ [कर्ण के नये गुरु, जो खुद कर्ण ने बनाये..]

     जैसे ही मैं राजभवन पहुँचा, पिताजी ने मुझको तैयार रहने को कहा। क्योंकि युद्धशाला में जाना था, इसलिए मैं तुरन्त ही तैयार हो गया। माँ ने जो पेटिका दी थी, वह मैंने एक आले में सँभालकर रख दी थी । उस पर पारिजात के चार पुष्प चढ़ाये। उसको वन्दन कर मैं धीरे से बोला, “माँ ! मुझको आशीर्वाद दो । तुम्हारा वसु जीवन के मार्ग पर एक महत्वपूर्ण मोड़ आज ले रहा है । युद्धशाला में जाने का आज पहल दिन है ।“

पिताजी ने बाहर से ही पुकारा, “कर्ण ! शोण ! जल्दी चलो।“

    हम तीनों युद्धशाला में आये । कल की अपेक्षा आज तो वहाँ बहुत अधिक युवक एकत्रित थे। वे सभी मध्य में स्थित उस चबूतरे के चारों ओर शान्तिपूर्वक बैठे हुए थे। सबके सम्मिलित शान्त और गम्भीर स्वर सुनाई पड़ रहे थे। शायद प्रात:काल की प्रार्थना हो रही थी।

    “ऊँ ईशावास्यम इदम सर्वम…” । प्रार्थना बहुत देर तक चलती रही। मैंने पिताजी को वापस जाने को कहा।

“अनुशासन रखना।“ यह कहकर वे लौट गये।

    बीच में बैठे हुए गुरुदेव द्रोण शान्तिपूर्वक उठकर खड़े हो गये। उन्होंने अपने दोनों हाथ उठाकर अपने सभी शिष्यों को आशीर्वाद दिया। मैं शोण को लेकर आगे बढ़ा । हम दोनों ने झुककर गुरुदेव को प्रणाम किया। मुझको आशा थी कि अपना हाथ उठाकर वे हमको भी आशीर्वाद देंगे। लेकिन इतने में ही अर्जुन उनके सामने आ गया और वे अर्जुन के कन्धे पर हाथ रखकर उससे कुछ बातें करते हुए वहाँ से चले गये।

     मैंने सदैव की तरह पूर्व दिशा में आकाश की ओर देखा । तप्त लाल लोहे के गोले की तरह सूर्यदेव आकाश की नीली छत को जला रहे थे। मेरी निराशा क्षण-भर में नौ-दो ग्यारह हो गयी। बस, महासामर्थ्यशाली उस तेज के अतिरिक्त अधिक योग्य गुरु इस त्रिभुवन में दूसरा कौन होगा ? किसी अन्य के आशीर्वाद की भीख माँगने की आवश्यकता ही क्या है ? आज से मेरे वास्तविक गुरु ये ही हैं। आज से बस इन्हीं की पूजा, आज से इन्हीं की आज्ञा। तत्क्षण मैं पत्थर के उस चबूतरे पर चढ़ गया। वहाँ पुष्पों से सजा हुआ धनुष रखा था। वह मैंने हाथ में उठा लिया और जितना ऊँचा उठा सकता था, उतना ऊँचा उठाकर मैं बोला, “संसार के समस्त अन्धकार को नष्ट करने वाले सूर्यदेव ! आज से मैं तुम्हारा शिष्य हूँ। मुझको आशीर्वाद दो। मुझको मार्ग दिखाओ।“ उस धनुष को मस्तक से लगाकर मैंने झुककर उस तेज को प्रणाम किया।

विश्वास रखो, दोस्तों, भगवान सजा देगा इन पापियों को, धैर्य रखो….

1

2

4

5

6

7

13

14

15

दारु………….

वेस्ट कर दी सालों ने…….

माँ कसमम्म्म्म्म्म्म्म्म्म………….

एक एक को चुन चुन के मारुँगा……….

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २१, भीष्म पितामह से संवाद और कर्ण के विचार ।

    एक विशाल वटवृक्ष के सम्मुख घास के छोटे-से तृण की तरह मैं खड़ा था। क्या करुँ, यही मेरी समझ में नहीं आ रहा था। तुरन्त ही जैसे-तैसे अपने को सँभालकर मैंने झुककर उनको अभिवादन किया। उन्होंने तत्क्षण मुझको ऊपर उठाया। अत्यन्त मृदु स्वर में बोले, “तुम अपनी पूजा में लीन थे। मैंने तुमको जगा दिया, इसलिए तुम क्षुब्ध तो नहीं हो गये ?”

“नहीं ।” मैं बोला।

“सचमुच वत्स, तुमको जगाने की इच्छा मैं रोक नहीं सका।“

    मैं आश्चर्य से उनकी ओर देखने लगा। थोड़ी देर बाद वे बोले, “आज तीन दशाब्दियाँ हो गयीं। प्रतिदिन नियमित रुप से मैं इस समय गंगा के घाट पर आता हूँ, लेकिन इस हस्तिनापुर का एक भी व्यक्ति कभी मुझसे पहले यहाँ नहीं आया, मैंने किसी को नहीं देखा। तुम वह पहले वयक्ति हो, जिसको मैं आज देख रहा हूँ।“

“मैं ?” मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि आगे क्या कहूँ।

    “हाँ ! और इसीलिए बहुत देर तक प्रतीक्षा करने के बाद अन्त में तुमको जगाया ।“ मेरे कानों के कुण्डलों की ओर देखते हुए वे बोले, “इन कुण्डलों के कारण तुम बहुत ही अच्छे लग रहे हो।“

“ये जन्मजात हैं।“ मैंने कहा ।

     “इनका सदैव ध्यान रखना ।” धीरे धीरे पैर रखते हुए वे घाट की सीढ़ियों पर उतरने लगे। पर्वत की तरह भव्य दिखने वाला उनका वह लम्बा शरीर ओझल होने लगा। गले तक पानी में जाकर वे खड़े हो गये। उनके सिर के बाल पानी के साथ तैरने लगे। मैं जहाँ खड़ा था, वहीं से मैंने उनको वन्दन किया। आर्द्र उत्तरीय कन्धे पर डालकर मैं राजभवन की ओर लौटा।

    उस विचित्र संयोग पर मुझे आश्वर्य हुआ। जिन पितामह भीष्म को देखने के लिए मैं कल दिन-भर विचार करता रहा था, वे स्वयं ही आज मुझको मिल गये थे – वे भी अकेले, गंगा के तट पर और प्रात:काल की इस रमणीय बेला में। कितने मधुर हैं उनके स्वर ! मन्दिर के गर्भगृह की तरह उनकी मुखाकृति कितनी शान्त और पवित्र है ! मुझ जैसे एक साधारण सूतपुत्र की कोई बात उनको अच्छी लगती है ! कौरवों के ज्येष्ठ महाराज मुझ-जैसे सूतपुत्र के कन्धे पर हाथ रखकर स्नेह से पूछताछ करते हैं ! सचमुच ही वीर पुरुष यदि अभिमानरहित हो, तो वह कितना महान लगने लगता है ! जिस कुरुकुल में पितामह जैसे वीर और गर्वरहित श्रेष्ठ पुरुष ने जन्म लिया है, वह कुल निश्चय ही धन्य है। मैं भी कितना भाग्यशाली हूँ, जो ऐसे राजभवन में रहने का सौभाग्य मुझको प्राप्त हुआ है। अब तो बार-बार इन पुरुष-श्रेष्ठ के दर्शन मुझको हुआ ही करेंगे। वे दो शान्त और तेजस्वी आँखें मुझपर भी कृपा-दृष्टि रखेंगी। अपने जीवन में जिन तीन व्यक्तियों पर मेरा प्रेम था, उनमें एक व्यक्ति और बढ़ गया था ! पितामह भीष्म !

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २० [गंगा तट पर भीष्म पितामह से मुलाकात]

     संसार के तीन व्यक्तियों से मुझको अत्यन्त प्रेम था। एक अपनी माँ से, दूसरा पिताजी से और तीसरा शोण से। उसी तरह तीन बातों के प्रति मुझमें आकर्षण था। एक थी अपनी असंख्य लहरों के असंख्य मुखों से मुझसे घंटों तक बात करने वाली गंगामाता, दूसरे थे मेरे लिए सदैव उत्साह का प्रचण्ड प्रवाह लेकर आनेवाले आदित्यनारायण और तीसरी यह माँ की दी हुई एक छोटी-सी निशानी चाँदी की पेटिका। इस पेटिका के कारण मुझको चम्पानगरी की याद आयी। मेरे मन का बछड़ा मातृभूमि के थनों पर आघात करने लगा। उनसे स्मृतियों की अनेक मधुर दुग्धधाराएँ बहने लगीं उनकी मधुरता चखते-चखते मैं न जाने कब सो गया।

    प्रत्युषा में पक्षियों की चहचहाहट से मैं जागा। क्षितिज की रेखाओं से अन्धकार हटने लगा था। समस्त हस्तिनापुर धीरे-धीरे जागृत हो रहा था। दूसरा एक सूखा उत्तरीय लेकर मैं कक्ष से बाहर निकला। इस समय वहाँ कोई न होगा, अत: गंगा के पानी में जी भर स्नान कर आऊँ, यह सोचकर मैं घाट की ओर चलने लगा। विचारों में डूबा मैं गंगा के घाट पर आ पहुँचा। मैंने उस अथाह पात्र को आदरपूर्वक नमस्कार किया और फ़िर दोनों हाथ आगे कर सिर के बल मैं पानी में कूद पड़ा। लगभग घण्टा-भर तक मैं उस पानी में मनमानी डुबकियाँ लगाता रहा। मैं पानी में से घाट की ओर पानी काटता हुआ आया। भीगा हुआ अधरीय बदला। भीगा वस्त्र पानी में डूबाकर, फ़िर निचोड़कर मैंने सीढ़ी पर रख दिया। दूर आकाश में सूर्यदेव धीरे-धीरे ऊपर उठ रहे थे। उनकी कोमल किरणें गंगा के पानी को गुदगुदाकर जगा रही थीं। अंजलि में पानी भरकर भक्तिभाव से उसका अर्ध्य मैंने सूर्यदेव को दिया।

    शायद किसी ने मेरे कन्धों को स्पर्श किया। मेरे कन्धों को जोर से हिला रहा था। मैंने धीरे से आँख खोलीं और मुड़कर देखा। अत्यन्त शांत मुखाकृतिवाले एक वृद्ध मेरी ओर देख रहे थे। उनकी दाढ़ी के, सिर के और भौंहों के सभी केश सफ़ेद बादल की तरह श्वेत-शुभ्र थे। भव्य मस्तक पर भस्म की लम्बी रेखाएँ थीं। उनका हाथ मेरे कन्धे पर अब भी ज्यों का त्यों था। कौन है यह वृद्ध ? तत्क्षण मैं प्रश्नों के बाण मन के धनुष पर चढ़ाने लगा। लेकिन नहीं, मैंने इनको कहीं नहीं देखा।

अत्यन्त स्नेहासिक्त, स्वर में उन्होंने मुझसे पूछा, “वत्स, तुम कौन हो ?”

“मैं सूतपुत्र कर्ण ।“

“सूतपुत्र ! कौन-से सूत के पुत्र हो तुम ?”

“चम्पानगरी के अधिरथजी का ।“

“अधिरथ का ?”

“जी । लेकिन आप ?” मैंने बड़ी उत्सुकता से पूछा।

“मैं भीष्म हूँ ।“ उनकी दाढ़ी के बाल हवा के झोंकों से लहरा रहे थे।

भीष्म ! पितामह भीष्म ! कौरव-पाण्डवों के वन्दनीय भीष्म ! गंगा-पुत्र भीष्म ! कुरुवंश के मन्दिर के कलश भीष्म ! योद्धाओं के राज्य के ध्वज भीष्म ! क्षण-भर मेरा मन विमूढ़ हो गया। कुरुवंश का साक्षात पराक्रम मेरे सामने गंगा के किनारे खड़ा था।