धरती पर आम कैसे आया, क्यों आम फलों का राजा है, आम इतना स्वादिष्ट क्यों होता है?, इसके लिये यह आम पुराण हमारे मित्र देवेन्द्र कौशिक जी की अतिथि पोस्ट है।
ॐ हरि तत्सत
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धरती पर आम कैसे आया, क्यों आम फलों का राजा है, आम इतना स्वादिष्ट क्यों होता है?, इसके लिये यह आम पुराण हमारे मित्र देवेन्द्र कौशिक जी की अतिथि पोस्ट है।
ॐ हरि तत्सत
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लॉकडाउन में बेटेलाल ने जमकर खाना बनाने का लुत्फ उठाया है, केवल वीडियो देखकर, थोड़ी अपनी अक्ल लगाकर जो पारंगत हुए हैं, काबिले तारीफ है।
खाना बनाना बहुत आसान नहीं है, इसमें सबसे मुश्किल है खाना बनाने के लिये अपने आप को तैयार करना। खाना बनाना दरअसल केवल महिलाओं का ही काम समझा जाता है, पर बेटेलाल कहते हैं कि जो स्वाद मेरे हाथ का होगा, वह किसी और के हाथ में नहीं, ध्यान रखना। वाकई स्वाद तो है।
आटा गूँथना भी रख स्किल है, रोटी, पराँठे, पूरी, बाटी, बाफले, मैदा सबको अलग अलग तरह से गूँथा जाता है। पर बेटेलाल अब इन सबमें परफेक्ट हो चुके हैं। उन्हें नान बहुत पसंद है, जिस दिन खाने की इच्छा होती है सबसे पूछ लेते हैं, फिर नान और पनीर की सब्जी बनाते हैं।
यही हाल इनका गेमिंग में है, पब्जी में पता नहीं कौन सी रैंकिंग हो गई है,चेस खेलने का शौक है तो पता नहीं कहाँ कहाँ के चेस के मैच देखते रहते हैं, फिर यूट्यूब के वीडियो, मूवीज और वेबसिरिज में लगे रहते हैं। पढाई जिस दिन मूड होता है किसी एक विषय का पूरा चेप्टर निपटा देते हैं। वीडियो में भी कुछ अलग ही देखते हैं, जैसे शार्क टैंक और भी कई एंटरप्रेन्योरशिप के कुछ अलग अलग।
रोको टोको मत बस, जो करना चाहते हैं करने दो, हम कहे, करो भई करो, इन सबका भी कुछ विधान ही होगा।
यह वाक़या हमें इसलिये याद आ गया जब हमने दोस्त के साथ आम का डिनर किया। पिछले वर्ष हम 1 सप्ताह के लिये मुंबई गये थे, यही समय था, खूब आम आ रहे थे। हम अपनी रॉ वेगन डाइट पर थे, घर से बाहर इस प्रकार की डाइट पर रहना थोड़ा मुश्किल होता है। परंतु हमने अच्छे से पालन किया।
सुबह ऑफिस जाते समय होटल के रेस्टोरेंट से जहाँ अपना ब्रेकफास्ट कॉम्प्लीमेंट्री था, पर हम ब्रेकफास्ट नहीं करते थे, तो हम अपनी 1 लीटर मिल्टन की बोतल में तरबूजे का ज्यूस ले जाते थे, और दोपहर में भूख लगती थी तो वहीं बीकेसी के बैंक की कैंटीन में मोसम्बी ज्यूस पी लेते थे।
शाम को होटल आते हुए, ककड़ी, गाजर, शिमला मिर्च, प्याज ले आते थे, 1 या 2 दिन हमने सब्जी का सलाद खाया, चाकू, बारीक सलाद काटने की मशीन, थाली सब साथ लेकर गये थे। फिर ठेलों ओर आम दिखने लगे, बढ़िया दशहरी, लँगड़ा।
बस फिर लँगड़े आम का ही शाम का भोज होता था, शाम को आम 2 दिन के हिसाब से लाते और होटल के कमरे में फ्रिज में डाल देते तो अगले दिन बढ़िया ठंडे आम मिलते थे।
हमारे मित्र होटल पर मिलने आने वाले थे, हमने उनसे पूछा कि डिनर साथ करेंगे, वो बोले हाँ करेंगे, वे आये मिलने, तो हमने कहा चलो आओ डिनर कर लो रेस्टोरेंट में, उन्होंने हमसे पूछा और तुम, हमने कहा पका तो खा नहीं रहे हम, हम तो डिनर में आम खाते हैं, मित्र बोले फिर आज हम भी डिनर में आम ही खायेंगे। हम दोनों ने छककर आम खाये।
आम के सीजन में डाइट का मजा है, सुबह 4-5 आम खाओ, फिर पूरी दोपहर तरबूजे का रस पियो और फिर शाम को वापिस से 5-6 आम खा लो। वजन मेंटेन रहेगा।
ये अंग्रेज opportunity को ओप्पोर्तुनीति कहते हैं और हम त की जगह च कहकर ओप्पोरचुनुटी कहते हैं। यह फेसबुक की बातचीत हुई, बढ़िया लगी तो ब्लॉग पोस्ट बनाकर सहेज ली।
Pawan Kumar बहुत शब्द हैं ऐसे, व्हाट को वाट बोलते हैं
हमने कहा – वात कहते हैं
नुतन नारायण भारतीय जलवायु के कारण……….. ठन्डे इलाकों में रहने वाले मुँह कम खोलकर शब्द उच्चारण करते है, इस कारण से कुछ ध्वनियों का लोप है उनकी भाषा मेंl
Vikas Porwal एक बार एक रशियन भाई से मुलाक़ात हुयी, aperture को अपरतूरे बोल रहा था
Mahfooz Ali इंडिया का फ़्यूट्युरे अब डार्क है…
Neeraj Rohilla भारत मे अधिकतर अपोर्चुनिटी कहते हैं, बाहर लगभग ऑपरचूनिटी; जैसे भारत मे अधिकतर इकोनोमिक कहते हैं और बाहर एक्नॉमिक ।
केवल भारत में ही इन सब बातों पर ध्यान देते हैं, अंग्रेजी बोलने वाले देश अंग्रेजी खराब होने पर ध्यान नहीं, अगला क्या कहना चाह रहा है इस पर ध्यान देते हैं, केवल भारत मे ही हमने देखा है कि लोग खराब अंग्रेजी या प्रोनांशियेशन पर लोगों को जाहिल डिक्लेयर कर देते हैं।
हमने कहा – यही हमने भी देखा, ग्रामर पर ध्यान दिलाकर नीचा दिखाने की कोशिश हमारे ही लोग करते हैं, पर अन्य देशों के लोगों का मैन फोकस होता है कि काम की बात आप तक पहुँचनी चाहिये।
Bs Pabla मतलब
ये हमारे ग्रंथों में बताई गई कोई नीति है? जो अंग्रेज चुराके ले गए थे 🤔
Kajal Kumar हमारा काम ‘इंडियन इंगलिश’ से ही काम चल जाता है क्योंकि वे हमसे यही expect भी कर रहे होते हैं
Vijender Masijeevi भाषा विज्ञान में इसे कंट्रास्टिंग एनालिसिस (व्यतिरेकी विश्लेषण) कहा जाता है। अपने जो भाषा पहले सीखी है उसकी ध्वनियां बाद में सीखी भाषा को प्रभावित करती ही हैं। हमारे यहां पूरा ट वर्ग और त वर्ग है इन ध्वनियों का उनके पास इस वर्ग की ध्वनियां कम हैं लिहाज हम इस वर्ग की ध्वनियों में बहुत फिजूलखर्ची करते हैं। रवींद्रनाथ ठाकोर का टैगोर होना तो सब जानते ही हैं, वो इसी वजह से है।
कल एक मैडम का कॉल आया, हमसे बोला कि HDB फाइनेंसियल से बोल रहे हैं, और स्पेशल ऑफर चल रहा है, पर्सनल लोन मात्र 3% पर दे रहे हैं, हमारा दिमाग चकरघिन्नी कि कोई 3% पर पर्सनल लोन कैसे दे सके है। फिर हमने पूछा ये मंथली ब्याज है न तो 36% हो गया वो बोलीं नहीं सर 3% वार्षिक।
फिर हमने पूछा अच्छा अगर हम 1 लाख लोन लेंगे तो हमको ₹3000 ब्याज देना होगा न, वो बोलीं नहीं सर वर्ष का इतना देना होगा, इसी बीच हम HDB की वेबसाइट खोलकर पूरा गणित समझने की कोशिश कर रहे थे। पर कहीं भी 3% वार्षिक वाला स्पेशल ऑफर नहीं था, हमने बताया मैडम को, तो वे बोलीं यह ऑफर केवल हमारे पास उपलब्ध है 😂😂
फिर वो पूछीं कि आपको लोन लेना है, हमने कहा हम तो आज तक लोन ही नहीं लिये, हम लोन नहीं लेते, लोन ले लें तो नींद उड़ जाती है। बस यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि 3% पर आप कैसे लोन बाँट रहे हो? मैडम तुनक गईं हुँह लोन लेना नहीं है पर जानकारी पूरी चाहिये। हमने कहा मैडम बात यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि HDB इतने कम ब्याज पर लोन कैसे दे रहा है? बस फिर फोन काट दिया।
कई लोगों को शेयर बाजार केसिनो लगता है, कि रातों रात वहाँ पर पासे फेंककर या नम्बर गेम में किस्मत आजमाकर करोड़ों कमाना चाहते हैं। पर यह बाजार उन्हीं जैसे लोगों का इंतजार करता है, थोड़ा सा जिताकर लालच देता है कि तुम केवल जीत ही रहे हो, और फिर वे लोग इस दलदल से बाहर निकल ही नहीं पाते, धन तो जाता ही है, अगर मानसिक कमजोर होते हैं तो जान भी दे देते हैं आत्महत्या करके।
हम स्टॉक मार्केट में करोड़ों कमाने नहीं आये, हमें बैंक की फिक्स्ड डिपॉजिट पर मिलने वाला ब्याज कम लगता था, और हमें चाहिये था दोगुना ब्याज, बस इस चक्कर में यहाँ आये, कई बार लालच में फँसे पर अपने लक्ष्य पर कायम रहे।
ध्यान रखिये वॉरेन बफेट का वार्षिक रिटर्न 23% है तो कैसे ये नए खिलाड़ी सोचते हैं कि वे 200 या 500% का रिटर्न बाजार से कमा लेंगे। क्योंकि यहाँ भी सपने बेचने वाले लोग हैं, जो बताते हैं कि अगर इतना पैसा लगाओगे तो साल का इतना पैसा तो चुटकी बजाते ही कमा लोगे, और जब पैसे की बात होती है तो आदमी लालच में अंधा हो जाता है। जब कोई समझाता है तो उसे लगता है कि यही है वो जो उसे करोड़पति बनने से रोक रहा है। ऐसे लोगों के चक्कर में न पड़ें जो कहते हैं कि महीने के इतने रूपये लेंगे और श्यूर साट कॉल देंगे, अगर ऐसा ही है तो उनको कॉल बेचने की क्या ज़रूरत वे बाज़ार से सीधे ही कमा सकते हैं।
लालच करिये पर सीमा में रहकर, देखिये एक साधारण सा गणित है, अगर आप कोई शेयर खरीदते हैं और अगर कुछ ही दिनों में आपको मान लीजिये 4-5% का प्रॉफिट होता है, तो बेचकर निकल लीजिये, हाँ पैसा कमाना है तो सीखना भी पड़ेगा, अगर ऐसा आपने वर्ष में 2-3 या 4 बार भी कर लिया तो आपने बैंक से दोगुना या तीन गुना ब्याज अर्जित कर लिया। छोटे मुनाफे पर लालची बनिये और मजा करिये।
यही विश्वयुद्ध की शुरुआत है, इस पर हमने फ़ेसबुक पर एक स्टेटस डाला था जिसमें बताया गया था कि जर्मनी ने चीन को 130 बिलियन पौंड का बिल कोरोना वायरस के लिये भेजा है, जिससे बीजिंग में सरसराहट शुरू हो गई है। ख़बर की लिंक यह रही –
इस पर फ़ेसबुक मित्रों के कमेंट जिनमें से अधिकतर पुरातनकालीन हिन्दी ब्लॉगर हैं –
Anshu Mali Rastogi हां, जिस तरह के हालात बन रहे हैं, उसे देखकर तो यही लग रहा है कि युद्ध की संभावना बन रही है। अमेरिका भी चीन के पीछे हाथ धोकर पड़ा है। चीन ने अपना नुकसान जो किया सो किया पर पूरी दुनिया का बड़ी मात्रा में नुकसान किया है।
Vivek Rastogi Anshu Mali Rastogi अपन कब बिल भेजेंगे, पता नहीं, भेजेंगे कि भी नहीं, यह भी पता नहीं
Anshu Mali Rastogi समय ही बताएगा कि आगे हम क्या करेंगे। करेंगे भी कि नहीं या भक्ति में ही तल्लीन रहेंगे।
Kajal Kumar Anshu Mali Rastogi अमेरिका, केवल छोटे-मोटे देशों पर ही हमला करता है बड़े देशों पर हमला करने की उसकी औकात नहीं है. वरना वह USSR के ख़िलाफ़ केवल cold War में ही न बना रहता. चीन-सागर पर कब्जा कर चुका है, अमेरिका कुछ ना कर सका. एक कृत्रिम टापू भी बना लिया अमेरिका वहां भी कुछ नहीं कर सका. केवल व्यापारिक प्रतिबंध की बात कर सकता है, लेकिन उस पर भी इसे डर है क्योंकि चीन के पास अमेरिका के इतने ट्रेजरी बांड है कि वह, किसी भी दिन चाहे तो अमरीका की अर्थव्यवस्था को गिरा सकता है
Vivek Rastogi Kajal Kumar चीन ने बहुत सशक्त रणनीति बनाई है, आसपास के गरीब देशों को लोन दे देकर, बढ़िया इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप करवा दिया, चीन को पता था कि यर गरीब देश पैसा नहीं चुका पायेंगे, बिल्कुल पुराने लाला की तर्ज पर अब को सबको अपने हाथ की कठपुतली बनायेगा।
Anshu Mali Rastogi वैसे, काजल भाई मुझे ये सारा मामला अर्थव्यवस्था पर आधिपत्य या एकाधिकार का ही अधिक लगता है। आप देख रहे होंगे, चीन इस मामले में खुद को बड़ी आसानी से बचा ले जाना चाह रहा है। खुद बेचारा बन अमेरिका ही नहीं पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था के साथ खिलवाड़ कर रहा है। बेशक, कोरोना में उसकी ही भूमिका है पर बिल्ली के गले में घण्टी बांधे कौन।
रही बात भारत की तो यहां कोई उम्मीद करना बेईमानी ही होगा।
क्या बोलते हो।
Anshu Mali Rastogi आप सही कह रहे हो विवेक भाई।
Vivek Rastogi Anshu Mali Rastogi अब अमेरिका अकेला नहीं है, यह बात चीन को भी अच्छे से समझ में आ रही है, इसलिये अब चीन क्या करता है, वह देखना जरूरी है।
Anshu Mali Rastogi माना कि अमेरिका अकेला नहीं है पर मुझे लगता है अन्य देश अभी युद्ध को टालना ही बेहतर समझेंगे। क्योंकि अभी उनके लिए अपने नागरिकों की जान बचाना प्राथमिकता में होगा। बाद में देखा जाएगा कि क्या करना है। पर चीन को बहुत अधिक आर्थिक नुकसान झेलना होगा, ऐसी संभावना कम ही लगती है। चीन बड़ा निर्दयी मुल्क है।
Vivek Rastogi Anshu Mali Rastogi बात आपकी सही है, अभी प्राथमिकता अपने नागरिकों को बचाने की है, पर इसका बहुत बड़ा नुक्सान चीन को किसी न किसी रूप में भुगतना ही होगा, अभी ऐसा भी लगता है कि विश्व की चौधराहट अमेरिका के हाथ से निकल सकती है और उस चौधराहट को या तो चीन ही हथियायेगा या फिर यूरोप के कुछ देश मिलकर विश्व चलायेंगे, एशिया के किसी मुल्क में चौधराहट करने का दमखम है नहीं।
Anshu Mali Rastogi सही। वैसे, ये मौका अभी भारत के हाथ में भी है कि वो चीन और अमेरिका को मात दे दे। पर यहां समस्या वही है कि बातें ऊंची-ऊंची और जमीनी हकीकत भिन्न। अमेरिका की चौधराहट तो ध्वस्त होनी ही थी- बहाना कोरोना बन गया। रही बात यूरोप या एशिया के देशों की तो अभी वक्त लगेगा लंबा। अमेरिका के बाद चीन ही है। हम विरोध चाहे चीन का कितना ही कर लें किंतु उसके प्रति निर्भरता से मुंह न मोड़ पाएंगे। महामारी के निपटते ही हम अपने-अपने खोलों में वापस लौट आएंगे।
Vivek Rastogi Anshu Mali Rastogi हमारे यहाँ जितने भी वीर हैं वे फेसबुक और ट्विटर वीर हैं, कामधंधे में इन्नोवेशन करने की कह दो तो नानी मर जाती है, सब केवल शब्दों के महारथी हैं, कितने लोगों ने अपनी खुद की प्राइवेट लेब खोलकर कोविड वायरस की दवाई बनाने की शुरूआत की, अनपढ़ों गँवारों के बस की बात नहीं, बस ये लोग केवल गरिया सकते हैं। काम धाम इनको कुछ करना नहीं है, इनके बूते पर भारत क्या खाक चौधराहट करेगा, रात दिन मेहनत करना होगी, वो भी फेसबुक और ट्विटर पर नहीं, जमीनी हकीकत पर, अगर भारत की आधी जनता भी जी जान से जुट जाये और केंद्रीय नेतृत्व असरकारक हो, तो हम चौधराहट के लिये अग्रसर हो सकते हैं। पैसा कमाना वो भी बाहर के देशों से बच्चों का हँसी खेल नहीं है।
Anshu Mali Rastogi आपसे सहमत हूं।
हमारे यहां लोगों के साथ खुशफहमी यह है कि वे 24X7 किसी न किसी दल, नेता और संगठन की भक्ति में लीन रहते हैं। ऐसे में उनसे किसी ऊंचे या गंभीर काम की अपेक्षा करना बेमानी ही है।
Vijender Masijeevi चीन को दुनिया का तब्लीगी जमात बनाने की कोशिश है- इस्लामोफोबिया की तर्ज पर एक सिनो फोबिया भी चल रहा है। ऐसे किसी युद्ध, भले ही वह केवल आभासी, आर्थिक और वाक युद्ध भर हो, के दूरगामी बुरे प्रभाव होंगे।
Neeraj Rohilla Vijender Masijeevi चीन इतना भी मासूम नहीं है, इससे छोटी घटनाओ पर संग्राम हो चुके हैं। वैसे पूरी दुनिया सिवा चीन पर खिसिया जाने के अलावा फिलहाल तो कुछ और नहीं कर पायेगी लेकिन इसका लॉन्ग टर्म नुकसान चीन को जरूर होगा। हां, मैन्युफैक्चरिंग अभी भी चीन में ही रहेगी
Ashutosh Pandit Vijender Masijeevi चीन की और जमात की कोई तुलना नहीं है दोनों के एजेंडा बिलकुल भिन्न है
Ashwin Joshi Agar ye world War 3 nahi he to bhi.।।।।।। This is the base ground या फिर कहे तो भूमिका जरूर है।।।।
अगर आपके भी कुछ कमेंट हों तो बताइयेगा हम यहीं जोड़ देंगे।
ऑफिस से छुट्टी तो सबको चाहिये होती है, पर कई बार बिना किसी कारण के भी छुट्टियाँ चाहिये होती हैं, जैसे कि कभी काम करने का मूड ही नहीं है, या फिर उस दिन आप उदास हैं, आपका घर में झगड़ा हो गया है और अब घरवालों को खुश करने के लिये अब उन्हें दिनभर बाहर घुमाने ले जाना है। ऑफिस से छुट्टी लेने अजीब कारण पर छुट्टी तो मिल ही जाती है, अगर अपने परिवार में गृहणी बीमार हो जाये तो भी हमें खुद ही काम करना होता है, तब भी बच्चों को भी सँभालना पड़ेगा, घर की साफ सफाई भी करना होगी तथा खाना भी बनाना होगा। ऐसी कई परिस्थितियों में Continue reading ऑफिस से छुट्टी लेने अजीब कारण, पर छुट्टी तो मिल ही जाती है