पैसे पेड़ पर उगते हैं पता बता रहे हमारे बेटे लाल…

जब हम घर पर रहते हैं तो बेटेलाल को हम ही सुबह उठाते हैं, और कुछ संवाद भी हो जाते हैं, कुछ दिनों पहले महाराज अपनी एक किताब गुमा आये और अब बोल रहे हैं कि पैसे दे दीजिये हम नई किताब खरीद लायेंगे। अपनी आदत के अनुसार हमने कह दिया “पैसे पेड़ पर नहीं उगते हैं” और अब तो यह हमारे प्रधानमंत्री जी ने भी पुष्ट कर दिया है।

हमने कहा बेटेलाल पहले जाकर अपनी किताब ढूँढ़ो जैसे डायरी गुमी थी और बाद में मिल गई वैसे ही वह भी मिल जायेगी, चिंता मत करो। पर ये महाराज आश्वस्त हैं नहीं मिलेगी। तभी हमने फ़िर से बोला बेटा पैसे पेड़ पर नहीं उगते हैं, तो हम तो इसके लिये पैसे नहीं देने वाले हैं।

पैसे का पेड़

हमें तभी बेटेलाल का जबाब मिला “हमें कुछ नहीं पता, हमें तो किताब लेनी है, और पैसे चाहिये!!!”, हमने फ़िर से कहा बेटा पैसे पेड़ पर नहीं उगते हैं, कहते हैं – “पैसे पेड़ पर उगते हैं”, हमने कहा फ़िर पता बताओ हम अभी वहीं से पैसे तोड़ लाते हैं और प्रधानमंत्री जी को भी बता देते हैं, बेटेलाल पूछते हैं कि ये प्रधानमंत्री जी कहाँ रहते हैं, हमने कहा दिल्ली में रहते हैं, बेटेलाल कहते हैं “उईई मैं तो इतनी दूर नहीं जा रहा उनको बताने कि पैसे का पेड़ कहाँ है”, हमने कहा अच्छा हमें तो बता दो।

बेटेलाल कहते हैं “वो पेड़ यहाँ बैंगलोर में थोड़े ही है, वह तो जयपुर में है, जयपुर में कांदिवली गाँव है, हमने कहा ओय्ये कांदिवली तो मुँबई में है, तो बेटेलाल कहते हैं अच्छा जयपुर की जगहों के नाम बताओ, हमने कहा हमें भी पता नहीं तो कहते हैं कि पुर्रपुर्रपुरम में है।

खैर यह संवाद तो इतना ही रहा, पर इतने संवाद में यह बात समझ में आ गई कि बेटेलाल को भी पता है कि पैसे का पेड़ नहीं है और कहीं उगते भी नहीं है, उनके लिये तो डैडी ही पैसे का पेड़ हैं, बस डैडी को हिलाओ और पैसे गिरने लगेंगे । मैं भी बेटे की मासूमियत भरी बातों को कहीं और से जोड़कर देखने लगा और अब सोच रहा हूँ कि काश मैं भी बच्चों जैसा पावन पवित्र मन वाला होता और इन बातों को यहीं खत्म कर कहीं किसी और काम में व्यस्त हो जाता ।

बनाना रिपब्लिक और मैंगो पीपल ( देखें वीडियो पहली बार )

देश की सबसे बड़ी राजनैतिक दल के दामाद याने कि देश के दामाद पर इन दिनों बहुत बड़े बड़े आरोपों की बौछार हो रही है।

हम भी सोचते हैं कि काश कि अपने भी कुछ लाख रूपये के इतने ही अनुपात में मात्र ३ वर्ष में करोड़ों रुपया हो जाता, जिस तरह से इन साब का बड़ा है।

जैसे हर वर्ष राजनैतिक दलों के नेता अपनी सम्पत्ति का ऐलान करते हैं और उनकी सम्पत्ति सीधे ५० प्रतिशत से २०० प्रतिशत के अनुपात में बड़ी होती है, यह तो वह सम्पत्ति होती है जो कि कानूनन वो ऐलान कर रहे हैं, जनता को दो नंबर वाली सम्पत्ति का तो पता ही नहीं चलता ।

इन नेताओं को आम जनता के लिये वित्तीय प्रबंधन के क्षैत्र में एक व्यापारिक संस्था खोलनी चाहिये और उसमें विज्ञापित भी किया जाना  चाहिये आज से १ वर्ष पहले मेरे पास ४.५ करोड़ की संपत्ति थी और वह इस वर्ष बढ़कर १० करोड़ की हो चुकी है, आप भी अपना पैसा ऐसे ही एक वर्ष में बड़ा सकते हैं। सारे बैंकों की वाट लग जायेगी और बैंकें भी अपना पैसा इन नेताओं को निवेश करने के लिये देंगी या फ़िर इन नेताओं को अपना वित्तीय प्रबंधक रख लेंगी।

खैर बात कहाँ शुरू की थी और कहाँ आ गई, वैसे भी यह ऐसा मुद्दा है कि जितना लिखो उतना कम है। तो हम अपने असली मुद्दे पर आते हैं बनाना रिपब्लिक एवं मैंगो पीपल।

बनाना रिपब्लिक याने कि चूसा हुआ लोकतंत्र, और मैंगो पीपल याने कि उसी चूसे हुए लोकतंत्र की आम जनता । अब बनाना रिपब्लिक बनाने में दामाद जी से ही पूछा जाये कि उनके परिवार के दल की ही अहम भूमिका है, जो कि बेचारे मैंगो पीपल भी चिल्ला रहे हैं। ऐसा लगता है कि पब्लिक को पता ही नहीं है कि मैंगो पीपल क्या होता है और बनाना रिपब्लिक क्या होता है।

जब जेद्दाह में होते हैं तो वहाँ जियो टीवी का प्रसारण होता है और वहाँ BNN Network का Banana News आता है जो कि लगभग ३० मिनिट का होता है और पाकिस्तानी नेताओं पर तीखा कटाक्ष होता है। आप भी इस कार्यक्रम के प्रोमो को देखिये जिसमें बताया गया है कि नेता तो मैंगो पीपल को चूसकर बनाना रिपब्लिक बना चुके हैं, और मीडिया उनके पास आता है तो पहले कोई बहाना बनाकर टालने की कोशिश करते हैं और फ़िर बाद में बकायदा दायें बायें देखकर दौड़ लगा देते हैं, नेता भी क्या फ़िट बताया है कि मीडिया थक जाता है परंतु नेता को थकान नहीं होती।

बनाना रिपब्लिक और मैंगो पीपल

पापा प्लीज आज मत जाओ और आज यहीं रहो

    हमारे एक मित्र हैं जो कि आजकल नौकरी के कारण परिवार के साथ अलग रह रहे हैं। उनकी एक प्यारी सी बिटिया है जो कि लगभग ५ वर्ष की होगी। बिटिया अपने पापा को बहुत याद करती है। हमारे मित्र को अधिकतर व्यापारिक यात्राओं पर ही रहना होता है जिस कारण से परिवार को आजकल ज्यादा समय नहीं दे पा रहे हैं। इसके पहले करीब तीन  वर्ष अपने परिवार के साथ ही भारत के बाहर रहे और वे तीन वर्ष बिटिया के जन्म के बाद के हैं, बिटिया का लगाव मम्मी से ज्यादा पापा के प्रति ज्यादा है।

    यह भी एक नैसर्गिक विषय है कि बिटिया पापा के करीब रहती है और बेटा मम्मी के करीब रहता है। इस विषय के बारे में शायद जितनी बात की जाये उतनी कम है, क्योंकि इसके प्रति सबके अपनी अपनी विचारधाराएँ हैं, जो कि इस विषय को प्रभावित करती हैं।

    तो हमारे मित्र अकेले भारत के बाहर जा रहे थे, मजबूरी यह थी कि परिवार को साथ लेकर नहीं जा पा रहे थे, क्योंकि व्यापारिक यात्राओं के साथ यही मजबूरी है जहाँ पर १ दिन से लेकर ३० दिन की यात्राएँ होती हैं और बहुत जल्दी जल्दी होती हैं। जिससे परिवार को साथ लेकर जाना लगभग असंभव हो जाता है। बाहर जाने के पहले परिवार से मिलने अपने गृहनगर गये तो बिटिया ने पापा को पकड़ लिया और कहा पापा आज आप मुझे अपने से चिपका कर सुलाना और छोड़कर मत जाना। पापा की मजबूरी यह थी कि पापा केवल ६-७ घंटे के लिये घर पर परिवार से मिलने जा पाये थे। पापा ने सबसे पहले घर पर जाकर बता दिया था कि मैं केवल ६-७ घंटे के लिये ही आ पा रहा हूँ।

    बिटिया पापा को एकटक देखे जा रही थी, फ़िर पापा के पास बड़े प्यार से आई और बोली पापा प्लीज आज मत जाओ और आज यहीं रहो, पर पापा ने अपनी मजबूरी बताई फ़िर भी बिटिया जिद पर अड़ी रही, पापा प्लीज आज रूक जाओ। फ़िर थोड़ी देर बाद पापा की गोदी में आकर बिटिया बैठ गई और पापा को प्यार करने लगी कभी गालों पर चूमती कभी हाथों को चूमती कभी माथे को चूमती। इस आस में बिटिया पापा को प्यार करती रही कि शायद पापा रुक जायें और उसकी आस पूरी हो जाये।

    पर पापा भी मजबूरी के हाथों अपने बिटिया का यह छोटा सा अरमान पूरा नहीं कर पा रहे थे, पापा का भी हृदय द्रवित हो रहा था, हृदय को कठोर कर पापा अपने गंतव्य के लिये निकल पड़े। सबकुछ अपने परिवार के लिये करना पड़ता है जिसके लिये इन छोटी छोटी बातों को पापा पूरी नहीं कर पाते हैं।

    यह केवल हमारे मित्र का ही हाल नहीं है, ऐसे बहुत सारे पापा, बेटे और बेटियाँ हैं जो कि इस जुदाई को महसूस कर रहे हैं, पापा अपने बच्चों का प्यार उनका बचपना खो रहे हैं और बच्चे बचपन में अपने पापा का प्यार नहीं पा रहे हैं। कहीं ना कहीं पापा और बच्चों में कहीं कुछ अधूरापन आ रहा है, वहीं रिश्ते में भी गरमाहट कम हो रही है, बच्चे तो छोटे हैं, वो तो कुछ समझ ही नहीं पा रहे हैं परंतु पापा मजबूरी में अपने बच्चों से दूर अपने काम में व्यस्त हैं। परिवार के साथ रहना और नौकरी करना दोनों ही जरूरी हैं, पर अगर इनमें से एक चीज को चुनना हो तो बहुत मुश्किल होता है ।

तश्तरी में खाना ना छोड़ क्या पेट पर अत्याचार कर लें ?

    आज सुबह नाश्ता करने गये थे तो ऐसे ही बात चल रही थी, एक मित्र ने कहा कि फ़लाना व्यक्ति नाश्ते में या खाने की तश्तरी में कुछ भी छोड़ना पसंद नहीं करते और यहाँ तक कि अपने टिफ़िन में भी कुछ छोड़ते नहीं हैं। वैसे हमने इस प्रकार के कई लोग देखे हैं जो इन साहब की तरह ही होते हैं जो कि अपने तश्तरी में कुछ छोड़ना पसंद नहीं करते। शायद कुछ लोग अपनी लुगाई के डर से नहीं छोड़ते, नहीं तो घर में महासंग्राम हो जायेगा, “अच्छा तो अब हमारे हाथ का खाना भी ठीक नहीं लगता जो तश्तरी में खाना छोड़ा जा रहा है।”

    हमारा मत थोड़ा अलग है, हम सोचते हैं कि तश्तरी में खाना छोड़ना, न छोड़ना अपने अपने व्यक्तिगत विचार हैं, जिस पर किसी और व्यक्ति का अपने विचार थोपना ठीक नहीं है। अब अगर कोई किसी होटल में खा रहा है और खाने का समान ज्यादा है तो इसका मतलब यह तो नहीं कि खाते नहीं बने फ़िर भी बस भकोस लिया जाये । छोड़ने से होटल वाला किसी गरीब को भी नहीं देने वाला है, क्योंकि वह तो फ़ेंकेगा ही।

    जो लोग ऐसे उपदेश देते हैं, वे कहते हैं कि हम अन्न की कीमत जानते हैं, भई अन्न की कीमत तो हम भी जानते हैं, परंतु वे खुद ही सोचें क्या व्यवहारिकता में यह संभव है। हम तो सोचते हैं कि रोजमर्रा के व्यवहार में यह संभव नहीं है। आदमी कितना ही गरीब हो वह इज्जत की रोटी खाना चाहता है, जो आदमी ये खाना खाता भी होगा, क्या कभी उसके मन को पढ़ने की कोशिश की है, कि वो किस दर्द से गुजर रहा होगा। अगर पढ़ने की कोशिश की होती और आपका मन उसकी मदद करने को होगा तो आप कम से कम उसे खाना नहीं देंगे उसे किसी और तरह से मदद कर देंगे, जैसे कि कोई छोटा काम दे दें, मेहनत के पैसे कमाने से उसे भी खुशी होगी।

    हाँ कुछ ढीट होते हैं जो कि काम करना ही नहीं चाहते और मुफ़्त में ही माल खाना चाहते हैं, तो मैं कहता हूँ कि अगर हम ऐसे ही उन लोगों के लिये सोचते रहेंगे तो वो लोग भी कभी सुधरने वाले नहीं हैं। बल्कि हम उन लोगों को बढ़ावा ही दे रहे हैं।

    हाँ आप अगर बफ़ेट में खा रहे हैं तो आप खाना उतना ले सकते हैं जितना आप खा सकते हैं, परंतु अगर कहीं पूरी प्लेट ही आपको ऑर्डर करनी है तो यह संभव नहीं है कि आप पूरा खा लें और अपने पेट पर अत्याचार करें। मैं तो खाने की तश्तरी में छोड़ना या ना छोड़ने के बारे में ज्यादा सोचता नहीं, क्योंकि यह निजता है और हम अपनी निजता का उल्लंघन नहीं होने देना चाहते, सबके अपने व्यक्तिगत विचार होते हैं, उनका सम्मान करना चाहिये।

    पेट पर अत्याचार (हमारे मित्र विनित जी द्वारा बहुतायत में उपयोग किया जाने वाला वाक्य है ।)

विचारों के प्रस्फ़ुटन से एक नई सृष्टि का निर्माण होता है।

    कई बार सोचा इस क्षितिज से दूर कहीं चला जाऊँ और कुछ विशेष अपने लिये सबके लिये कुछ कर जाऊँ, परंतु ये जो दिमाग है ना मंदगति से चलता है, इसे पता ही नहीं है कि कब द्रुतगति से चलना है और कब मंदगति से चलना है। दिमाग के रफ़्तार की चाबी पता नहीं कहाँ है। और ये भी नहीं पता कि मंदगति से एकदम द्रुतगति पर कैसे ले जाया जाये।

    विचारसप्ताहांत में पाँचसितारा होटल में अकेला कमरे में दिनभर दिमाग दौड़ाने की कोशिश करता हूँ, परंतु दिमाग भी वातानुकुलन से प्रभावित हो चुका है और एक अजीब तरह का अहसास दिमाग में कुलबुलाने लगता है। शायद दिमाग इस होटल के कमरे की दीवारों की मजबूती देखना चाहता हो, हजारों विचार छिटक के इधर उधर निकल पड़ते हैं, दीवारों से टकराकर नष्ट होने की कोशिश करते हैं परंतु एक विचार के टूटने से चार नये खड़े हो जाते हैं। ज्यादा हो जाता है तो खिड़की के पास जाकर बाहर को देख लेता हूँ, सोचता हूँ कि शायद कुछ विचार इस खिड़की से बाहर गिर पड़ें और यह कमरा थोड़ा भारहीन हो जाये।

    खिड़की के पास जाकर शीतलता का अहसास कम हो जाता है और तपन लगने लगती है, जब शीतलता से तपन में जाते हैं तो तपन अच्छी लगती है और ऐसे ही जब तपन से शीतलता में आते हैं तो शीतलता अच्छी लगती है। मानव को कौन समझ पाया है, पता नहीं जब मानव फ़ैसला लेता है तो वह दिमाग से लेता है या दिल से लेता है।

    मानव को अपने आप को समझने की प्रवृत्ति ही मानव को अपने अंदर के प्रकाश की और धकेलती है, उसे समझने की कोशिश में ही मानव बाहरी ज्ञान को भूल अंतरतम में झांकने की कोशिश करता है, कभी यह कोशिश नाकाम होती है तो कभी यह कोशिश सफ़ल होती है।

    रफ़्तार की भी अपनी गति होती है और स्थिरता के स्थिर में भी एक गति होती है, शून्य में कुछ भी नहीं है, जब विचार अपने पूर्ण वेगों से प्रस्फ़ुटित होते हैं, पूर्ण आवेग में आते हैं तो विचार अंगारित हो जाते हैं और विचारों के प्रस्फ़ुटन से एक नई सृष्टि का निर्माण होता है। कई बार गति आवेग और वेग सब जाने पहचाने से लगते हैं, अपने से लगते हैं। किंतु यह भी सर्वथा सार्वभौमिक सत्य है ‘गति, आवेग और वेग’ कभी किसी की साँखल से नहीं बँधा है। सब पूर्व नियत है, सब पूर्व नियोजित है।

शब्द-शक्ति के भेद (३) व्यंजना – 2 – रस अलंकार पिंगल

(१) शाब्दी व्यंजना – शाब्दी व्यंजना वहाँ होती है, जहाँ व्यंग्यार्थ शब्द के प्रयोग पर आश्रित रहता है। इसके दो भेद किये गये हैं – (अ) अभिधामूला और लक्षणामूला ।

(अ) अभिधामूला – एक शब्द के कई अर्थ हो सकते हैं लेकिन जब अनेक अर्थ वाले शब्द को संयोग, वियोग साहचर्य आदि के प्रतिबन्ध द्वारा एक ही अर्थ में नियन्त्रित कर दिया जाता है, तब जिस शक्ति द्वारा उसके अन्य अर्थ का भी बोध होता है तब वहाँ अभिधा मूला शाब्दी व्यंजना मानी जाती है।

उदाहरणार्थ –

चिर-जीवौ जोरी जुरै क्यों न स्नेह गम्भीर।

को घटि ये वृषभानुजा, वे हलधर के वीर॥

इस उदाहरण में ‘वृषभानुजा’ और ‘हलधर’ शब्दों के दो-दो अर्थ हैं लेकिन यहाँ ‘वृषभानुजा’ का ‘राधा’ (वृषभदेव की पुत्री) और ‘हलधर’ के ‘वीर’ को श्रीकृष्ण (बलराम के भाई) के एक ही अर्थ में नियन्त्रित कर दिया गया है, किन्तु इन अर्थों के साथ ‘गाय’ और ‘बैल’ का व्यंग्यार्थ भी निकलता है और यही अर्थ इस दोहे को सुन्दर बनाये हुए है।

शब्द के अनेक अर्थों को नियन्त्रित करने के लिये भारतीय आचार्यों ने संयोग, वियोग आदि १३ प्रतिबन्धों का विवेचन किया है।

(१) संयोग – अनेकार्थी शब्द के किसी एक ही अर्ह्त के साथ प्रसिद्ध सम्बन्ध को संयोग कहते हैं।

(२) वियोग – अनेकार्थी शब्द के एक अर्थ का निश्चय जब किसी प्रसिद्ध वस्तु सम्बन्ध के अभाव से होता है तब बहाँ वियोग माना जाता है।

(३) साहचर्य – प्रसिद्ध साहचर्य सम्बन्ध से अर्थ बोध होने पर साहचर्य होता है।

(४) विरोध – प्रसिद्ध विरोध के आधार पर जब अर्थ का निर्णय होता है तब वहाँ विरोध होता है।

(५) अर्थ – प्रयोजन के कारण जब अनेकार्थी शब्द का एक ही अर्थ निश्चित हो।

(६) प्रकरण – किसी विशेष प्रसंग के कारण जब बक्ता अथवा स्रोता की बुद्धिमानी से एक अर्थ निश्चित हो।

पहले के भाग यहाँ पढ़ सकते हैं –

“रस अलंकार पिंगल [रस, अलंकार, छन्द काव्यदोष एवं शब्द शक्ति का सम्यक विवेचन]”

काव्य में शब्द शक्ति का महत्व – रस अलंकार पिंगल

शब्द शक्ति क्या है ? रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 1 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा– 2 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 3 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (३) व्यंजना – 1 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (३) व्यंजना – 1 – रस अलंकार पिंगल

(३) व्यंजना – कवि महत्व की दृष्टि से व्यंजना का महत्व सर्वाधिक माना गया है। वही काव्य श्रेष्ठ माना जाता है जिसमें व्यंजना शक्ति या व्यंग्य मुख्य हो। जब वाच्यार्थ या लक्ष्यार्थ के अभाव में अन्य अर्थ ग्रहण किया जाता है, तब वहाँ व्यंजना शक्ति मानी जाती है। उदाहरणार्थ –
सूर की निम्न पंक्तियों में व्यंजना शक्ति का चमत्कार है-
‘हम सौ कहि लई सो सुनि कै जिय गुन लेहु अपाने।
कहँ अबला कहँ दसा दिगम्बर समुख करौ पहिचानै॥’
कहाँ तो अबला ( युवती स्त्रियाँ और कहाँ योगियों की भाँति नग्न रहना, भला इन दोनों में कोई समानता है ? हे उद्धव ! इस बात को तुम हृदय में अच्छी प्रकार जमा लो कि तुमने जो कुछ (हे युवतियों ! नग्न रहो, यह बहुत अच्छा कार्य है) हमसे (अपने घनिष्ठतम मित्र कृष्ण प्रेमिकाओं से कहा है जबकि तुम्हें ऐसी बात नहीं करनी चाहिए थी) कहा उसको हमने (कृष्ण के सखा समझकर क्षमा करते हुए) शान्ति से मौन होकर सुन लिया (किन्तु यदि तुमने किसी अन्य स्थान पर युवती स्त्रियों को नग्न रहने का उपदेश दिया तो वह तुमको पाखण्डी समझेंगी और आश्चर्य नहीं कि वे तुमको मक्कार समझकर पीट भी दें।)
उक्त अर्थ में जो कुछ कोष्ठक में लिखा है वह व्यंग्यार्थ है। यह अर्थ शब्दों का वाच्यार्थ नहीं है, अपितु पके हुए अंगूरों के गुच्छे में भरे हुए रस की तरह स्पष्ट झलकता है जिसे सहृदय व्यक्ति ही ग्रहण कर सकते हैं।
 
व्यंजना के भेद – व्यंजना के दो प्रमुख भेद – (१) शाब्दी और (२) आर्थी किये गये हैं। शाब्दी के पुन: दो भेद – (१) अभिधा मूला और (२) लक्षणा मूला किये गए हैं। अभिधा मूला शाब्दी व्यंजना के वक्ता, वाक्य आदि की विशेषता के आधार पर १० भेद किये गए हैं। व्यंजना के इन सभी भेदों को अग्रलिखित सारणी के द्वारा समझाया गया है –
Vyanjana Chart
व्यंजन के भेद
सारणी बड़ी देखने के लिये चित्र पर क्लिक करें, और बड़ा करना हो तो कृप्या Ctrl + का उपयोग करें ।
पहले के भाग यहाँ पढ़ सकते हैं –

“रस अलंकार पिंगल [रस, अलंकार, छन्द काव्यदोष एवं शब्द शक्ति का सम्यक विवेचन]”

काव्य में शब्द शक्ति का महत्व – रस अलंकार पिंगल

शब्द शक्ति क्या है ? रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 1 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा– 2 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 3 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (३) व्यंजना – 1 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (३) व्यंजना – 2 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 3 – रस अलंकार पिंगल

(२) उपादान लक्षणा या अजहतस्वार्था – लक्षण-लक्षणा में मुख्यार्थ को बिल्कुल तिरस्कृत कर दिया जाता है, लेकिन उपादान लक्षणा में लक्ष्यार्थ के साथ मुख्यार्थ का सम्बन्ध भी रहता है; उदाहरणार्थ –

’बढ़ी आ रही हैं तोपें तेजी से किले की ओर।’

तोपों के साथ तोपों के चालक भी किले के ओर आ रहे हैं – यह स्वयं सिद्ध बात है अत: तोपें आने (मुख्यार्थ) के साथ तोप चालक (लक्ष्यार्थ) का भी सम्बन्ध स्पष्ट है।

(अ) सारोपा शुद्धा उपादान लक्षणा – निम्न उदाहरण से स्पष्ट हो जायेगा –

कर सोलह श्रंगार चली तुम कहाँ परी-सी?’

उक्त पंक्ति में ‘तुम’ पर ‘परी’ होने का आरोप होने के कारण सारोपा और ‘परी’ में मुख्यार्थ भी सुरक्षित होने और उसका ‘श्रेष्ठतम सुन्दरी’ लक्ष्यार्थ से सम्बन्ध होने के कारण उपादान लक्षणा है।

(ब) साध्यवसाना शुद्धा उपादान लक्षणा –

‘अरे हृदय को थाम महल के लिए झोपड़ी बलि होती है।’

‘महल’ और ‘झोपड़ी’ आरोप्यमाण का ही कथन होने के कारण यहाँ साध्यवसाना है, साथ में ‘महल’ और ‘झोपड़ी’ अपना मुख्यार्थ भी सुरक्षित रखते हैं तथा महलों के वासी अमीरों तथा झोपड़ी में रहने वाले गरीबों के लक्ष्यार्थ को भी स्पष्ट करने के कारण यहाँ उपादान लक्षणा भी है।

मम्मट ने ‘काव्यप्रकाश’ में इन्हीं भेदों का वर्णन किया है।

पहले के भाग यहाँ पढ़ सकते हैं –

“रस अलंकार पिंगल [रस, अलंकार, छन्द काव्यदोष एवं शब्द शक्ति का सम्यक विवेचन]”

काव्य में शब्द शक्ति का महत्व – रस अलंकार पिंगल

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शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 1 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा– 2 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 3 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (३) व्यंजना – 1 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा– 2 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद –

(2) शुद्धा प्रयोजनवती लक्षणा – जहाँ गुण सादृश्य के अतिरिक्त अन्य किसी सादृश्य से लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाये, वहाँ शुद्धा प्रयोजनवती लक्षणा होती है। सादृश्य सम्बन्ध निम्न प्रकार से हो सकते हैं –

(१) सामीप्य सम्बन्ध – ‘अरूण’ शब्द का मुख्यार्थ ‘सूर्य का सारथी’ है किन्तु ‘अरूण’ का लक्ष्यार्थ ‘सूर्य’ ही ग्रहण किया जाता है। सामीप्य सम्बन्ध के कारण ही यह लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाता है, क्योंकि सूर्य अरूण (सूर के सारथी) के समीप रहता है।

(२) आधार-आधेय सम्बन्ध – ‘फ़ुटबाल के मैच में भारत इंग्लैण्ड से जीत गया’ – इस कथन में आधार-आधेय सम्बन्ध से ही अर्थ ग्रहण किया जायेगा अर्थात भारत के खिलाडी इंग्लैण्ड के खिलाड़ियों से जीत गये।

(३) कारण-कार्य-सम्बन्ध – ‘नियमित भोजन स्वास्थ्य है’ – इस कथन में कारण-कार्य-सम्बन्ध है, क्योंकि भोजन ही स्वास्थ्य (कार्य) का कारण है।

(४) अंगागिभाव सम्बन्ध – इसके अनुसार अंग से अंगी का लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाता है। उदाहरणार्थ किसी मनुष्य के हाथ की उँगली दब जाने पर यदि वह व्यक्ति कहे – ‘मेरा हाथ दब रहा है’ तो इसमें हाथ का लक्ष्यार्थ हाथ की उँगली होगा।

(५) तात्कर्म्य सम्बन्ध – कर्म-सादृश्य के आधार पर लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाता है । जैसे –

‘एरे मतिमंद चन्द आवत न तोहि लाज,

ह्वैके द्विजराज काज करत कसाई के।’

यहाँ चन्द्रमा को कसाई इसलिए कथित किया गया है कि वह भी विरहणियों को कसाई के समान कर्म करने वाला प्रतीत होता है।

(६) तादर्थ्य सम्बन्ध – ‘रमेश ब्रजेश के गुरूदेव हैं’  – इस पंक्ति में रमेश को देवता के समान पूज्य बताना ही लक्ष्यार्थ है।

शुद्धा प्रयोजनवती लक्षणा के भी दो भेद हैं – (१) लक्षण-लक्षणा या जहतस्वार्था और (२) उपादान लक्षणा या अजह्त्स्वार्था, इनके भी दो-दो भेद हैं – सारोपा और साध्यवसाना।

(१) लक्षण-लक्षणा या जहतस्वार्था – जहाँ मुख्यार्थ अथवा वाच्यार्थ का लगभग बिल्कुल त्याग कर दिया जाता है, वहाँ लक्षण-लक्षणा या जहतस्वार्था लक्षणा होती है। उदाहरण – ‘पेट में चूहे कूद रहे हैं’ यह वाक्य अपना अभीष्ट अर्थ रखता है लेकिन इसके मुख्यार्थ या वाच्यार्थ में पूर्ण रूप से बाधा मालूम पड़ती है, क्योंकि पेट में चूहों का कूदना सर्वथा असम्भव है। इसमें चूहे कूदना का वाच्यार्थ बिल्कुल त्याग दिया जाता है और लक्ष्यार्थ ‘तेज भूख लगी है’ ग्रहण किया जाता है।

(अ) सारोपा शुद्धा लक्षण-लक्षणा – जब आरोप के विषय और आरोप्यमाण में अभेद हो; जैसे –

आज भुजड्गों से बैठे हैं वे कंचन के घड़े दबाये – इस काव्य में आरोप का विषय (पूँजीपति) और आरोप्यमाण (भुजड़्ग) में अभेद कथित किया गया है।

(ब) साध्यवसाना शुद्ध लक्षण-लक्षणा – आरोप के कथित न होने पर यह लक्षणा होती है। जैसे –

‘दिल का टुकड़ा कहाँ गया’

उक्त वाक्य में आरोप का विषय लुप्त है और केवल आरोप्यमाण (दिल के टुकड़े) का ही कथन है। ‘दिल का टुकड़ा’ अपना मुख्यार्थ बिल्कुल छोड़ देता है और ‘पुत्र’ लक्ष्यार्थ को बिल्कुल तिरस्कृत करके लगाया जाता है।

पहले के भाग यहाँ पढ़ सकते हैं –

“रस अलंकार पिंगल [रस, अलंकार, छन्द काव्यदोष एवं शब्द शक्ति का सम्यक विवेचन]”

काव्य में शब्द शक्ति का महत्व – रस अलंकार पिंगल

शब्द शक्ति क्या है ? रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 1 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा– 2 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 3 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (३) व्यंजना – 1 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 1 – रस अलंकार पिंगल

(१) रूढ़ि लक्षणा – जहाँ किसी शब्द के मुख्यार्थ को छोड़कर उससे सम्बन्धित अन्य अर्थ परस्पर अथवा रूढ़ि द्वारा निश्चित होता है। जैसे – ‘बम्बई फ़ैशनिबल है’, इस पंक्ति में बम्बई नगर अभीष्ट या लक्ष्यार्थ नहीं है, अपितु ‘बम्बई नगर के निवासी’ इसका लक्ष्यार्थ है। बम्बई नगर के निवासियों के लिए ‘बम्बई’ कहना रूढ़ हो गया है। रूढ़ि लक्षणा के भी दो भेद – (अ) गौणी और (ब) शुद्धा – किये गए हैं ।

(अ) गौणी रूढ़ि लक्षणा – परम्परानुसार गुणबोधक लक्ष्यार्थ ग्रहण करने से गौणी रूढ़ि लक्षणा होती है।

(ब) शुद्धा रूढ़ि लक्षणा – परम्परा अथवा रूढ़ि के आधार पर जब वाच्यार्थ से सम्बन्धित लक्ष्यार्थ भी ग्रहण किया जाता है, तब वहाँ शुद्धा रूढ़ि लक्षणा मानी जायेगी।

(२) प्रयोजनवती लक्षणा – मुख्यार्थ में बाधा होने पर किसी विशेष प्रयोजन से लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाता है, वहाँ प्रयोजनवती लक्षणा होती है। प्रयोजनवती लक्षणा के दो प्रमुख भेद हैं –

१ – गौणी और

२ – शुद्धा

(१) गौणी प्रयोजनवती लक्षणा – जहाँ उपमा और उपमेय में गुण की समानता के कारण लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाये, वहां गौणी प्रयोजनवती लक्षणा होती है, यथा –

‘चन्द्र-मुख को देखकर मन हो गया प्रफ़ुल्ल’

चन्द्रमा और मुख परस्पर भिन्न है अत: यहाँ मुख्यार्थ में बाधा है लेकिन दोनों के गुण में पर्याप्त सादृश्य है। जिस प्रकार चन्द्रमा को देखकर मन प्रफ़ुल्लित हो जाता है, उसी प्रकार मुख को देखकर मन प्रफ़ुल्लता से भर उठता है, अत: इस गुण सादृश्य के कारण यह लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाता है। गौणी प्रयोजनवती लक्षणा के भी दो भेद – (अ) सारोपा और (ब) साध्यवसाना किये गये हैं।

(अ) सारोपा  गौणी प्रयोजनवती लक्षणा – जहाँ उपमान और उपमेय दोनों का आरोप हो वहाँ सारोपा गौणी प्रयोजनवती लक्षणा होती है। ‘चन्द्र-मुख को देखकर मन हो गया प्रफ़ुल्ल’ इसका उदाहरण है, क्योंकि इसमें चन्द्र (उपमान) और मुख (उपमेय) दोनों का आरोप है।

(ब) साध्यवसाना  गौणी प्रयोजनवती लक्षणा – जहाँ केवल उपमान ( आरोप्यमाण) का वर्णन हो और उपमेय (आरोप का विषय) लुप्त हो वहाँ साध्यवसाना गौणि प्रयोजनवती लक्षणा होती है। उदाहरणार्थ –

‘बाँधा था बिधु को किसने’

यहाँ उपमेय ‘मुख’ का कथन नहीं है केवल आरोप्यमाण ‘विधु’ (उपमान) का कथन है।

पहले के भाग यहाँ पढ़ सकते हैं –

“रस अलंकार पिंगल [रस, अलंकार, छन्द काव्यदोष एवं शब्द शक्ति का सम्यक विवेचन]”

काव्य में शब्द शक्ति का महत्व – रस अलंकार पिंगल

शब्द शक्ति क्या है ? रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 1 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा– 2 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 3 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (३) व्यंजना – 1 – रस अलंकार पिंगल