शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 1 – रस अलंकार पिंगल

(१) रूढ़ि लक्षणा – जहाँ किसी शब्द के मुख्यार्थ को छोड़कर उससे सम्बन्धित अन्य अर्थ परस्पर अथवा रूढ़ि द्वारा निश्चित होता है। जैसे – ‘बम्बई फ़ैशनिबल है’, इस पंक्ति में बम्बई नगर अभीष्ट या लक्ष्यार्थ नहीं है, अपितु ‘बम्बई नगर के निवासी’ इसका लक्ष्यार्थ है। बम्बई नगर के निवासियों के लिए ‘बम्बई’ कहना रूढ़ हो गया है। रूढ़ि लक्षणा के भी दो भेद – (अ) गौणी और (ब) शुद्धा – किये गए हैं ।

(अ) गौणी रूढ़ि लक्षणा – परम्परानुसार गुणबोधक लक्ष्यार्थ ग्रहण करने से गौणी रूढ़ि लक्षणा होती है।

(ब) शुद्धा रूढ़ि लक्षणा – परम्परा अथवा रूढ़ि के आधार पर जब वाच्यार्थ से सम्बन्धित लक्ष्यार्थ भी ग्रहण किया जाता है, तब वहाँ शुद्धा रूढ़ि लक्षणा मानी जायेगी।

(२) प्रयोजनवती लक्षणा – मुख्यार्थ में बाधा होने पर किसी विशेष प्रयोजन से लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाता है, वहाँ प्रयोजनवती लक्षणा होती है। प्रयोजनवती लक्षणा के दो प्रमुख भेद हैं –

१ – गौणी और

२ – शुद्धा

(१) गौणी प्रयोजनवती लक्षणा – जहाँ उपमा और उपमेय में गुण की समानता के कारण लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाये, वहां गौणी प्रयोजनवती लक्षणा होती है, यथा –

‘चन्द्र-मुख को देखकर मन हो गया प्रफ़ुल्ल’

चन्द्रमा और मुख परस्पर भिन्न है अत: यहाँ मुख्यार्थ में बाधा है लेकिन दोनों के गुण में पर्याप्त सादृश्य है। जिस प्रकार चन्द्रमा को देखकर मन प्रफ़ुल्लित हो जाता है, उसी प्रकार मुख को देखकर मन प्रफ़ुल्लता से भर उठता है, अत: इस गुण सादृश्य के कारण यह लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाता है। गौणी प्रयोजनवती लक्षणा के भी दो भेद – (अ) सारोपा और (ब) साध्यवसाना किये गये हैं।

(अ) सारोपा  गौणी प्रयोजनवती लक्षणा – जहाँ उपमान और उपमेय दोनों का आरोप हो वहाँ सारोपा गौणी प्रयोजनवती लक्षणा होती है। ‘चन्द्र-मुख को देखकर मन हो गया प्रफ़ुल्ल’ इसका उदाहरण है, क्योंकि इसमें चन्द्र (उपमान) और मुख (उपमेय) दोनों का आरोप है।

(ब) साध्यवसाना  गौणी प्रयोजनवती लक्षणा – जहाँ केवल उपमान ( आरोप्यमाण) का वर्णन हो और उपमेय (आरोप का विषय) लुप्त हो वहाँ साध्यवसाना गौणि प्रयोजनवती लक्षणा होती है। उदाहरणार्थ –

‘बाँधा था बिधु को किसने’

यहाँ उपमेय ‘मुख’ का कथन नहीं है केवल आरोप्यमाण ‘विधु’ (उपमान) का कथन है।

पहले के भाग यहाँ पढ़ सकते हैं –

“रस अलंकार पिंगल [रस, अलंकार, छन्द काव्यदोष एवं शब्द शक्ति का सम्यक विवेचन]”

काव्य में शब्द शक्ति का महत्व – रस अलंकार पिंगल

शब्द शक्ति क्या है ? रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 1 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा– 2 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (२) लक्षणा – 3 – रस अलंकार पिंगल

शब्द-शक्ति के भेद (३) व्यंजना – 1 – रस अलंकार पिंगल

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