अब हालत यह है कि उसके बाद से किसी भी दरवाजे से निकलना होता है तो पहले अच्छे से पड़ताल कर लेते हैं, संतुष्ट हो लेते हैं फ़िर ही निकलते हैं, दर्द तो अब भी बहुत है, सूजन कम है। समय के साथ साथ सब ठीक हो जाता है, गहरे जख्म भी भर जाते हैं।
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विचारों पर विचार
अभी तक विचारों को सुबह लिखने की आदत नहीं पड़ी है, क्योंकि अगर सुबह ही विचार लिखने बैठ गये तो फ़िर प्रात: भ्रमण मुश्किल हो जाता है पर सुबह के विचारों को कहीं ना कहीं इतिहास बना लेना चाहिये, मानव मन है जो विचारों को जितना लंबा याद रख सकता है और उतनी ही जल्दी याने कि अगले ही क्षण भूल भी सकता है। ऐसे पता नहीं कितने विचारों की हानि हो चुकी है। जो शायद कहीं ना कहीं जीवन का मार्ग और दशा बदलने का कार्य करते हैं।
ब्लॉगिंग की शुरूआत के अनुभव (भाग ३)
ब्लॉगिंग की शुरूआत के अनुभव (भाग २)
ब्लॉगिंग की शुरूआत के अनुभव (भाग १)
हम उन बैंक अधिकारी के साथ अपने मित्र के सायबर कैफ़े गये, जहाँ रोज शाम वे इन्टरनेट का उपयोग करने जाते थे, उन्होंने हमें सबसे पहले गूगल में खोजकर हिन्दी के बारे में बताया, फ़िर हिन्दी में कुछ लेख भी पढ़वाये, अब याद नहीं कि वे सब कोई समाचार पत्र थे या कुछ और, बस यह याद है कि किसी लिंक के जरिये हम पहुँचे थे, और वह शायद हिन्दी की शुरूआती अवस्था थी । हिन्दी लिखने के लिये कोई अच्छा औजार भी उपलब्ध नहीं था।
तब तक हमारा 486 DX2 दगा दे चुका था, यह कम्प्यूटर लगभग हमारे पास ४-५ वर्ष चला, और हमने फ़िर इन्टेल छोड़ दिया, और ए एम डी का एथलॉन प्रोसेसर वाला कम्प्यूटर ले लिया, कीबोर्ड हालांकि नहीं बदला वह हमने अपने पास मैकेनिकल वाला ही रखा, क्योंकि मैमरिन कीबोर्ड बहुत जल्दी खराब होते थे और उसमें टायपिंग करते समय टका टक आवाज भी नहीं आती थी, तो लगता ही नहीं था कि हम कम्प्यूटर पर काम भी कर रहे हैं, एँटर की भी इतनी जोर से हिट करते थे कि लगे हाँ एँटर मारा है, जैसे फ़िल्म में हीरो एन्ट्री मारता है।
उस समय लाईवजनरल, ब्लॉगर, टायपपैड, मायस्पेस, ट्रिपोड और याहू का एक और प्लेटफ़ॉर्म था, अब उसका नाम याद नहीं आ रहा
है। फ़िर उन्हीं बैंक अधिकारी के साथ ही हम सायबर कैफ़े जाने लगे और हिन्दी के बारे में ज्यादा जानने की उत्सुकता ने हमें उनका साथ अच्छा लगने लगा, पर इसका फ़ायदा यह हुआ कि अब वे शाम रंगीन हमारे साथ हिन्दी के बारे में जानने और ब्लॉगिंग प्लेटफ़ॉर्म को जानने में करने लगे। सारे लोग यही सोचते थे कि देखो ये लड़का तो गया हाथ से अब यह भी अपनी शामें सायबर कैफ़े में रंगीन करने लगा है।
परंतु उस समय इन्टरनेट की रफ़्तार इतनी धीमी थी कि एक घंटा काफ़ी कम लगता था और उस पर हमारी जिज्ञासा की रफ़्तार और सीखने की उत्कंठा बहुत अधिक थी। हमने बहुत सारे ब्लॉगिंग प्लेटफ़ॉर्म देखे परंतु ब्लॉगर का जितना अच्छा और सरल इन्टरफ़ेस था उतना सरल इन्टरफ़ेस किसी ब्लॉगिंग प्लेटफ़ॉर्म का नहीं था । हमने वर्डप्रेस का नाम इस वक्त तक सुना भी नहीं था।
काफ़ी दिनों की रिसर्च के बाद क्योंकि इन्टरनेट की रफ़्तार बहुत धीमी थी और अपनी अंग्रेजी भी बहुत माशाअल्ला थी, तो इन दोंनों धीमी रफ़्तार के कार्यों से ब्लॉगिंग की दुनिया में आने में देरी हुई, तब तक गूगल करके हम बहुत सारे हिन्दी ब्लॉगिंग कर रहे ब्लॉगरों को पढ़ने लगे थे, उस समय चिट्ठाग्राम, अक्षरविश्व जैसी महत्वपूर्ण वेबसाईस होस्ट की गई थीं, जिससे बहुत मदद मिलती थी, और उस समय कुछ गिने चुने शायद ८०-९० ब्लॉगर ही रहे होंगे। आपस में ब्लॉगिंग को बढ़ावा देते, टिप्पणियाँ करते, लोगों को कैसे ब्लॉगिंग के बारे में बताया जाये, इसके बारे में बात करते थे। उस समय हम सोचते थे कि कम से कम रोज एक वयक्ति को तो हम अपने ब्लॉग के बारे में बतायेंगे। जिससे पाठक तो मिलना शुरू होंगे।
जारी..
ब्लॉगिंग की शुरूआत के अनुभव (भाग १)
नामांकन आपके परिवार के लिये बहुत जरूरी है.. (Nomination is very important for your family)
PMP, CBAP, ISTQB कौन सा सर्टिफ़िकेशन करना चाहिये ।
आजकल बहुत सारे प्रोफ़ेशनल सर्टिफ़िकेशन बाजार में उपलब्ध हैं, जैसे कि प्रोजेक्ट मैनेजर के लिये PMP, बिजनेस अनालिस्ट के लिये CBAP, टेस्टिंग वालों के लिये ISTQB की बाजार में बहुत ज्यादा डिमांड है। सारे लोगों का प्रोफ़ाईल बिल्कुल यही नहीं होता है, कुछ ना कुछ अलग होता है और वे इसी सोच विचार में रहते हैं कि कौन सा सर्टिफ़िकेशन करें, और सही तरीके से बाजार में कोई बताने वाला भी नहीं होता है।
अब PMP को ही लें, यह सर्टिफ़िकेशन प्रोजेक्ट मैनेजर के लिये जरूर है, परंतु उतना ही मतलब का बिजनेस अनालिस्ट के लिये भी है, कई जगह बिजनेस अनालिस्ट प्रोजेक्ट मैनेजर का काम भी करता है और प्रोजेक्ट प्लॉनिंग करता है। PMP सर्टिफ़िकेशन केवल IT प्रोजेक्ट मैनेजर के लिये ही नहीं होता है, यह हरेक जगह, हर प्रोजेक्ट मैनेजर के लिये होता है, फ़िर भले ही वह मैन्यूफ़ेक्चरिंग इंडस्ट्री हो या रियल इस्टेट इंडस्ट्री या फ़िर ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री।
PMP के बारे मे सोचा जाता है कि यह IT प्रोजेक्ट मैनेजर्स के लिये सर्टिफ़िकेशन बनाया गया है, परंतु यह सर्टिफ़िकेशन दरअसल प्रोजेक्ट मैनेजर्स को प्रोसेस, बजट और रिसोर्स मैनेजमेंट इत्यादि सिखाता है, किस तरह से प्रोजेक्ट को सही दिशा में ले जाया जाये, क्या चीजें जरूरी हैं, अगर सही तरह से रिपोर्टिंग होगी तो रिस्क उतनी ही कम होगी।
वैसे ही अन्य सर्टिफ़िकेशन हैं, CBAP बिजनेस अनालिस्ट के फ़ंक्शन को समझाता है, और ISTQB टेस्टिंग के बेसिक फ़ंक्शन से लेकर एडवांस लेवल तक के तौर तरीके सिखाता है। जिससे किसी भी प्रकार के प्रोजेक्ट के लिये सही तरह से प्लॉनिंग करने में मदद तो मिलती ही है, साथ ही सही तरीके से कैसे डॉक्यूमेन्टेशन किया जाये, यह भी पता चलता है। जिससे प्रोजेक्ट के डॉक्यूमेंट अच्छे बनते हैं और ट्रांजिशन में परेशानी नहीं आती है।
इन सारे सर्टीफ़िकेशन में पहले का अनुभव जरूरी होता है, तो पहले जाँचें कि आप कौन से सर्टिफ़िकेशन के लिये फ़िट हैं। आपका अनुभव कौन से सर्टिफ़िकेशन के लिये उम्दा है और वह सर्टिफ़िकेशन आपमें वैल्यू एड कर रहा है। इन सर्टिफ़िकेशनों की फ़ीस ज्यादा नहीं होती, परंतु इन सर्टिफ़िकेशन्स से आप अपना काम अच्छे से कर पायेंगे, आपके काम की क्वालिटी अपने आप दिखेगी।
नई नौकरी के लिये बाजार में उतरेंगे तो ये सर्टिफ़िकेशन बेशक आपके लिये नई नौकरी की ग्यारंटी ना हों, पर नई नौकरी के लिये पासपोर्ट जरूर साबित होंगे, अगर किसी एक पद के लिये १०० लोग दौड़ में हैं और सर्टिफ़िकेशन केवल ५ लोगों के पास, तो उन ५ लोगों के चुने जाने की उम्मीदें बाकी के उम्मीदवारों से अधिक होगी, आपकी प्रतियोगिता उन ५ लोगों से होगी ना कि पूरे १०० लोगों से । अपनी अपनी फ़ील्ड और कार्य के अनुसार अपना सर्टिफ़िकेशन चुनिये और अपने भविष्य का निर्माण कीजिये।
आप इस पोस्ट का वीडियो भी देख सकते हैं –
साइड अपर के लोचे और स्लीपर में ठंड को रोकने का इंतजाम
वो सही ही कहते हैं आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है ।
बात करने का बहाना चाहिये तो प्रकृति सबसे अच्छा विषय है
कल दोपहर का भोजन करने के बाद हमेशा की तरह थोड़ा टहलने निकला था, मौसम सुहाना था, बहुत दिनों बाद मुँबई में धूप देख रहा था, जैसे धरती पर अचानक ही रुपहली सुनहली चादर किसी ने बिछा दी हो, सारी प्रकृति खिलखिला उठी थी, और मैं उसी प्रकृति में अनमना सा चला जा रहा था, मन कहीं दिमाग कहीं और दिल कहीं ओर व्यस्त था, समझ नहीं आ रहा था कि ये सब एक जगह कब आयेंगे, बस अन्मयस्कता पर मुस्कराहट का दामन ओड़े घूम रहा था। बहुत अजीब होता है जब ऐसे किसी ओर चोले को ओड़ना पड़ता है। सारा वातावरण अंजान ही लगता है ।
लौटते हुए अचानक ही बारिश शुरु हो गई और अचानक ही बारिश ने अपने अंदर सारे विचारों को समा लिया, पहले बारिश का हर तरह से मजा लेते थे, परंतु अब बारिश भी प्रकृति के नियम की मजबूरी लगने लगी है, मुंबई की बारिश भी तेज होती है, पता नहीं होता कि कब कितनी तेज बारिश होगी, इसलिये छाता हमेशा अपने पास रखना पडता है, पर आज नहीं था, खैर बारिश में ही दौड़ते हुए, सीमेंट के फ़र्श में भी गड्डे होते हैं, और वही आजकल के आधुनिक गड्ढे हैं, जिसमें बारिश का पानी भर जाता है और आधुनिक लोग उसी में छप छप कर बारिश का आनंद ले लेते हैं। खैर भीगते भीगते अपनी सीट पर पहुँचे। सबने पूछा अरे पूरे भीग गये, हम केवल मुस्करा दिये.. क्योंकि हमें भी पता था और उनको भी कि पूरे नहीं भीगे हैं अभी १५ मिनिट में बदन की गर्मी से ये बारिश की देन सूख जायेगी।
अगर किसी से बात करने का बहाना चाहिये तो प्रकृति सबसे अच्छा विषय है, “अरे आज गर्मी बहुत है”, “आज बारिश जबरदस्त है”, “आज बारिश नहीं है, थोड़ा अच्छा लग रहा है”, “आज अच्छी ठंड है”, “कल का मौसम अच्छा था, आज थोड़ा चिपचिपा लग रहा है” इत्यादि। पर कई बार और कई मौकों पर संवाद आगे नहीं बढ़ पाता, सब अपनी अपनी परेशानियों में अपने अंदर ही इतने व्यस्त होते हैं, कि वे प्रकृति का मजा ले ही नहीं पाते।
आज सुबह उठकर खिड़की से बाहर का ऩजारा देखा बाहर फ़िर से बारिश हो रही है, और इतनी तेज कि बारिश की एक एक बूँद ऊपर से नीचे तक श्रंखलाबद्ध तरीके से गिरती हुई दिखाई दे रही है, बूँदों की लय को देखकर मन रम जाता है, ऐसा लगता है कि ये ऊपर से ही साथ साथ आने की, आगे पीछे चलने की कसमें खाकर आई हों। सामने महाकाली गुफ़ा के जंगल की हरियाली और उसके पीछे पवई की भव्य इमारतें इस दृश्य को और भी विहंगम बना देते हैं। अभी मेरे पास दृश्य को कैद करने के लिये कोई उपकरण नहीं है, नहीं तो यह दृश्य मैं अवश्य कैद करना चाहता था। आज प्रकृति के बीच नहीं जा पाये, मनोरम दृश्य और बहती हुई हवाओं के आज निकट से साक्षी नहीं हो पाये।
कुछ लम्हें.. लिफ़्ट, संवाद, अखबार और समय
सुनहली सुबह को उठकर नित्यक्रम से निवृत्त होकर, घूमने के लिये प्रकृति के बीच निकल पड़ना, प्रकृति के बीच घूमने का एक अपना ही अलग आनंद होता है, जब मैं अपने अपार्टमेंट के फ़्लेट से बाहर निकलता हूँ तो वहाँ केवल चार फ़्लेट, दो लिफ़्ट और एक सीढ़ियों के दरवाजे होते हुए भी हमेशा सन्नाटा ही पसरा हुआ पाता हूँ, सीढ़ियों से उतरने की सोचता नहीं, क्योंकि आठ माला उतरने से अच्छा है कि लिफ़्ट से ही उतर लिया जाये, वैसे ही आने में भी । कई बार सोचता हूँ कि अगर लिफ़्ट का अस्तित्व ना होता तो मुँबई में क्या केवल चार माले के घर ही होते, तब इतनी सारी बाहर से आई हुई जनता कैसे और कहाँ रहती, परंतु कुछ चीजों ने जिंदगी के कई प्रश्नों को हल कर दिया है।
अपार्टमेंट से बाहर पहुँचते ही, झट से सुरक्षाकर्मी सलाम ठोंकता है और हम छोटे वाले दरवाजे से होते हुए हाईवे पर आ जाते हैं, दरवाजे के बाहर सीधा हाईवे ही है, सड़क पार एक छोटा सा उद्यान है, जहाँ सुबह लोग अपनी कैलोरी जलाने आते हैं, पर फ़िर भी वहाँ एकांत का सन्नाट पसरा हुआ है, यहाँ पर फ़िर भी लोग सुबह एक दूसरे को देखकर मुस्करा लेते हैं, सुप्रभात, जय राम जी की कह लेते हैं, पर कई शहरों में तो आपस में रोज देखने के बाद भी कभी कोई संवाद ही नहीं होता, संवाद पता नहीं किस घुटन में जीता है, जहाँ आपस में या खुद में ही लगता है कि शायद संवाद मौन है, और मौन ही संवाद है।
वापिस आकर पसीने में भीगे हुए, ताजा अखबार और दूध की थैली खुद ही दरवाजे से उठाकर लाते हैं, फ़िर अपने फ़्लेट में डाइनिंग टेबल की कुर्सियों को खींचकर पहले जूते मोजे उतारते हैं और फ़िर रोज की तरह पंखा चालू करना भूल गये होते हैं तो पंखा चालू करके, अपने पसीने पर गर्वित होते हुए अखबार पढ़ने लगते हैं, जैसे पसीना बहाकर पता नहीं किस पर अहसान करके आये हैं। अखबार भी क्या चीज है, जरा से पन्नों में दुनिया भर की खबरें भरी होती हैं, पर खबरें केवल वही होती हैं जो मीडिया हमें पढ़ाना चाहता है, हमारे भारत विकास की खबरें कहीं नहीं हैं, या भारत को विकास की और कैसे अग्रसर कैसे किया जाये, परिचय भी नहीं है जो लोग विकास का कार्य कर रहे हैं, पता नहीं कैसा अखबार है, बस इनमें उन्हीं लोगों का जिक्र है जो कुछ ना कुछ लूट रहे हैं, या लूटने की तैयारी कर रहे हैं। मुझे तो अब इन खबरों से ऊबकाई आने लगती है।
तैयार होकर ऑफ़िस जाने का समय हो गया है, बारिश में लेदर के जूते पहनने का मन नहीं करता, आखिर महँगे जो आते हैं, बारिश में सैंडल में ही जाना ठीक लगता है, जिसको जो समझना हो समझे । अपार्टमेंट से बाहर निकलते ही फ़िर वही मुंबई की चिल्लपों कहीं मुलुन्ड वाली बस तो कहीं वाशी जाने वाली बस, अब हम जिधर जाते हैं उधर की बस मिलना मुश्किल होता है, तो ऑटो ही पकड़ना होता है और ऑटो पकड़ना भी एक युद्ध ही होता है, जितने भी यात्री वहाँ खड़े होते हैं, सब पहचान के होते हैं और आपस में एक दूसरे को जानते हैं, अगर उसी तरफ़ वे यात्रा कर रहे होते हैं तो खुशी खुशी उन्हें ड्रॉप भी कर देते हैं, पता नहीं मुंबई में ऐसी क्या चीज है जो आदमी को बदल देती है, शायद समय !! क्योंकि समय की सबके पास कमी है और सब अपने समय का सदुपयोग करना चाहते हैं ।