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| घर की छत से लिया कोहरे का फोटो |
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| घर की छत से लिया कोहरे का फोटो |
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| घर की छत से लिया कोहरे का फोटो |
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| घर की छत से लिया कोहरे का फोटो |
वहीं मीरापुर को महाभारतकाल से जोड़कर बताया गया है, और यह कौरव राज्य का भाग बताया गया है, मीरापुर के चारों और चार मंदिर और तालाब हैं, उनकी उत्पत्ति के बारे में बताया गया है, कैसे नाम बिगड़ जाते हैं, फिर भले ही वह जगह हो, मंदिर हो या इंसान हो।
उनके खानदान को “हकलों के खानदान” के नाम से जाना जाता था, वे बताते हैं कि उनके खानदान में उनकी पीढ़ी तक पिछली सात पुश्तों से कोई न कोई हकलाता था, तो उनके खानदान का नाम हकलों का खानदान हो गया। प्रभाकरजी ने अपने किताबों से प्रेम होने के बारे में बताया है कि उन्हें यह शौक घर से ही लगा, उनके पिताजी की चावल की दुकान थी और वे अपने ग्राहक से इतने प्रेम से बात करते थे कि ग्राहक कपड़ा, बर्तन सभी चीजें उनकी दुकान से ही खरीदना चाहते, तो वे खुद तो नहीं बेचते थे पर सब चीजों के दुकान पर ही बुलवा देते थे। चावल, तंबाकू के टोकरे के साथ ही एक टोकरा और होता था, वह था किताबों का टोकरा, जिसमें “चंद्रकान्ता”, “चंद्रकान्ता संतति”, “भूतनाथ” और “राधेश्याम की रामायण” जैसी अद्भुत किताबें होती थीं।
प्रभाकर जी कहते हैं कि इन किताबों से ही उन्होंने कल्पना के पंखों पर बैठ कर उड़ना सीखा। वे अपने पिताजी के पढ़ने के शौक के बारे में बताते हैं वह भी रोमांचक है, जब उनकी शादी हुई तो उन्हें पता लगा कि उनकी पत्नी पढ़ी-लिखी हैं, वे तब तक बहीखाते की भाषा ही जानते थे, तुरत पण्डित जी के पास पहुँचकर बोले मुझे सात दिनों में हिन्दी पढ़ानी होगी और उन्होंने हिन्दी सीख ली। फिर उनका निरंतर अध्ययन जारी रहा।
पढ़ने के बाद अपने पिताजी के स्वभाव को विश्लेषण कर प्रभाकरजी लिखते हैं कि इस अध्ययन और पूजापाठ ने उन्हें जहाँ कुछ मूल्य दिये, वहाँ उनके अन्तर के सहज स्नेह-स्रोत को सोख लिया । वे अवहेलना की सीमा तक तटस्थ हो गये।
आज इतना ही, सोचा था कि एक छोटा सा फेसबुक स्टेटस लिखूँगा, पर लिखने बैठा तो पूरी एक पोस्ट ही बन गई, इसी लिखने को ही तो शायद ब्लॉगिंग कहते होंगे ।
The Great Ocean Road – यह 220 कि.मी. का जबरदस्त हाईवे है, जिसका अधिकतर रास्ता समुद्र के किनारे बना हुआ है, और कुछ रास्ता घने जंगलों के मध्य से भी गुजरता है, इस पर लंबी ड्राईव का आनंद ही कुछ और होना चाहिये।
माँ और उसकी कोख में पल रही बेटी के मध्य संवाद
कला केशव के सामने फफक फफक कर रो रही थी, केशव धीमे धीमे कला के नजदीक गया और कला को अपनी बाँहों में भरकर गालों से गालों को सटाकर कह रहा था, बस कला मुझे समझ आ गया है कि मैं कहाँ गलत हूँ । अब आज से मेरा समय तुम्हारा हुआ, केशव के स्पर्श से कला का गुस्सा और अकेलापन क्षण भर में काफूर हो गया, स्पर्श के स्पंदन को कला और केशव दोनों ही महसूस कर रहे थे, कला और केशव दोनों ने आगे से अपना समय आपस में बिताने का निश्चय किया।