Tag Archives: मेरी जिंदगी

वो एक रंग की कमीज..

    कमीज खरीदने की जरूरत महसूस होने लगी थी, कंपनी बदली थी, पहले वाली कंपनी में जीन्स टीशर्ट भी रोज चल जाती थी, परंतु जिस कंपनी में आये थे, वहाँ सप्ताह में ४ दिन औपचारिक कपड़े पहनने का रिवाज था और जब लगातार पिछले २ वर्षों से जीन्स से ही गुजारा चल रहा था तो औपचारिक कपड़ों में कमी होना स्वाभाविक ही थी, और दो वर्षों में तो औपचारिक कपड़ों में नये रंग नये रूप के कपड़े आ जाते हैं, वैसे भी महानगरों में फ़ैशन बहुत जल्दी बदलता है। वैसे हमने देखा है कि कुछ ही लोग ढंग के औपचारिक कपड़े पहनते हैं, वरना तो केवल पहनने से मतलब होता है, किसी भी रंग की पतलून के ऊपर किसी भी रंग की कमीज पहन ली।

कमीज

    वहीं कुछ लोग औपचारिक कपड़ों में भी सँवरे नजर आते हैं, जिस करीने से कपड़े पहनते हैं, जिन रंगों का संयोजन वे कमीज और पतलून में करते हैं वह आँखों को भाता है। कई बार कुछ रंग इतने अच्छे दिख जाते हैं कि हम भी उसी रंग के कपड़े बाजार में अपने लिये ढूँढ़ने लगते हैं। यह मानवीय स्वाभाव है।

    मुझे याद है जब खाकी प्रचलन में आई, तब मैंने भी खाकी ली और उसके साथ सफ़ेद कमीज का संयोजन बहुत ही फ़बता था, परंतु हमारे छोटे से कार्यालय में भी सोमवार को कम से कम तीन चार लोग उसी तरह के रंग संयोजन में देखे जा सकते थे, ऐसा लगता था कि कंपनी का ड्रेसकोड हो गया है। अधिकतर सोमवार को सफ़ेद कमीज पहने हुए लोग देखे जा सकते हैं, शायद इसके पीछे कार्पोरेट सभ्यता का असर हो।

   औपचारिक कपड़े हमने भी नये रंग की शर्ट लेनी थी, हम कमीज खरीदने दुकान में गये और लगभग सारे रंग देख डाले परंतु कुछ समझ में नहीं आया, हमने कहा भई कुछ अच्छा प्याजी रंग की कमीज दिखाईये, क्योंकि उस रंग में बहुत सारे सूक्ष्म रंगों से आच्छादित कपड़े आते हैं, जो कि आँखों को चुभते भी नहीं है और कोमलता का अहसास करवाते हैं, और गहरे रंग के कपड़े जिसमें चमक होती है वे आँखों को चुभते हैं और मन को भी नहीं भाते हैं, जब हमने एक अच्छे से प्याजी हल्के रंग की कमीज ली तो देखा कि अब इसके लिये पतलून भी लेनी होगी, फ़िर हमने पतलून भी ली जो बराबर रंग संयोजन में हो।

    अब इस बात को बहुत समय बीत चला है, उस समय वह रंग संयोजन बहुत ही कम लोगों के पास होता था, परंतु आजकल यह रंग संयोजन कम से कम कमीज का बहुत ही सामान्य हो चला है, अब जिस दिन मैं वह कमीज पहनकर जाता हूँ तो मुझे तो अधिकतर लोग उसी रंग की कमीज पहने दिखते हैं।

    यह भी मानवीय स्वभाव है कि जिस दिन हम जिस रंग के कपड़े पहनते हैं तो उसी रंग के परिधानों पर हमारी नजर रूक ही जाती है।

वैश्वीकरण के दौर में हिन्दी भारतीयों के लिये..

    हिन्दी दिवस हमें क्यों मनाने की जरूरत पड़ी, ये बात समझ से परे है, हमने तो आजतक अंग्रेजी दिवस या किसी और भाषा का दिवस मनाते नहीं देखा । यह ठीक है कि भारत पर कभी ब्रतानिया साम्राज्य शासन किया करता था, परंतु हमने आजाद होने के बाद भी अपनी भाषा का सम्मान वापिस नहीं लौटाया और हम ब्रतानिया साम्राज्य की भाषा पर ही अटके रहे, क्यों ? यह एक बहुत ही विकट प्रश्न है, जिसके लिये हमें गहन अध्ययन की जरूरत है। इसके पीछे केवल राजनैतिक इच्छाशक्ति की ही कमी नहीं कही जा सकती, इसके पीछे भारतीय मानस भी है जो अपनी भाषा में कभी मजबूत नहीं दिखे, जब लगा कि केवल अंग्रेजी भाषा ही सांभ्रात भाषा है तो अपनी भाषा में उन्हें वह सम्मान समाज ने नहीं दिया।

    जब दूसरे देश अपनी भाषा से इतना प्यार करते हैं और अंग्रेजी भाषा को अपने संस्कार और अपने परिवेश में आने की इजाजत ही नहीं देते हैं, तो हम क्यों ऐसा नहीं कर सकते ? ऐसा नहीं है कि अंग्रेजी भाषा ने उन देशों में पैर पसारने की कोशिश नहीं की, कोशिश की परंतु वे लोग कामयाब नहीं हो पाये । अब वैश्वीकरण के युग में भी वे देश अंग्रेजी भाषा को नकारने में लगे हुए हैं, और अपनी भाषा में ही काम करने के लिये दृढ़ हैं, हाँ जमीनी तौर पर कुछ कठिनाइयाँ बेशक आती होंगी, परंतु कम से कम वहाँ की जनता अपनी भाषा में हर सरकारी कार्य को समझती तो है।

    हमारे यहाँ भारत में सबसे पहले तो साक्षरता का यक्ष प्रश्न है, फ़िर अधिकतर सरकारी कार्यों में कार्यकाज की भाषा अंग्रेजी है, और जहाँ पर आम भारतीय जनता को रोज दो चार होना पड़ता है। वे उस भाषा में अपने कागजात बनवाने के लिये मजबूर होते हैं, जो भाषा उनको आती ही नहीं है और किसी ओर के भरोसे वे अपने महत्वपूर्ण कागजारों पर हस्ताक्षर करने को बाध्य होते हैं ।

    हिन्दी कब हमारी आम कामकाज की भाषा बन पायेगी, और वैश्वीकरण का हवाला देने वाले कब समझेंगे कि आधारभूत दस्तावेजों के लिये हमारी खुद की भाषा हमारे देश के लिये उपयुक्त होगी । कम से कम हमारे देश के लोगों को अपने दस्तावेज तो पढ़ने आयें, कामना यही है कि हमारे आधारभूत दस्तावेज तो कम से कम हमारी अपनी हिन्दी भाषा में हों।

मैं झूठ क्यों बोलने लगा हूँ

मैं झूठ क्यों बोलने लगा हूँ

कारण ढूँढ़ रहा हूँ,

पर जीवन के इन रंगों से अंजान हूँ,

बोझ हैं ये झूठ मेरे मन पर..

 

ऐसे गाढ़े विचलित रंग,

जीवन की डोर भी विचलित,

मन का आकाश भी,

और तेरा मेरा रिश्ता भी..

 

तुमसे छिपाना मेरी मजबूरी,

मेरी कमजोरी, मेरी लाचारी,

हासिल क्या होगा,

जीवन दोराहे पर है..

 

तुम पढ़कर विचलित ना होना

जीवन लंबा है,

कभी कहीं किसी आकाश में,

मेरा भी तारा होगा..

जीवन के तीन सच

क्राउड मैनेजमेंट

    बेटेलाल के मनोरंजन के लिये पास ही गये थे, तो पता चला कि उस जगह वहीं पास के आई.टी. पार्क का सन्डे फ़ेस्ट चल रहा है और प्रवेश भी केवल उन्हीं आई.टी.पार्क वालों के लिये था, पार्किंग फ़ुल होने के कारण, पार्किंग आई.टी.पार्क में करवाई गई, वहाँ पर भी अव्यवस्था का बोलबाला था, साधारणतया: आई.टी. पार्क में क्राऊड मैनेजमेंट अच्छा होना चाहिये, परंतु मैंने आज तक किसी भी आई.टी. पार्क में क्राऊड मैनेजमेंट ठीक नहीं देखा, सब पढ़े लिखे तीसमारखाँ होते हैं, जो अपने से ऊपर किसी को समझते ही नहीं और अपने से ज्यादा हाइजीनिक भी, भले ही घर में कैसे भी रहते हों, परंतु बाहर तो हमेशा दिखावा जरूरी होता है। भले ही समझदारी कम हो, परंतु आई.टी. पार्क के गेट में प्रवेश करते ही समझदारी कुछ ज्यादा ही विकसित हो जाती है। हमसे हमारा वाहन जबरन आई.टी.पार्क में खड़ा करवाया गया और चार गुना शुल्क वसूला गया। खैर हम तो जल्दी ही वहाँ से निकल लिये, बहुत दिनों बाद कार्पोरेट्स इमारतों के बीच में खुद को असहज महसूस कर रहा था ।

    इतने सबके बाद सोच रहा था कि उज्जैन में सिंहस्थ के दौरान प्रशासन का क्राउड मैनेजमेंट बहुत अच्छा रहता है, वाकई तारीफ़ के काबिल।

गर्लफ़्रेंड

    सुबह कुछ समान लेकर आ रहा था कि बीच में एक जगह रुकना पड़ा, कार खड़ी थी और एक बाईक कुछ ऐसे आकर रुकी कि हमें भी मजबूरन रुकना पड़ा, बंदा जो बाईक चला रहा था, उसने हेलमेट नहीं पहनी थी, और जबरदस्त ब्रेक लगाकर रुकी थी, पीछे सीट पर कन्या थी, कन्या बोली – “क्या हुआ ?” बंदा बोला “हेलमेट के लिये !!” और भी कुछ बोला था जो सुनाई नहीं दिया, शायद “आपसे सुबह के प्रवचन सुनने के बाद सोचा कि अभी मेनरोड आने से पहले ही हेलमेट लगा ली जाये”, कन्या बोली “ओह्ह!! मॉय गॉड, तो आप पर मेरे कटु वचन कब से असर करने लगे”, तो इतना समझ में आया कि बंदा कभी बीबी की बात तो मानता नहीं है, इसलिये वह जरूर उसकी गर्लफ़्रेंड होगी ।

पहचान

    एक नौजवान जोड़ा हमारे फ़्लेट के सामने वाले फ़्लेट में रहता था, उनकी छत खुली हुई थी, जिस पर अधिकतर उनकी शाम बीतती थी, बस उनके साथ समस्या यही थी कि वह केवल एक कमरा था, खैर नये शादीशुदा थे तो शादी के बाद भी बैचलरों जैसा मजा लूट रहे थे, पर जैसे ही नई जिम्मेदारी उनके सर पर आई, उन्हें एकदम से मकान बदलना पड़ा।

    कोई  बातचीत हम लोगों के बीच नहीं थी, केवल एक खामोश पहचान थी, चेहरों की पहचान, यहाँ तक कि मुस्कान भी नहीं अगर कभी हम मुस्करा भी दिये तो वे सपाट चेहरे के रहते थे, तो हमें लगा कि उन्हें पहचान बढ़ाना ठीक नहीं लगता, हमने भी अपनी तरफ़ से पहचान बढ़ाने का उपक्रम बंद कर दिया, इसी बीच उन्होंने कार ली, बिल्कुल नई कार, जिसे रखने के लिये मकान मालिक के घर में जगह ऐसी थी कि अगर मकान मालिक की कार निकालनी हो तो उन्हें अपनी कार निकालनी पड़ेगी याने की रेल के डब्बे की स्टाईल में, तो रोज सुबह ६ बजे उनके रिवर्स मारने की संगीत की आवाज सुनाई देने लगती थी, खुद से ही दोनों पति पत्नि ने कार सीखी और फ़िर रात को उनकी पत्नी थोड़ा बायें थोड़ा दाहिने कहकर कार को मकान में पार्क करवाती थीं। हमें लगा कि उन्होंने कार केवल अंदर और बाहर करने के लिये ही ली है क्योंकि वे लोग कार से कहीं और जाते ही नहीं थे।

    खैर उन्होंने मकान बदल लिया, फ़िर काफ़ी दिनों तक दिखे नहीं, हम भी बैंगलोर से बाहर थे अब काफ़ी दिनों बाद बैंगलोर में आना हुआ तो आमना सामना हो गया, वे अपनी जिम्मेदारी को गोद में लेकर आ रहे थे, तो देखकर हम थोड़ी देर तो असमंजस में थे कि ये वही बंदा है पर तुरंत ही उसकी और से एक मुस्कान आई तो हमने भी एक मुस्कान पलट कर फ़ेंक दी और इस तरह से मुस्कान की पहचान तो हो ही गई।

रूपये की विनाशलीला देखने के लिये तैयार हैं ?

    आजकल सब और चर्चा में डॉलर और रूपया है और जब से रूपया १०० रूपया पौंड को पार किया है तब से पौंड भी चर्चा में है। कल ही एक परिचित से बात हो रही थी, तो वे कहने लगे कि हमारे भारत पर तो ब्रिटिश का शासन था फ़िर हमारे ऊपर यह डॉलर क्यों हावी है, हमारे विनिमय तो पौंड में होना चाहिये। हमने उन्हें समझाया कि डॉलर को विश्व में मानक मुद्रा का दर्जा मिला हुआ है, डॉलर से लड़ने के लिये यूरोपीय देशों ने यूरो मुद्रा की शुरूआत की थी, नहीं तो उन्हें सब जगह डॉलर से उस देश की मुद्रा का विनिमय करना पड़ता था। अब उन्हें यूरो मुद्रा का विनिमय यूरोपीय देशों में नहीं करना पड़ता है।

    डॉलर क्यों पटकनी दे रहा है रूपये को, यह समझने की कोशिश करें तो लुब्बा लुआब यह है कि हमने आयात ज्यादा किया और निर्यात कम किया, याने कि विदेशी मुद्रा जो कि मानक मुद्रा डॉलर है वह हमारे खजाने से ज्यादा गई और मानक मुद्रा डॉलर हमारे खजाने में कम आई, खैर इस बात का ज्यादा मायने भी नहीं है क्योंकि डॉलर हमारे रूपये के मुकाबले अभी ओवररेटेड है, अगर वाकई असली दाम इसका देखा जाये तो लगभग २० रूपये होना चाहिये। और डॉलर अभी तीन गुना ज्यादा दाम पर व्यापार कर रहा है।

Rupees vs USD

USD Vs INR

    हमारी जीडीपी याने कि सकल घरेलू उत्पाद लगातार कम होती जा रही है, हमने पिछले ९ वर्षों में  मान लो कि रत्न आभूषण ५०० अरब डॉलर के आयात किये और लगभग ३५० करोड़ के रत्न आभूषण हमने निर्यात किये तो हमें पिछले ९ वर्षों में लगभग १५० करोड़ का विशुद्ध घाटा हुआ है। इसी प्रकार पेट्रोलियम और गैस में जमकर घाटा हुआ है, कुछ अंदरूनी कलह के कारण और कुछ व्यापारिक प्रतिष्ठानों की जिद के कारण । भारत विश्व में उत्पादित सोने और पेट्रोल के बहुत बड़े भाग  का उपयोग करता है।

    स्वतंत्रता के बाद से भारत का रूपया कभी राजनैतिक कारणों से तो कभी व्यापारिक कारणों से तो कभी आर्थिक नीतियों से मात खाता आया है, हमारे भारत के पास बेहतरीन काम करने वाले लोग हैं, बेहतरीन वैज्ञानिक हैं, पर उन्हें भारत के लिये उपयोग करने के लिये ना ही राजनैतिक इच्छाशक्ति है और ना ही आर्थिक जगत की इच्छाशक्ति है। अगर कुछ और बड़ी कंपनियाँ भारत की बाहर व्यापार करने लगें तो डॉलर की नदियों का मुख भारत की और होगा।

    अधिकतर अंतर्राष्ट्रीय कंपनियाँ अपने लाभ का एक बड़ा हिस्सा मानक मुद्रा याने कि डॉलर में विनिमय कर भेज देती हैं। हम भारतवासियों को भी समझना होगा कि हमें घरेलू उत्पादों का ज्यादा उपयोग करना चाहिये, जिन उत्पादों से डॉलर बाहर जा रहा है, उन उत्पादों को उपयोग करने से बचना चाहिये।

    मुद्रा गिरने से हमारे भारत के आर्थिक हालात बेहद खराब हो सकते हैं, इसका सीधा असर बैंक में बड़े बड़े ऋण पर पड़ेगा, बाहर पढ़ने वाले विद्यार्थियों पर पड़ेगा ये दो बड़े भार होंगे हमारी अर्थव्यवस्था पर, वैसे ही राष्ट्रीयकृत बैंकें ४ % से ज्यादा एन.पी.ए. याने कि जो ऋण डूब चुके हैं, से लड़ रही हैं, और अब यह व्यक्तिगत मुश्किलें बड़ाने वाला दौर होगा, अर्थव्यवस्था पर इसका सीधा असर कुछ ही दिनों में दिखना शुरू हो जायेगा, जब पेट्रोलियम पदार्थों के भाव आसमान छूने लगेंगे तो इसका सीधा असर हमारी दैनिक उपयोग की वस्तुओं पर पड़ते देर नहीं लगेगी। जब रूपया ३३% गिर चुका है तो अब पेट्रोलियम के भाव में ३३% की तेजी का अंदाजा लगा ही सकते हैं। सरकार भी कब तक राजनैतिक कारणों से रूपये के गिरने के कारण महँगाई से जनता को बचा पायेगी, और अगर यह भार जनता पर नहीं डाला गया तो भारत के खजाने पर सीधा असर पड़ेगा।

    हमारा कैश इन्फ़्लो तो उतना ही रहने वाला है वह तो डॉलर के महँगे होने से या रूपये के गिरने से ज्यादा नहीं होने वाला है, तो अब भविष्य के संकेत ठीक नहीं है, जितनी बचत अभी तक कर लेते थे, अब वह बचत भी बहुत कम होने वाली है। अभी भी अगर इस पर नियंत्रण नहीं पाया गया तो रूपये की विनाशलीला देखने के लिये तैयार रहना होगा।

भारत की आधारभूत समस्याएँ और उसके समाधान.. सैनिटरी नैपकीन और पानी

    बहुत दिनों से सोच रहा हूँ रिवर्स माइग्रेशन के लिये, रिवर्स माइग्रेशन मतलब कि अपने आधार पर लौटना, जहाँ आप पले बढ़े जहाँ आपके बचपन के साथीगण हैं,  देशांतर गमन शायद ठीक शब्द हो। लौटकर जाना बहुत बड़ा फ़ैसला नहीं है, पर लौटकर वापिस वहाँ अपना समय किस तरह से समाज के लिये लगायें, यह एक कठिन फ़ैसला है। अभी पिछले दिनों जब मैं अपने कुछ व्यावसायिक मित्रों से अपने गृहनिवास में बात कर रहा था, जब मैंने उनको अपना मन्तव्य बनाया तो एक मित्र ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा “बोस सब उज्जैन वापिस आकर समाज सेवा ही करना चाहते हैं, एक दिन ऐसा आयेगा कि सब समाजसेवक ही होंगे, सेवा करवाने वाले कम”, उस मित्र की बात वाकई बहुत दिलचस्प लगी, अगर इतने लोग सेवा करने वाले उपलब्ध हैं पर कर नहीं पा रहे हैं तो उनको बस एक नई दिशा देने की जरूरत है।
    कुछ समय बाद ही इंडीब्लॉगर ने फ़्रेंकलिन टेंपलटन इन्वेस्टमेन्ट्स के साथ “द इंडिया काँरवा” प्रस्तुत किया जिसमें अपने विचार उन वक्ताओं के लिये देने थे जिन्होंने बिल्कुल सतही तौर पर समाज के साथ काम किया और टेडेक्स गेटवे मुंबई दिसम्बर २०१२ में उन्होंने अपने विचार रखे। उनके विचार सुनकर अपने तो दिमाग के सारे दरवाजे खुल गये, हम सोच रहे थे कि करें क्या ? परंतु यहाँ तो लोग आधारभूत समस्याओं से ही सामना कर रहे हैं, उनके लिये कुछ बड़ा करने से पहले, उनकी आधारभूत समस्याओं को समझा जाये और उस पर कार्य किया जाये।
    अरुनाचलम मुरुगनाथम मेरे लिये नया नाम था, परंतु जब मैंने इनकी कहानी सुनना शुरू कि जो इतनी दिलचस्प थी, कि मैं इनके कार्य करने और कुछ करने की जिद से बहुत प्रभावित हुआ, अरुनाचलम में शुरू से ही कुछ करने की इच्छा थी, जिस तरह से उन्होंने महिलाओं के लिये सैनिटरी नैपकीन का अविष्कार किया, जिससे महिलाएँ अपने खुद के लिये यह आधारभूत सुविधा पा सकें, जिस तरह से उनके किये गये अविष्कार से जितनी बड़ी आबादी को यह लाभ मिल सकेगा, कितने ही लोगों को रोजगार मिल सकेगा, सैनिटरी नैपकीन की बात महिलाएँ तो क्या पुरूष भी दबे शब्दों में बात करते हैं पर अरुनाचलम नें यही बात मंच तक लाई और इसके लिये कार्य कर इतनी महँगी चीज को बिल्कुल ही पहुँच वाले दामों में भारत की महिलाओं को उपलब्ध करवाया।
अरुनाचलम मुरुगनाथम की दिलचस्प यात्रा आप यहाँ सुन सकते हैं।
सिन्थिया कोनिग ने भारत की सबसे आधारभूत समस्या और सबसे भारी समस्या को समझा और उसका एक अच्छा, हल्का सा समाधान भी दिया। जैसा कि हम सब लोग जानते हैं भारत की सबसे बड़ी समस्या है पानी, जो कि सहजता से उपलब्ध नहीं है और जहाँ उपलब्ध है वहाँ से घर लाने में कितने श्रम की जरूरत होती है, आज भी गाँवों में महिलाएँ सिर पर पानी ढो़कर लाती हैं, और पानी बहुत भारी होता है। इसके लिये सिन्थिया कोनिग ने एक रोलर का अविष्कार किया जो कि ड्रम के आकार का है और पानी भरने के बाद उसे आसानी से खींचा जा सकता है, पानी अधिक मात्रा में लाया जा सकता है और सबसे बड़ी बात कि इसकी कीमत गाँव वालों की पहुँच में है मात्र ९७५ – १००० रूपये।
सिन्थिया कोनिक का दिलचस्प व्याख्यान यहाँ सुन सकते हैं, कैसे उन्होंने भारी पानी को हल्का कर दिया।
सुप्रियो दास, अच्छे खासे इंजीनियर थे, परंतु कुछ करने की इच्छाशक्ति ने उन्हें अपने खुद के लिये काम करने के लिये प्रेरित किया, और उन्होंने बहुत सारे अविष्कार भी किये, जिसमें उनका सबसे अच्छा और अधिकतर जनता को फ़ायदा पहुँचाने वाला है, जिम्बा !! जब सुप्रियो दास ने देखा कि हमारे यहाँ केवल अच्छा पीने लायक साफ़ पानी ना मिलने के कारण ही हजारों मौतें रोज हो रही हैं, उन्होंने इसके लिये बहुत शोध किया और पाया कि पर्याप्त मात्रा में क्लोरीन नहीं मिलाया जा रहा है या बहुत ही सस्ता क्लोरीन उपलब्ध ही नहीं है और अगर है भी तो कम या ज्यादा होने से नुकसानदायक है, तब उन्होंने जिम्बा उत्पाद बनाया जो कि पानी के स्रोत पर ही लगा दिया जाता है तो जहाँ से लोग पानी लेते हैं, उन्हें पर्याप्त मात्रा में क्लोरीन मिला हुआ पानी मिल रहा है, जिससे आश्चर्यजनक तरीके से जहाँ भी प्रयोग हुए अच्छे नतीजे मिले और सबसे बड़ी बात कि इस यंत्र में कोई भी ऐसी चीज नहीं लगी कि वह खराब हो सके।
सुप्रियो दास की क्लोरीन की कहानी, कैसे पानी को पीने लायक बनाया
    इन तीन अविष्कारों से मैं बहुत प्रभावित हुआ, अगर कुछ करने की ठान लो तो कुछ भी असंभव नहीं है, बस काम करना है यह सोच हमारी दृढ़ होनी चाहिये।
    यह पोस्ट फ़्रेंकलिन टेंपलटन द्वारा आयोजित टेडेक्स गेटवे मुंबई २०१२ में आयोजित “द इंडिया काँरवा” में कुछ महत्वपूर्ण सामाजिक और आधारभूत समस्यों से प्रेरित होकर लिखी गई है। Franklin Templeton Investments partnered the TEDxGateway Mumbai in December 2012.

मोबाईल की आत्मकथा – निबंध

मैं मोबाईल हूँ आज मैं आपको अपनी आत्मकथा सुनाता हूँ, बहुत लंबी यात्रा करके आज मैंने वर्तमान युग को आधुनिक सुविधाओं से युक्त कर दिया है। आज दुनिया में कोई भी मेरे बिना अपने दैनिक कार्यों की कल्पना नहीं कर सकता है, मैं आज की दुनिया का सबसे तेज संचार व्यवस्था का माध्यम हूँ।

मेरा अविष्कार  वर्ष १९७३ में मोटोरोला के अनुसंधानकर्ता मार्टिन कूपर ने किया था, मार्टिन कूपर को “मोबाईल का पितामह” भी कहा जाता है। मार्टिन कूपर ने ३ अप्रैल १९७३ को बेल प्रयोगशाला के प्रतिद्वन्दी डॉ. एंगेल से पहली बार मोबाईल से फ़ोन पर बात की थी। १९७९ में एन.टी.टी. ने जापान में अपना पहला वाणिज्यिक सेलुलर नेटवर्क स्थापित किया था। १९८१ में पूर्णत: स्वचलित मोबाईल प्रणाली डेनमार्क, फ़िनलैंड, नार्वे और स्वीडन में शुरू हुई थी। फ़िर तो १९८० के मध्य से कई देशों ने मेरी शुरूआत की जैसे ब्रिटेन, मेक्सिको और कनाडा।

वर्ष १९८३ में मोटोरोला ने अमेरिका में 1G नेटवर्क स्थापित किया। उस समय मेरी क्षमता केवल ३० मिनिट बात करने तक ही सीमित थी उसके बाद मुझे १० घंटे चार्ज करना पड़ता था। उस समय बाजार में मेरी बहुत जबरदस्त माँग थी जबकि बैटरी बहुत कम चलती थी, मेरा वजन ज्यादा था और बैटरी कम चलने के कारण बात भी कम हो सकती थी, परंतु फ़िर भी हजारों खरीददार मेरे इंतजार में थे।

वर्ष १९९१ में फ़िनलैंड के रेडियोलिंजा 2G नेटवर्क की शुरूआत की थी, मोबाईल पर एस.एम.एस की शुरूआत वर्ष १९९३ में फ़िनलैंड से हुई थी,  2G सेवा के दस वर्ष बाद 3G सेवा एन.टी.टी. डोकोमो ने जापान में शुरूआत की थी। अब 4G भी सेवा में आ चुका है और 5G परीक्षण के दौर में है।

मोबाईल  से बात की जा सकती है, एस.एम.एस. भेजे जा सकते हैं और अब तो मोबाईल से क्या क्या नहीं किया जा सकता है, अब स्मार्ट फ़ोन का दौर है, अब टच स्क्रीन फ़ोन से संगीत सुन सकते हैं, कैमरे का उपयोग कर सकते हैं, इंटरनेट का उपयोग कर सकते हैं।

अभी मोबाईल बनाने में मुख्य छ: कंपनियाँ हैं सेमसंग, नोकिया, एपल, ZTE, एल.जी., हुवाई ।

आज के इस आधुनिक दौर में मैंने सारी सुविधाएँ दे दी हैं, अब बैंक से पैसे ट्रांसफ़र करने हो तो मोबाईल से किये जा सकते हैं, किसी भी बिल का भुगतान करना हो या ट्रेन, प्लेन का टिकट बुक करना हो वह भी मोबाईल से किये जा सकते हैं। मेरी सुविधाओं में दिन प्रतिदिन उन्नति हो रही है, और नई नई सुविधाओं का उपयोग दुनिया कर पायेगी।

एक मुलाकात कल परसों में प्रसिद्ध हुए नेता और बरसों से प्रसिद्ध अभिनेता खाज साहब से

एक मुलाकात कल परसों में प्रसिद्ध हुए नेता और बरसों से प्रसिद्ध अभिनेता खाज साहब से –

प्रश्न – खाज साहब आपके मुंबई में १२ रूपये वाली थाली के बयान ने आपको रातोंरात प्रसिद्धी दी है, आप क्या सोचते हैं ?

उत्तर – अरे भई, हमने कोई गलत बयानबाजी थोड़े ही कर दी है, १२ रूपये की थाली मुंबई में मिलती है, इसलिये बता दिया है, अब इसमें नेता के रूप में प्रसिद्धी वाली तो कोई बात ही नहीं है, आखिर जनता को पता तो चलना चाहिये कि १२ रूपये में भी थाली मिलती है और मुंबई में आसानी से गुजारा कर सकते हैं।

प्रश्न – खाज साहब जनता १२ रूपये वाली थाली के रेस्टोरेंट के पते माँग रही है, आप कब तक  ये पते जनता को मुहैया करवायेंगे ?

उत्तर – देखिये नेता का काम है बताना कि हाँ भई १२ रूपये में थाली उपलब्ध है, बाकी उपलब्ध कहाँ कहाँ है वह काम या तो नौकरशाहों का होता है या फ़िर जनता खुद इतना काम भी नहीं कर सकती, देखिये हमारी उपलब्धि कि हमने जनता को इतनी मूलभूत चीज बताई जो जनता को भी पता नहीं थी, आप भी क्या बेकार के प्रश्न लेकर आये हैं।

प्रश्न – खाज साहब आपके कांपीटिशन में दिल्ली में एक और नेता ने बताया कि दिल्ली में ५ रूपये में थाली मिलती है, आप इसके बारे में क्या कहना चाहते हैं?

उत्तर – अब देखिये विपक्ष का काम ही यही होता है कि पक्ष का मुद्दा चुरा लें और उसे अपना बतायें, अब हमने इतनी मेहनत से १२ रूपये की थाली का मुद्दा बनाया तो वे ५ रूपये की थाली बताने लगे, अब हद है भई चोरी की । फ़ालतू में कन्ट्रोवर्सी करते हैं ।

प्रश्न – खाज साहब लोग कह रहे हैं जब १२ रूपये में थाली मिलती है तो मनेरगा में ज्यादा पैसा देकर आप लोग क्यों देश को डुबा रहे हो ?

उत्तर – मनेरगा में मेहनत करके पैसा मिलता है, इसीलिये स्कीम का नाम भी मनेरगा रखा गया है कि नाम से ही पता चले कि मेहनत करो और पैसा ले जाओ, अब जो मेहनत करेगा उसको तो सरकार को भी ज्यादा पैसे देना पड़ेंगे ना, नहीं तो कोई काम करने को तैयार ही नहीं होगा, अब हम गाँव का तो बता नहीं सकते कि वहाँ १२ रूपये की थाली मिलती है या नहीं ?

प्रश्न – खाज साहब जनता बोल रही है कि १२ रूपये की थाली के लिये सरकार जनता को स्टाम्प पेपर पर लिखकर अगले ३०-४० वर्ष की गारंटी दे और थाली नहीं मिलने की दशा में बीमा का प्रावधान हो ।

उत्तर – गारंटी !!! गारंटी किस चीज की है, हर जगह लिखा रहता है कि फ़ैशन के इस दौर में गारंटी की इच्छा ना करें, फ़िर अरे हम कोई कपड़े थोड़े ही पहना रहे हैं, हम तो केवल थाली की बात कर रहे हैं, जब वह मिलती है तो मिलती है, उसमें गलत बात क्या है, स्टाम्प पेपर क्या होता है जब हमारी सरकार ६० से ज्यादा  वर्षों से चल रही है तो जनता को भरोसा होना चाहिये । अब एक तो सरकार १२ रूपये में थाली उपलब्ध करवा रही है और ऊपर से जनता को बीमा भी करवा कर दे, खुद करवा लें, सरकार के ऊपर किसी प्रकार की कोई बंदिश नहीं है।

प्रश्न – खाज साहब आखिरी सवाल, क्या आपने कभी १२ रूपये की थाली खाई है ?

उत्तर – ये लो, हम तो बीते वर्षों से जब भी केंटीन में जाते हैं तो वहाँ १० रूपये से भी कम की थाली में खा लेते हैं, फ़िर भी हमारी दरियादिली देखिये कि हमने जनता को १२ रूपये की थाली बताई है।

बात करने का बहाना चाहिये तो प्रकृति सबसे अच्छा विषय है

    कल दोपहर का भोजन करने के बाद हमेशा की तरह थोड़ा टहलने निकला था, मौसम सुहाना था, बहुत दिनों बाद मुँबई में धूप देख रहा था, जैसे धरती पर अचानक ही रुपहली सुनहली चादर किसी ने बिछा दी हो, सारी प्रकृति खिलखिला उठी थी, और मैं उसी प्रकृति में अनमना सा चला जा रहा था, मन कहीं दिमाग कहीं और दिल कहीं ओर व्यस्त था, समझ नहीं आ रहा था कि ये सब एक जगह कब आयेंगे, बस अन्मयस्कता पर मुस्कराहट का दामन ओड़े घूम रहा था। बहुत अजीब होता है जब ऐसे किसी ओर चोले को ओड़ना पड़ता है। सारा वातावरण अंजान ही लगता है ।

    लौटते हुए अचानक ही बारिश शुरु हो गई और अचानक ही बारिश ने अपने अंदर सारे विचारों को समा लिया, पहले बारिश का हर तरह से मजा लेते थे, परंतु अब बारिश भी प्रकृति के नियम की मजबूरी लगने लगी है, मुंबई की बारिश भी तेज होती है, पता नहीं होता कि कब कितनी तेज बारिश होगी, इसलिये छाता हमेशा अपने पास रखना पडता है, पर आज नहीं था, खैर बारिश में ही दौड़ते हुए, सीमेंट के फ़र्श में भी गड्डे होते हैं, और वही आजकल के आधुनिक गड्ढे हैं, जिसमें बारिश का पानी भर जाता है और आधुनिक लोग उसी में छप छप कर बारिश का आनंद ले लेते हैं। खैर भीगते भीगते अपनी सीट पर पहुँचे। सबने पूछा अरे पूरे भीग गये, हम केवल मुस्करा दिये.. क्योंकि हमें भी पता था और उनको भी कि पूरे नहीं भीगे हैं अभी १५ मिनिट में बदन की गर्मी से ये बारिश की देन सूख जायेगी।

    अगर किसी से बात करने का बहाना चाहिये तो प्रकृति सबसे अच्छा विषय है, “अरे आज गर्मी बहुत है”, “आज बारिश जबरदस्त है”, “आज बारिश नहीं है, थोड़ा अच्छा लग रहा है”, “आज अच्छी ठंड है”, “कल का मौसम अच्छा था, आज थोड़ा चिपचिपा लग रहा है” इत्यादि। पर कई बार और कई मौकों पर संवाद आगे नहीं बढ़ पाता, सब अपनी अपनी परेशानियों में अपने अंदर ही इतने व्यस्त होते हैं, कि वे प्रकृति का मजा ले ही नहीं पाते।

    आज सुबह उठकर खिड़की से बाहर का ऩजारा देखा बाहर फ़िर से बारिश हो रही है, और इतनी तेज कि बारिश की एक एक बूँद ऊपर से नीचे तक श्रंखलाबद्ध तरीके से गिरती हुई दिखाई दे रही है, बूँदों की लय को देखकर मन रम जाता है, ऐसा लगता है कि ये ऊपर से ही साथ साथ आने की, आगे पीछे चलने की कसमें खाकर आई हों। सामने महाकाली गुफ़ा के जंगल की हरियाली और उसके पीछे पवई की भव्य इमारतें इस दृश्य को और भी विहंगम बना देते हैं। अभी मेरे पास दृश्य को कैद करने के लिये कोई उपकरण नहीं है, नहीं तो यह दृश्य मैं अवश्य कैद करना चाहता था। आज प्रकृति के बीच नहीं जा पाये, मनोरम दृश्य और बहती हुई हवाओं के आज निकट से साक्षी नहीं हो पाये।

कुछ लम्हें.. लिफ़्ट, संवाद, अखबार और समय

    सुनहली सुबह को उठकर नित्यक्रम से निवृत्त होकर, घूमने के लिये प्रकृति के बीच निकल पड़ना, प्रकृति के बीच घूमने का एक अपना ही अलग आनंद होता है, जब मैं अपने अपार्टमेंट के फ़्लेट से बाहर निकलता हूँ तो वहाँ केवल चार फ़्लेट, दो लिफ़्ट और एक सीढ़ियों के दरवाजे होते हुए भी हमेशा सन्नाटा ही पसरा हुआ पाता हूँ, सीढ़ियों से उतरने की सोचता नहीं, क्योंकि आठ माला उतरने से अच्छा है कि लिफ़्ट से ही उतर लिया जाये, वैसे ही आने में भी । कई बार सोचता हूँ कि अगर लिफ़्ट का अस्तित्व ना होता तो मुँबई में क्या केवल चार माले के घर ही होते, तब इतनी सारी बाहर से आई हुई जनता कैसे और कहाँ रहती, परंतु कुछ चीजों ने जिंदगी के कई प्रश्नों को हल कर दिया है।

    अपार्टमेंट से बाहर पहुँचते ही, झट से सुरक्षाकर्मी सलाम ठोंकता है और हम छोटे वाले दरवाजे से होते हुए हाईवे पर आ जाते हैं, दरवाजे के बाहर सीधा हाईवे ही है, सड़क पार एक छोटा सा उद्यान है, जहाँ सुबह लोग अपनी कैलोरी जलाने आते हैं, पर फ़िर भी वहाँ एकांत का सन्नाट पसरा हुआ है, यहाँ पर फ़िर भी लोग सुबह एक दूसरे को देखकर मुस्करा लेते हैं, सुप्रभात, जय राम जी की कह लेते हैं, पर कई शहरों में तो आपस में रोज देखने के बाद भी कभी कोई संवाद ही नहीं होता, संवाद पता नहीं किस घुटन में जीता है, जहाँ आपस में या खुद में ही लगता है कि शायद संवाद मौन है, और मौन ही संवाद है।

    वापिस आकर पसीने में भीगे हुए, ताजा अखबार और दूध की थैली खुद ही दरवाजे से उठाकर लाते हैं,  फ़िर अपने फ़्लेट में डाइनिंग टेबल की कुर्सियों को खींचकर पहले जूते मोजे उतारते हैं और फ़िर रोज की तरह पंखा चालू करना भूल गये होते हैं तो पंखा चालू करके, अपने पसीने पर गर्वित होते हुए अखबार पढ़ने लगते हैं, जैसे पसीना बहाकर पता नहीं किस पर अहसान करके आये हैं। अखबार भी क्या चीज है, जरा से पन्नों में दुनिया भर की खबरें भरी होती हैं, पर खबरें केवल वही होती हैं जो मीडिया हमें पढ़ाना चाहता है, हमारे भारत विकास की खबरें कहीं नहीं हैं, या भारत को विकास की और कैसे अग्रसर कैसे किया जाये, परिचय भी नहीं है जो लोग विकास का कार्य कर रहे हैं, पता नहीं कैसा अखबार है, बस इनमें उन्हीं लोगों का जिक्र है जो कुछ ना कुछ लूट रहे हैं, या लूटने की तैयारी कर रहे हैं। मुझे तो अब इन खबरों से ऊबकाई आने लगती है।

    तैयार होकर ऑफ़िस जाने का समय हो गया है, बारिश में लेदर के जूते पहनने का मन नहीं करता, आखिर महँगे जो आते हैं, बारिश में सैंडल में ही जाना ठीक लगता है, जिसको जो समझना हो समझे । अपार्टमेंट से बाहर निकलते ही फ़िर वही मुंबई की चिल्लपों कहीं मुलुन्ड वाली बस तो कहीं वाशी जाने वाली बस, अब हम जिधर जाते हैं उधर की बस मिलना मुश्किल होता है, तो ऑटो ही पकड़ना होता है और ऑटो पकड़ना भी एक युद्ध ही होता है, जितने भी यात्री वहाँ खड़े होते हैं, सब पहचान के होते हैं और आपस में एक दूसरे को जानते हैं, अगर उसी तरफ़ वे यात्रा कर रहे होते हैं तो खुशी खुशी उन्हें ड्रॉप भी कर देते हैं, पता नहीं मुंबई में ऐसी क्या चीज है जो आदमी को बदल देती है, शायद समय !! क्योंकि समय की सबके पास कमी है और सब अपने समय का सदुपयोग करना चाहते हैं ।