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प्रात:भ्रमण के दौरान “मधुबन में राधिका नाचे रे, गिरधर की मुरलिया बाजे रे…”

    आज सुबह घूमने के दौरान कुछ पुरानी यादें ताजा हो गईं, घूमते हुए एक वृद्ध सज्जन के पास से निकले तो उनके जेब में रखे मोबाईल से गाना बज रहा था “मधुबन में राधिका नाचे रे, गिरधर की मुरलिया बाजे रे…”, हमें अपने घर की याद आ गई, क्योंकि हमारे पापा और मम्मी जी को भी यह गाना बहुत पसंद है, और मुझे भी, शास्त्रीय संगीत पर आधारित (मेरे ज्ञान के अनुसार) गाना लाजबाब है।

कोहिनूर (1960) फ़िल्म के इस  गाने का लुत्फ़ उठाईये –

झाबुआ कॉलेज जाते समय दो तालाब और भी बहुत सारी यादें…. मेरे किस्से … विवेक रस्तोगी

    कॉलेज में पहले वर्ष में ही कॉलेज की हवा लग गयी, झाबुआ जी हाँ यह मध्यप्रदेश में एक आदिवासी क्षैत्र है और यहाँ के भील भिलाले बहुत प्रसिद्ध हैं। पहले भी एक पोस्ट लिखी है यहाँ चटका लगाकर देख सकते हैं “झाबुआ के भील मामा”।

    अपने कॉलेज जाते समय बीच में दो तालाब पड़ते थे, पहला तालाब तो हमारे घर के पास ही था और उसमें पानी थोड़ा कम होता था, केवल बरसात में पुरा जाता था। दूसरा तालाब हमारे कॉलेज के पास था जिसे पार करने के बाद ही कॉलेज जाया जा सकता था। बहुत ही सुन्दर दृश्य बनता था, और खासकर बारिश में तो कहने ही क्या, पुल के ऊपर एक फ़ीट पानी बहता था और कॉलेज आने जाने वाले रेलिंग के सहारे तालाब पार किया करते थे। तालाब में कमल के फ़ूल खिला करते थे कभी कोई कमल पास में खिल गया तो हम उसे ऐसे ही तोड़ लिया करते थे।

    दूर से ही तालाब का पुल दिखाई पड़ता था, वहीं दूर से ही कोई हरे,नीले रंग की स्कर्ट पहनी हुई लड़की दिखाई देती, तो साईकिल और तेज कर देते, पता है पास जाकर देखते कि भील जा रहा है, वहाँ के भील लोगों का पहनावा है यह, शाल को लँगी जैसा लपेट लेंगे और दूर से ऐसा लगेगा कि लड़की जा रही है, पास जाकर देखा तो भील मामा।

एक शेर अर्ज किया करते थे –

“दूर से देखा तो लगा हेमामालिनी बाल हिला रही है,

पास जाकर देखा तो पता चला कि भैंस पूँछ हिला रही है।”

    वहीं पास में भील कमल की जड़ याने कि कमलककड़ी वहीं से तोड़कर बेचते थे। कमल में लक्ष्मीजी रहती हैं, इसलिये हम कमल को बहुत पसंद किया करते थे, एक हमारा मित्र था नाम उसका भी कमल था, बस काला था तो हमने उसका नाम कालिया रख दिया था, और हम लोग कहते थे कमल कालिया, काला पड़ने की भी कहानी है, झाबुआ आने के पहले उसके पिताजी खरगोन में रहते थे, और खरगोन निमाड़ में आता है, कहते हैं निमाड़ की गर्मी में अच्छे अच्छे जल जाते हैं, इतनी झुलसती हुई गर्मी होती है निमाड़ में।

    कॉलेज के इस तालाब के एक किनारे शायद मंदिर था और दूसरे किनारे सर्किट हाऊस था, फ़िर थोड़े आगे जाने पर बायीं तरफ़ आदिवासी होस्टल था और फ़िर कॉलेज, कॉलेज के गेट के पहले एक रास्ता बायीं तरफ़ जाती थी जो कि गोपाल कॉलोनी का शार्टकट था और मेन रोड से बसें और अन्य परिवहन साधन रानापुर की ओर जाते थे, आगे कहाँ जाते थे वह हमें अब याद नहीं आ पा रहा है।

    कॉलेज के गेट में प्रवेश करते ही पार्किंग के लिये दो स्टेंड बने हुए थे जिसमें शेड भी लगे थे, और आगे जाने पर “शहीद चंद्रशेखर आजाद” की प्रतिमा लगी थी, और हमारे कॉलेज का नाम है “शहीद चंद्रशेखर आजाद महाविद्यालय, झाबुआ”, फ़िर कॉलेज की इमारत और पीछे की ओर बड़ा मैदान। जहाँ पर हम एन.सी.सी. की परेड किया करते थे फ़िर बाद में करवाते थे। बहुत सी यादें जुड़ी हुई हैं।

shahid chandra shekhar aazad

शहीद चंद्रशेखर आजाद को मेरा नमन

सिगरेट का असली नशा तो धुआँ अंदर लेने पर ही होता है, और असली नुक्सान भी। …. अपने किस्से … विवेक रस्तोगी

    कॉलेज के मेनगेट पर शटर के पास बैठकर दो विल्स मुँह में दबाई और चपरासी काका से शिप माचिस ली फ़िर उसमें से एक तीली निकाली और आग लगाने के लिये जैसे ही माचिस पर घर्षण करने वाले थे कि प्रिंसिपल सर आते दिखे, चुपचाप माचिस साईड में रखी, दोनों विल्स सिगरेट एक हाथ में पीछे दबाई और प्रिंसिपल सर जैसे ही पास आये दूसरे हाथ से झुककर चरण स्पर्श किये, और प्रिंसिपल सर अंदर अपने रुम में चले गये।

    फ़िर वापिस से दोनों विल्स मुँह में और माचिस की तीली घर्षण के लिये अग्रसर, और एक सर्र की आवाज से तीली जली और मुँह में लगी दोनों विल्स सिगरेट में जोर से अंदर कश मारा, जिससे दोनों विल्स सिगरेट एक बार में ही जल ली।

    एक विल्स सिगरेट अपने दोस्त को दी और दूसरी अपने मुँह में दबाये कश खींचे जा रहे थे, तब सिगरेट पीनी तो आती नहीं थी, बस झांकीबाजी करते थे, मुँह में धुआँ लेकर नाक से निकालने को ही सिगरेट पीना समझते थे।

हमारे एक सीनियर आये जो कि अच्छॆ मित्र भी थे, बोले “ऐ क्यों सिगरेट खराब कर रहे हो”

हम बोले “क्यों”

सीनियर बोले “बताओ हम बताते हैं कि सिगरेट कैसे पीते हैं”

    और उन्होंने हमारे हाथ से सिगरेट ली और कश अंदर खींचा और धुएँ का तो अता पता ही नहीं था बोले धुआँ पेट में अंदर तक लो तभी तो नशे का मजा आयेगा। फ़िर थोड़ी देर बाद अपने पेट में से पता नहीं कैसे पूरा धुआँ मुँह से बाहर निकाला। हम तो देखकर ही दंग रह गये, कि ऐसा भी होता है।

सीनियर बोले “अब ऐसा करके बताओ”

हम बोले “लाओ, हम भी करके देखते हैं”

    फ़िर जो सुट्टा मारा तो जो खाँसे कि बस आँखें लाल और आँखों से पानी बाहर, सिगरेट पीने का अभ्यास बहुत ही महँगा सा लग रहा था। पर माने नहीं, केवल दो दिन की सिगरेट प्रेक्टिस के बाद उस्तादी हो गई।

    साथ ही हमें सीनियर ने बताया कि सिगरेट का असली नशा तो धुआँ अंदर लेने पर ही होता है, और असली नुक्सान भी।

चांसलर सिगरेट के कसैलेपन से विल्स तक का सफ़र और ऐश की परिभाषा…

    चांसलर सिगरेट लेकर टेकरी के पीछे छुपते हुए दोनों साईकिल से जाते थे…… किसी पहाड़ी में छिपकर रोज वो चांसलर सिगरेट जो गहरे चाकलेटी रंग की होती थी…थोड़ी मीठी सी लगती थी … पर दो-चार कश लेने के बाद फ़िर कड़वी लगने लगती थी… क्यों वो बाद में पता चला .. सिगरेट तो पीनी आती नहीं थी ….. पहले कश में ही सिगरेट का फ़िल्टर अपनी जीभ से गीला कर देते थे और फ़िर वो कसैलापन मुँह में चढ़ता ही जाता ।

    सिगरेट के जलते हुए सिरे को देखते हुए उस सिगरेट को खत्म होते देखते थे… सिगरेट का धुआँ और उसकी तपन शुरु में असहनीय होती थी… बाद में पता चला कि जब सिगरेट जलती है और जो आग उस सिगरेट को ऐश में बदलती है उसका तापमान १०० डिग्री होता है… पहली बार हमारे भौतिकी विज्ञान के प्रोफ़ेसर ने बताया था कि इसे ऐश कहते हैं…

    हम तब तक जिंदगी के मजे लेने को ही ऐश समझते थे, पर उस दिन हमें असलई ऐश समझ आई कि सिगरेट की राख जो कि जिंदगी को भी राख बना देती है, उसे ऐश कहते हैं… पता था कि ऐश करना अच्छी बात नहीं है… परंतु बहुत देर बाद समझ में आई ये बात…

    एक मित्र था कालिया कहता था कि किसी भी नये शहर में जाओ तो सिगरेट और दारु से दांत काटे मित्र बड़ी ही आसानी से बन जाते हैं, किसी भी पान की गुमटी को अपना अडडा बना लो और फ़िर देखो …. जब शहर बदला तो यही फ़ार्मुला अपनाया और चांसलर छोड़ विल्स के साथ बहुत से दोस्त बनाये…

    अब लगता है वो ऐश खत्म होने से अच्छी दोस्ती खत्म हो गई, लोग आपस में बात करने के लिये समय नहीं निकाल पाते… कम से कम ऐश करते समय आपस में पाँच मिनिट बतिया तो लेते हैं…

पर क्या करे हम ऐश करना छोड़ चुके हैं…. पर वो चांसलर का कसैलापन अभी भी याद है…

मेरे स्वप्न में, वही नदी क्यों आती है…. मेरी कविता …. विवेक रस्तोगी

बारबार मेरे स्वप्न में

वही नदी क्यों आती है

जो मुझे बुलाती है

कहती है कि आओ जैसे तुम पहले

मेरे पास आकर बैठते थे

वैसे ही पाँव डालकर बैठो,

अब तो तुम

समुंदर के पास हो

है बहुत विशाल

पर मुझे बताओ

कि कितनी बार उसने तुम्हें

अपने पास बैठने दिया

जैसे मैंने ??

क्योंकि शब्दों से मेरा जीवन जीवन्त है …. मेरी कविता … विवेक रस्तोगी

शब्दों से मेरा जीवन जीवन्त है

नहीं तो सुनसान रात्रि के

शमशान की सन्नाटे की गूँज है

सन्नाटे की सांय सांय में

जीवन भी कहीं सो चुका है

शमशान जाने को समय है

पूरी जिंदगी मौत से डरते हैं

शमशान जाने से डरते हैं

पर एक दिन मौत के बाद

सबको वहीं उसी सन्नाटे में

जाना होता है,

जहाँ रात को सांय सांय

हवा अपना रुख बदलती है

जहाँ रात को उल्लू भी

डरते हैं,

जहाँ पेड़ों पर भी

नीरवता रहती है

मैं जाता हूँ तो मुझे

मेरे शब्द जीवित कर देते हैं

क्योंकि शब्दों से मेरा जीवन जीवन्त है।

फ़िर भी मेरी सुबह और दिन भागते हुए शुरु होते हैं…..मेरी कविता … विवेक रस्तोगी

रोज सुबह भागते हुए

दिन शुरु होता है,

पर सुबह तटस्थ रहती है,

सुबह अपनी ठंडी हवा,

पंछियों की चहचहाट,

मंदिर की घंटियाँ,

मेरे खिड़्की के जंगले से आती भीनी भीनी

फ़ूलों की खुश्बु,

सब कुछ तो ताजा होता है

फ़िर भी मेरी सुबह और दिन

भागते हुए शुरु होते हैं।

तुम इतने भयानक क्यों थे..! … मेरी कविता … विवेक रस्तोगी

सिसकती खिड़्कियाँ

चिल्लाते दरवाजे

विलाप करते रोशनदान

चीखते हुए परदे

सब तुम्हारी याद दिलाते हैं

मेरे अतीत

तुम इतने भयानक क्यों थे !

कुछ है क्या मेरे लिये ? मेरे आने से पहले …… मेरी कविता ….. विवेक रस्तोगी

कुछ है क्या मेरे लिये ?

या सब पहले ही खर्च हो चुका है

मेरे आने से पहले,

कुछ है क्या करने के लिये ?

या सब पहले ही हो चुका है

मेरे आने से पहले,

कुछ है क्या कहने के लिये ?

या सब पहले ही कह चुके हैं

मेरे आने से पहले,

कुछ है क्या सुनने के लिये ?

या सब पहले ही सुन चुके हैं

मेरे आने से से पहले,

हमेशा जिंदगी में सब कुछ,

मेरे आने से पहले ही क्यों हो जाता है,

और जो मैं करता हूँ, वह

बाद मैं सोचता हूँ क्या मैं इसे ऐसा कर सकता था ?

बस सोचता हूँ कि सब पहले ही क्यों हो चुका होता है

मेरे आने से पहले ?

मेरे बेटे की खराब तबियत में मेरे विचार और घटनाक्रम। क्या डॉक्टर एकाधिक व्यक्तित्व विकार के शिकार होते हैं ? [ Doctor’s with Multiple Disability Disorder ?]

    कल मेरे बेटे की तबियत कुछ ज्यादा ही खराब हो गयी, जैसे ही शाम को मैं घर पहुँचा तो पता चला कि ये दोपहर से सो ही रहा है और कुछ खाया भी नहीं है। आज लगातार पाँचवा दिन है जबकि बुखार कम नहीं हुआ है और १०२ चल रहा है। मैंने तुरन्त ही बच्चे के विशेषज्ञ डॉक्टर को फ़ोन लगाया और पूछा कि कब कहाँ मिलेंगे। और तुरन्त ही उनके नर्सिंग होम लेकर चल दिये।

    इन डॉक्टर के यहाँ हमारा बेटे को हम लगातार दिखाते रहे हैं, उन्होंने अपनी जाँच पूरी की और तुरन्त ही रक्त और मूत्र जाँच के आदेश दे दिये। और लेब को तुरन्त रिपोर्ट देने का बोला। हम कुछ समयांतरल के बाद वापिस डॉक्टर के पास पहुँचे तो वो बोले कि WBS कम है, और टायफ़ाईड होने की संभावना है, कमजोरी बहुत ज्यादा है। इसलिये इसी समय बालक को भर्ती करवा दीजिये।

    उनका बोलना था कि हमारा कलेजा मुँह को आ गया कि जरा सी जान और अस्पताल में भर्ती, हमने कहा क्या घर पर रहकर चिकित्सा नहीं हो सकती है, डॉक्टर बोले हो सकती है पर क्यों जोखिम लें, पहले ही इतनी कमजोरी है और ज्यादा कमजोरी हो गयी तो। हम क्या बोल सकते थे। चुपचाप अपनी गर्दन हिलाई और घर पर फ़ोन लगाया कि तैयार हो जाओ, अस्पताल में भर्ती करवाना है।

   जब हमें डॉक्टर ने बोला था कि भर्ती करवा दो तो हमें डॉक्टर का चेहरा शैतान को होता दिखा था कि उसके मुँह पर अचानक बोलते बोलते ही कान बड़े हो गये हैं, मुँह बड़ा हो गया है, सिर पर दो सींग उग आये हैं, नाक बड़ी हो गयी है और दाँत बाहर को राक्षस जैसे निकल आये हैं।

    हम तो हमेशा से डॉक्टर को भगवान का रुप मानते हैं, परंतु कभी कभी लगता है कि नहीं ये लोग एकाधिक व्यक्तित्व विकार का शिकार होते हैं, तभी तो पल में अपनी बातों से मरीज और मरीज के परिवार का विश्वास जीत लेते हैं और फ़िर उनकी जेब काटने लगते हैं।

    हमारे जो डॉक्टर हैं, वे लगभग हमारी ही उम्र के होंगे, और अभी अभी नया नर्सिंग होम खोला है, और मुंबई में दो जगह नर्सिंग होम हैं। घरवाले भी सोचते होंगे कि वाह हमारे बेटे ने क्या व्यवसाय जमाया है। मुझे लगता है कि मेरा डॉक्टर पर ज्यादा विश्वास है और भगवान पर तो अटूट विश्वास है। और ये सब बातें न जाने क्यों मेरे दिलोदिमाग में आ गई हैं।

    शायद एकदम से मेरी पितृग्रंथी को चोट लगी हो, या फ़िर अस्पताल में खराब अनुभवों से। उम्मीद है कि इलाज कर रहे डॉक्टर हिन्दी ब्लॉग नहीं पढ़ते होंगे और उन्हें बुरा भी नहीं लगेगा। अब हम जा रहे हैं हमारे बेटॆ के पास कल से उसे दो इंजेक्शन और १ सिलाइन चढ़ चुकी है, हमारी घरवाली रातभर से सोई नहीं है, अब हम जा रहे हैं अपने लख्तेजिगर के पास…