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पैसे पेड़ पर उगते हैं पता बता रहे हमारे बेटे लाल…
जब हम घर पर रहते हैं तो बेटेलाल को हम ही सुबह उठाते हैं, और कुछ संवाद भी हो जाते हैं, कुछ दिनों पहले महाराज अपनी एक किताब गुमा आये और अब बोल रहे हैं कि पैसे दे दीजिये हम नई किताब खरीद लायेंगे। अपनी आदत के अनुसार हमने कह दिया “पैसे पेड़ पर नहीं उगते हैं” और अब तो यह हमारे प्रधानमंत्री जी ने भी पुष्ट कर दिया है।
हमने कहा बेटेलाल पहले जाकर अपनी किताब ढूँढ़ो जैसे डायरी गुमी थी और बाद में मिल गई वैसे ही वह भी मिल जायेगी, चिंता मत करो। पर ये महाराज आश्वस्त हैं नहीं मिलेगी। तभी हमने फ़िर से बोला बेटा पैसे पेड़ पर नहीं उगते हैं, तो हम तो इसके लिये पैसे नहीं देने वाले हैं।
हमें तभी बेटेलाल का जबाब मिला “हमें कुछ नहीं पता, हमें तो किताब लेनी है, और पैसे चाहिये!!!”, हमने फ़िर से कहा बेटा पैसे पेड़ पर नहीं उगते हैं, कहते हैं – “पैसे पेड़ पर उगते हैं”, हमने कहा फ़िर पता बताओ हम अभी वहीं से पैसे तोड़ लाते हैं और प्रधानमंत्री जी को भी बता देते हैं, बेटेलाल पूछते हैं कि ये प्रधानमंत्री जी कहाँ रहते हैं, हमने कहा दिल्ली में रहते हैं, बेटेलाल कहते हैं “उईई मैं तो इतनी दूर नहीं जा रहा उनको बताने कि पैसे का पेड़ कहाँ है”, हमने कहा अच्छा हमें तो बता दो।
बेटेलाल कहते हैं “वो पेड़ यहाँ बैंगलोर में थोड़े ही है, वह तो जयपुर में है, जयपुर में कांदिवली गाँव है, हमने कहा ओय्ये कांदिवली तो मुँबई में है, तो बेटेलाल कहते हैं अच्छा जयपुर की जगहों के नाम बताओ, हमने कहा हमें भी पता नहीं तो कहते हैं कि पुर्रपुर्रपुरम में है।
खैर यह संवाद तो इतना ही रहा, पर इतने संवाद में यह बात समझ में आ गई कि बेटेलाल को भी पता है कि पैसे का पेड़ नहीं है और कहीं उगते भी नहीं है, उनके लिये तो डैडी ही पैसे का पेड़ हैं, बस डैडी को हिलाओ और पैसे गिरने लगेंगे । मैं भी बेटे की मासूमियत भरी बातों को कहीं और से जोड़कर देखने लगा और अब सोच रहा हूँ कि काश मैं भी बच्चों जैसा पावन पवित्र मन वाला होता और इन बातों को यहीं खत्म कर कहीं किसी और काम में व्यस्त हो जाता ।
बनाना रिपब्लिक और मैंगो पीपल ( देखें वीडियो पहली बार )
देश की सबसे बड़ी राजनैतिक दल के दामाद याने कि देश के दामाद पर इन दिनों बहुत बड़े बड़े आरोपों की बौछार हो रही है।
हम भी सोचते हैं कि काश कि अपने भी कुछ लाख रूपये के इतने ही अनुपात में मात्र ३ वर्ष में करोड़ों रुपया हो जाता, जिस तरह से इन साब का बड़ा है।
जैसे हर वर्ष राजनैतिक दलों के नेता अपनी सम्पत्ति का ऐलान करते हैं और उनकी सम्पत्ति सीधे ५० प्रतिशत से २०० प्रतिशत के अनुपात में बड़ी होती है, यह तो वह सम्पत्ति होती है जो कि कानूनन वो ऐलान कर रहे हैं, जनता को दो नंबर वाली सम्पत्ति का तो पता ही नहीं चलता ।
इन नेताओं को आम जनता के लिये वित्तीय प्रबंधन के क्षैत्र में एक व्यापारिक संस्था खोलनी चाहिये और उसमें विज्ञापित भी किया जाना चाहिये आज से १ वर्ष पहले मेरे पास ४.५ करोड़ की संपत्ति थी और वह इस वर्ष बढ़कर १० करोड़ की हो चुकी है, आप भी अपना पैसा ऐसे ही एक वर्ष में बड़ा सकते हैं। सारे बैंकों की वाट लग जायेगी और बैंकें भी अपना पैसा इन नेताओं को निवेश करने के लिये देंगी या फ़िर इन नेताओं को अपना वित्तीय प्रबंधक रख लेंगी।
खैर बात कहाँ शुरू की थी और कहाँ आ गई, वैसे भी यह ऐसा मुद्दा है कि जितना लिखो उतना कम है। तो हम अपने असली मुद्दे पर आते हैं बनाना रिपब्लिक एवं मैंगो पीपल।
बनाना रिपब्लिक याने कि चूसा हुआ लोकतंत्र, और मैंगो पीपल याने कि उसी चूसे हुए लोकतंत्र की आम जनता । अब बनाना रिपब्लिक बनाने में दामाद जी से ही पूछा जाये कि उनके परिवार के दल की ही अहम भूमिका है, जो कि बेचारे मैंगो पीपल भी चिल्ला रहे हैं। ऐसा लगता है कि पब्लिक को पता ही नहीं है कि मैंगो पीपल क्या होता है और बनाना रिपब्लिक क्या होता है।
जब जेद्दाह में होते हैं तो वहाँ जियो टीवी का प्रसारण होता है और वहाँ BNN Network का Banana News आता है जो कि लगभग ३० मिनिट का होता है और पाकिस्तानी नेताओं पर तीखा कटाक्ष होता है। आप भी इस कार्यक्रम के प्रोमो को देखिये जिसमें बताया गया है कि नेता तो मैंगो पीपल को चूसकर बनाना रिपब्लिक बना चुके हैं, और मीडिया उनके पास आता है तो पहले कोई बहाना बनाकर टालने की कोशिश करते हैं और फ़िर बाद में बकायदा दायें बायें देखकर दौड़ लगा देते हैं, नेता भी क्या फ़िट बताया है कि मीडिया थक जाता है परंतु नेता को थकान नहीं होती।
विचारों के प्रस्फ़ुटन से एक नई सृष्टि का निर्माण होता है।
कई बार सोचा इस क्षितिज से दूर कहीं चला जाऊँ और कुछ विशेष अपने लिये सबके लिये कुछ कर जाऊँ, परंतु ये जो दिमाग है ना मंदगति से चलता है, इसे पता ही नहीं है कि कब द्रुतगति से चलना है और कब मंदगति से चलना है। दिमाग के रफ़्तार की चाबी पता नहीं कहाँ है। और ये भी नहीं पता कि मंदगति से एकदम द्रुतगति पर कैसे ले जाया जाये।
सप्ताहांत में पाँचसितारा होटल में अकेला कमरे में दिनभर दिमाग दौड़ाने की कोशिश करता हूँ, परंतु दिमाग भी वातानुकुलन से प्रभावित हो चुका है और एक अजीब तरह का अहसास दिमाग में कुलबुलाने लगता है। शायद दिमाग इस होटल के कमरे की दीवारों की मजबूती देखना चाहता हो, हजारों विचार छिटक के इधर उधर निकल पड़ते हैं, दीवारों से टकराकर नष्ट होने की कोशिश करते हैं परंतु एक विचार के टूटने से चार नये खड़े हो जाते हैं। ज्यादा हो जाता है तो खिड़की के पास जाकर बाहर को देख लेता हूँ, सोचता हूँ कि शायद कुछ विचार इस खिड़की से बाहर गिर पड़ें और यह कमरा थोड़ा भारहीन हो जाये।
खिड़की के पास जाकर शीतलता का अहसास कम हो जाता है और तपन लगने लगती है, जब शीतलता से तपन में जाते हैं तो तपन अच्छी लगती है और ऐसे ही जब तपन से शीतलता में आते हैं तो शीतलता अच्छी लगती है। मानव को कौन समझ पाया है, पता नहीं जब मानव फ़ैसला लेता है तो वह दिमाग से लेता है या दिल से लेता है।
मानव को अपने आप को समझने की प्रवृत्ति ही मानव को अपने अंदर के प्रकाश की और धकेलती है, उसे समझने की कोशिश में ही मानव बाहरी ज्ञान को भूल अंतरतम में झांकने की कोशिश करता है, कभी यह कोशिश नाकाम होती है तो कभी यह कोशिश सफ़ल होती है।
रफ़्तार की भी अपनी गति होती है और स्थिरता के स्थिर में भी एक गति होती है, शून्य में कुछ भी नहीं है, जब विचार अपने पूर्ण वेगों से प्रस्फ़ुटित होते हैं, पूर्ण आवेग में आते हैं तो विचार अंगारित हो जाते हैं और विचारों के प्रस्फ़ुटन से एक नई सृष्टि का निर्माण होता है। कई बार गति आवेग और वेग सब जाने पहचाने से लगते हैं, अपने से लगते हैं। किंतु यह भी सर्वथा सार्वभौमिक सत्य है ‘गति, आवेग और वेग’ कभी किसी की साँखल से नहीं बँधा है। सब पूर्व नियत है, सब पूर्व नियोजित है।
काली चमड़ी के कारण आँखों और गर्दनों पर असर और वजन बढ़ना
जून महीने में जब पहली बार सऊदी आये थे तो अप्रत्याशित तरीके से २ किलो बजन बढ़ गया था, इस बार अभी तक २०० ग्राम तो बड़ ही चुका है, जबकि यहाँ आने के बाद व्यायाम ज्यादा कर रहे हैं।
यहाँ के खाने में हो सकता है कि कैलोरी कुछ ज्यादा हों और उसके लिये हमारा शरीर अभ्यस्त नहीं हो, अब इस बार दोगुना ज्यादा कैलोरी जलाना शुरू कर दिया परंतु फ़िर भी वजन थोड़ा बहुत बड़ा है। जबकि यह महीना रमजान का महीना है और खुले आम खाना पीना यहाँ अपराधिक श्रेणी में रखा जाता है। खुले आम खाना पीना और धूम्रपान वर्जित है।
ऐसा लगता है कि यहाँ की हवाएँ स्वास्थय के लिये अच्छी हैं और उससे स्वास्थ्य वर्धन हो रहा है, यहाँ पर अभी तापमान लगभग ३८ डिग्री होगा, परंतु गर्मी और धूप ३८ डिग्री वाली नहीं है, ऐसा लगता है कि अगर इस धूप में अगर थोड़ी देर खड़े हो गये तो जल भुन कर खाक हो जायेंगे। शाम को भी लू के थपेड़े जिस्म को लहुलुहान करते रहते हैं।
एक और खासबात कि यहाँ पर मर्द सफ़ेद लिबास में और औरत काले लिबास में पायी जाती है, हम कहते हैं कि यहाँ आकर मर्द की चमड़ी सफ़ेद और औरत की चमड़ी काली हो जाती है। हर औरत एक जैसी दिखती है क्योंकि काली चमड़ी ऊपर से नीचे तक एक जैसी होती है, जहाँ काली चमड़ी के बीच चमकने का कोई रोलपार्ट ही नहीं है।
काली चमड़ी होने के कारण न आँखों को इधर उधर जोर देना होता है और ना हई अस्वाभाविक या स्वाभाविक रूप से आँखों और गर्दनों को घुमाना पड़ता है, जब अलग अलग प्रकार की चमड़ी प्रदर्शित होगी केवल तभी आँखों और गर्दन को कष्ट होगा, अब आँखों और गर्दन का काम भी कम हो गया है तो इसके कारण भी कम कैलोरी जल रही हैं।
अभी कारण और भी होंगे जिस पर विश्लेषण जारी है।
चिकन समोसा मटन समोसा और आलू समोसा
कठिनाईयों भरे ये दिन
जीवन में सभी प्रकार की कठिनाईयाँ आती रहती हैं, और हमें अपने जीवन में सारी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। सारी मजबूरियों के मारे होते हैं और सारे हालात से समझौता करना पड़ता है।
अभी यह मेरा जेद्दाह में दूसरा ट्रिप है, पहला ट्रिप ठीक ठाक निकल गया था, परंतु दूसरे ट्रिप में बहुत सारी कठिनाईयाँ हैं, तो यह भी समझ लें कि जीवन में यह भी एक सीख ही है।
रमजान का महीना चल रहा है और यहाँ गैरमुस्लिमों के लिये जीना बहुत मुश्किल हो जाता है, यहाँ पर सभी रोजा रखते हैं, और सारा बाजार सुबह के ४ बजे से रात ९ बजे तक बंद रहता है, खाने के लिये रेस्त्रां भी शाम ५ बजे खुलते हैं, पर रेस्त्रां में जाकर खा नहीं सकते, ५ से ७ के बीच आप केवल पार्सल करवा सकते हैं, फ़िर शाम ७ बजे के बाद रेस्त्रां में खा सकते हैं।
और ७ बजे के बाद रेस्त्रां जाने के लिये टैक्सी मिलना बहुत मुश्किल होता है, क्योंकि लगभग सभी लोग इफ़्तार पर गये होते हैं। यहाँ पर असली समां तो शाम ७ बजे बाद ही शुरू होता है, जीवन में गति भी शाम ७ बजे बाद आती है। ७ बजे से ट्राफ़िक बड़ना शुरु होता है और रात ९ बजे के बाद तो ट्राफ़िक अपने चरम पर होता है।
यहाँ पर सभी लोग ७ बजे के बाद इफ़्तार करते हैं और सुबह ३.३० पर सहर करते हैं, समय थोड़ा आगे पीछे होता है । ऐसे ही बाजार भी रात्रि ९ बजे से सुबह ४ बजे तक खुले रहते हैं, बाजार मतलब कि सारे प्रकार के बाजार मॉल, दुकानें और पटरी बाजार भी।
खुलेआम खाना पीना और धूम्रपान मना होता है। अगर किसी गैरमुस्लिम को यह सब करना भी है तो उसे सार्वजनिक जगहों पर नहीं करना चाहिये। यहाँ कार्यालयों का समय १० से ४ हो जाता है पर केवल उनके लिये जो रोजे रखते हैं और बाकियों के लिये ८ से ५ ही होता है।
शाम को जगह जगह इफ़्तार पार्टिंयों का आयोजन होता है, बस शाम को जल्दी मतलब कि ५ बजे के बाद शाकाहारी भोजन कुछ चुनिंदा रेस्त्रां में ही उपलब्ध होता है, अधिकतर रेस्त्रां में शाकाहारी भोजन रात्रि ९ बजे बाद उपलब्ध होता है।
थोड़े दिनों की कठिनाईयाँ और हैं, फ़िर जीवन वापिस से पटरी पर आ जायेगा, एक बात और है कि यहाँ घूमने के लिये ऐसा कोई पर्यटक स्थल नहीं है, अगर कुछ है भी तो इतनी बंदिशें हैं कि जाने से पहले इच्छा ही खत्म हो जाये और मौसम इस बात की इजाजत भी नहीं देता, क्योंकि मौसम अभी बहुत गर्म है रात में भी लू के थपेड़े लगते हैं।
सकारात्मक और नकारात्मक संकेत जीवन में ..
कभी कभी जो सोचो वह हो नहीं पाता और जो नहीं सोचो वह हो जाता है, पर अधिकतर छ्ठी इंद्रिय से जो संकेत मिलते हैं वे हमेशा हमेशा बहुत ज्यादा करीब होते हैं। जीवन में ऐसे बहुत सारे वाकये हो रहते हैं जब हमें लगता है कि यह हमारा फ़ैसला नहीं, यह तो तकदीर का फ़ैसला है।
हम कितना भी किसी भी काम के बारे में सोच लें हमेशा उसके बारे में मन में विचारों में दो प्रकार की लहरें दौड़ती रहती हैं, एक नकारात्मक और एक सकारात्मक, जिसमें कई बार हम सकारात्मक और नकारात्मक दोनों लहरों के लिये कई पैमाने निर्धारित कर देते हैं। जैसे अगर आज यह कार्य हो गया तो मेरे काम में सकारात्मक परिवर्तन के संकेत हैं, परंतु अगर नहीं हुआ तो नकारात्मक परिवर्तन के संकेत हैं।
यह प्रक्रिया लगभग सबके साथ होती है जो कि निश्चलता से अपने कर्मों को निभाते हैं, जिनके मन की ऊर्जा का स्रोत हमेशा पवित्रता होती है। अपने निश्छल कर्मों से ऐसे लोग प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का भरपूर प्रयोग कर पाते हैं और वही प्रकृति प्रदत्त संसाधन उनके लिये छठी इंद्रिय का कार्य करती है।
ऐसे ही नकारात्मक संकेत भी प्रकृति प्रदत्त होते हैं, जो कि हमेशा समय समय पर इंसान को चेताते रहते हैं और इंसान को जीवन के अँधेरे में जाने से बचाता है, वहीं सकारात्मक संकेत जीवन के लक्ष्यों को अपने पूर्ण रूप में प्राप्त करने में मदद करते हैं।
जरूरत है हमें अपने जीवन में सारे कार्यों को निश्छल भाव से पूर्ण करने की, सारे कार्यों को पूर्ण करने के संकेत हमें प्रकृति हमेशा सकारात्मक और नकारात्मक रूप में हमेशा देती है। अत: कोई भी कार्य करें पूर्ण लगन और ईमानदारी से करें, प्रकृति प्रदत्त ऊर्जा का स्रोत बना रहता है।
दिवास्वप्न बुरा या अच्छा … मेरी कविता .. विवेक रस्तोगी
एक दिवास्वपन आया मुझे
एक दिन..
श्री भगवान ने आशीर्वाद दिया,
सारे अच्छे लोग देवता रूपी
और
उनके पास हथियार भी वही,
सारे बुरे लोग राक्षस रूपी
और
उनके पास हथियार भी वही
समस्या यह हो गई
कि
देवता लोग कम
और
राक्षस ज्यादा हो गये
तब
श्री भगवान वापिस आये
और
देवता की परिभाषा ठीक की
फ़िर
देवता ज्यादा हो गये
और
राक्षस कम हो गये,
देवताओं ने राक्षसों पर कहर ढ़ाया
और
देवताओं का वास हो गया
फ़िर
कुछ देवता परेशान हो गये
क्योंकि
राक्षस गायब हो गये
तो
कुछ फ़िर से राक्षस बन गये।
असली ताकत तो हमारे पास ही है !
अन्ना का अनशन चल रहा है, सरकार, राजनैतिक पार्टियाँ और मीडिया अन्ना को मिल रहे समर्थन को कम कर आंक रहे हैं। और देश की जनता को चिल्ला चिल्ला कर बता रहे हैं, देखा अन्ना के आंदोलन में कोई दम नहीं है, अप्रत्यक्ष रूप से यह कह रहे हैं, “देख लो, सारे ईमानदारों, तुम सबकी हम भ्रष्टाचारियों के सामने कोई औकात नहीं है”।
मीडिया भी निष्पक्षता से खबरें नहीं बता रहा है, सब के सब मिल चुके हैं, केवल अन्ना एक तरफ़ है और दूसरी तरफ़ ये सारे बाजीगर। इन बाजीगरों को लग रहा है कि इन लोगों ने जैसे अन्ना और जनता को हरा दिया है। पर क्या इन बाजीगरों को पता नहीं है कि जनता से वे हैं, जनता उनसे नहीं।
जनता सब देख रही है, समझ रही है, वैसे समझदार लोगों के लिये अभी कुछ महीनों में जो चुनाव हुए हैं, वो ही जनता की सोच और ताकत समझने के लिये काफ़ी हैं।
देखते हैं कि ये सारे कब तक अपना पलड़ा भारी समझते हैं, क्योंकि असली ताकत तो हमारे पास ही है, ठीक है कुछ लोगों की ताकत बिकाऊ है परंतु सरकार बनाने जितनी ताकत खरीदना असंभव है।
देखो कि अगली सरकार जनता की ताकत से बनती है या सरकार की खरीदी हुई ताकत से।
वैसे सरकार यह ना समझे कि अन्ना वहाँ जंतर मंतर पर अकेले हैं, अन्ना के समर्थन में घर पर भी बहुत सारे लोग हैं जो अन्ना के साथ हैं बस जंतर मंतर पर नहीं हैं।

