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दाम्पत्य जीवन के १२ सुनहरे वर्ष

जीवन निर्जीव था, बिल्कुल रेगिस्तान जैसा जहाँ आँधियाँ तो आती थीं, बबंडर तो आते थे, परंतु केवल रेत के, जहाँ कोई दूसरा उन उड़ती हुई रेत को नहीं देख पाता था, बस अकेला यह निर्जीव उन रेत के रेलों के बीच इधर से उधर बहता रहता था। ये रेत और रेगिस्तान बहुत लंपट होते हैं, जब कभी सोचने में आता कि शायद यहाँ जल होता पर मृगतृष्णा उन सपनों को साकार होने के पहले ही कहीं किसी दूर देस में विलीन कर देती। ये अंधड़ भी उन मृगतृष्णाओं से मिले हुए थे।

तभी कहीं से मेरी जिंदगी में एक सावन की फ़ुहार, बसंत की बयार आई, जहाँ मैं अपने ऊपर बीते हुए उन अंधड़ों के प्रकोप को भूल गया, केवल हर तरफ़ चारों ओर जीवन में स्नेहिल प्रेम की झिलमिल बारिश थी, कहीं पीले रंग के कहीं लाल रंग के कहीं ओर भी चटक रंग के फ़ूल कहीं से मेरी जिंदगी में प्रवेश कर चुके थे।

आज ठीक १२  बरस हो गये हैं तुम्हें मेरी जिंदगी में आकर, और तुमने मेरे मन के रेगिस्तान को जो उपवन का रूप दिया है, वह मेरे लिये बहुत है, आज ही के दिन मेरी जिंदगी का नया चेप्टर शुरू हुआ था जिसकी शुरूआत तुमने की थी जिससे मैंने अपनी जिंदगी में एकदम कई नये रंगों का आना देखा, मेरी जिंदगी में १२ वर्ष पहले अचानक ही बसंत आ गया था जो कि कहीं बसंत पंचमी के आसपास था।

जीवन की दो महत्वपूर्ण उपयोगी चीजें पानी और पेपर नेपकीन

    जब से देश के बाहर आना शुरू किया है तब से दो चीजों की महत्ता पता चल गई है, पहला पानी और दूसरा है पेपर नैपकीन । अपने भारत में तो कोई समस्या नहीं, पानी भी बहुत है और हाथ धो भी लिये तो अपने ही रूमाल से पोंछना पड़ते हैं, क्योंकि साधारणतया: पेपर नेपकीन उपलब्ध नहीं होते।

    जब सऊदी आये तो यहाँ सब कुछ बदला हुआ था, पहली बार शौचालय में घुसे तो लगा कि अपने पुरूष वाले शौचालय में नहीं हैं गलती से महिलाओं वाले शौचालय में घुस आये हैं, बाहर जाकर देखा तो शेख को चिन्हित करता फ़ोटो लगा था, तब वापिस अंदर आ गये। क्योंकि पुरूषों वाले शौचालय में दोनों तरह के साधन उपलब्ध होते हैं और यहाँ केवल पश्चिमी और देशी पद्धति वाले बंद दरवाजे के शौचालय उपलब्ध थे, वो खुलेवाले खड़े होकर निवृत्त होने वाले शौचालय नहीं थे। बहुत आश्चर्य हुआ परंतु फ़िर भी बाहर निकले और साथी को बताया कि इधर तो ऐसे ही शौचालय हैं और अपने को तो वैसे वाले की आदत है। क्योंकि दुबई या अबुधाबी में साधारणतया: इस तरह के शौचालय भी उपलब्ध हैं।

    अब यहाँ पर टॉयलेट पेपर भी वो अपने २-३ तह वाला नहीं यहाँ पर तो सीधा पेपर रोल लोड कर देते हैं और फ़िर चाहे जितना पेपर खींचो और हाथ मुँह पोंछ लो, यह पेपर रोल पहले तो हमें बड़ा अजीब लगा था पर अब तो इसकी आदत पड़ गई है,  हमने कई लोगों को देखा हाथ मुँह धोकर इतना पेपर खींचते हैं कि अच्छा खासा छोटा तौलिया बन जाता है और फ़िर हाथ मुँह पैर सब उसी से पोंछ लेते हैं।

Hand Towel DispensersPaper Roll

    Auto cut paper towel dispensersकुछ रेस्टोरेंट में ऐसे ही रोल होते हैं परंतु उसमें कटर साथ में होते हैं, कुछ जो देसी किस्म के रेस्टोरेंट होते हैं, वहाँ बड़े बड़े रोल तार में करके लटका दिये जाते हैं, जितना मर्जी हो पेपर खींचो और हाथ पोंछ लो, पता नहीं यहाँ पर रोज ही कितने ही पेपर नेपकीन की खपत होती होगी, और तो और वो टिश्यु पेपर का अलग उपयोग किया जाता है।

    पानी लगभग सभी जगह बहुत ही कम मात्रा में उपलब्ध होता है, अधिकतर जगह पानी का फ़ोर्स बहुत कम होता है जिससे पानी के खर्च पर नियंत्रण रखा जा सके। यहाँ जेद्दाह में पानी अधिकतर डिस्टीलेशन से होता है, पीने का पानी अधिकतर इपोर्ट होता है। परंतु पर केपिटा पानी का खर्च दुनिया में सबसे ज्यादा होता है, वैसे अभी थोड़े दिन पहले ही दोहा कतार के बारे में पढ़ रहे थे, उधर भी यही कहा जा रहा था। पता नहीं दोनों में ज्यादा पानी का उपयोग कौन करता है।

    जब तक दुनिया के लिये इनके पास ईंधन है, ये अपनी अमीरी से सबको रिझाते रहेंगे । वैसे एक बात और बता दूँ कि यहाँ पेट्रोल भारतीय रूपये में ७ रूपये लीटर और पानी १५ रूपये का ६०० एम.एल. है।

वो भी क्या दिन थे..

वे दिन बीते हुए भी अभी बहुत ज्यादा समय नहीं हुआ है, जब न ये आधुनिक दूरसंचार के बेतार वाले उपकरण थे और न ही ये अंतर्जाल और आपस में बातचीत के लिये सुविधाएँ उपलब्ध थीं।

अगर कहीं जाना भी होता था तो उस समय पहले से ही कार्यक्रम तय हो जाते थे और फ़िर नियत वक्त पर मिल लिया करते थे, ऑफ़िस के सहकर्मी से मिलना हो या फ़िर दोस्तों के साथ मिलना हो। कई चीजें नियत थीं, फ़लाना समय पर फ़लानी जगह पर मिलन है, उस समय वह अड्डा हुआ करता था। अगर कोई पूछ भी ले तो कोई भी आसानी से बता दिया करते थे कि शाम के वक्त तो अभी वे उस जगह मिलेंगे उसके बाद वे उस जगह अपने दोस्तों के साथ होंगे फ़िर घर निकल जायेंगे।

अगर कोई किसी कारणवश नियत जगह पर नहीं पहुँच पाता तो साथी सोचते कि शायद कुछ जरूरी कार्य आन पड़ा होगा, नहीं तो अपने अड्डे पर जरूर मिलता। कोई ज्यादा ही चिंतित होता तो झट से अपनी साइकिल लेकर खोज में निकल पड़ता था ।

उन दिनों शायद दोस्तों और परिवारों के बीच समय का मानक एक ही था, थोड़ा बहुत ही समय आगे पीछे हुआ करता था। समय का महत्व वाकई उन दिनों में हुआ करता था, ना ज्यादा दोपहिया वाहन हुआ करते थे और ना ही चौपहिया वाहन। उन दिनों अधिकतर व्यक्ति अपनी शारीरिक ऊर्जा पर ही निर्भर हुआ करता था फ़िर चाहे वो पैदल चलना हो या साइकिल चलाना । खबरें भी तेजी से अपना रास्ता तय करती थीं, खबरों को रास्ता तय करने के लिये किसी दूरसंचार उपकरणों पर आश्रित नहीं रहना पड़ता था।

शाम को घूमने जाने के लिये दोस्त लोग घर के बाहर से आवाज दिया करते थे, अगर ज्यादा समय लगने वाला होता तो बता दिया जाता था कि आज किधर की तरफ़ घूमने जाने वाले हैं, लगभग हर चौराहे और रास्ते के लोग, लगभग सभी को जानते थे, और वे पीछे आने वाले लोगों का मार्ग प्रशस्त कर दिया करते थे, बस अभी दस मिनिट पहले ही इधर से निकले हैं।

समय की धुरी उन दिनों निश्चित थी, समय अपनी गति से चलता था, समय को कोई भी अपनी गति से चलाने की कोशिश नहीं करता था। आज आधुनिक उपकरणों के बीच में सभी लोग समय को अपनी गति से चलाने की कोशिश करते हैं, परंतु समय फ़िर भी अपनी ही गति से चल रहा है, जैसे पहले चला करता था, सबके मानसिक धरातल बदल गये हैं, आज भी यही याद आता है “वो भी क्या दिन थे” ।

भारतीय मानसिकता घाटे में बाहर निकलने की नहीं है

हाल ही में ऐसे बहुत सारे लोगों से मिलना हुआ जो कि शेयर बाजार की समझ नहीं रखते परंतु फ़िर भी शेयर बाजार में अपना निवेश कर बैठे थे, वह भी तब मतलब कि २००८ – २००९ जब बाजार अपनी उच्च अवस्था पर था। उस समय हालात यह थे कि जिसको कुछ पता नहीं था वह भी शेयर बाजार में रूचि लेने लगा था और अपना निवेश बाजार में करके उस रैली का फ़ायदा उठाना चाहता था, परंतु उसे शेयर बाजार के मुगलों की जानकारी नहीं थी, जैसे ही आम आदमी का पैसा शेयर बाजार में आया, मुगलों ने अपनी कारीगरी दिखाई और बाजार को आसमान से उठाकर जमीन पर पटक दिया।

और ये नये निवेशक केवल बाजार को औंधे मुँह गिरते देखते रहे, चूँकि इन्होंने अपने गाढ़ी कमाई का पैसा लगाया था तो सोचा कि घाटा लेने से अच्छा है कि थोड़ा इंतजार कर लिया जाये और जब अपने भाव मिल जायेंगे तब बाजार से बाहर हो जायेंगे, परंतु उनका दुर्भाग्य कि वह दिन कभी नहीं आया। क्योंकि उन दिनों अच्छी कंपनियों के साथ साथ बेकार कंपनियों के भाव भी आसमान छू रहे थे, ये नवागत निवेशक अपने आप को उस बाजार में शामिल कर अपने आप को फ़न्ने खाँ समझ रहे थे। आज की हालात में भी उनके पोर्टफ़ोलियो ७०% घाटा दर्शा रहे हैं, हम तो उन्हें अब भी यही सलाह दे रहे हैं कि ३०% जो मिल रहा है उसे निकालकर किसी अच्छी म्यूचयल फ़ंड में डाल दो, तो अगले कुछ अरसे में कम से कम आपने जितना पैसा लगाया था उतना तो हो ही जायेगा।

किंतु भारतीय मानसिकता घाटे में बाहर निकलने की नहीं है, हमें तो बस सुनहरे स्वप्न देखने को चाहिये, जब घाटा होता है तो कहते हैं कि अपनी तो किस्मत ही खराब थी, और जब मुनाफ़ा होता है तो कहते हैं देखा अपनी अक्ल का कमाल, हारना किसी को अच्छा नहीं लगता । परंतु निवेश जो कि आम इंसान अपनी गाढ़ी कमाई से करता है उसे अपने निवेश को हमेशा व्यावसायिक नजरिये से देखना चाहिये।

हमेशा निवेश करते समय अपना घाटा सहने की शक्ति का आकलन कर लें, हमेशा स्टॉप लॉस लगाकर बाजार में निवेश करें, अगर अच्छी कंपनी में निवेश कर रहे हैं तो उसके अच्छे परिणामों का इंतजार भी करें। परंतु हमारे भारतीय निवेशक करते हमेशा उल्टा हैं। बाजार में निवेश का कोई समय बुरा नहीं होता, फ़िर भले ही इन्डेक्स कम हो या ज्यादा । केवल निवेशक को अपनी रकम ऐसी कंपनी में निवेश करनी चाहिये जो उस समय कम भाव पर हो, और इसके लिये तगड़े विश्लेषण और अपने कुछ अच्छे जानकारों की सलाह लेनी चाहिये।

जैसे कि घाटे के लिये आकलन करना चाहिये बिल्कुल वैसे ही मुनाफ़े का भी पहले से आकलन करना चाहिये, अगर १०% के मुनाफ़े की उम्मीद कर रहे हैं तो बेहतर है कि उतने पर ही मुनाफ़ा लेकर बाहर हो जायें, परंतु हमारे यहाँ के निवेशक इस पर भी ध्यान नहीं देते, हमारे यहाँ के निवेशक को जरूरत है बेहतर विश्लेषण की जो कि उसे खुद करना चाहिये, हमेशा ध्यान रखें अगर कोई निवेशक को टिप दे रहा है कि फ़लाना शेयर खरीद लें या बेच दें तो उसमें कहीं ना कहीं उसका निजी स्वार्थ है। कार्य हमेशा वही करना चाहिये जिसमें आपको खुद ज्ञान हो, दूसरों के भरोसे दुनिया में कभी नहीं चला जाता, दूसरों के भरोसे चलने वाले हमेशा धोखा ही खाते हैं। बेहतर है कि पहले सीखें और फ़िर कुछ करें ।

रात्रि का सफ़र और दिन भर नींद

    इस बार सफ़र कुछ जल्दी ही हो गया, केवल तीन दिन ही भारत में परिवार के साथ व्यतीत कर पाये थे कि तीसरे दिन की रात्रि को ही घर से निकलना था, क्योंकि सुबह ४.३० बजे की फ़्लाईट थी और अंतर्राष्ट्रीय यात्रा के लिये ३ घंटे पहले पहुँचना होता है, वैसे तो वेब चेक इन कर लिया था, तो १.५ घंटे पहले भी पहुँचते तो काम चल जाता । परंतु हमने सोचा कि दो बजे तो निकलना ही है उसकी जगह १२ बजे ही निकल लेते हैं, अगर नींद नहीं खुली तो खामखाँ में घर पर ही सोते रह जायेंगे, और फ़िर २ बजे जरा नींद ज्यादा ही आती है, तो टैक्सी ड्राइवर साब भी झपकी मार लिये गाड़ी चलाते हुए तो बस कल्याण ही हो जायेगा।

समय से मतलब कि १ बजे रात्रि को हवाई अड्डे पहुँच गये, सोचा इतनी जल्दी भी क्या करेंगे, उधर जाकर । पहले कैफ़ोचीनो पीते हैं आराम से और फ़िर थोड़ी देर बैंगलोर की रात की ठंडक के मजे लेते हैं। जींस के जैकेट में भी ठंडक कुछ ज्यादा ही लग रही थी, सो ज्यादा देर बैठने का आनंद भी नहीं लूट पाये। चाँद की हसीन रोशनी में कोहरा देखना कभी कभी ही नसीब होता है। हवा में भरपूर नमी थी, और जितने भी लोग घूम रहे थे या बैठे थे, वे अपने भरपूर गरम कपड़े होने के बावजूद ठिठुर रहे थे। वैसे भी बैंगलोर में इस तरह से रात बिताने का संयोग से बनता है।

खैर जल्दी ही चाँद के आँचल से निकल कर हवाईअड्डे की पक्की इमारत के आगोश में आ गये। पता चला कि फ़्लाईट एक घंटा देरी से है, सोचा कि पहले लगता था कि केवल ट्रेन और बस ही देरी से चलते हैं और तो और ये हवाई कंपनी वाले एस.एम.एस. भी नहीं करते हैं । जब चेक इन के काऊँटर पर देखने पहुँचे तो लंबी लाईन लगी थी, और वेब चेकइन की लाईन खाली थी, हमारे एक और मित्र भी मिल गये थे लाईन में लगने के पहले, तो दोनों साथ ही चेक इन की लाईन में लग लिये और कब एक घंटा बातों में व्यतीत हो गया, पता ही नहीं चला, जब काऊँटर पर पहुँचे तो अधिकारी महोदय मुस्कराकर बोले कि आपने तो वेबचेक इन कर लिया था फ़िर इधर, हम कहे नींद नहीं आ रही थी, तो सोचा कैसे टाईम पास किया जाये सो लाईन में लग लिये, वे भी हँस पड़े। इमिग्रेशन फ़ॉर्म भरने के बाद इमिग्रेशन और सुरक्षा की बाधाएँ पार कीं, तो पाया सब हिन्दी बोलने वाले थे, और सुरक्षा में जो अधिकारी मौजूद थे वे तो ठॆठ हिन्दी बोल रहे थे, जैसे कि अधिकतर उत्तर भारत के राज्यों में बोली जाती है।

फ़िर लंबी कुर्सी पर लेट लिये पर नींद को हम आने नहीं दे रहे थे क्योंकि ३ घंटे बचे थे और एक बार हम सो जायें तो उठने की गारंटी तो अपनी है नहीं, तो बेहतर था कि जागकर नींद को न आने दिया जाये। जब फ़्लाईट में घुस गये तो सुबह के पाँच बज चुके थे और साढ़े पाँच को उड़नी थी, अपन तो कंबल ओढ़कर सो लिये।

लगभग चार घंटे की फ़्लाईट में पूरा समय सोकर निकाला, जब सुबह अबूधाबी पहुँचे तो केवल आठ ही बज रहे थे, याने की भारत में दस, हम समय से दो घंटे तेजी से भाग लिये थे, और अब हमें फ़िर ७ घंटे का इंतजार करना था, सो फ़िर लंबी आराम कुर्सी पकड़ी और सो लिये । घर से परांठे बनवाकर लाये थे, जब भूख लगी खाकर फ़िर सुस्ता लिये।

आखिरकार आठ घंटे इंतजार करने के बाद अपनी अगली फ़्लाईट का वक्त हो गया और सऊदी पहुँच गये, इधर भी पूरी फ़्लाईट में सोते सोते गये। इमिग्रेशन में १ घंटा लग गया फ़िर आधे घंटे में होटल पहुँच गये और फ़िर जल्दी ही शुभरात्रि कर बिस्तर में घुस गये।

कुछ फ़ोटो खींचे थे, अबूधाबी के ऊपर से वो हमारे टेबलेट में पड़े हैं, अभी लोड करने में आलस आ रहा है, तो फ़ोटो अगली पोस्ट में लगा देंगे।

स्नूज कार्यक्रम और सुबह का आलस

अगर ऑफ़िस जाने का समय जल्दी का हो तो सुबह उठने में कभी कभी आलस्य आने लगता है, रोज उसी समय उठो, रात को रोज अलार्म चेक करो कि हाँ भई अलार्म चल भी रहा है, जब से मोबाईल में अलार्म लगाने लगे हैं, तो मोबाईल झट से गणना करके बता भी देता है कि कितने घंटे और कितने मिनिट अलार्म बजने में लगे हैं, और लगता है कि अरे केवल इतनी ही देर सोने को मिलेगा।

सुबह उठना बचपन से अच्छा लगता है, ऐसा नहीं है कि अब नहीं लगता परंतु कभी कभी देर तक सोने की इच्छा हो जाती है और ये अलार्म इतनी जल्दी बज जाता है कि बस, ऐसा लगता है कि अभी अभी सोये थे और इतनी जल्दी सुबह हो गई, अभी नई अलार्म लगाया है जिसमें पक्षिओं के कोलाहल के बीच मधुर ध्वनि सुनाई पड़ती है, इस अलार्म को सुनकर तो नींद और लेने का मन करता है, ऐसा लगने लगता है कि कहीं बागीचे में ठंडी बयार में घास पर लेटे हुए इन आवाजों को सुन रहे हैं।

अभी कम से कम रोज ४-५ बार तो स्नूज करना पड़ता है ५ मिनिट के स्नूज में फ़िर भी २०-२५ मिनिट सो जाते हैं, इसे कहते हैं अर्धचेतन अवस्था, और जो सपना पूरा नहीं हो पाता है, उसे फ़ास्ट फ़ार्वर्ड करके पूरा कर लेते हैं।

स्नूज का कार्यक्रम अच्छा लगा मोबाईल में, नहीं तो पहले जब घरवाले उठाते थे तो कभी कभी प्रवचन से दिन की शुरूआत होती थी, पर अब अलार्म ने आसान कर दिया है, पहले वाली घड़ी में स्नूज वाला कार्यक्रम नहीं था।

दिन भर एक्सेल, वर्ड, पीडीएफ़ और ईमेल में गुजरता है, लंबे लंबे फ़ोन कॉल होते हैं, कभी पढ़ते हुए कभी सुनते हुए और कभी बोलते हुए उन तन्हाईयों में भी कोई विचार आ जाता है। पता नहीं ये विचार कहाँ कितनी जगह लेते हैं, जरा सी स्पेस मिली नहीं और विचार घुस जाता है। जो दिन भर करते हैं वही सपने रात में आते हैं, कभी किसी एक्सेल शीट में काम कर रहे होते हैं और काम चल रहा होता है, गणनाएँ कठिन होती हैं तो रात को सपने में भी वहीं एक्सेल शीट घूम रही होती है, और सपने में भी उसके सॉल्यूशन पर काम चलता रहता है।

कई बार ऐसा लगता है कि लंच के बाद ऑफ़िस खत्म हो जाना चाहिये, लंच के बाद घनघोर आलस आता है, मुँह में उबासी और आँखों में नींद होती है। पर जब कार्य होता है तो कार्य तो करना ही पड़ता है।

हम स्नूज कार्यक्रम का अच्छा उपयोग कर रहे हैं, अब सोचते हैं कि कोई मोबाईल ऐसा नहीं आये जिसमें नहीं उठने पर वो करंट मार दे या पानी की बाल्टी डाल दे ।

स्वप्न की पटकथा के लेखक और अभिनयकर्ता

स्वप्न हमारी मूर्क्षित जिंदगी के वे पल होते हैं जहाँ हम हमारे आसपास की घटनाओं और आसपास रहने वाले व्यक्तियों को देखते हैं। दिनभर में जो भी घटना हम पर प्रभाव डालती है उससे जुड़ी वे बातें जो हम देखना चाहते हैं और वास्तव में देखी नहीं हैं, वास्तव में स्वप्न में अपने आप वह कहानी बुन जाती है और हम उसे फ़िल्म जैसा देखते हैं।

कई बार हम अपने स्वप्न की कहानी खुद चला रहे होते हैं और यहाँ तक कि जो कार्यकलाप हम स्वप्न में देख रहे होते हैं, उन कार्यकलापों में हम उन वास्तविक व्यक्तियों की प्रतिमूर्ति अभिनय के रूप में देख रहे होते हैं, जिन्हें हम जानते हैं कि यह व्यक्ति इन कार्यकलापों में संलग्न है या अच्छा करता है।

स्वप्न अकारण भी नहीं होते हैं शायद प्रकृति की देन है कि हम स्वप्न में भी मनोरंजन चाहते हैं, और उस आनंद की अनुभूति करना चाहते हैं, जो वास्तव में कहीं पर भी नहीं है, देशकाल वातावरण कहीं का भी हो सकता है, जहाँ वास्तव में स्वप्नदर्शी गया ही नहीं हो, परंतु इस का एक बिंदु यह भी है कि व्यक्ति स्वप्न में अपनी सारी क्षमताओं का प्रदर्शन करता है, जो कि वास्तव में उसके पास होती ही नहीं हैं, यह भी कह सकते हैं कि उन क्षमताओं को व्यक्ति पाना चाहता है परंतु वास्तविक जिंदगी में वह पा नहीं सकता या उतना दृढ़ नहीं बन पाता कि वह उन क्षमताओं का अधिकारी पात्र हो।

स्वप्न अर्धचेतन अवस्था में भी होते हैं, जिसमें हम आधे जड़ और आधे चेतन होते हैं, जिसमें स्वप्न की कहानी की डोर स्वयं स्वप्नदर्शा के पास होती है, परंतु अर्धचेतन होने पर भी वह अपना स्वप्न पूर्ण कर पाता है, अधिकतर ऐसे स्वप्न प्रात:काल उठने के पहले होते हैं, यह वह समय होता है जब व्यक्ति अर्धचेतन अवस्था में अपने स्वप्न को किसी फ़िल्म की तरह अपने रंगमंच पर अपने कलाकारों के साथ बुन रहा होता है।

स्वप्न हमेशा वैयक्तिक चिंतन से संबंधित होते हैं, जैसा चिंतन पार्श्व मष्तिष्क में चल रहा होता है, वही स्वप्न की पटकथा निर्धारित करता है, बेहतर है कि हम अच्छे वातावरण में अच्छे विचारों के साथ रहें और अच्छे स्वप्न देखें।

आचार्य चतुरसेन कृत “सोमनाथ” और मेरा दृष्टिकोण..

    आज आचार्य चतुरसेन कृत “सोमनाथ” उपन्यास खत्म हुआ, इस उपन्यास को पढ़ने के बाद कहीं ना कहीं मन और दिल आहत है, बैचेन है.. कैसे हमारे ही लोग जो कि केवल अपने कुछ स्वार्थों के लिये गद्दारी कर बैठे.. और आखिरकार जिन लोगों के लिये गद्दारी की गई, जिस वस्तु के लिये गद्दारी की गई.. वह भी उनसे दगा कर बैठी.. और जिन लोगों से गद्दारी की गई.. उन लोगों ने उन्हें छोड़ा भी नहीं..

    किसी ने जाति के नाम पर .. किसी ने स्त्री के प्रेम में .. किसी ने गद्दी के लिये .. किसी ने अपने स्वार्थ के लिये .. किसी ने अपने अपमान के बदले के लिये .. अपने ही देव अपने ही धर्म को कलुषित किया .. और दूसरे धर्म ने कुफ़्र और काफ़िर कहकर .. अनुचित ही धर्मों को और उसकी संस्कृतियों को तबाह किया..

    छोटी छोटी रियासतों में आपस की दुश्मनी ने गजनी के महमूद को सोमनाथ पर चढ़ाई के दौरान बहुत मदद की.. छोटे और बड़े साम्राज्यों ने अपनी आन बान और शान बचाने के लिये जिस तरह से गजनी के महमूद के आगे समर्पण कर दिया.. वह भारत के लिये इतिहास का काला पन्ना है.. और जिन्होंने अपने प्राण न्यौछावार कर .. मरते दम तक अपनी मातृभूमि की रक्षा की.. उन्होंने अपना नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अमिट स्यासी से लिखवा लिया है..

    पुरातनकाल में जब राजाओं का शासन होता था.. तब की कूटनीति और राजनीतिक चालों में बहुत ही दम होता था.. जितने भी कूटनीतिज्ञ और राजनीतिक अभी तक मैंने इतिहास की किताबों में पढ़े हैं.. वे आज की दुनिया में देखने को नहीं मिलते हैं.. इसका मुख्य कारण जो इतिहास से समझ में आता है वह है ब्राह्मणों का उचित सम्मान और वैदिक अध्ययन को समुचित सहयोग ।

    सोमनाथ में चौहान, परमार, सोलंकी, गुर्जर आदि राजाओं का वर्णन जिस शूरवीरता से किया गया है, उससे क्षत्रियों के लिये हम नतमस्तक हैं.. परंतु वहीं जहाँ इन राजाओं के शौर्य और पराक्रम को देखने को मिलता है .. वहीं इनमें से ही कुछ लोगों द्वारा पीठ में छुरा घोंपने का भी काम किया..

    सोमनाथ पर आक्रमण और सोमनाथ को ध्वस्त करने के बाद जिस तरह से प्रजा को गुलाम बनाकर उनपर अत्याचार किये गये.. और शब्दचित्र रचा गया है.. बहुत ही मार्मिक है.. हरेक बात पर महमूद को कर चाहिये होता था.. क्योंकि वह भारत में शासन करने के उद्देश्य से नहीं आया था .. वह आया था केवल भारत को लूटने के लिये.. धार्मिक स्थलों को ध्वस्त करने के लिये और इस्लामिक साम्राज्य को स्थापित करने के लिये..

    गजनी का महमूद भले ही कितना भी शौर्यवान और पराक्रमी रहा हो.. परंतु यहाँ पर आचार्य चतुरसेन ने महमूद की कहानी को जो अंत किया है वह थोड़ा बैचेन कर देता है.. परंतु यह भी पता नहीं कि वाकई इस गजनी के महमूद का सत्य कभी सामने आ पायेगा ।

आत्मसंकल्प या बलपूर्वक

किसी भी कार्य को करने के लिये संकल्प चाहिये होता है, अगर संकल्प नहीं होगा तो कार्य का पूर्ण होना तय नहीं माना जा सकता है। जब भी किसी कार्य की शुरूआत करनी होती है तो सभी लोग आत्मसंकल्पित होते हैं, कि कार्य को पूर्ण करने तक हम इसी उत्साह के साथ जुटे रहेंगे।

परंतु असल में यह बहुत ही कम हो पाता है, आत्मसंकल्प की कमी के कारण ही दुनिया के ५०% से ज्यादा काम नहीं हो पाते, फ़िर भले ही वह निजी कार्य हो या फ़िर व्यापारिक कार्य । कार्य की प्रकृति कैसी भी हो, परंतु कार्य के परिणाम पर संकल्प का बहुत बड़ प्रभाव होता है।

कुछ कार्य संकल्प लेने के बावजूद पूरे नहीं कर पाने में असमर्थ होते हैं, तब उन्हें या तो मन द्वारा हृदय पर बलपूर्वक या हृदय द्वारा मन पर बलपूर्वक रोपित किया जाता है। बलपूर्वक कोई भी कार्य करने से कार्य जरूर पूर्ण होने की दिशा में बढ़ता है, परंतु कार्य की जो मूल आत्मा होती है, वह क्षीण हो जाती है।

उदाहरण के तौर पर देखा जाये कि अगर किसी को सुबह घूमना जरूरी है तो उसके लिये आत्मसंकल्प बहुत जरूरी है और व्यक्ति को अपने आप ही सुबह उठकर बाग-बगीचे में जाना होगा और संकल्पपूर्वक अपने इस निजी कार्य को पूर्ण करना होगा। परंतु बलपूर्वक भी इसी कार्य को किया जा सकता है, जिम जाकर, जहाँ ट्रेडमिल पर वह चढ़ जाये और केवल पैर चलाता जाये तो उसका घूमना जरूर हो जायेगा, परंतु मन द्वारा दिल पर बलपूर्वक करवाया गया कार्य है। किंतु वहीं बाग-बगीचे में घूमने के लिये आत्मसंकल्प के बिना घूमना असंभव है, क्योंकि तभी व्यक्ति के हाथ पैर चलेंगे। जब हाथ पैर चलेंगे, उत्साह और उमंग होगी तभी कार्य पूर्ण हो पायेगा।

कार्य पूर्ण होना जरूरी है, फ़िर वह संकल्प से हो या बलपूर्वक क्या फ़र्क पढ़ता है, संकल्प से कार्य करने पर आत्मा प्रसन्न रहती है, परंतु बलपूर्वक कार्य करने से आत्मा हमेशा आत्म से बाहर निकलने की कोशिश करती है।